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अध्यात्म

त्रिविध दु:खों का निवारण पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

समस्त दु:खों के कारण तीन हैं- अज्ञान, अशक्ति और अभाव। इन तीनों कारणों को जो जिस सीमा तक अपने आपसे दूर करने में समर्थ होगा, वह उतना ही सुखी बन सकेगा। अज्ञान के कारण मनुष्य का दृष्टिकोण दूषित हो जाता है, वह तत्वज्ञान से अपरिचित होने के कारण उल्टा- पुल्टा सोचत...

उच्च मानसिकता के चार सूत्र पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

व्यवहार की धर्मधारणा और सेवा-साधना सद्गुणों के जीवन में उतारने भर से बन पड़ती है। इसके अतिरिक्त दूसरा क्षेत्र मानसिकता का रह जाता है। उसमें चरित्र और भावनात्मक विशेषताओं का समावेश किया जा सके, तो समझना चाहिए लोक-परलोक दोनों को ही समुन्नत स्तर का बना ल...

उचित- अनुचित की कसौटी पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

उचित-अनुचित का निष्कर्ष निकालने और किधर चलना है, किधर नहीं इसका निर्णय करने की उपयुक्त बुद्धि भगवान ने मनुष्य को दी है। उसी आधार पर उसकी गतिविधियाँ चलती भी हैं पर देखा यह जाता है कि दैनिक जीवन की साधारण बातों में जो विवेक ठीक काम करता है वही ...

वास्तविक सफलता पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

जीवन की वास्तविक सफलता और समृद्घि आत्मभाव में जागृत रहने में है। जब मनुष्य, अपने को आत्मा अनुभव करने लगता है तो उसकी इच्छा, आकांक्षा और अभिरूचि उन्हीं कामों की ओर मुड़ जाती है, जिनसे आध्यात्मिक सुख मिलता है। मनुष्य परोपकार, परमार्थ, सेवा, सहायता, दान, ...

व्यक्तिपरक संदर्भ पं श्रीराम शर्मा आचार्य

आज का व्यक्ति समस्याओं के जाल में दिन- दिन जकड़ता चला जा रहा है। क्या धनी, क्या निर्धन, क्या विद्वान, क्या अशिक्षित, क्या बीमार, क्या स्वस्थ, सभी स्तर के मनुष्य अपने को अभावग्रस्त और संकटग्रस्त स्थिति में पाते हैं। भूखे को पेट दर्द- दूसरी तरह का और ...

विचार एक मजबूत ताकत पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

शुभ सात्विक और आशापूर्ण विचार एक वस्तु है। यह एक ऐसा किला है, जिसमें मनुष्य हर प्रकार के आवेगों और आघातों से सुरक्षित रह सकता है। लेकिन मनुष्य को उत्तम विचार ही रखने और अपनी आदत में डालने अभ्यास निरंतर करना चाहिए। विचार फालतू बात नहीं है। यह एक मजबूत ...

विचार- क्रान्ति की महती आवश्यकता पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

एक समय था जब अवांछनीयता व्यक्तियों या तत्त्वों को हटाने के लिए प्रधानतया शस्त्रबल से ही काम लिया जाता था, तब विचार-शक्ति की व्यापकता का क्षेत्र खुला न था। यातायात के साधन, शिक्षा, साहित्य, ध्वनि विस्तारक यंत्र, प्रेस आदि की सुविधाएँ उन दिनों न थीं और ...

विचार शक्ति (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

समुन्नत जीवन की व्यापक विस्तृत संभावनाओं का आधार सद्विचार ही है। विचारों की तरंगें, प्रकाश, ताप, ध्वनि एवं विद्युत् की अपेक्षा अधिक ही शक्तिशाली है, कम नहीं। विचार है क्या? प्राण शक्ति की स्फुरणा ही विचार है। फोटोन कण प्रकाश वेग से चलते हैं, ...

विधेयात्मक विचार पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

विचारणाओं भावनाओं की उत्कृष्टता ही मानवीय उत्कर्ष का, अभ्युदय का प्रमुख आधार है। जो इस तथ्य से भली- भाँति अवगत हैं, वे अपनी चिन्तन- चेतना को सदैव ऊध्र्वगामी बनाये रखने का प्रयत्न करते हैं। विचार शक्ति की महिमा से अनजान व्यक्तियों को जिस- तिस प्रकार ...

वीरों का कैसा हो वसंत (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

आज वसंत पर्व पर बहती वासंती बहार की सरसाहट में एक सवाल है- वीरों का कैसा हो वसंत? वसंत महोत्सव मनाने के वीरों के अपने निराले ढंग हैं। ये मानवता के लिए मर मिटने के लिए वसंती चोला ओढ़ते हैं, कष्टों को सहते हैं, तिल- तिल करके जलते और गलते हैं, पर आदर्शों के ...

विशेष अनुदान विशेष दायित्व पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

भगवान् ने मनुष्य के साथ कोई पक्षपात नहीं किया है, बल्कि उसे अमानत के रूप में कुछ विभूतियाँ दी हैं। जिसको सोचना, विचारणा, बोलना, भावनाएँ, सिद्धियाँ- विभूतियाँ कहते हैं। ये सब अमानतें हैं। ये अमानतें मनुष्यों को इसलिए नहीं दी गई हैं कि उनके द्वारा वह सुख- ...

व्यक्तित्व गठन हेतु अवलम्बन (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

व्यक्तित्व का गठन मूलत: विचारों पर निर्भर है। चिंतन मन को ही नहीं शरीर को भी प्रभावित करता है। मनोकायिक गड़बडिय़ाँ चिंतन की गिरावट का ही परिणाम है। चिंतन की उत्कृष्टता को अपनाने तथा उसे व्यावहारिक जगत में उतारने से ही भावनात्मक तथा सामाजिक समंजन ...

व्यक्तित्व गठन एकमात्र अवलम्बन (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

व्यक्तित्व का गठन मूलत: विचारों पर निर्भर है। चिन्तन मन को ही नहीं, शरीर को भी प्रभावित करता है। मनोकायिक गड़बडिय़ाँ चिन्तन की गिरावट का ही परिणाम है। इस बात को प्राय: सभी मनोवैज्ञानिक एकमत से स्वीकार करते हैं। चिन्तन की उत्कृष्टता को अपनाने तथा उसे ...

व्यक्तित्व को सुसंस्कृत बनायें पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

मनुष्य एक अबोध शिशु के रूप में इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। तब न उसमें भला- बुरा सोचने की क्षमता होती है और न किसी तथ्य को समझाने, परिस्थितियों से लाभ उठाने या अपने गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत करने की शक्ति। मनुष्य की जीवन यात्रा किसी पाठशाला में भर्ती ...

आइए उजले संकल्प करें पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

महान विचार ही महान परिस्थितियों को उत्पन्न करते हैं और अपनाने वालों को महान बनाते हैं। संसार की महान घटनाएं महान विचारों के कारण ही संभव हुई हैं। उन्हीं ने समय को बदला और उपयुक्त वातावरण बनाया है। विचारों के नियंत्रण से बड़ी शक्तियां प्राप्त की जा ...

उपासना का स्वरूप और मर्म पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य

पूजा- विधि में लोग आमतौर से अपनी- अपनी रुचि और सुविधा के अनुरूप जप, ध्यान और प्राणायाम का अवलम्बन अपनाते हैं। इन तीनों का प्राण- प्रवाह तभी वरदान बन कर अवतरित होता है, जब इन तीनों के पीछे अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई प्रेरणाओं को अपनाया जाये। नाम जप का ...

दृष्टिकोण बदलने से परिवर्तन संभव पं श्रीराम शर्मा आचार्य

किस दान की महिमा कब अत्यधिक बढ़ी- चढ़ी मानी जाती है? इसके उत्तर में एक ही बात कही जा सकती है कि जब जिस विपत्ति का अत्यधिक प्रकोप हो, तब उसके निराकरण का उपाय ही सर्वश्रेष्ठ दान है। प्यास से संत्रस्तों को पानी, भूख से तड़पतों को अन्न, अग्निकाण्ड का शमन करने के ...

मानसिक स्वच्छता का महत्त्व पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

मन की चाल दोमुँही है। जिस प्रकार दोमुँही साँप कभी आगे, कभी पीछे चलता है, उसी प्रकार मन में दो परस्पर विरोधी वृत्तियाँ काम करती रहती हैं। उनमें से किसे प्रोत्साहन दिया जाय और किसे रोका जाय, यह कार्य विवेक बुद्धि का है। हमें बारीकी के साथ यह देखना होगा कि ...

प्रेम या अपनत्व पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

अपनों के लिए स्वभावत: उनके दोषों को छिपाने और गुणों को प्रकट करने की आदत होती है। कोई भी पिता अपने प्यारे पुत्र के दोषों को नहीं प्रकट करता है। वह तो उसकी प्रशंसा के पुल ही बाँधता रहता है। दुर्गुणी बालक को न तो कोई मार डालता है और न जेल ही पहुँचा देता है, वर...

नारी जागरण की दूरगामी सम्भावनाएँ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

भावनाशील प्रतिभाओं को खोजना, एक सूत्र में बाँधना और उन्हें मिलजुल कर सृजन के लिए कुछ करने में जुटाना सतयुग की वापसी का शिलान्यास है। इसके उपरान्त ही उज्ज्वल भविष्य का भव्य भवन खड़ा हो सकने का विश्वास किया जा सकता है। इसलिए इसे सम्पन्न करने के ...

नवसृजन की चेतना असमर्थ नहीं है पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

छोटी, सामाजिक, स्थानीय एवं व्यक्तिगत समस्याओं के उपाय- उपचार छोटे रूप में भी सोचे और खोजे जा सकते हैं, पर जब समस्या बड़ी हों, तो उनसे निपटने के लिए बड़े पैमाने पर तैयारियाँ करनी होती हैं। नल का पानी कुछ लोगों की आवश्यकता पूरी कर सकता है, किंतु सूखाग्रस्त ...

निराशा हर स्थिति से हटे पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

अनाचार अपनाने पर प्रत्यक्ष व्यवस्था में तो अवरोध खड़ा होता ही है, साथ ही यह भी प्रतीत होता है कि नियतिक्रम के निरंतर उल्लंघन से प्रकृति का अदृश्य वातावरण भी इन दिनों कम दूषित नहीं हो रहा है। भूकम्प, तूफान, बाढ़, विद्रोह, अपराध, महामारियाँ आदि इस तेजी से ...

निरोगी काया पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

मनुष्य जन्म अगणित विशेषताओं और विभूतियों से भरापूरा है। हर किसी को यह छूट है कि जितना महापुरुषों, संतों ने अपने आपको ऊँचा उठाया है, पर यह संभव तभी है, जब शरीर और मन पूर्णतया स्वस्थ हो। जो औरों के लिए, जितना उपयोगी और सहायक सिद्ध होता है, उसे उसी अनुपात ...

निश्चयात्मक स्वभाव बनायें (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

बिजली के बारे में जानकार व्यक्ति जानते हैं कि ऋण (निगेटिव) और धन (पॉजीटिव) दो प्रकार की धाराएँ मिलकर स्फुरण उत्पन्न करती हैं। मनुष्य शरीर में यह दोनों प्रकार की धाराएँ विद्यमान्ï हैं और उन्हीं के आधार पर जीवन के सारे कायों का संचालन होता है। किसी ...

परावलम्बन छोड़, आत्मावलम्बन अपनाएँ (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

प्रगति के पथ पर चलते हुए यदि दूसरों का सहयोग मिल सकता है, तो उसे प्राप्त करने में हर्ज नहीं। सहयोग दिया जाना चाहिए और आवश्यकतानुसार लेना भी चाहिए। पर इस तथ्य को ध्यान में रखना चाहिए कि हमारी मूलभूत आवश्यकता हमें स्वयं ही पूरी करनी पड़ती है, ...

परिस्थितियों का जन्मदाता पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

अध्यात्मवाद का दूसरा सिद्धान्त है ‘‘आत्मनिर्भरता।’’ अपने ऊपर विश्वास करना, अपनी शक्तियों पर विश्वास करना एक ऐसा दिव्य गुण है जो हर कार्य को करने योग्य साहस, विचार एवं योग्यता उत्पन्न करता रहता है। दूसरों के ऊपर निर्भर रहने से अपना बल घटता है और ...

पात्रता एक चमत्कारी शक्ति (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

पात्रता के अभाव में सांसारिक जीवन में किसी को शायद ही कुछ विशेष उपलब्ध हो पाता है। अपना सगा होते हुए भी एक पिता मूर्ख गैर जिम्मेदार पुत्र को अपनी विपुल सम्पत्ति नहीं सौंपता। कोई भी व्यक्ति निर्धारित कसौटियों पर खरा उतरकर ही विशिष्ट स्तर की सफलता ...

प्रधानता आत्मा को पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

मनुष्य सामान्यत: जो बाह्य में देखता, सुनता और समझता है वह यथार्थ ज्ञान नहीं होता। किन्तु वह भ्रमवश उसी को यथार्थ ज्ञान मान लेता है। अवास्तविक ज्ञान को ही ज्ञान समझकर और उसके अनुसार ही अपने कार्यों को करने के कारण ही मनुष्य अपने मूल उद्देश्य सुख- ...

प्रगति के कदम- प्रतिज्ञाएँ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

दो कदम जीवन की उन्नति और प्रगति के लिए हैं। उनमें से एक- एक कदम समय रहते बढ़ा लेना चाहिए। पाप घटाएँ- विचार करना चाहिए कि हमारे शारीरिक- मानसिक और आध्यात्मिक पाप क्या- क्या हैं? और जो पाप अब तक हम करते रहे हैं? उनमें से एक पाप को छोड़ ही देना ...

प्राणवान प्रतिभाओं की खोज पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य

समय की माँग के अनुरूप दो दबाव इन दिनों निरंतर बढ़ते जा रहे हैं। एक व्यापक अवांछनीयताओं से जूझना और उन्हें परास्त करना। दूसरा है- नवयुग की सृजन व्यवस्था को कार्यान्वित करने की समर्थता। निजी और छोटे क्षेत्र में भी वह दोनों कार्य अति कठिन पड़ते हैं। फिर ...

प्रतिभा तो अंदर है, उसे निखारें पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रसुप्त प्रतिभा को जागरण का अवसर मिले, इसके लिए आवश्यक है कि श्रेष्ठ चिंतन से अंतराल को और दुष्ट आचरण से काय कलेवर को बचाए रहने का प्रयत्न किया जाए। यह तभी बन पड़ेगा जब अवांछनीय महत्त्वाकाँक्षाओं की हथकड़ी- बेड़ी से हाथ पैर खुले रहें। लोगों की ...

सभ्यताओं का समन्वय (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

सभ्यता और संस्कृति इस युग के दो बहु- प्रचलित विषय हैं। आस्थाओं और मान्यताओं को संस्कृति और तदनुरूप व्यवहार, आचरण को सभ्यता की संज्ञा दी जाती है। मानवीय सभ्यता या संस्कृति कहें या चाहे जो भी नाम दें, मानवीय दर्शन सर्वत्र एक ही हो सकता है, मानवीय संस्कृति ...

राष्ट्र की प्रगति का मूल आधार- चरित्रनिष्ठा (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

मनुष्य की सर्वोपरि सम्पदा उसकी चरित्रनिष्ठा है। यह एक ऐसा शब्द है, जो मानव के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का उद्बोधन करता है। व्यक्तिगत जीवन में कर्तव्य परायण, सत्यनिष्ठा, पारिवारिक जीवन में स्नेह- सद्भाव एवं सामाजिक जीवन में शिष्टता- शालीनता, ...

सच्चा मनुष्य कौन? पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

संसार के सर्वाधिक प्राचीन धर्मग्रन्थ ‘वेद’ में मनुष्य को उस मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्रदान की गई है, जिससे वह स्वयं देव- मानव बनकर संसार में दैवी प्रकृति के व्यक्तियों का निर्माण कर सके, ताकि समाज को निम्रगामी होने से बचाया और उसे उच्च स्थिति की तरफ ले ...

सादा जीवन- उच्च विचार (पं श्रीराम शर्मा आचार्य)

मानवी सत्ता शरीर और आत्मा का सम्मिश्रण है। शरीर प्रकृति पदार्थ है। उसका निर्वाह स्वास्थ्य, सौन्दर्य, अन्न- जल जैसे प्रकृति पदार्थों पर निर्भर है। आत्मा चेतन है। परमात्मा चेतना का भाण्डागार है। आत्मा और परमात्मा की जितनी निकटता, घनिष्ठता होगी, उतना ...

सद्गुरु की आवश्यकता (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

अनेक महत्त्वपूर्ण विधाएँ गुरु के माध्यम से प्राप्त की जाती हैं और तंत्र विद्या का प्रवेश द्वार तो अनुभवी मार्गदर्शक के द्वारा ही खुलता है। अक्षराम्भ यद्यपि हमारी दृष्टि में सामान्य सी बात है, पर छोटा बालक उस कार्य को अध्यापक के बिना अकेला ही ...

सद्विचारों का लाभ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

परमार्थ परायण जीवन जीना है तो उनके नाम पर कुछ भी करने लगना उचित नहीं। परमार्थ के नाम पर अपनी शक्ति ऐसे कार्यों में लगानी चाहिए जिनमें उसकी सर्वाधिक सार्थकता हो। स्वयं अपने अन्दर से लेकर बाहर समाज में सत्प्रवृत्तियाँ पैदा करना, बढ़ाना इस दृष्टि से सबसे ...

साधन और साध्य पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

गीताकार ने साधना क्रिया पर जोर देते हुए कहा है- ‘स्वकर्मणा तमभ्यच्र्य सिद्धिं विन्दति मानव:।’ (गीता १८/४६) जो व्यक्ति सच्चाई के साथ अपना कार्य करता है, उसे ही सिद्धि मिलती है। कर्म साधना ही साध्य की अर्चना है। साध्य कितना ही पवित्र, उत्कृष्ट महान् ...

साधना एवं सिद्धि पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

महर्षि अरविन्द ने अपनी पूर्ण योग रूपी सर्वांगपूर्ण पद्धति में बताया है कि जगत् और जीवन से बाहर निकलकर स्वर्ग या निर्वाण योग का लक्ष्य नहीं है, जीवन एवं जगत्  को परिवर्तित करना ही पूर्ण योग है। सर्वांगपूर्ण योग पद्धति के चार प्रमुख अंग हैं- शुद्धि, ...

सत्प्रवृत्तियों का करें विस्तार पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

परमार्थ परायण जीवन जीना है, तो उसके नाम पर कुछ भी करने लगना उचित नहीं। परमार्थ के नाम पर अपनी शक्ति ऐसे कार्यों में लगानी चाहिए, जिनमें उसकी सर्वाधिक सार्थकता हो। स्वयं अपने अंदर से लेकर समाज में सद्प्रवृत्तियाँ पैदा करना, बढ़ाना इस दृष्टि से सबसे अधिक ...

समग्र अध्यात्म (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

अध्यात्म की त्रिवेणी प्रेम, ज्ञान और बल इन तीन धाराओं में प्रवाहित होती है। इन तीनों का संतुलित अभिवर्धन करने से ही कोई समग्र आध्यात्मवादी हो सकता है। प्रेम हमारे अन्त:करण का अमृत है। जिस प्रकार हम अपने स्वार्थ, सुख, यश, वैभव और उत्सर्ग को चाहते हैं उसी ...

समाज निर्माण में प्रतिभाओं का आमंत्रण पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रस्तुत समय, जिससे हम गुजर रहे हैं- संधिकाल है। यह युगसंधि का समय न चूकने जैसा है। आपत्तिकाल में लोग व्यवसाय छोडक़र दुर्घटना से निपटने के लिए दौड़ पड़ते हैं। अग्निकांड, भूकंप, दूर्भिक्ष, महामारी दुर्घटना जैसे अवसरों पर उदार सेवा भावना की परीक्षा होती ...

सामाजिक न्याय पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

सामाजिक न्याय का सिद्धान्त ऐसा अकाट्य तथ्य है कि इसकी एक कदम के लिए भी उपेक्षा नहीं की जा सकती। एक वर्ग के साथ अन्याय होगा तो दूसरा वर्ग कभी भी शान्तिपूर्ण जीवन यापन न कर सकेगा। लोहे की छड़ को एक सिरे पर गरम किया जाय तो उसकी गरमी धीरे- धीरे दूसरे सिरे तक ...

समस्त शक्तियों का स्रोत पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

कोई भी व्यक्ति जितना कुछ वैभव, उल्लास और साधन सम्पत्ति अर्जित करता है, वह उपार्जन एक ही मूल्य पर होता है। वह मूल्य है- शक्ति। जिसमें जितनी क्षमता है, जितनी शक्ति है, वह उतना ही वैभव और उल्लास अर्जित कर लेता है। इन्द्रियों में शक्ति हो तो विभिन्न भोगों ...

संकल्प शक्ति (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

संकल्प का अपना विज्ञान है। उसे कर्म का बीजारोपण कह सकते हैं। संकल्प की चरणबद्ध रूपरेखा बनाई जाती है। इसमें सोच विचार कर निश्चय किये जाते हैं। निश्चय को मन में छिपाकर नहीं रखा जाता है, वरन् प्रकट किया जाता है। उसकी क्रमबद्ध योजना बनाई जाती है। ...

सफलता की अपेक्षा नीति श्रेष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

लोगों की दृष्टि में सफलता का ही मूल्य है, जो सफल हो गया, उन्हीं की प्रशंसा की जाती है। देखने वाले यह नहीं देखते कि सफलता नीतिपूर्वक प्राप्त की गई है या अनीतिपूर्वक। झूठे, बेईमान, चोर, लुटेरे भी बहुत धन कमा लेते हैं। किसी चालाकी से कोई बड़ा पद या ...

सात्विक दान पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

सात्विक प्रवृत्ति वाला आत्मज्ञ सात्विक दान को जीवन में उपयुक्त स्थान देता है। यदि सच कहा जाय तो अखिल विश्व की समस्त गतिविधि दान के सतोगुण नियम के आधार पर चल रही हैं। परमेश्वर ने कुछ ऐसा क्रम रखा है कि पहले बोयो तब काटो। जो कोई भी तत्त्व अपने दान की ...

सविता का प्रचण्ड सामर्थ्य (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

मानव व सूर्य के आदि काल से ही महान् भावनात्मक संबंध रहे हैं। वैदिक वाङ्मय सूर्य के माहात्म्य, उनकी विश्व संचालन में चेतनात्मक भूमिका तथा सूर्योपासना के लाभों के विवरणों से भरा पड़ा है। सूर्य मानव के लिए प्राणदाता, जीवन रक्षक व सांस्कृतिक विकास का परिच...

स्वाध्याय- एक योग पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

जीवन को सफल, उच्च एवं पवित्र बनाने के लिए स्वाध्याय की बड़ी आवश्यकता है। किसी भी ऐसे व्यक्ति का जीवन क्यों न देख लिया जाये, जिसने उच्चता के सोपानों पर चरण रखा है। उसके जीवन में स्वाध्याय को विशेष स्थान मिला होगा। स्वाध्याय के अभाव में कोई भी व्यक्ति ...

सच्चिदानन्द (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

भगवान् के यों अगणित नाम हैं उनमें से एक नाम है- सच्चिदानंद। सत् का अर्थ है- टिकाऊ अर्थात् न बदलने वाला- न समाप्त होने वाला। इस कसौटी पर केवल परब्रह्म ही खरा उतरता है। उसका नियम, अनुशासन, विधान एवं प्रयास सुस्थिर है। सृष्टि के मूल में वही है। परिवर्तनों ...

स्फटिक मणि सा बनाइये मन (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

असंभव को संभव बनाने वाला अन्तर्यात्रा का विज्ञान उनके लिए ही है जो अंतर्चेतना के वैज्ञानिक होने के लिए तत्पर हैं। योग साधक भी रहस्यवेत्ता वैज्ञानिक होता है। फर्क सिर्फ इतना है कि सामान्य पदार्थ वैज्ञानिक बाह्य प्रकृति एवं पदार्थों को लेकर अनुसंधान ...

साधना ऐसी जो प्रत्यक्ष सिद्धि दात्री हो पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

व्यावहारिक जीवन में शालीनता, सज्जनता, सुव्यवस्था, संयमशीलता आदि सत्प्रवृत्तियों का प्रतिष्ठापन और संवर्धन करने के उपरांत ही पूजा विधानों के सफल होने की आशा करनी चाहिए। गंदगी से सना बच्चा यदि माता की गोद में बैठने के लिए मचले, तो वह उसकी इच्छा पूरी ...

शान्ति और सुव्यवस्था का आधार पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

आज के समय में मनुष्य के बाहर भीतर शांति तथा सुव्यवस्था स्थापित करने के लिए आध्यात्मिक प्रयास ही सार्थक हो सकते हैं। श्रद्धा, भावना, तत्परता एवं गहराई इन्हीं में समाहित है। हर मानव का धर्म,  सामान्य से ऊपर, वह कर्त्तव्य है, जिसे अपनाकर लौकिक-आत्मिक ...

शरीर और आत्मा पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शरीर और आत्मा का गठबन्धन कुछ ऐसा ही है, जिसमें जरा अधिक ध्यान देखने पर वास्तविकता झलक जाती है ।। शरीर भौतिक स्थूल पदार्थों से बना हुआ है, किन्तु आत्मा सूक्ष्म है। पानी में तेल डालने पर वह ऊपर को ही आने का प्रयत्न करेगा क्योंकि तेल के परमाणु पानी की ...

शरीर एक मन्दिर पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

आस्तिकता और कर्तव्य परायणता की सदवृत्ति का प्रभाव पहले अपनी सबसे समीपवर्ती स्वजन पर पडऩा चाहिए। हमारा सबसे निकटवर्ती सम्बन्धी हमारा शरीर हैं। उसके साथ सद्व्यवहार करना, उसे स्वस्थ और सुरक्षित रखना अत्यावश्यक है। शरीर को नश्वर कहकर उसकी ...

शिष्ट और शालीन बनें (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

शिक्षित सम्पन्न और सम्मानित होने के बावजूद भी कई बार व्यक्ति के संबंध में गलत धारणाएँ उत्पन्न हो जाती हैं और यह समझा जाने लगता है कि योग्य होते हुए भी अमुक व्यक्ति के व्यक्तित्व में कमियाँ हैं। इसका कारण यह है कि शिक्षित, सम्पन्न और सम्माननीय होते हुए भ...

शिव बन कर ही शिव की पूजा करें (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

शिव का अर्थ है ‘शुभ’। शंकर का अर्थ होता है, कल्याण करने वाले। निश्चित रूप से उसे प्रसन्न करने के लिए मनुष्य को उनके अनुरूप ही बनना पड़ेगा। ‘शिवो भूत्वा शिवं यजेत् अर्थात् शिव बनकर ही शिव की पूजा करें। हमारे धर्म ग्रंथों में वर्णित शिव के स्वरूप की ...

सीमित रहे सपनों की उड़ान पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

हर व्यक्ति के अन्दर दिव्यता का खजाना छुपा हुआ है। इसको खोदकर बाहर निकालने के लिए जरूरी है कि मानसिक हलचलों को सृजनात्मक स्वरूप प्रदान किया जाए। इसके लिए ऐसे जीवन दर्शन को प्रोत्साहन देना चाहिए, जो दोनों बातों पर ध्यान रखें। एक ओर मानव स्वभाव और ...

सोच विचार फैसला लें पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

मन के दो भाग हैं.एक बहिर्मन, दूसरा अंतर्मन। बाहरी मन तो तर्क.वितर्क करता है, सोचता है, काट- छाँट करता है, निर्णय करता है और अपने इरादों को बदलता रहता है, पर अंर्तमन भोले- भाले किंतु दृढ़ निश्चयी बालक के समान है। वह काट- छाँट नहीं करता, वरन् श्रद्धा और ...

श्रेष्ठता की कसौटी पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

मनुष्य की श्रेष्ठता की कसौटी यह होनी चाहिए कि उसके द्वारा मानवीय उच्च मूल्यों का निर्वाह कितना हो सका। योग्यताएँ, विभूतियाँ तो साधन मात्र हैं। लाठी एवं चाकू स्वयं न तो प्रशंसनीय है, न निन्दनीय। उनका प्रयोग पीड़ा पहुँचाने के लिए हुआ या प्राण- रक्षा के ...

सृष्टि के सर्वश्रेष्ठ प्राणी पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

मनुष्य का निर्माण ईश्वरीय नियम, संदेश सद्भावनाओं और श्रेष्ठ विवेक आदि के व्यापक प्रसार तथा सृष्टि में सत्य न्याय और प्रेम के स्थापना के लिये किया गया है। ईश्वर  को मनुष्य ही ऐसा प्राणी मिला, जिसके द्वारा अन्य प्राणियों द्वारा किया हुआ शक्ति का ...

सुधरें- सँभलें तो काम चलें पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकृति का प्रपंच, जिसमें आम आदमी बेतरह उलझा, उद्विग्न, खिन्न, विपन्न होते देखा जाता है। कभी- कभी तो इसे सिनेमा के पर्दे से प्रभावित होकर चित्र- विचित्र अनुभूतियों में तन्मय होते तक देखा जाता है। यद्यपि यह पूरा कमाल कैमरों का, प्रोजेक्टर का, एक्टर- ...

सुखद और सरल सत्य ही है (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

नि:संदेह सत्य का मार्ग उतना कठिन नहीं है। जितना दीखता है। जो वस्तु व्यवहार में नहीं आती, जिससे हम दूर रहते हैं, वह अजनबी, विचित्र तथा कष्टसाध्य लगती है, पर जब वह समीप आती है, तो वह स्वाभाविक एवं सरल बन जाती है। चूँकि हमारे जीवन में झूठ बोलने की आदत ने ...

सुखी वही, जिसने सुख की वासना छोड़ दी (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

‘‘जीवन की तृष्णा और सुख प्राप्ति की चाहत को दूर करो। किन्तु जो महत्त्वाकाँक्षी हैं, उन्हीं की भाँति कठोर श्रम करो। जिन्हें जीवन की तृष्णा है, उन्हीं की भाँति सभी के जीवन का सम्मान करो। जो सुख के लिए जीवन यापन करते हैं, उन्हीं की भाँति सुखी रहो। अपने ...

विचारों से बनिए अधिक सुंदर पं.श्रीराम शर्मा आचार्य

कुरूपता एक मानसिक रोग है, सुंदरता अच्छे स्वभाव का परिणाम है। स्वास्थ्य और सुंदरता का गहरा संबन्ध है। सुंदरता अच्छे स्वास्थ्य, निश्चिन्त जीवन, हर्ष और उल्लास में छिपी है। इसके अलावा सुंदरता को देर तक स्थिर रखने के लिए मधुर और स्वस्थ मानसिक ...

सुसंस्कृत तथा श्रेष्ठ व्यक्तित्व पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

आदर्श व्यक्तित्व ही किसी देश या समाज की सच्ची सम्पत्ति माने जाते हैं। जमीन में गढ़े धन की चौकसी करने वाले साँपों की तरह तिजोरी में जमा नोटों की रखवाली करने वाले कंजूस तो गली- कूँचों में भरे पड़े हैं। ऐसे लोगों से कोई प्रगति की आशा नहीं की जा सकती। प्रगति ...

यज्ञ का वैज्ञानिक आधार (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

आज का युग विज्ञान और बुद्धिवाद का युग है, हर एक बात को विज्ञान और बुद्धि की कसौटी से तोला जाता है, क्यों और कैसे का उत्तर पूछा जाता है। आज का बुद्धिशीलमानव केवल विश्वास और श्रद्धा के ही आधार पर किसी कार्य को करने के लिये तैयार नहीं है। वह बुद्धि और ...

तपश्चर्या से आत्मतत्त्व का विकास (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

साधना से सिद्धि मिलती है, इसमें दो राय नहीं हैं। सिद्धि वस्तुत: अपने आपको, अपनी अंतरात्मा को सिद्ध करने का ही दूसरा नाम है। साधना हम अपनी इन्द्रियों की, अपने मन, बुद्धि और चित्त की करते हें। इनके सध जाने पर अंत:करण परिष्कृत हो जाता है। परिष्कृत अंत:करण ...

तीन महान् तत्त्व (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

अमृत, पारस और कल्पवृक्ष यह तीनों महान् तत्त्व सर्वसाधारण के लिए सुलभ हैं। हम जितना उनसे दूर रहते हैं उतने ही ये हमारे लिए दुर्लभ हैं परन्तु जब हम इनकी ओर  कदम बढ़ाते हैं तो यह अपने बिल्कुल पास, अत्यन्त निकट आ जाते हैं। जिस ओर मुँह न हो उधर की चीजों ...

आत्मा की परमात्मा से पुकार (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

आत्मा ने परमात्मा से याचना की ‘असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतंगमय’। यह तीनों ही पुकारें ऐसी हैं, जिन्हें द्रौपदी और गज की पुकार के समतुल्य समझा जा सकता है। निर्वस्त्र होते समय द्रौपदी ने अपने को असहाय पाकर भगवान् को पुकारा ...

आत्म विकास की सामान्य प्रक्रिया

कई व्यक्ति कम से कम समय में अधिक से अधिक बढ़- चढ़कर उपलब्धियाँ प्राप्त करने के लिए आतुर होते और आकुल व्याकुल बनते देखे गए हैं। ऐसे लोगों के लिए बच्चों वाले बालू के महल और टहनियाँ गाड़कर बगीचा खड़ा करने जैसा कौतुक रचना पड़ता है या फिर बाजीगरों जैसा छद्म ...

भावनाओं से संचालित जीवनधारा (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

शरीर और उसकी गतिविधियों के संबंध में सामान्य रूप से हमारी स्थिति ऐसी रहती है, जैसी बच्चों के प्यारे मामाजी की। जिन्होंने अपनी ऐनक आँखों पर चढ़ा रखी है और सारे घर में ऐनक को ढूँढऩे के लिए उलट- पुलट कर रहे हैं। भन्नाये हुए मामाजी जब बच्चों से ऐनक का पता पूछत...

हम अपना भविष्य और चरित्र स्वयं बनाते हैं पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता है। निज का उत्थान- पतन उसके वश की बात है। यह तथ्य जितना सच है, उतना ही यह भी सही है कि वातावरण का प्रभाव अपने ऊपर भी पड़ता है और अपने व्यक्तित्व से परिवार एवं समाज का वातावरण भी प्रभावित होता है। बुरे वातावरण में रहकर ...

चेतना की सत्ता एवं उसका विस्तार पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

इस संसार में जड़ के साथ चेतन भी गुँथा हुआ है। काम करती तो काया ही दीखती है, पर वस्तुत: उसके पीछे सचेतन की शक्ति काम कर रही होती है। प्राण निकल जाएँ तो  अच्छी- खासी काया निर्जीव हो जाती है। कुछ करना- धरना तो दूर, मरते ही सडऩे- गलने का क्रम आरंभ हो जाता है, और ...

चिंतन,भावना एवं कर्मों के श्रेष्ठता द्वारा अर्चन (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

सच यही है कि सारा अस्तित्व एक है और हममें से कोई उस अस्तित्व से अलग- थलग नहीं है। हम कोई द्वीप नहीं है, हमारी सीमाएँ काम चलाऊ हैं। हम किन्हीं भी सीमाओं पर समाप्त नहीं होते। सच कहेें, तो कोई दूसरा है ही नहीं, तो फिर दूसरे के साथ जो घट रहा है, वह समझो अपने ही साथ ...

चिन्ताओं से डर कैसा? (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

जीवन में खिलाड़ी की तरह पार्ट अदा करिए और पल्ला झाड़ कर अलग हो जाइए। इस वैराग्य, निष्काम कर्म अनासक्ति की योग शास्त्र में बार- बार शिक्षा दी गयी है, यह कोई अव्यावहारिक या काल्पनिक विषय नहीं है, वरन् कर्म शील मनुष्यों का जीवन मन्त्र है। जिन लोगों पर ...

देव दर्शन के पीछे दिव्य दृष्टि भी रहे (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

दर्शन शब्द का अर्थ जहाँ देखना है वहाँ उसका एक अर्थ विवेचना या विचारणा भी है। अनेक लोग देव प्रतिमाओं, तीर्थ स्थानों, संत एवं सत्पुरुषों के दर्शन करने आया करते हैं, वे इसमें पुण्य लाभ का विश्वास करते हैं। शुभ व्यक्तियों अथवा शुभ स्थानों का दर्शन करना ...

देव संस्कृति की गौरव गरिमा (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

सभ्यता और संस्कृति इस युग के दो बहु- चर्चित विषय हैं। आस्थाओं और मान्यताओं को संस्कृति और तदनुरूप व्यवहार, आचरण को सभ्यता की संज्ञा दी जाती है। मानवीय सभ्यता और संस्कृति कहें या चाहे जो भी नाम दें मानवीय दर्शन सर्वत्र एक ही हो सकता है, मानवीय संस्कृति ...

धर्म धारणा की व्यवहारिकता (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

शान्ति के साधारण समय में सैनिकों के अस्त्र- शस्त्र मालखाने में जमा रहते हैं; पर जब युद्ध सिर पर आ जाता है, तो उन्हें निकाल कर दुरुस्त एवं प्रयुक्त किया जाता है। तलवारों पर नये सिरे से धार धरी जाती है। घर के जेवर आमतौर से तिजोरी में रख दिये जाते हैं; पर ...

धर्म का सच्चा स्वरूप (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

संसार में हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, ताओ, कन्फ्यूशियस, जैन, बौद्ध, यहूदी आदि विभिन्न नामों से प्रचलित धर्म- सम्प्रदायों पर दृष्टिपात करने से यही पता चलता है कि उनके बह्यास्वरूप एवं क्रिया- कृत्यों में जमीन- आसमान जितना अंतर है। यह अंतर होना उचित भी ...

ज्ञान और विज्ञान एक दूसरे का अवलम्बन अपनाएँ (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

ज्ञान और विज्ञान यह दोनों सहोदर भाई हैं। ज्ञान अर्थात् चेतना को मानवी गरिमा के अनुरूप चिन्तन तथा चरित्र के लिए आस्थावान बनने तथा बनाने की प्रक्रिया। यदि ज्ञान का अभाव हो तो मनुष्य को भी अन्य प्राणियों की भाँति स्वार्थ परायण रहना होगा। उसकी ...

एकाग्रता की अद्भुत सामर्थ्य (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

एकाग्रता एक उपयोगी सत्प्रवृत्ति है। मन की अनियन्त्रित कल्पनाएँ, अनावश्यक उड़ानें उस उपयोगी विचार शक्ति का अपव्यय करती हैं, जिसे यदि लक्ष्य विशेष पर केन्द्रित किया गया होता, तो गहराई में उतरने और महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त करने का अवसर मिलता। ...

एकता और समता का आदर्श (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

राष्ट्रीय एकता का वास्तविक तात्पर्य है- मानवीय एकता। मनुष्य की एक जाति है। उसे किन्हीं कारणों से विखण्डित नहीं होना चाहिए। भाषा, क्षेत्र, सम्प्रदाय, जाति, लिंग, धन, पद आदि के कारण किसी को विशिष्ट एवं किसी को निकृष्ट नहीं माना जाना चाहिए। सभी को समाज में ...

ईमानदारी का व्यवहार (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

ईमानदार जीवन हजार मनकों में अलग चमकता हीरा होता है। ईमानदारी यश, धन, समृद्धि का आधार होती है। इसके बावजूद लोग कहते सुने जाते हैं कि व्यापार में बेईमानी बिना काम नहीं चलता, ईमानदारी से रहने में गुजारा नहीं हो सकता, वास्तव में यह गलत है। वस्तुत: जो ...

गायत्री का अवलम्बन परम श्रेयस्कर पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

गायत्री उपासना से मानव शरीर में सन्निहित अगणित संस्थानों में से कितने ही जाग्रत एवं प्रखर हो चलते हैं। इस जागृति का प्रभाव मनुष्य के व्यक्तित्व को समान रूप से विकसित होने में सहायक सिद्ध होता है। व्यायाम से शरीर पुष्ट होता है, अध्ययन से विद्या आती ...

गायत्री की अमोघ शक्ति पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

गायत्री सद्बुद्धि का मंत्र है। इस महामंत्र में कुछ ऐसी विलक्षण शक्ति है कि उपासना करने वाले के मस्तिष्क और हृदय पर बहुत जल्दी आश्चर्यजनक प्रभाव परिलक्षित होता है। मनुष्य के मन:क्षेत्र में समाए हुए काम, क्रोध, लोभ, मोह, चिंता, ईर्ष्या, कुविचार आदि चाहे कि...

गायत्री की असंख्य शक्तियाँ (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

संसार में जितना भी वैभव, उल्लास दिखाई पड़ता है या प्राप्त किया जाता है, वह शक्ति के मूल्य पर ही मिलता है। जिसमें, जितनी क्षमता होती है, वह उतना ही सफल होता  और वैभव उपार्जित कर लेता है। जीवन में शक्ति का इतना महत्त्वपूर्ण स्थान है कि उसके बिना कोई आनंद ...

गायत्री साधना का सत्परिणाम अवश्यंभावी (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

गायत्री साधना का प्रत्यक्ष परिणाम है- सात्विक आत्मबल की अभिवृद्धि। सात्विक आत्मबल के दस लक्षण हैं- उत्साह, सतत परिश्रम, कर्तव्यपरायणता, संयम, मधुर स्वभाव, धैर्य, अनुद्वेग, उदारता, अपरिग्रह और तत्त्वज्ञान। यदि कोई व्यक्ति सच्ची गायत्री साधना कर ...

गायत्री और यज्ञ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

भारत की प्रसुप्त अंतरात्मा को जगाने के लिए ज्ञान और विज्ञान की प्रतिष्ठापना करना सर्वप्रथम कार्य है। इन दोनों के बल पर ही कोई व्यक्ति या राष्ट्र उन्नति कर सकता है। जब इनमें से एक की भी कमी हो जाती है, तो अध:पतन आरंभ हो जाता है। ज्ञान का अर्थ है- विद्या बुद...

गुरु ही साधक व साधना है (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

गुरु वह तत्त्व है, जो अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश करके ज्ञान रूपी तेज का प्रकाश करता है। ‘गु’ अन्धकार का वाचक है और ‘रु’ प्रकाश का। ऐसे सद्गुरु के लिए लगन, उनको पाने के लिए गहरी चाहत, उनके चरणों में अपना सर्वस्व समर्पण करने के लिए आतुरता में ही मनुष्य जीवन ...

जीवन का अर्थ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

जीवन का अर्थ है- सक्रियता, उल्लास, प्रफुल्लता। निराशा का परिणाम होता है- निष्क्रियता, हताशा, भय, उद्विग्रता और अशांति। जीवन है प्रवाह, निराशा है सडऩ। जीवन का पुष्प आशा की उष्ण किरणों के स्पर्श से खिलता है, निराशा का तुषार उसे कुम्हलाने को बाध्य करता है। ...

हे मनुष्य! तुम महान हो! पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

तुम्हारा वास्तविक स्वरूप- तुम्हारे हिस्से में स्वर्ग की अगणित विभूतियाँ आई हैं न कि नर्क की कुत्सित। तुमको वही लेना चाहिये, जो तुम्हारे हिस्से में आया है। स्वर्ग तुम्हारी ही सम्पत्ति है। शक्ति तुम्हारा जन्म सिद्ध अधिकार है। तुमको केवल स्वर्ग में ...

ईश्वरीय सिद्धांत पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

तीन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्धांत व्यक्त होते हैं- यह जो संसार है परमात्मा से व्याप्त है, उसके अतिरिक्त सब मिथ्या है, माया है, भ्रम है, स्वप्न है। मनुष्य को उसकी इच्छानुसार सृष्टि संचालन के लिए कार्य करते रहना चाहिए। मनुष्य में जो श्रेष्ठता- शक्ति या ...

ईश्वर सर्वव्यापक एवं न्यायकारी पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

ईश्वर का दंड एवं उपहार दोनों ही असाधारण हैं। इसलिए आस्तिक को इस बात का सदा ध्यान रहेगा कि दंड से बचा जाए और उपहार प्राप्त किया जाए। यह प्रयोजन छुट- पुट पूजा- अर्चना, जप- ध्यान से पूरा नहीं हो सकता। भावनाओं और क्रियाओं को उत्कृष्टता के ढाँचे में ढालने से ...

उसे जड़ में नहीं, चेतन में खोजें (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

समझा जाता है कि विधाता ही मात्र निर्माता है। ईश्वर की इच्छा के बिना पत्ता नहीं हिलता। दोनों प्रतिपादनों से भ्रमग्रस्त न होना हो, तो उसके साथ ही इतना और जोडऩा चाहिए कि उस विधाता या ईश्वर से मिलने- निवेदन करने का सबसे निकटवर्ती स्थान अपना अंतःकरण ही है। ...

जैसा कर्म, वैसा फल पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

बाहरी दुनिया में मुलजिम को सजा दिलाने का काम दो महकमों के अधीन है, एक पुलिस, दूसरा अदालत। पुलिस तो मुलजिम को पकड़ती है और उसके कामों का सबूत एकत्रित करके अदालत के सामने पेश करती है। फिर अदालत का महकमा अपना काम करता है। जज महाशय अपराध और अपराधी की स्थिति ...

जीवन के गरिमामय बोध तो हो पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

एक मजदूर बड़े परिश्रम से कुछ चावल कमाकर लाया था। उन्हें खुशी- खुशी सिर पर रखकर घर लिये जा रहा था। अचानक उस बोरी में छेद हो गया और धीरे- धीरे उसकी गैर जानकारी में वे चावल पीछे की ओर गिरते गये ।। यहाँ तक कि कुछ आगे जाने पर उसकी बोरी ही खाली हो गई। जब पीछे देखा त...

जीवन में सेवा का महत्त्व पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

प्राणी मात्र की सेवा करना मनुष्य का परम कर्तव्य है। इसे ही विराट ब्रह्म की आराधना कहते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है- ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्व भूत हिते रता:। जो सब जीवों का हित- चिंतन करते हैं, मुझे प्राप्त होते हैं। अत: साधक के लिए तो यह और ...

जीवन- साधना से लाभ? पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

मनुष्य विद्युत- शक्ति का भण्डार है। उसमें प्राण तत्व इतनी प्रचुर मात्रा में भरा हुआ है कि उसके आधार पर असम्भव और आश्चर्यजनक कार्यों को भी पूरा किया जा सकता है, किन्तु हम उसका सदुपयोग करना सीख जायें, तो जीवन की दिशा दूसरी हो सकती है। मानवीय विद्युत का ...

जीवन संजीवनी है इच्छा- शक्ति (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

ज्ञान और क्रिया के मध्य की स्थिति को इच्छा शक्ति के नाम से जाना जाता है। ज्ञान जब तक कार्य रूप में परिणत नहीं होता, तब तक वह अनुपयोगी और अपूर्ण ही कहा जायेगा। उसे पूर्ण और उपयोगी बनाने के लिए इच्छा शक्ति की आवश्यकता अनुभव की जाती है। संसार में जितने ...

आत्मशक्ति का अक्षय भण्डार पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रत्येक छोटी- सी दीखने वाली वस्तु के पीछे एक बृहत् भण्डार होता है। बूँद के पीछे समुद्र लहरें मार रहा है। बीज के पीछे पेड़ लहलहा रहे हैं, वायु के एक झोंके के पीछे सृष्टि में तूफान उठ रहे हैं। यदि बूँद के पीछे एक बृहत् जल का महासागर लहरा रहा है, छोटे से ...

मनुष्य सृष्टि के सर्वश्रेष्ठ प्राणी हैं पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

मनुष्य सृष्टि का सबसे समुन्नत, ईश्वरीय शक्तियों से भरा हुआ, असीम सिद्धियों को धारण किये हुए सबसे शक्तिशाली प्राणी है। बुद्धि और ज्ञान इसके मुख्य गुण हैं, जिनके बल पर यह संसार के सब प्राणियों का सम्राट है। मनुष्य सर्वशक्तियों का समूह है। भगवान् ने अपने ...

जीवन का कायाकल्प पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

गायत्री मन्त्र से आत्मिक कायाकल्प हो जाता है। इस महामन्त्र की उपासना आरम्भ करते ही साधक को ऐसा प्रतीत होता है कि मेरे आन्तरिक क्षेत्र में एक नई हलचल आरम्भ हो गई है। सतोगुणी तत्वों की अभिवृद्धि होने से दुर्गुण, कुविचार, दु:ख स्वभाव एवं दुर्भाव घटने आरम्...

जीवन का चार स्तरंभ पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सुसंस्कारिता के लिए चार आधार- समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी, बहादुरी हैं। इन्हें आध्यात्मिक- आंतरिक वरिष्ठता की दृष्टि में उतना ही महत्त्वपूर्ण माना जाना चाहिए जितना कि शरीर के लिए अन्न, जल, वस्त्र और निवास को अनिवार्य समझा जाता है।       ...

जीवन में विचार की आवश्यकता पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

जिन विचारों पर हम विश्वास करते हैं, बार- बार चिंतन करते, हृदय पटल पर लाते हैं, जिन्हें हम मन के अव्यक्त प्रदेश में प्रवेश करते हैं। वे ही हमारे अंत:करण की नींव हो जाते हैं। कुटिल एवं असत्य विचार से मुक्ति का सरल उपाय सुविचार की भावना को दृढ़ कराना है। ...

जीवन सम्पदा पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

जीवन संपदा के चार क्षेत्र हैं- इंद्रिय शक्ति, समय शक्ति, विचार शक्ति, धन- साधन शक्ति। आरंभ की तीन तो ईश्वर प्रदत्त है। चौथी इन तीनों के संयुक्त प्रयत्न से भौतिक क्षेत्र में पुरुषार्थ द्वारा अर्जित की जाती हैं। जो व्यक्ति इन्हेें दैवी विभूतियाँ मानकर ...

जीवन यात्रा बने एक पर्वोत्सव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

मनुष्य के हृदय भण्डार का द्वार खोलने वाली, निम्नता से उच्चता की ओर ले जाने वाली यदि कोई वस्तु है, तो प्रसन्नता ही है। यही वह साँचा है, जिसमें ढ़लकर मनुष्य अपने जीवन का सर्वतोमुखी विकास कर सकता है। जीवन- यापन के लिए जहाँ उसे धन, वस्त्र, भोजन एवं जल की ...

जो कुछ चाहें, वह सब पायें (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

आध्यात्मिक मान्यताओं के अनुसार सभी प्राणियों में एक ही चेतना का अस्तित्व विद्यमान है। शरीर की दृष्टि से वे भले ही अलग- अलग हों, पर वस्तुत: आत्मिक दृष्टि से सभी एक हैं। इस संदर्भ में परामनोविज्ञान की मान्यता है विश्व- मानस एक अथाह और असीम जल राशि की ...

कर्म का फल पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

यदि कर्म का फल तुरंत नहीं मिलता, तो इससे यह नहीं समझ लेना चाहिए कि उसके भले- बुरे परिणाम से हम सदा के लिए बच गये। कर्मफल एक ऐसा अमिट तथ्य है, जो आज नहीं तो कल भुगतना ही पड़ेगा। कभी- कभी इन परिणामों में देर इसलिए होता है कि ईश्वर मानवीय बुद्धि की परीक्षा ...

कर्त्तव्य- अनुशासन पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

परमात्मा ने मनुष्य को अन्य प्राणियों की अपेक्षा विशेष बुद्धि और शक्ति दी है। इस संसार में जितनी भी महत्त्वपूर्ण शक्तियाँ हैं, उनमें बुद्धि शक्ति ही सर्वोपरि है। मानव जाति की अब तक की इतनी उन्नति के पीछे उसकी बौद्धिक विशेषता को परमात्मा ने कुछ ...

कर्त्तव्य का महत्व पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

हमारी बुद्धिमत्ता इसी में है कि हम धर्म के कर्त्तव्य पालन का महत्त्व समझें, सदाचार की मर्यादाओं का उल्लंघन न करें। स्वयं शांतिपूर्वक जिएँ और दूसरों को सुखपूर्वक जीने दें। यह सब नियंत्रण की नीति अपनाने से ही संभव हो सकता है। कर्त्तव्य और धर्म का ...

मैं क्या हूँ? पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

किसी व्यक्ति से पूछा जाय कि आप कौन हैं? तो वह अपने वर्ण, कुल, व्यवसाय, पद या सम्प्रदाय का परिचय देगा। ब्राह्मण, अग्रवाल, बजाज, वैष्णव हूँ आदि- आदि। अधिक पूछने पर अपने निवास स्थान, वंश, व्यवसाय आदि का अधिकाधिक विस्तृत परिचय देगा। प्रश्न के उत्तर के लिए ही ...

मैं क्या हूँ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

जानने योग्य इस संसार में अनेक वस्तुएँ हैं, पर उन सबमें प्रधान अपने आपको जानना है। जिसने अपने को जान लिया उसने जीवन का रहस्य समझ लिया। भौतिक विज्ञान के अन्वेषकों ने अनेक आश्चर्यजनक आविष्कार किए हैं। प्रकृति के अन्तराल में छिपी हुई विद्युत शक्ति, ईश्वर श...

मौन : मन और वाणी का संयम पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

मनुष्य जो कुछ सोचता और विचार करता है, उसे वाणी के माध्यम से व्यक्त करता है। मनुष्य ने अपने विचारों और भावों को सर्वप्रथम वाणी के माध्यम से व्यक्त करना सीखा। वाणी और मस्तिष्क का सीधा सम्बन्ध है, विशेषतः: अभिव्यक्ति के लिए तो सबके लिए वही सर्वाधिक सुलभ ...

मन की शक्ति पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

मन को जीवन का केन्द्र बिन्दु कहना असंभव नहीं है। मनुष्य की क्रियाओं, आचरणों का प्रारम्भ मन से ही होता है। मन तरह- तरह के संकल्प, कल्पनाएँ करता है। जिस ओर उसका रुझान हो जाता है उसी ओर मनुष्य की सारी गतिविधियाँ चल पड़ती है। जैसी कल्पना हो उसी के अनुरूप ...

मन को सुधारा जाय पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

मनुष्य के अस्तित्व पर गंभीरता पूर्वक विचार किया जाय, तो उसकी एक मात्र विशेषता उसका मनोबल ही दृष्टिगोचर होता है। शरीर की दृष्टि से वह अन्य प्राणियों की तुलना बहुत गया- गुजरा है। मनोबल की विशेषता के कारण ही मनुष्य सृष्टि का मुकुटमणि है। मन वस्तुत: ...

मानव जीवन की महत्ता पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

शरीर की तरह मन के सम्बन्धों में भी लोग प्राय: भूल करते हैं। शरीर को संतुष्ट करने या सजाने- सँवारने को महत्त्व देकर लोग उसे स्वस्थ, निरोगी एवं सशक्त बनाने की बात भूल जाते हैं। मन के बारे में भी ऐसा ही होता है। लोग मन को महत्त्व देकर ‘मनमानी’ करने में ...

पुण्यफल प्रदाता शान्तिकुञ्ज का अखण्ड दीपक

शास्त्रों- पुराणों में ऐसा उल्लेख पढ़ने को मिलता है कि यदि घृत से कोई दीपक लगातार 20 वर्षों तक जलता रहे, तो वह सिद्ध हो जाता है, जिसके दर्शन मात्र से ही अनेकानेक पापों का प्रक्षालन हो जाता है। ऐसी ही एक सिद्ध ज्योति शांतिकुंज में है, जो पिछले ८७ वर्षों से ...

अपनी समस्याएँ आप सुलझायें (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

शारीरिक स्वास्थ्य की अवनति या बीमारियों की चढ़ाई अपने आप नहीं होती, वरन् उसका कारण भी अपनी भूल है। आहार में असावधानी, प्राकृतिक नियमों की उपेक्षा, शक्तियों का अधिक खर्च, स्वास्थ्य नाश के यह प्रधान हेतु हैं जो लोग तन्दुरूस्ती पर अधिक ध्यान देते ...

अयास से क्षमताओं का विकास पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

सतत अभ्यास द्वारा शरीर एवं मन को इच्छानुवर्ती बनाया जा सकता है तथा उन्हें असामान्य कार्यों के कर सकने के लिए भी सहमत किया जा सकता है। प्रतिभा- योग्यता के विकास में बुद्धि आवश्यक तो है, सर्वसमर्थ नहीं। बुद्धिमान होते हुए भी विद्यार्थी यदि पाठ याद न ...

आप भला तो जग भला पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

जीवन अनेकों समस्याओं के साथ उलझा हुआ है। उन उलझनों को सुलझाने में, प्रगति पथ पर उपस्थित रोड़ों को हटाने में बहुधा हमारी शक्ति का एक बहुत बड़ा भाग व्यतीत होता है, फिर भी कुछ ही समस्याओं का हल हो पाता है, अधिकांश तो उलझी ही रह जाती हैं। उस अपूर्णता का कारण ...

आकर्षक व्यक्तित्व बनाइये पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

सद्भावनायुक्त नागरिक ही आपको सामाजिक प्रतिष्ठा और मान-सम्मान देने वाले हैं। उनके दृष्टिकोण एवं विचारधारा पर आपकी सफलता अवलम्बित है। जैसा आपके आसपास वाले समझते हैं, वैसे ही वास्तव में आप हैं। समाज में आपके प्रत्येक कार्य की सूक्ष्म अलक्षित ...

जो औरों के काम आयें (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

समय की माँग के अनुरूप दो दबाव इन दिनों निरंतर बढ़ते जा रहे हैं। एक व्यापक अवांछनीयताओं से जूझना और उन्हें परास्त करना, और दूसरा है- नवयुग की सृजन व्यवस्था को कार्यान्वित करने की समर्थता। निजी और छोटे क्षेत्र में भी यह दोनों कार्य अति कठिन पड़ते हैं। फिर ...

आस्तिक कुकर्मी नहीं हो सकता पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

जीव को परमेश्वर का अंश कहा गया है। जिस प्रकार जल के प्रपात में से पानी के अनेक छोटे-छोटे झरने उत्पन्न होते और वियल होते हैं, उसी प्रकार विभिन्न जीवधारी परमात्मा में से उत्पन्न होकर उसी में लय होते रहते हैं। आस्तिकता वह शुद्ध दृष्टिï है, जिसके आधार पर मनु...

आत्मा की परमात्मा से पुकार (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

आत्मा ने परमात्मा से याचना की ‘असतो मा सद्ïगमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतंगमय’। यह तीनों ही पुकारें ऐसी हैं, जिन्हें द्रौपदी और गज की पुकार के समतुल्य समझा जा सकता है। निर्वस्त्र होते समय द्रौपदी ने अपने को असहाय पाकर भगवान्ï को ...

आत्मा की उन्नति पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

जीवन की वास्तविक सफलता और समृद्घि आत्मभाव में जागृत रहने में है। जब मनुष्य, अपने को आत्मा अनुभव करने लगता है तो उसकी इच्छा, आकांक्षा और अभिरूचि उन्हीं कामों की ओर मुड़ जाती है, जिनसे आध्यात्मिक सुख मिलता है। हम देखते हैं कि चोरी, हिंसा, व्यभिचार, छल ...

आत्मा, महात्मा और परमात्मा का विकास पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

महात्मा वह है, जिसके सामान्य शरीर में असामान्य आत्मा निवास करती है। काया की वेशभूषा और चित्र-विचित्र आवरणों का धारण महात्मा होने का न तो आधार है और न लक्षण। सामान्य वेष और सामान्य रहन-सहन के बीच महात्मा के स्तर तक पहुँचा जाना सम्भव है और पहुँचाया जाता ...

अभ्यास से क्षमताओं का विकास पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

सतत अभ्यास द्वारा शरीर एवं मन को इच्छानुवर्ती बनाया जा सकता है तथा उन्हें असामान्य कार्यों के कर सकने के लिए भी सहमत किया जा सकता है। प्रतिभा-योग्यता के विकास में बुद्धि आवश्यक तो है, सर्वसमर्थ नहीं। बुद्धिमान होते हुए भी विद्यार्थी यदि पाठ याद न करे, ...

अपने अन्दर के भगवान् को जगाइये (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

       संसार के छोटे कहे जाने वाले प्राणी एक निश्चित प्रकृति लेकर जन्मते हैं और प्रायः अंत तक उसी स्थिति में बने रहते हैं। इतना स्वार्थी मनुष्य ही था, जिसे अपने साधनों से तृप्ति नहीं हुई और उसने दूसरों के स्वत्व का अपहरण करना प्रारंभ किया। ...

नैष्ठिक प्रतिभाओं की प्रतीक्षा पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

अनुकरण की प्रवृत्ति मनुष्य स्वभाव का महत्त्वपूर्ण अंग बनकर रहती है। हम जैसा देखते हैं, वैसा करते हैं। बच्चा अभिभावकों को, साथियों को जिस शब्दावली का, भाषा का प्रयोग करते सुनता है, उसी को बोलने और समझने लगता है। चरित्र और स्वभाव के संबंध में भी ...

अध्यात्मवाद (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

वर्तमान की समस्त समस्याओं का एक सहज सरल निदान है- ‘अध्यात्मवाद’। यदि शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, आर्थिक जैसे सभी क्षेत्रों में अध्यात्मवाद का समावेश कर लिया जाये, तो समस्त समस्याओं का समाधान साथ-साथ होता चले और आत्मिक प्रगति के लिए अवसर एवं अवकाश भी ...

अध्यात्म और ईश्वर का मर्म (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

आध्यात्मिकता का अर्थ है उस चेतना पर विश्वास करना, जो प्राणधारियों को एक दूसरे के साथ जोड़ती है, सुख- संवर्धन और दु:ख- निवारण की स्वाभाविक आकांक्षा को  अपने शरीर या परिवार तक सीमित न रख कर अधिकाधिक व्यापक बनाती है। अध्यात्म का सीधा अर्थ आत्मीयता के ...

अध्यात्म और विज्ञान का मिलन पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

अपने शरीर से लेकर सम्पूर्ण दृश्य जगत् में कहीं भी देखें, सर्वत्र जड़ और चेतन की संयुक्त सत्ता दृष्टिगोचर होती है। दोनों का संयोग बिखर जाने पर न तो कहीं प्राणी के लिए पदार्थ रहेगा और न ही पदार्थ के लिए प्राणी। बुद्धि और मन की परिधि यह संसार ही है। वे ...

साधना की असफलता के कारण (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

किसी भी कार्य में सफलता पाने के लिए जो मंजिल तय करनी पड़ती है, उसे साधना कहा जाता है। इस साधना में यदि विघ्न- बाधाएँ उपस्थित हो जायें, तो प्राय: मंजिल बीच में ही अधूरी छूट जाती है। जीवन का भौतिक पहलू हो या आध्यात्मिक, कोई भी निरापद नहीं है। सांसारिक ...

अहंता का परिवर्तन (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

जैसे कुआँ खोदने पर जमीन में मिट्टियों के कई पर्त निकलते हैं, वैसे ही मनोभूमि की स्थिति है। उनके कार्य, गुण और क्षेत्र भिन्न- भिन्न हैं। ऊपर वाले पर्त- मन और बुद्धि हैं। मन में इच्छाएँ, वासनाएँ, कामनाएँ पैदा होती हैं, बुद्धि का काम विचार करना, मार्ग ...

अनास्था की जननी- दुर्बुद्धि पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

इस भ्रांत धारणा की एक हानि यह है कि मनुष्य स्वेच्छाचारी व अनाचारी बनता है और अपनी राह पर तीर की नोंक वाले काँटे बोने में लगा रहता है। न चाहते हुए भी अंधकारमय परिस्थितियों को अपने समीप बुलाने के लिये निमंत्रण देने में बाध्य रहता है। अभावग्रस्तता, ...

आत्मबल से उभरी परिष्कृत प्रतिभा पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

अध्यात्मबल का संपादन कठिन नहीं वरन् सरल है। उसके लिये आत्मशोधन एवं लोकमंगल के क्रियाकलापों को जीवनचर्या का अंग बना लेने भर से काम चलता है। व्यक्तित्व में पैनापन और प्रखरता का समावेश इन्हीं दो आधारों पर बन पड़ता है। यह बन पड़े तो दैवी अनुग्रह अनायास ...

आपका मूल्य क्या है? पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

एक प्रसिद्ध चित्रकार के जीवन की एक घटना हैं। उसके पास एक धनी कलाप्रेमी चित्र खरीदने आया। उसने एक चित्र को देखकर उसका दाम पूछा। चित्रकार ने उसकी कीमत 50 गिन्नी बताई। कला प्रेमी ने छोटे से चित्र की अधिक कीमत पर आश्चर्य जताया। इस पर कलाकार ने कहा- पूरे तीन सा...

आत्मिक प्रगति की दिशाधारा पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

शरीर से कोई महत्त्वपूर्ण काम लेना हो तो उसके लिए उसे प्रयत्नपूर्वक साधना पड़ता है। कृषि, व्यवसाय, शिल्प, कला विज्ञान, खेल आदि के जो भी कार्य शरीर से कराने हैं उनके लिए उसे अभ्यस्त एवं क्रिया- कुशल बनाने के लिए आवश्यक ट्रेनिंग देनी पड़ती है। लुहार, सुनार, ...

अपने को पहचानें पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

शरीर अनेक सुख- सुविधाओं का माध्यम है, ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा रसास्वादन और कर्मेन्द्रियों के द्वारा उपार्जन करने वाला शरीर ही सांसारिक हर्षोल्लास प्राप्त करता है। इसलिए इसे स्वस्थ, सुन्दर, सुसज्जित एवं समुन्नत स्थिति में रखना चाहिए। इसी ...

अपनी दुनिया के स्वयं निर्माता पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

एक दार्शनिक का मत है कि संसार एक निष्प्राण वस्तु है। इसे हम जैसा बनाना चाहते हैं, यह वैसा ही बन जाता है। जीव चैतन्य है और कर्ता है। संसार पदार्थ है और जड़ है। चैतन्य कर्ता में यह योग्यता होती है कि वह जड़ पदार्थ की इच्छा और आवश्यकता का उपयोग कर सके। ...

अपनी समस्याएँ आप सुलझायें (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

शारीरिक स्वास्थ्य की अवनति या बीमारियों की चढ़ाई अपने आप नहीं होती, वरन् उसका कारण भी अपनी भूल है। आहार में असावधानी, प्राकृतिक नियमों की उपेक्षा, शक्तियों का अधिक खर्च, स्वास्थ्य नाश के यह प्रधान हेतु हैं जो लोग तन्दुरुस्ती पर अधिक ध्यान देते ...

अपनी यथार्थता जानें (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

मानव जीवन एक प्रकार से देवत्व प्राप्ति का अवसर है। इस अवसर का सदुपयोग कर मानव से महामानव, नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम तक बना जा सकता है। मानव शरीर की संरचना भगवान् की श्रेष्ठतम कृति है। इस सृष्टि में मनुष्य से बढ़कर अन्य कोई प्राणी उसने इतना ...

आत्मबोध की प्राप्ति (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

मनुष्य को विवेक बुद्धि प्राप्त है। इसलिए वह श्रेष्ठ है, पर यदि मनुष्य इस विवेक बुद्धि को ताक में रखकर केवल पेट- प्रजनन और लोभ- लिप्सा में ही संलग्न रहे, तो बहुत कुछ मायने में पशु भी उससे अच्छे ही सिद्ध होंगे। अप्राकृतिक आहार- विहार पशुओं को पसंद नहीं, ...

आत्मज्ञान की उपलब्धि ही सर्वश्रेष्ठ सिद्धि (पं श्रीराम शर्मा आचार्य)

अपने आपको जानना ही आत्मज्ञान प्राप्त करना है। अपने को शरीर मानना यह अविद्या है और आत्मज्ञान प्राप्त करना ही विद्या है। पहली मृत्यु है और दूसरी अमरता। एक  अंधकार है, दूसरा प्रकाश, एक जन्म- मृत्यु है दूसरा मोक्ष। एक बंधन है तो दूसरा मुक्ति। नरक और ...

आत्म- परिष्कार बनाम साधना (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

आज जन- जीवन एक विडम्बना मात्र बनकर रह गया है, जिसे ज्यों- त्यों करके काटना पड़ता है। निर्वाह की आवश्यकता जुटाने, गुत्थियों को सुलझाने और प्रतिकूलताओं के अनुकूलन में माथा- पच्ची करते- करते मौत के दिन पूरे हो जाते हैं। अभावों और संकटों से पीछा नहीं ...

मानव हित संवर्द्धन शासन बनाम धर्म

शासन का क्षेत्र पदार्थ एवं व्यवहार है, धर्म का चरित्र एवं चिन्तन। धर्म व्यक्तित्व का गठन करता है। शासन साधनों के उत्पादन वितरण से लेकर सुरक्षा व्यवस्था जैसे भौतिक प्रयोजनों की पूर्ति करता है। अर्थ और दण्ड की शक्ति उसके हाथ में रहने से आकर्षण एवं ...

कर्मफल आज नहीं तो कल भोगना ही पड़ेगा (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

यदि ईश्वर को यह प्रतीत होता है कि बुद्धिमान बनाया गया मनुष्य पशुओं जितना मूर्ख ही बना रहेगा तो शायद उसने दण्ड के बल पर चलाने की व्यवस्था उसके लिए भी सोची होती। तब झूठ बोलते ही जीभ में छाले पड़ने, चोरी करते ही हाथ में फोड़ा उठ पड़ने, बेईमानी करते ही बुखार आ जान...

श्रेष्ठ मनुष्य (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

सभी संत पुरुषों ने बतलाया है मनुष्य जितना  अधिक दूसरों को देता है और दूसरों से जितना कम अपने लिए चाहता है, उतना ही वह श्रेष्ठ होता है, इसके विपरीत जितना वह दूसरों को कम देता है और अपने लिए जितना ही अधिक चाहता है, उतना ही वह दीन-हीन होता  जाता है, जो ...

सत्य में समाया जीवन का आनन्द (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

एक अनादि शक्ति जिसे हम अपनी भाषा में ब्रह्म, सृष्टिकर्त्ता, परमात्मा आदि विविध नामों से जानते हैं, उसका प्रकाश, उसकी प्रेरणा ही जगत् को सब ओर से प्रकाशित किए हुए हैं। उसी से इस जगत् और यहाँ के पदार्थों को हमारे ज्ञान-क्षेत्र, कार्य-क्षेत्र सौन्दर्य को ...

संसार की सबसे बड़ी सेवा (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

संसार के सभी धर्म-सम्प्रदायों ने मनुष्य जीवन को एक अमूल्य, अनुपम उपहार माना है। सनातन धर्म ने तो इसे ईश्वर का राजकुमार कहकर पराकाष्ठा ही कर दी है, लेकिन आज संसार के करोड़ों-अरबों लोगों में से कितने मानव जीवन की इस गरिमा को जानते हैं, मानते हैं तथा ...

महामानव बनने की विधा (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

तथा कथित भक्तजनों में से कुछ सम्पदा पाना या सफलता माँगते हैं, कुछ स्वर्ग, मुक्ति और सिद्धि की फिराक में रहते हैं। कइयों पर ईश्वर दर्शन का भूत चढ़ा रहता है। माला घुमाने और अगरबत्ती जलाने वालों में से अधिकतर संख्या ऐसे ही लोगों की है। उपासना उतने तक ...

पराधीन सपनेहु सुख नाँहीं (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

बहुत से लोग परिस्थितियों का रोना लेकर बैठ जाते हैं, और अपनी कार्य करने की असमर्थता जताने लगते हैं, जो अनुचित है। परिस्थितियाँ ही अनुकूल हो गयीं और हमने अपने कर्त्तव्य पूरे कर लिये, तो इसमें किसी वाहवाही की बात नहीं है। परिस्थितियाँ तो सदैव प्रतिकूल ही ...

विकास के दो सोपानः चरित्र निष्ठा एवं आत्म विश्वास (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

जिसने कठिन समय में अपने मानसिक संतुलन को कायम रखने का महत्त्व समझ लिया, जो बुरी घड़ी में भी दृढ़ रहता है, अंधकार में रहकर जो प्रकाश पूर्ण प्रभात की आशा लगाये रहता है, वह वीर पुरुष सहज में ही दुर्गमता को पार कर जाता है। मानसिक संतुलन के कायम रहने से न तो ...

क्यों नहीं फलती साधनाएँ (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

रात-दिन के आघात, दुःख, असफलता और निराशाओं के कारण जब मानव हृदय रो पड़ता है, उसे अपनी शक्तियों के ऊपर अविश्वास हो जाता है एवं संसार में उसे अपना कोई भी नहीं दिखलाई पड़ता है, उस समय वह अशरण-शरण मंगलमय भगवान् की ओर आकर्षित होता है और संसार में रहते हुए भी संसार की...

मानवीय देह का ध्वनि तरंगों के माध्यम से कायाकल्प (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

आधुनिक खोजों से सिद्ध हो चुका है कि विभिन्न प्रकार की स्वर लहरियों से रोगियों के रोगों का इलाज किया जा सकता है। इसी कारण संगीत-चिकित्सा को चिकित्सा क्षेत्र में एक नई पद्धति के रूप में मान्यता प्राप्त हो चुकी है। प्राचीनकाल में भी मेघ, मल्हार गाकर ...

महात्मा ईसा का शाश्वत संदेश (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

संसार में आज जो संस्कृति, सभ्यता दिखाई दे रही है, वह सब महामानवों की ही देन है। उनके ही उपदेशों और चरित्र का आश्रय लेकर हम लोग मानवता के चरम लक्ष्य की ओर अग्रसर हो रहे हैं। ऐसी विभूतियों को स्वामी विवेकानन्द ने ‘जीवन्त ईश्वर रूप’ कहा है। महात्मा ईसा की ...

नववर्ष हेतु (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

सत्कार्य के प्रति समर्पण तुम्हें धरती  और धरती की आत्मा की रफ्तार के साथ चल सकने की सामर्थ्य देता है। निठल्ला होना तो मौसम की बहारों के लिए अजनबी बन जाना है और जीवन की उस शोभायात्रा से अलग-थलग हो जाना है, जो अनन्त को शानदार समर्पण करती हुई अपने समूचे ...

व्यावहारिक अध्यात्म (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

ऐसी मान्यता है कि जिसे जितने सुविधा-साधन उपलब्ध हो सकेंगे, वह उतना ही सुखी रह सकेगा। प्रगति की दिशा में बढ़ सकना उतना ही अधिक संभव होगा। यह मान्यता आंशिक रूप से ही सत्य है, क्योंकि देखा यह गया है कि अनुकूलताओं की प्रचुरता रहने पर भी लोग खिन्न-उद्विग्र ...

कितनी घातक है गुरु गौरव की उपेक्षा (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य )

तैत्तिरीय उपनिषद् में ‘मातृदेवो भव’, ‘पितृ देवो भव’ के साथ ‘आचार्य देवो भव’ कहकर गुरु का महत्त्व माता-पिता के तुल्य बताया है। इतना ही नहीं, अनेक स्थानों पर तो ‘गुरु साक्षात् परब्रह्म’ कहकर उसकी सर्वोपरिता को भी स्वीकार किया गया है। वस्तुस्थिति भी ऐसी ...

ईमानदारी का व्यवहार (डॉ० प्रणव पण्ड्या )

ईमानदार जीवन हजार मनकों में अलग चमकता हीरा होता है। ईमानदारी यश, धन, समृद्धि का आधार होती है। इसके बावजूद लोग कहते सुने जाते हैं कि व्यापार में बेईमानी बिना काम नहीं चलता, ईमानदारी से रहने में गुजारा नहीं हो सकता, वास्तव में यह गलत है।  वस्तुतः जो ...

कोई ऐसी भक्ति करेगा? (डॉ० प्रणव पण्ड्या )

हजरत अबू बिन आदम की एक बार फरिश्ते (स्वर्गदूत ) से भेंट हुई, वह अपनी बगल में एक बहुत बड़ी पुस्तक दबाये हुए था, हजरत ने फरिश्ते से पूछा- आपके हाथ में यह कौन सी पुस्तक है? और आप किस लिए पृथ्वी पर घूम रहे हैं? फरिश्ते ने उत्तर दिया कि मैं ईश्वर भक्तों की खोज किया ...

चिन्ताओं से घबराइये मत (डॉ० प्रणव पण्ड्या )

जीवन को एक प्रकार का खेल समझिए। खिलाड़ी की तरह पार्ट अदा करिए और पल्ला झाड़ कर अलग हो जाइए। इस वैराग्य, निष्काम कर्म अनासक्ति की योग शास्त्र में बार-बार शिक्षा दी गयी है, यह कोई अव्यावहारिक या काल्पनिक विषय नहीं है, वरन् कर्म शील मनुष्यों का जीवन मन्त्र ...

गंगा जल का वैज्ञानिक महत्त्व (डॉ० प्रणव पण्ड्या )

गंगा के जल में कुछ ऐसे रासायनिक पदार्थों का मिश्रण है, जिससे उसके  द्वारा समय-समय पर आश्चर्यजनक परिणाम उपस्थित होते हैं। गंगा जल वर्षों तक रखा रहने पर भी खराब नहीं होता है। बल्कि खराब पदार्थ गंगा में पड़कर अपना बुरा प्रभाव खो बैठते हैं। हरिद्वार के ...

मानसिक पवित्रता से सौन्दर्य वृद्धि (डॉ० प्रणव पण्ड्या )

सुन्दर निर्मल भावना एवं मानसिक शक्ति ही एक ऐसा उपकरण है, जिसके द्वारा सुन्दरता प्राप्त की जा सकती है। एक विद्वान् डॉक्टर कहते हैं कि सौन्दर्य का आदर्श सदा ध्यान में रखने से सुन्दरता प्राप्त हो सकती है। सुन्दरता को ध्यान भावना में रखना और सुन्दर बनना ए...

उत्तम वस्तु के अधिकारी कौन? (डॉ० प्रणव पण्ड्या )

नेपोलियन को चिट्ठी देने एक घुड़सवार वायु वेग से आगे बढ़ा। लम्बी यात्रा के बाद घोड़ा बेहद थक चुका था। अतः सवार ज्यों ही नेपोलियन के निकट पहुँचा और घोड़े से नीचे उतरा वैसे ही थका हुआ घोड़ा पृथ्वी पर गिरकर मृत्यु को प्राप्त हुआ। नेपोलियन ने पत्रोत्तर लिखकर ...

निश्चयात्मक स्वभाव बनायें (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य )

बिजली के बारे में थोड़ी सी जानकारी रखने वाले जानते हैं कि ऋण (निगेटिव) और  धन (पॉजीटिव) दो प्रकार की धाराएँ मिलकर स्फुरण उत्पन्न करती हैं। मनुष्य शरीर में यह दोनों प्रकार की धाराएँ विद्यमान् हैं और उन्हीं के आधार पर जीवन के सारे कायों का संचालन ...

आत्म निरीक्षण- आत्मिक प्रगति का राजमार्ग (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

अपने आपकी समीक्षा करना, व्यक्तित्व के वर्तमान स्वरूप को समझना आध्यात्मिक साधना की दृष्टि से नितान्त आवश्यक है। क्योंकि इसी आधार पर त्रुटियों का संशोधन और न्यूनता की पूर्ति करना सम्भव है। इस आत्म-निरीक्षण का एक और भी पहलू है कि जो विशिष्टताएँ आत्मिक ...

आत्मा की परमात्मा से पुकार (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

आत्मा ने परमात्मा से याचना की ‘असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतंगमय’। यह तीनों ही पुकारें ऐसी हैं, जिन्हें द्रौपदी और गज की पुकार के समतुल्य समझा जा सकता है। निर्वस्त्र होते समय द्रौपदी ने अपने को असहाय पाकर भगवान् को पुकारा ...

सच्चे मनुष्य कौन? (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

संसार के सर्वाधिक प्राचीन धर्मग्रन्थ ‘वेद’ में किसी विशेष धर्म या जाति सम्बन्धी नीति-नियमों का उल्लेख नहीं किया गया है, बल्कि मनुष्य को उस मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्रदान की गई है, जिससे वह स्वयं देव-मानव बनकर संसार में दैवी प्रकृति के व्यक्तियों ...

श्रेष्ठ जीवन का मूलाधार (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

आज प्रायः प्रत्येक व्यक्ति, समाज, सरकार और सम्पूर्ण विश्व भयग्रस्त है। इस भय का मुख्य कारण उस शारीरिक, मानसिक, भौतिक, नैतिक, सामाजिक या राजनैतिक स्थिति की कल्पना है, जो हमारी आशाओं और आकांक्षाओं के विपरीत है। न चाहते हुए भी जिसके घटित हो जाने की आशंका ...

जहाँ सुमति तहँ सम्पत्ति नाना (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

संसार में समस्त दुःखों की जननी कुबुद्धि है- भूतकाल के कुविचार ही हैं। परमात्मा का युवराज मनुष्य दुःख के निमित्त नहीं, अपने पिता के इस पुण्य उपवन-संसार में आनंद की क्रीड़ा करने के लिए आता है। इस स्वर्गादपि गरीयसी धरती माता पर वस्तुतः दुःख का अस्तित्व ...

आत्मबोध की प्राप्ति (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

मनुष्य को विवेक बुद्धि प्राप्त है। इसलिए वह श्रेष्ठ है, पर यदि मनुष्य इस विवेक बुद्धि को ताक में रखकर केवल पेट-प्रजनन और लोभ-लिप्सा में ही संलग्र रहे, तो बहुत कुछ मायने में पशु भी उससे अच्छे ही सिद्ध होंगे। उदाहरणार्थ मानव का जैसा लोभ, मोह, स्वार्थ, ...

आकर्षक व्यक्तित्व की कुंजी (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

     रूपी साँचे में ढलकर ही मनुष्य जीवन बनता है। अतः यदि जीवन को उच्च बनाना है, तो आवश्यक है कि हम पहले व्यक्तित्व को श्रेष्ठ बनायें। श्रेष्ठ व्यक्तित्व ही दिव्य जीवन की निशानी है। गुण, कर्म, स्वभाव इन तीनों का परिष्कार लाने से ही सही रूप में ...

जीवन और जगत् आखिर है क्या? (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

अनन्त काल से मनुष्य को यह प्रश्र विस्मित करता रहा है कि वास्तव में ये जीवन क्या है? इसको जीवन और जगत् के आधार पर जानने की जिज्ञासा मनुष्य के मन से समाप्त नहीं हुई। जब तक इस समस्या का सच्चा समाधान नहीं मिल जाता, यह जिज्ञासा बनी रहेगी। जीवन के संदर्भ ...

भाग्य निर्माण की सर्वोच्च शक्ति (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

मनुष्य भटका हुआ देवता है। यह भटकाव और कुछ नहीं मात्र विचारों की विकृति है। यदि सही चिन्तन, तथ्य, तर्क और प्रमाणों की खोज करते हुए अपने लिए सही मार्ग अपनाये, तो साधारण से साधारण मनुष्य हँसी-खुशी का जीवन जीते हुए अपने लिए प्रगति का पथ-प्रशस्त कर सकता है और ...

मातृ शक्ति और महापुरुष (शैलदीदी)

विश्व रंगमंच के उच्चतम पदों पर पहुँचे और महानता के उच्च शिखर पर जा चढ़े व्यक्तियों के जीवन इतिहास पर दृष्टिपात करते हैं, तो उनके विकास में सामाजिक परिस्थितियों, शिक्षा एवं साधनों आदि का सीमित योगदान रहा है। माँ के प्रति अनन्य श्रद्धा-भाव ने ही ...

सविता का प्रचण्ड सामर्थ्य (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

मानव  व सूर्य के आदि काल से ही महान् भावनात्मक संबंध रहे हैं। वैदिक वाङ्मय सूर्य के माहात्म्य, उनकी विश्व संचालन में चेतनात्मक भूमिका तथा सूर्योपासना के लाभों के विवरणों से भरा पड़ा है। सूर्य मानव के लिए प्राणदाता, जीवन रक्षक व सांस्कृतिक ...

मनुष्य कहाँ है? (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

आज हर क्षेत्र में मनुष्यों की माँग है। मनुष्यों के अभाव में दुनिया पिछड़ रही है। कार्य  रुके पड़े हैं। सभी मनुष्य की खोज में लगे हैं, लेकिन दुनिया में इतने मनुष्यों के होते हुए भी यह सवाल उठ ही जाता है कि मनुष्य कहाँ है? हिन्दू हैं, मुसलमान हैं, ईसाई हैं, ...

व्यक्तित्व विकास का अमोघ उपाय (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

‘शीघ्र मृत्यु से बचना है, तो मानसिक व्यायाम कभी भूलकर भी बन्द न करें। मानसिक व्यायाम अर्थात् स्वाध्याय का अर्थ कुछ भी पढ़ना नहीं। जो विषय आप नहीं जानते उसका अध्ययन कीजिए। किसी ऐसे विषय का अध्ययन कीजिए, जिससे आपको अपनी खोपड़ी खुजानी पड़े।’  यह शब्द ...

जीवन का मूल मन्त्र (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

धीरस्तुष्टो भवेन्नैव ह्येकस्यां हि समुन्नतौ। क्रियतामुन्नतिस्तेन सर्वास्वाशास्तु जीवने॥ अर्थात् विज्ञ मनुष्य को एक ही प्रकार की उन्नति में संतुष्ट नहीं रहना चाहिए। वरन् सभी दिशाओं में उन्नति करनी चाहिए।  जैसे शरीर के सभी अंगों का पुष्ट होना आ...

स्वाध्याय का मूल प्रयोजन (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

सत्य और धर्म की महत्ता के संबंध में सभी जानते हैं। भले ही उनका परिपालन न करते हों, किन्तु स्वाध्याय के संबंध में कम लोग ही यह अनुभव करते हैं कि उसकी महत्ता भी सत्य और धर्म के परिपालन से किसी भी प्रकार कम नहीं है। उसकी उपेक्षा करने पर इतनी बड़ी हानि होती ...

महापुरुष ढालने का स्टील प्लान्ट (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

गीता का कथन है-ज्ञान के समान पवित्र इस संसार में और कुछ नहीं। विवेकानन्द कहते थे, हमारे सारे संकट और दुःख मात्र इस कारण हैं कि हम अपने और अपने समय के समाज के बारे में बहुत कम जानते हैं, फलतः यह समझ नहीं पाते कि कठिनाइयों के निराकरण एवं सुविधाओं के संवर्धन ...

मित्रता (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

जीवन यात्रा का पथ बहुत लम्बा होता है, इसमें अनेकों उतार-चढ़ाव, परिवर्तन, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियाँ आती हैं, जिनमें अकेला चलना सामान्यतः बहुत कठिन हो जाता है। जीवन पथ पर चलने के लिए अभिन्न साथी- सहयोगियों की आवश्यकता मानव जीवन का एक अनिवार्य पहलू ...

परमात्मा का सर्वोत्तम वरदान (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

गायत्री को गुरु मंत्र माना गया है। उसे वेद माता कहा गया है और गायत्री उपासना प्रत्येक हिन्दू के लिए आवश्यक धर्म-कर्त्तव्य बताया है। क्यों? किसलिए? यह गायत्री की मूल भावना से अपने आप स्पष्ट हो जाता है, जिसमें उस शक्तिशाली, तेजस्वी, सर्वव्यापी, दिव्य ...

ओजस्, तेजस्, ब्रह्मवर्चस (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

प्रकृति के अंतराल में छिपी विद्युत् शक्ति का परिचय शताब्दियों पूर्व लगा लिया गया था और अब उसका उपयोग मनुष्य जीवन की घनिष्ट सहचरी के रूप में किया जा रहा है। कभी अग्रि की, पशु-शक्ति की क्षमता को हस्तगत करके मनुष्य को बड़ा संतोष हुआ था।  इन शताब्दियों ...

सप्तलोक- सप्त आयामों का ज्ञान- विज्ञान (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

शास्त्रों में सप्त लोक, सप्त ऋषि, सप्त देवियाँ, सप्त नगरी, सप्त रंग, सूर्य की सप्त किरणें, सप्त घोड़ों का वर्णन विस्तारपूर्वक किया गया है। उपरोक्त सात समूह वस्तुतः चेतना की सात परतें, सात आयाम हैं- जिनका आलंकारिक वर्णन इन रूपों में किया गया ...

सर्वधर्म समन्वय (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

आज धार्मिक क्षेत्र में हठधर्मी व्यक्तियों की संख्या बढ़ गयी है। इनका न अपना कोई सिद्धान्त होता है, न ही किसी औचित्य पर सदाशयतापूर्वक विचार करते हैं, जो अपने हित में लगा उसी पर अड़ पड़े। इनका किसी पर क्या प्रभाव पड़ेगा। इससे क्या लेना? हठधर्मी वे जो ...

ज्ञान का महत्त्व समझिये (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

जीवन की विकृतियाँ, सुख-दुःख, उलझन, अशांति, हीनता, अवसाद आदि का मूल कारण मनुष्य का अपना अज्ञान ही होता है। चाणक्य ने कहा है- ‘अज्ञान के समान मनुष्य का और कोई दूसरा शत्रु नहीं है।’ हितोपदेश में आया है- ‘अज्ञानी लोग थोड़ा सा काम शुरू करते हैं, किन्तु बहुत ...

श्रद्धामयोऽयं पुरुषो (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

अमेरिका एक ऐसा देश है, जहाँ आजकल विश्वास-चिकित्सा की लहर चल पड़ी है। वहाँ यूनिटी स्कूल ऑफ क्रिश्चियनिटी, कम्यूनिटी ऑफ जीसस, चर्च ऑफ यूनीवर्सल डिजाइन, डोवीवाद, दि एमेनुअल मूवमेण्ट, क्रिश्चियन साइंस, एवं न्यू थॉट मूवमेण्ट जैसे नामों से विभिन्न ...

जीवन साधना का मर्म (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

पदार्थ और चेतना सांसारिक रचना के दो मूलभूत तत्त्व हैं। पदार्थ का संबंध बाहरी ढाँचे से है, जबकि ढाँचे के संयोजन के पीछे काम करने वाली शक्ति चेतना है। साधना इसी चेतन क्षेत्र का व्यवसाय है। संसार के सभी व्यवसाय  पूँजी, परिश्रम और अनुभव के आधार पर चलते ...

धर्म का सच्चा स्वरूप (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

संसार में हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख,  ईसाई, ताओ, कन्फ्यूशियस, जैन, बौद्ध, यहूदी आदि विभिन्न नामों से प्रचलित धर्म-सम्प्रदायों पर दृष्टिपात करने से यही पता चलता है कि उनके बाह्यस्वरूप एवं क्रिया-कृत्यों में जमीन-आसमान जितना अंतर है। यह अंतर होना उचित भी ...

महामंत्र की प्रचण्ड सामर्थ्य (डॉ. प्रणव पण्ड्या )

शब्द एवं ध्वनियों का हमारे जीवन से गहरा संबंध है, भारतीय ऋषियों ने इस संदर्भ में जितना गहन अध्ययन किया, शायद संसार में और किसी ने नहीं किया हो। इसलिए भारतीय मनीषियों  ने ‘शब्द’ को ब्रह्म कहा है- अक्षर ब्रह्म-अक्षरं परमं ब्रह्म। ब्रह्म सर्वव्यापी ...

पाप- पुण्य का भेद (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य )

हर एक व्यक्ति, चाहे वह भले कर्म करता हो या बुरे, निःसंदेह सच्चिदानन्द की प्राप्ति के लिए प्रयत्न कर रहा है। मानव जीवन की धारा इसी निश्चित दिशा में प्रवाहित हो रही है, उसका पलटना या बढ़ना किसी भी व्यक्ति के लिए संभव नहीं, क्योंकि वह ईश्वर-प्रदत्त ...

नववर्ष की नई उपलब्धि (डॉ. प्रणव पण्ड्या )

एक मजदूर बड़े परिश्रम से कुछ चावल कमाकर लाया था। उन्हें  घर लिये जा रहा था। अचानक उस बोरी में छेद  हो गया और धीरे-धीरे वे चावल पीछे की ओर गिरते गये। जब पीछे देखा तो उसे होश आया। उसने एक हसरतभरी निगाह उन दानों पर डाली और कहा- काश! मैं इन  दानों को फिर से पा ...

आन्तरिक शून्यता ही है, परम सिद्धि (डॉ० प्रणव पण्ड्या )

किसी समय महर्षि रमण से पश्चिमी विचारक पॉल ब्रँटन ने पूछा था, ‘मनुष्य की महत्त्वाकांक्षा की जड़ क्या है?’ महर्षि रमण हँसकर बोले- ‘हीनता का भाव, बात थोड़ी अटपटी सी लगती है। हीनता का भाव और महत्त्वाकांक्षी चेतना परस्पर विरोधी दिखाई पड़ती हैं, लेकिन वे वस्तुतः...

सबके लिए ध्येय प्रतिमा का ध्यान (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

मनुष्य उन्नति करना चाहता है। हर किसी की इच्छा होती है कि मैं सुन्दर,स्वरूपवान्, स्वस्थ, बलवान् विद्वान्, बुद्धिमान्, तेजस्वी, प्रतापी, ऐश्वर्यवान् असाधारण शक्तियाँ रखने वाला बनूँ। परन्तु सर्वतो मुखी उन्नति के मार्ग पर बढ़ने का कार्य किस प्रकार आरम्भ ...

धर्म संकट (डॉ० प्रणव पण्ड्या )

अनेक बार मनुष्य के जीवन में ऐसे अवसर उपस्थित होते हैं, जब वह धर्म संकट में पड़ जाता है। सामने दो ऐसे मार्ग आ जाते हैं, जो दोनों ही अरुचिकर होते हैं, उनमें से किसी को भी करने की इच्छा नहीं होती, फिर भी ऐसी परिस्थिति सामने होती है कि एक को किये बिना गुजारा ...

ध्यान से उपजती है- अतीन्द्रिय संवेदना (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

योग साधक की दृष्टि, उसकी संवेदना और अनुभूतियों का संसार सबसे अलग विशेष व विलक्षण होता है। वह सामान्य इन्द्रियों से पार व परे देखता है, जानता है, अनुभव करता है। उसके सामने सत्य के व्यापक रूप प्रकट होते हैं। उसकी अन्तर्चेतना में अस्तित्व की इन्द्रधनुषी ...

ध्यान की गहराई में छिपा है परम सत्य (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

योग साधक जैसे- जैसे अन्तर्यात्रा पथ पर आगे बढ़ते हैं उनकी संवेदनाएँ सूक्ष्म हो जाती है। इस संवेदनात्मक सूक्ष्मता के साथ ही उनमें संवेगात्मक स्थिरता- नीरवता व गहरी शान्ति आती है। और ऐसे में उनके अनुभव भी गहरे, व्यापक व पारदर्शी होते चले जाते हैं। कई ...

राग शमन करता है- वीतराग का ध्यान (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

अन्तर्यात्रा का विज्ञान योग पथ को प्रकाशित करता है। इसके प्रकाश में योग पथ की सूक्ष्मताएँ, गुह्यताएँ गहरे रहस्य उजागर होते हैं। योग पथ के पथिक इस प्रकाश का सहारा पाकर इधर- उधर अटकने- भटकने से बचते हैं। अन्तर्यात्रा विज्ञान का प्रकाश उन्हें न केवल ...

तीव्र प्रयासों से मिलेगी, समाधि में सफलता (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

समाधि की अवस्था को पाने के लिए पूर्व वर्णित तत्त्वों एवं सत्यों का जीवन में तीव्रतर होते जाना जरूरी है। सारा सुफल इस तीव्रता का ही है। महर्षि कहते हैं- तीव्रसंवेगानामासन्नः ॥ १/२१॥ अर्थात्- समाधि की सफलता उनके निकटतम होती है, जिनके प्रयास तीव्र, ...

चाहत नहीं, तड़प जगे (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

योग के मार्ग पर नया- नया चलना आरम्भ किये साधकों के लिए यह समाधि का महाद्वार खुल जाना सहज नहीं है। उनकी कतिपय आदतें, अतीत के संस्कार, पुरातन प्रवृत्तियाँ यह स्थिति पनपने नहीं देती। उनमें चाहत तो जगती है, लेकिन थोड़े ही दिनों में धूमिल और धुँधली होकर ...

सहज ही मिल सकती है- सिद्धि (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

आध्यात्मिक जीवन में तीन आँखों की जरूरत पड़ती है। इसमें पहला नेत्र है- आध्यात्मिक जीवन के प्रति निष्कपट जिज्ञासा। ऐसी जिज्ञासा वाले ही इस पथ पर चलने के लिए उत्सुक होते हैं। दूसरा नेत्र है- प्रचण्ड संकल्प। ऐसा संकल्प जगने पर ही अन्तर्यात्रा पर पहला कदम पड़...

गहरी निद्रा भी दे सकती है ज्ञान (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

महर्षि पतंजलि कहते हैं कि व्यक्तित्व की पहेली को सुलझाने के लिए, जीवन के महाप्रश्न को हल करने के लिए व्यक्ति को अपनी सम्पूर्णता में प्रतिबद्ध होना होगा। ध्यान सधे, समाधि सिद्ध हो इसके लिए व्यक्ति की समग्र ऊर्जा आवश्यक है। व्यक्ति जब अपने ...

व्यक्तित्व की विशेषताओं के अनुरूप सभी ध्यान श्रेष्ठ है (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

अन्तर्यात्रा में योग साधक की गति ज्यों- ज्यों तीव्र होती है, त्यों- त्यों उसकी भावनाओं एवं विचारों में गहरे परिवर्तन होते हैं। इन परिवर्तनों का स्वरूप कुछ इस तरह से बनता बदलता है कि उसे रूपान्तरण की संज्ञा दी जा सकती है। इन परिवर्तनों के कारण जीवन की रास...

अतिचेतन तक को वश में कर लेता है ध्यान (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

अंतर्यात्रा के पथ पर श्रद्घा एवं सम्पूर्ण सामर्थ्य से चल रहे साधक के व्यक्तित्व से कभी ज्ञान के आश्चर्य पल्लवित होते हैं तो कभी उसमें अचरज में डालने वाली शक्ति सामर्थ्य नजर आती है। जिसे कभी सुना नहीं गया, जिसके बारे में कभी सोचा नहीं गया, ऐसे कितने ही ...

स्फटिक मणि सा बनाइये मन (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

यह तथ्य भली भाँति हृदयंगम कर लेना चाहिये कि असंभव को संभव बनाने वाला अन्तर्यात्रा का विज्ञान उनके लिए ही है जो अन्तर्चेतना के वैज्ञानिक होने के लिए तत्पर हैं। वैज्ञानिक अपनी अनूठी दृष्टि, प्रक्रियाओं एवं प्रयोगों की वजह से विशेष होता है। जिन बातों को, ...

मंजिल नहीं, पड़ाव है- सवितर्क समाधि (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

सीमाओं से मुक्त गगन में श्वेत हंस की भाँति साधक उड़ना चाहता है। इसीलिए तो वह अन्तर्यात्रा के लिए संकल्पित हुआ था, जिसके प्रयोगों में रहस्यमयता है, किन्तु इनकी परिणति बड़ी स्पष्ट है। जो इन प्रयोगों में संलग्न हैं, वे अपनी अनुभूति में इस सच का ...

सत्य का साक्षात्कार है- निर्वितर्क समाधि (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

अन्तर्यात्रा के विज्ञान का सार- परिष्कार है। परिष्कार की साधना के सघन एवं गहन होने से अन्तर्यात्रा का पथ प्रशस्त होता है। इसके वैज्ञानिक प्रयोगों में सुगमता आती है। साधकों एवं सामान्य जनों में योग साधना के जटिल एवं दुरूह होने की बात कही- सुनी जाती ...

ॐ कार को जाना, तो प्रभु को पहचाना (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

प्रभु के सामने साधक भी बालक ही है। वह जानना चाहता है कि प्रभु को किस नाम से जानें? किस तरह से उसका स्मरण करें? इसकी चर्चा महर्षि इस सूत्र में करते हुए कहते हैं- तस्य वाचकः प्रणवः ॥ १/२७॥ अर्थात्- उसे ‘ॐ’ के नाम से जाना जाता है। महर्षि ने इस सूत्र में ...

यदि जान सकें तो जप की कला (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

योग न तो लौकिक ज्ञान है और न ही कोई सामान्य सांसारिक विद्या है। यह महान् आध्यात्मिक ज्ञान है और अतिविशिष्ट परा विद्या है। वाणी से इसका उच्चारण भले ही किया जा सकता हो, पर इसके अर्थ बौद्धिक चेतना में नहीं खुलते। इसके रहस्यार्थों का प्रस्फुटन तो गहन भाव चे...

आत्म साक्षात्कार का साधन जप (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

मंत्र जप के विषय में बाबा कबीर कहते हैं- माला तो कर में फिरै, जीभ फिरै मुख मांहि। मनुवां तो चहुँ दिशि फिरै, यह तो सुमिरन नाहिं यानि कि माला तो हाथ में घूमती रहती है ओर जीभ मुख में घुमती रहती है। मन चारों दिशाओं में घूमता- फिरता है। इस स्थिति को न तो जप कहा ...

मंत्र में छिपी है विघ्न विनाशक शक्ति (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

भौतिक विज्ञानी कहते हैं कि ध्वनि और कुछ नहीं है सिवाय विद्युत् के रूपान्तरण के। अध्यात्म विज्ञान के विशेषज्ञ योगी जन कहते हैं कि विद्युत् और कुछ नहीं है सिवाय ध्वनि के रूपान्तरण के। यानि कि ध्वनि और विद्युत् एक ही ऊर्जा के दो रूप हैं। और इनका ...

बहुत बड़ी है आततायी विघ्नों की फौज (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

ईश्वरीय अनुभूति करने में प्रमाद कर रहे लोगों को महर्षि चेतावनी देते हैं कि विघ्नों के क्रम की इति यहीं तक नहीं है। ये और भी हैं। योग साधना के अन्य विक्षेपों का खुलासा करते हुए महर्षि अपना सूत्र प्रकट करते हैं- दुःखदौर्मनस्याङ्ग्रमेजयत्वश्वास- ...

एक से ही हों एकाकार (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

जीवन ऊर्जा के चक्र के अव्यवस्थित हो जाने से जन्मे विघ्नों को समाप्त करने का समाधान महर्षि अपने सूत्र में बताते हैं। तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः॥ १/३२॥ अर्थात्- उनको (साधना में आने वाले सभी विघ्नों को) दूर करने के लिए एक तत्त्व का ...

करुणा कर सकती है- चंचल मन पर काबू (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

व्यवहार की गड़बड़ियो से भी मन इतना चंचल व अस्थिर हो जाता है कि योग साधना की स्थिति ही नहीं बनती। इस समस्या का निराकरण महर्षि अपने सूत्र में करते हुए कहते हैं- मैत्रीकरूणामुदितोयेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्य- विषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम्॥ १/३३॥ अ...

बड़ा गहरा है- प्राण व मन का नाता (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

तपस्वी के तप, भक्त की भक्ति और योगी के योग से सबसे पहले प्राण निर्मल होते हैं। ऐसा होने पर ही इनकी साधना आगे बढ़ती है। प्राणों का मल वासना है। वर्तमान स्थिति में प्राण वासना से गंदले और धुँधले हैं। वासना के आवेग इन्हें प्रेरित, प्रवर्तित, परिवर्तित और ...

अध्यात्मवाद

वर्तमान की समस्त समस्याओं का एक सहज सरल निदान है- अध्यात्मवाद। यदि शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, आर्थिक जैसे सभी क्षेत्रों में अध्यात्मवाद का समावेश कर लिया जाये, तो समस्त समस्याओं का समाधान साथ- साथ होता चले और आत्मिक प्रगति के लिए अवसर एवं अवकाश भी ...

किसकी महत्ता को स्वीकार करें? (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

पदार्थ विज्ञान, जिसे भौतिक विज्ञान भी कहा जाता है, के आविष्कार निश्चय ही सराहनीय एवं आश्चर्यजनक है, पर जब चेतना विज्ञान, जिसे योग विज्ञान भी कहा जाता है, की उपलब्धियों से तुलना की जाय, तो दोनों के बीच काफी अंतर दिखाई देता है। यदि चेतना विज्ञान प्रखर ...

सांस्कृतिक चेतना उन्नयन के पाँच प्रमुख आधार

विश्वविख्यात तीर्थ नगरी हरिद्वार में करीब- करीब सभी धर्म- सम्प्रदायों के मठ, मंदिर एवं आश्रम देखने को मिलते हैं। समय- समय पर इनसे जुड़े भक्त गण यहाँ आकर तीर्थ यात्रा का लाभ प्राप्त करते हैं। तीर्थ नगरी की सबसे बड़ी विशेषता है पतित पावनी भागीरथी का अविरल ...

विचार शक्ति (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

समुन्नत जीवन की व्यापक विस्तृत संभावनाओं का आधार सद्विचार ही है। विचारों की तरंगें, प्रकाश, ताप, ध्वनि एवं विद्युत् की अपेक्षा अधिक ही शक्तिशाली है, कम नहीं। विचार है क्या? प्राण शक्ति की स्फुरणा (डिस्चार्ज ऑफ वाइटल फोर्स) ही विचार है। फोटोन कण ...

विचार परिष्कार (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

विचारणाओं भावनाओं की उत्कृष्टता ही मानवीय उत्कर्ष का, अभ्युदय का प्रमुख आधार है। जो इस तथ्य से भली- भाँति अवगत हैं, वे अपनी चिन्तन- चेतना को सदैव ऊर्ध्वगामी बनाये रखने का प्रयत्न करते हैं। विचार शक्ति की महिमा से अनजान व्यक्तियों को जिस- तिस प्रकार ...

अपने आपको जानो, समझो और सुधारो (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

परमात्मा अपनी विशाल दुनिया का मालिक है, पर आत्मा को भी अपने सत्ता क्षेत्र में पूर्ण आधिपत्य प्राप्त है। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है। अपनी दुर्बुद्धि से उसे बिगाड़ सकता है और सत्प्रवृत्तियाँ अपनाकर बना भी सकता है। अपने कमरे में सूर्य की धूप ...

आत्म- प्रगति की धुरी- आत्म विश्वास (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

मनुष्य के कायिक और मानसिक इकाई में अद्भुत क्षमताओं के एक से एक भण्डार भरे पड़े हैं। उनका सुव्यवस्थित सदुपयोग बन पड़े, तो सामान्य समझा जाने वाला व्यक्ति भी ऐसी सफलताएँ प्राप्त कर सकता है, जिन्हें चमत्कारी देव वरदानों की तरह गिना जाने लगे। दुर्भाग्य इसी बा...

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत

मनुष्य की सारी गतिविधि और क्रिया- कलापों का संचालन केन्द्र मनःसंस्थान है। सागर की लहरों की भाँति मनःक्षेत्र में भी कितने ही उतार चढ़ाव आते रहते हैं। कभी तो वह समुद्र- सा शान्त, आकाश- जैसा नीरव और शीतल वायु का स्पर्श करता हुआ बहता है, तो कभी समुद्र में आने ...

आत्मा की परमात्मा से पुकार (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

आत्मा ने परमात्मा से याचना की असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतंगमय। यह तीनों ही पुकारें ऐसी हैं, जिन्हें द्रौपदी और गज की पुकार के समतुल्य समझा जा सकता है। निर्वस्त्र होते समय द्रौपदी ने अपने को असहाय पाकर भगवान् को पुकारा था। गज ...

श्रेष्ठ जीवन का मूलाधार (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

आज प्राय: प्रत्येक व्यक्ति, समाज, सरकार और सम्पूर्ण विश्व भयग्रस्त है। इस भय का मुख्य कारण उस शारीरिक, मानसिक, भौतिक, नैतिक, सामाजिक या राजनैतिक स्थिति की कल्पना है, जो हमारी आशाओं और आकांक्षाओं के विपरीत है। न चाहते हुए भी जिसके घटित हो जाने की आशंका ...

परिष्कृत चेतना में ही दिव्य शक्तियों का अवतरण सम्भव (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

चेतना की परिष्कृत स्थिति उसे कहा जाता है, जहाँ भौतिक तत्त्वों का कम और आत्मिक उत्कृष्टता का अधिकाधिक समावेश होता है। जब भौतिकता ही मन- मस्तिष्क अंत:करण पर छाई रहती है, तो जीव एक सीमा में पाशबद्ध होता है, जिसे कषाय- कल्मष, भवबंधन, लोभ- मोह, वासना- ...

संकल्प शक्ति (शैल दीदी)

संकल्प का अपना विज्ञान है। उसे कर्म का बीजारोपण कह सकते हैं। संकल्प की चरणबद्ध रूपरेखा बनाई जाती है। इसमें सोच विचार कर निश्चय किये जाते हैं। निश्चय को मन में छिपाकर नहीं रखा जाता है, वरन् प्रकट किया जाता है। उसकी क्रमबद्ध योजना बनाई जाती है। ...

सर्वोपरि धर्म (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

आज हमारे राष्ट्र को आजाद हुए अर्धशतक से अधिक समय बीत चुका है। एतदर्थ लाखों लोगों ने अपनी कुर्बानी दी, किसी ने परिवार खोया, किसी ने अपना जमा जमाया व्यवसाय, कारोबार एवं किसी ने शहादत द्वारा स्वयं को राष्ट्र देवता की बलिवेदी पर न्यौछावर कर दिया। इतनी बड़ी की...

सफलता का रहस्य (शैलदीदी)

मनुष्य के विकास की संभावनाएँ असीम हैं। उसके अंतर्गत छिपी हुई क्षमता का पूरी तरह मूल्यांकन किया जा सकना कठिन है। महामानवों के अगणित इतिहास इस बात के साक्षी हैं कि साधनहीन परिवारों में उत्पन्न होना तथा विपरीत परिस्थितियों का घेरा मनुष्य की प्रगति में ...

परावलम्बन छोड़े, आत्मावलम्बन अपनाएँ (शैलदीदी)

प्रगति के पथ पर चलते हुए यदि दूसरों का सहयोग मिल सकता है, तो उसे प्राप्त करने में हर्ज नहीं। सहयोग दिया जाना चाहिए और आवश्यकतानुसार लेना भी चाहिए। पर इस तथ्य को ध्यान में रखना चाहिए कि हमारी मूलभूत आवश्यकता हमें स्वयं ही पूरी करनी पड़ती है, ...

साधन और साध्य (शैलदीदी)

गीताकार ने साधना क्रिया पर जोर देते हुए कहा है स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि विन्दति मानवः। जो व्यक्ति सच्चाई के साथ अपना कार्य करता है, उसे ही सिद्धि मिलती है। कर्म साधना ही साध्य की अर्चना है।       साध्य कितना ही पवित्र उत्कृष्ट महान् क्यों ...

प्रतिभा की अतिशय आवश्यकता

इक्कीसवीं सदी में परिष्कृत प्रतिभाओं की बढ़ी- चढ़ी भूमिका होगी। उसी को दूसरे शब्दों में ईश्वरेच्छा- दैवी प्रेरणा या समर्थ चेतना द्वारा संपन्न की या कराई गई तपश्चर्या कह सकते हैं। इस आधार पर महाकाल ने इन दिनों परिष्कृत प्रतिभाओं का उत्पादन- ...

भावना की परिष्कृति का परम बोध है : श्रद्धा डॉ. प्रणव पण्ड्या

भावना चेतना का परमोच्च शिखर है। भावना गिरने पर कलुष- वासना बनती है और उठने एवं परिष्कृत होने पर परम वृत्ति का अनुभव होता है। इसके अभाव में मन अतृप्ति की कसक से कसकता रहता है। इसके अपूरणीय खालीपन से अंतर बुरी तरह से कसकता रहता है। जीवन में सब कुछ होते ...

सभी धर्मों में उच्च आदर्शों की समरसता (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

मनुष्य सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी माना गया है, परन्तु स्रष्टा ने उसके अन्दर की इच्छा शक्ति को प्रबल कर, दो रास्ते बना दिए हैं। वह चाहे तो अधोगामी प्रवृत्ति अपनाकर पशु तुल्य जीवन जिये अथवा उत्कृष्ट जीवन अपना कर देवोपम एवं सर्वश्रेष्ठ जीवन को ...

व्यक्तित्व ढालने का उपयुक्त समय : अध्ययन काल

व्यक्तित्व ढालने का सबसे उपयुक्त और सही समय वह है जिसे अध्ययन काल कहते हैं। किशोरावस्था और उभरती आयु में जोश रहता है, शरीर में सामर्थ्य और मस्तिष्क में धारणा शक्ति का बाहुल्य रहता है एवं प्रकृति प्रदत्त ऐसी और भी विशेषताएँ रहती हैं जिनके कारण ...

अपने ही अन्तःकरण में बसता है ईश्वर (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

ईश्वर से मिलने, निवेदन करने का सबसे निकटवर्ती स्थान अपना अंतःकरण ही है। यों तो ईश्वर सर्वव्यापी है और उसे कहीं भी अवस्थित माना- देखा जा सकता है; पर दूरवर्ती भाग- दौड़ करने से बचना हो और कस्तूरी वाले मृग की तरह निरर्थक न भटकना हो, तो अपना ही अंतःकरण ...

प्रतिकूलताओं के रहते हुए भी प्रगति संभव (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

यह आवश्यक नहीं कि किसी को उन्नतिशील बनने के लिए उसके पास समुचित साधन होना चाहिए अथवा उसके अभिभावकों द्वारा उसके लिए शिक्षा तथा सुविधा जुटाने का प्रबन्ध किया ही जाय। यह यों तो अच्छी बात है, पर इनका अभाव रहने पर भी मनुष्य अपनी इच्छा- शक्ति एवं तत्परता ...

विपत्ति के समय मनोबल का संबल (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

इतिहास के पन्ने ऐसे प्रतिभाशालिओं की पुरुषार्थ गाथाओं से भरे पड़े हैं जिनने अपने संकल्प एवं पुरुषार्थ के बल पर अपने को ऊँचा उठाया और स्वयं को कुछ से कुछ बनाकर दिखा दिया। जिनने विभिन्न प्रकार की बलिष्ठताओं सम्बन्धी कीर्तिमान स्थापित किये हैं, उनमें ...

अद्भुत व असीम इच्छा- शक्ति (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

कभी- कभी अनायास ही छोटी- सी काया में अपरिमित सामर्थ्य न जाने कहाँ से उद्भूत होने लगता है कि उस कार्य को करने पर व्यक्ति स्वयं आश्चर्यचकित हो उठता है। विगोरीज, फ्राँस के घोड़े की टाँग आखेट की उछल- कूद में टूट गई। घोड़े को उस दयनीय स्थित में छोड़ना ...

मन्त्र साधना के क्षेत्र में गायत्री मन्त्र की महिमा सर्वोपरि (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

गायत्री महामन्त्र की शक्ति असाधारण है। उसमें भरी हुई शिक्षा को यदि हृदयंगम किया जा सके, विचारणा को सद्बुद्धि में, ऋतम्भरा प्रज्ञा में परिणत किया जा सके, तो समझना चाहिए कि नर को नारायण रूप में परिणत होने की सम्भावनाओं का पथ प्रशस्त हो गया। इन अक्षरों ...

गुणसूत्रों में परिष्कार से संस्कार संवर्धन तक (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

वंशानुक्रम विज्ञान में अब तक जो शोधें हुई हैं, उनके अनुसार सन्तान के व्यक्तित्व का ढाँचा बनाने में जो जीन्स काम करते हैं, वे न जाने कितनी पीढ़ियों से चले आते हैं। मातृकुल और पितृकुल के सूक्ष्म उत्तराधिकारों से वे बनते हैं। सम्मिश्रण की प्रक्रिया ...

आत्मसाक्षात्कार कराने वाला अद्भुत अध्यात्म उपचार : त्राटक (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

त्राटक योगसाधना का एक ऐसा अंग है, जिसका अभ्यास योगीजन दीर्घकाल से करते रहे हैं। यों तो इसकी अनेक विधियाँ हैं, कई प्रतीकों का उपयोग बताया गया है, पर आकाश त्राटक एक ऐसी विधि है, जिसका यदि सही- सही अभ्यास हो गया, तो साधक आत्मसाक्षात्कार तक प्राप्त कर सकता ...

गायत्री मन्त्र में हजार परमाणु से भी अधिक शक्ति पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

मुम्बई के प्रख्यात साप्ताहिक ‘ब्लिट्ज’ के सम्पादक संचालक श्री करेंजिया लन्दन गये थे। वहाँ रह रहे विश्वविख्यात विचारक कोयस्लर से उन्होंने भेंट की। इस भेंट में अन्य विषयों के अतिरिक्त परमाणु युद्ध की सम्भावना और उसकी विश्वव्यापी प्रतिक्रिया ...

सनातन धर्म की साधना पद्धतियाँ

सनातन धर्म में जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य ईश्वरतुल्य अपने जीवन की श्रेष्ठतम सम्भावनाओं एवं शक्तियों को उपलब्ध करना है। इसी लक्ष्य को यहाँ विविध नामों से परिभाषित किया गया है। आत्म साक्षात्कार, मोक्ष, मुक्ति, पूर्णता प्राप्ति, कैवल्य, समाधि, ...

गायत्री की रहस्यमयी प्राणविद्या (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

गायत्री मंत्र के द्वारा जिस प्राणविद्या की साधना की जाती है- वह ब्रह्मविद्या ही है। जप, अनुष्ठान और पुरश्चरणों के द्वारा मनोभूमि को शुद्ध किया जाता है। जिस प्रकार किसान अपनी कृषि- भूमि को हल चलाकर जोतता है और उसे इस योग्य बनाता है कि उसमें उपासना के ...

गायत्री की महत्ता (डॉ० प्रणव पण्ड्या)

भारतीय प्रजातंत्र की विधि- व्यवस्था के लिए डॉ० अंबेडकर की अध्यक्षता में बने संविधान की तरह एक समय भारतीय समाज जिस विधि- व्यवस्था के अंतर्गत चलता था, उसका नाम ‘मनुस्मृति’ है। भगवान् मनु ने गायत्री उपासना को राष्ट्रीय उपासना का स्थान प्रदान किया ...

सिख धर्म में यज्ञ- हवन (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

सिख धर्म में यज्ञ का वैसा ही महत्त्व स्वीकारा गया है जैसा कि हिंदू धर्म के अन्य वर्ग संप्रदायों में ।। गुरुवाणी में यज्ञ- महिमा का उल्लेख अनेकों स्थानों पर मिलता है यथा- तित धोए होम जदा सद पूजा। पइयै कारण सो है॥ (वार माफ म०१ गु०प्र० ...

एक साइन्टीफिक टैकनीक हैः ‘ऑटोसजेसन’ (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

‘ऑटोसजेसन’ अर्थात् स्वसंकेत। आत्मसुधार का यह बहुत ही अच्छा तरीका है। इसके द्वारा अवचेतन मन की गहराई में प्रवेश कर उस क्षेत्र में जमी विकृत अभिरुचियों में अभीष्ट सुधार- परिवर्तन किया जा सकता है। यह एक विज्ञानसम्मत प्रक्रिया है, जिसके सहारे अपने आपको अ...

ब्राह्मणत्व का उद्भव यज्ञ से (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

ब्राह्मण परंपरा में यज्ञ को एक अनिवार्य आवश्यकता माना गया है। ब्राह्मण के छह कर्म बताए गए हैं। इन्हें तीन युग्म भी कहा जाता है- (१) विद्या पढ़ना- विद्या पढ़ाना,  (२) दान देना- दान दिलाना,(३) यज्ञ करना- यज्ञ कराना। इन तीन युग्मों में एक यज्ञ से संबंधित है। ...

बुद्धि की महत्ता एवं उपयोगिता (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

शास्त्रकारों ने एक बड़े रहस्य का उद्घाटन किया है— बुद्धेबुद्धिमतां लौके नास्त्यगम्य हि किंचन। बुद्धया यतो हता नन्दश्चाणक्यनासिपाणया॥ अर्थात्- ‘बुद्धिमानों की बुद्धि के आगे संसार में कुछ भी असाध्य नहीं है। बुद्धि से ही शस्त्रहीन ...

आत्मविश्वास विकसित करने के कुछ दिव्य सूत्र (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

‘सदा विजयी’ आत्मविश्वास का ध्येय वाक्य है। आत्मविश्वास विजय के रथ पर आरूढ़ होता है। यह तमस् के सघन कुहासे में तेजस्वी सूर्य- सा चमकता है। यह हर विपरीत परिस्थितियों को चीरकर निकल जाता है। आत्मविश्वासी कभी हार नहीं मानता। सदैव अपने लक्ष्यपथ पर बढ़ता रहता ...

लोकनिर्माण के नैष्ठिक पथिक- सन्त पायर (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

एक फ्रेम में मढ़ा हुआ एने फ्रैंक का वाक्य ‘प्रकृति बदलेगी और मनुष्य पुनः अच्छा बनेगा। बुरा दिन समाप्त हो जायेगा और संसार एक बार फिर देख सकेगा शान्ति, व्यवस्था और सुख’ आफिस की उस दिवार पर टंगा था, जहाँ पायर सैनिक अफसर की हैसियत से काम करते थे। पायर का जन्...

विवेक ने खोले ‘अन्तर्चक्षु’

राजगृह का विशाल समारोह कक्ष श्रोताओं से खचाखच भरा था। तीर्थंकर महावीर का प्रवचन चल रहा था। वाणी से अमृत की वर्षा हो रही थी। मन्त्रमुग्ध हो सभी उसका रस- पान कर रहे थे। विशाल परिसर में सम्राट् श्रेणिक, महामन्त्री अभय कुमार आदि मूर्धन्य भी भगवान् ...

पागलों के मित्र डॉ. फिलिप पिनेल

मानवता के पीछे पागल हो जाने वाले और उसकी सेवा में अपने को बर्बाद कर देने वाले मानव- देवताओं को अभिनन्दन करना जिस दिन संसार भूल जायेगा, वह दिन संसार में सभ्यता के सूर्यास्त की सन्ध्या होगी और जब तक अभिनन्दन होता रहेगा, उनके पागलपन का अर्थ लगाया जाता ...

स्वामी रामकृष्ण परमहंस देव जी का कुछ प्रेरक प्रसंग सम्पूर्ण समर्पण

सम्पूर्ण समर्पण श्री रामकृष्ण परमहंस शिष्यों को उपदेश दे रहे थे। वे समझा रहे थे कि जीवन में आये अवसरों को साहस तथा ज्ञान की कमी के कारण लोग खो देते है। अज्ञान के कारण उस अवसर का महत्त्व नहीं समझ पाते। समझकर भी उसके पूरे लाभों का ज्ञान न होने से उसमें ...

गूढ़ यौगिक विधियों की सरलतम व्याख्या (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

योग अपने आप में एक अनोखा व शक्तिशाली विज्ञान है। यह आज के भौतिक विज्ञान से कई गुना अधिक प्रभावशाली तथा रहस्यमय है। आज के अणु- परमाणु की शक्तियों से कहीं ज्यादा शक्तियाँ इस विज्ञान में समायी हैं। आज से लाखों वर्षों पूर्व हमारे ऋषि- मनीषि इस विज्ञान से, ...

गीता का प्रतिपाद्य अनासक्त कर्मयोग (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

वास्तव में प्रत्येक मनुष्य के तीन पहलू होते हैं- कर्मात्मक, ज्ञानात्मक और भावात्मक। इसलिए एक ही व्यक्ति कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग का अनुसरण करता है। इन तीनों को अलग- अलग व्यक्तियों में विभाजित नहीं किया जा सकता। अर्जुन एक ही व्यक्ति थे। गीता के ...

अलग- अलग अस्तित्व रखते उपासना- साधना (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

कोई भी किसान खेत में बीज डालने से पूर्व पहले उसे पानी से भरकर उसकी अच्छी तरह जुताई करता है, कूड़ा- कचरा निकालता है, खाद डालता है, तब भूमि इस योग्य हो पाती हे कि उसमें बीज डालने और उसके उगने की संभावनाएँ सुनिश्चित होती हैं। उपासना मनोभूमि में उगने वाला बीज ...

प्रतिकूलताओं से संघर्ष में निहित -सफलता का आनन्द (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

मनुष्य में इच्छा, आकांक्षा और उन्नति करने की भावना होनी ही चाहिए। जो व्यक्ति संकट के भय से प्रगति करने का साहस नहीं करते, उन्हें सोचना चाहिए कि क्या इस जड़ता से वे सर्वथा बच जाएँगे? किसी महत्त्वपूर्ण कार्य में हाथ डालने पर तत्सम्बंधी कठिनाइयाँ और ...

आइए, मिल- जुलकर जीना प्रकृति से सीखें (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ))

आइए, मिल- जुलकर जीना प्रकृति से सीखें (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य )) वनों में कुछ ऐसे वृक्ष होते हैं, जो अपनी सीमा में छोटे- छोटे पौधों को पनपने नहीं देते हैं। सारे जंगल में दो- चार ऐसे हिंसक जन्तु भी होते हैं, जो छोटे- छोटे जीव- जन्तुओं को खा डालते हैं। ...

सावित्र्युपनिषद्

यह उपनिषद् सामवेदीय परम्परा से सम्बद्ध है। अतिलघुकाय इस उपनिषद् में सविता- सावित्री के विविध रूपों की परिकल्पना करके उनमें एकत्व प्रतिपादित किया गया है। सर्वप्रथम सविता- सावित्री के युग्म एवं उनका कार्य- कारणत्व का प्रतिपादन है। तदुपरान्त ...

विस्मरण से स्व- स्मरण की ओर यात्रा (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

दुःख मनुष्य की स्वाभाविक अनुभूति नहीं है। उसकी स्वाभाविक अनुभूति सुख है। यदि मनुष्य की स्वाभाविक अनुभूति दुःख होती, तो मानव मात्र हर समय रोते- कलपते ही नजर आते। पर ऐसा होता नहीं। हर मनुष्य अपने जीवन में अधिकांशतः हँसता है, खेलता और मौज मनाता हुआ दिखाई ...

महत्त्वपूर्ण साधना पद्धति : चिन्तन एवं आत्मसमर्पण

जिस प्रकार मनुष्य अपनी आँखों से अपनी आखें नहीं देख सकता, उसे देखने के लिए दर्पण का सहारा लेना पड़ता है, उसी प्रकार अपना स्वरूप स्मरण करने के लिए परमात्मा का स्मरण, उनके प्रति समर्पण करना जरूरी होता है। उनके सदा- सर्वदा चिन्तन- मनन करते रहने से उनके प्रति ...

ध्यान सूर्य का नित्य करेंगे, अपनी प्रतिभा प्रखर करेंगे (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

रूसी वैज्ञानिक ब्लादिमीर देस्यातोय का कहना है कि पृथ्वी पर समय- समय पर आने वाले चुंबकीय प्रभाव से मनुष्य की मस्तिष्कीय तरंगों में परिवर्तन होता है। आधुनिक मस्तिष्क विज्ञानी भी मानने लगे हैं कि मस्तिष्कीय क्रिया क्षमता का मूलभूत स्रोत अल्फा ...

सफलता के कुछ स्वर्णिम सूत्र (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

‘हम अपने भाग्य के निर्माता आप हैं’ जो इस महामन्त्र को जानते हैं, वे सफलता की राह पर तेजी से आगे बढ़ने लगते हैं। लौकिक उन्नति हो या आध्यात्मिक प्रगति, सब कुछ उन्हें आसानी से उपलब्ध होने लगती हैं। इसके लिए उपयोगी तत्त्व मुख्यतः सात हैं। इन्हीं ऊर्जा- ...

उसका हर आँसू रामायण और प्रत्येक कर्म गीता है (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

शरीर स्वस्थ व बलवान बनता है- संयम से और मन स्वाध्याय से। जीवन शैली को संयमित रखने, व्यायाम- वर्जिश करने से शरीर में निखार आयेगा। इस क्रम में यह बार- बार ध्यान रखिए कि शरीर के निखरे हुए सौन्दर्यपूर्ण आकर्षण का वास्तविक कारण जीवन की प्राण- क्षमता है और यह प्...

चेतना जगत् का रहस्योद्घाटन करता प्रतीकों का विज्ञान डॉ. प्रणव पण्ड्या

प्रतीक जीवन का मनोवैज्ञानिक सत्य है। सत्य चाहे वैज्ञानिक हो, सामाजिक हो, धार्मिक हो या आध्यात्मिक, हमें उसे हृदयंगम करने के लिए प्रतीकों का सहारा लेना ही पड़ता है। युगद्रष्टा स्वामी विवेकानन्द के अनुसार यह अनिवार्य आवश्यकता दार्शनिक ज्ञान एवं ...

उपासना- साधना के साथ से ही साथ देता है ईश्वर (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

परमात्मा की विस्मृति को, विस्मरणशीलता को दूर करने का उपासना से अच्छा और कोई उपाय नहीं है। जप- तप, पूजा- अर्चना आदि के जो भी विधान बनाये गये हैं, वे सब परमात्मा को अपने स्मृति पटल पर बनाये रखने के लिए बनाये गये हैं। नित्य प्रति जब नियत समय पर उपासना की जाएगी, ...

सर्वसुलभ ‘सहज समाधि’ अर्थात् परिष्कृत दृष्टिकोण (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

महात्मा कबीर जी सहज योग से सहज समाधि को प्रधानता देते हैं। सहज योग का तात्पर्य है- सिद्धान्तमय जीवन, कर्त्तव्यपूर्ण कार्यक्रम। यह समाधि सहज है- सर्व सुलभ है- सर्वसाधारण की साधनाशक्ति के भीतर है, इसलिए उसे ‘सहज समाधि’ का नाम दिया गया है। हठयोग, ...

रामचरित में समन्वय, सहगमन, संगठन (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

व्यक्ति अपने आप में बहुत नेक और गुणवान हो तो भी उसमें यदि सामूहिक दृष्टिकोण का अभाव हो, सहयोग और संगठन का महत्त्व वह न समझता हो अथवा उसके अनुरूप अपनी प्रवृत्तियाँ न बना सके, तो उसकी स्वयं की प्रगति भी कुण्ठित हो जाती है और समाज के लिये भी वह उपयोगी नहीं बन ...

भूतल का अमृत प्रेम (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

किसी मनुष्य के पास दूसरे को देने योग्य यदि कोई सबसे अधिक उत्कृष्ट एवं महत्त्वपूर्ण वस्तु हो सकती है, तो वह प्रेम ही है। यों आर्थिक या बौद्धिक सहायता देकर भी किसी का कुछ उपकार किया जा सकता है, परन्तु उसका लाभ स्वल्पकालीन रहता है, इसलिए उसकी प्रसन्नता ...

जीवन फूलता- फलता है आन्तरिक उत्कृष्टता से (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

सद्भावनाओं का उत्पादन और सम्वर्द्धन करने के लिए जितना उपयोगी और उर्वर क्षेत्र परिवार है, उतना दूसरा और कोई नहीं। सद्भावनाओं का उपयोग देशभक्ति, समाजसेवा, सहकारिता, शिक्षा, स्वास्थ्य, साहित्य, कला आदि किसी भी क्षेत्र में किया जा सकता है, किन्तु उसका ...

अक्लमन्दों की मूर्खता (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

मनुष्य की अक्ल का कोई ठिकाना नहीं है। आए दिन वह अनेकों समस्याओं का हल करती रहती है। अणु- परमाणु से लेकर विश्व ब्रह्माण्ड तक उसकी पढ़ाई- लिखाई और सोच के विषय हैं। अमीबा से लेकर डायनासोर तक की गुत्थियों को वह हल कर रही है। लेकिन मुख्य समस्या की ओर ध्यान ...

समस्त प्राणियों के जीवन रक्षक अग्निदेव (डॉ० प्रणव पण्ड्या)

अग्निदेव को ऋषियों ने अनेकों विशेषणों से विभूषित किया है। उन्होंने अग्निदेव को सर्वश्रेष्ठ, वन्दनीय, अमर, ज्ञानी, श्रेष्ठ दूत आदि कहकर संबोधित किया है। अविनाशी, सबको जीवन देने वाले, हविवाहक, विश्व का त्राण करने वाले, सबके आराध्य हे अग्निदेव! इस ...

तीर्थ- सेवन का फल मिलता अन्तःकरण की शुद्धि से (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

तीर्थ क्या हैं? उनका दर्शन व रहस्य क्या है? इस संबंध में विचार किया जाय तो प्रतीत होता है, तीर्थ वह स्थान है जहाँ जाकर मनुष्य को मानसिक तथा आत्मिक रूप से कुछ मिलता है, पर इस मिलने के साथ- साथ एक शर्त भी जुड़ी रहती है कि तीर्थसेवी की मनःस्थिति उसी स्तर की हो, ...

पाप और पुण्य का रहस्य पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

श्रेष्ठ कार्य वह है, जो श्रेष्ठ उद्देश्य के लिए किया जाता है। उत्तम कार्यों की कार्य प्रणाली भी प्राय: उत्तम ही होती है। दूसरों की सेवा या सहायता करनी है, तो प्राय: उसके लिए मधुर भाषण, नम्रता, दान, उपहार आदि द्वारा ही उसे संतुष्ट किया जाता है। परन्तु ...




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