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ज्ञानोदय

सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

भगवान आदर्शो श्रेष्ठताओं के समुच्चय का नाम है। सिद्धान्तों के प्रति मनुष्य के जो त्याग और बलिदान हैं, वस्तुतः वही भगवान की भक्ति है। जाग्रत आत्माएँ कभी अवसर नही चूकतीं हैं। वे जिस उद्देश्य को लेकर अवतरित होती हैं, उसे पूरा किये बिना उन्हें चैन ...

सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

अपना मूल्य समझो और विश्वास करो कि तुम संसार के सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति हो। अपने को मनुष्य बनाने का प्रयत्न करो, यदि इसमें सफल हो गये, तो हर काम में सफलता मिलेगी।सद्ज्ञान और सत्कर्म यह दो ईश्वर प्रदत्त पंख हैं, जिनके सहारे स्वर्ग तक उड़ सकते ...

सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

जहाँ व्यक्ति का मिथ्या अहंकार समाप्त हो जाता है, वहाँ उसकी गरिमा आरंभ होती है। फूलों की सुगन्ध हवा के प्रतिकूल नहीं फैलती, पर सद्गुणों की कीर्ति दसों दिशाओं में फैलती है। अध्यात्म एक नकद धर्म है, जिसे मात्र आत्मशोधन की तपश्चर्या से ही भुनाया जा सकता ...

सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

आलस्य से बढ़कर अधिक समीपवर्तीं शत्रु दूसरा नहीं।घमण्डी के लिए कहीं कोई ईश्वर नहीं, ईर्ष्यालु का कोई पड़ोसी नहीं और क्रोधी का कोई मित्र नहीं।मनुष्य परिस्थितियों का दास नहीं, वह उनका निर्माता, नियंत्रणकर्ता और स्वामी है। परमेश्वर का प्यार केवल ...

सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

व्यक्तित्व की गरिमा प्रतिभा, पद या वैभव नहीं व्यक्ति की आंतरिक महानता पर निर्भर है। बुद्धिमान वह है, जो किसी की गलतियों से हुई हानि देखकर अपनी गलतियाँ सुधार लेता है। ज्ञानयोगी की तरह सोचें, कर्मयोगी की तरह पुरुषार्थ करें और भक्तियोगी की तरह ...

सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

वैराग्य का अर्थ है- त्याग, समर्पण, विवेक और सत्य के प्रति श्रद्धा की अनन्य भावना। भगवान् जिसे सच्चे मन से प्यार करते हैं, उसे अग्नि परीक्षाओं में होकर गुजारते हैं। दूसरों के साथ सदैव नम्रता, मधुरता, सज्जनता, उदारता एवं सहृदयता का व्यवहार ...

सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

सम्मान और स्वाभिमान के साथ जीने में ही जीवन का आनंद है।तर्क की सार्थकता तब है, जब वह श्रद्धा के साथ जुड़ा हो।सच्ची लगन तथा निर्मल उद्देश्य से किया हुआ प्रयत्न कभी निष्फल नहीं जाता।खरे बनिये, खरा काम कीजिए और खरी बात कहिए, इससे आपका हृदय हल्का ...

सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

ईश्वरीय प्यार को प्राप्त करने के लिए अपने आंतरिक स्तर को परिष्कृत करना ही सर्वश्रेष्ठ तप- साधना है।शिक्षा एक ऐसा साँचा हैे, जिसमें छात्र की गीली मिट्टी को किसी भी आकृति में ढाला जा सकता है। अध्यात्म की पहली शिक्षा है- मनुष्य निरन्तर मंगलमय कामनाएँ ...

सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

पाप से मन को बचाये रहना पुण्य कार्यों मे प्रवृत्त रखना ही मानव जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ है।वर्तमान का उपयोग ठीक हो रहा है तो भविष्य के उत्तम होने की संभावना तो है ही। फरसे से कटा हुआ वन भी अंकुरित हो जाता है, किन्तु कटु वचन कहकर वाणी से किया घाव कभी ...

सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

मिथ्या अहंकार जीवन विकास के मार्ग का भयानक रोड़ा है। बढ़ने का प्रयत्न करते रहना ही जीवन का लक्षण है और लक्ष्य भी। सद्विचार तब तक मधुर कल्पना भर बने रहते हैं, जब तक उन्हें कार्य रूप में परिणित नहीं किया जाता। अपना मूल्य गिरने न पाये यह सतर्कता, ...

सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

मतभेदों की दीवारें गिराये बिना एकता, आत्मीयता, समता जैसे आदर्शों की दिशा में बढ़ सकना संभव नहीं है। मन को निरुद्देश्य फिरते रहने की छूट न दें, उससे पतन- पराभव का पथ प्रशस्त होता है। जो व्यक्ति दूसरों के लिए जीता है और उनकी सेवा करता है,वह अक्षय कीर्ति ...

सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

जीवन में बाधाओं और असफलताओं को पार करते हुए लक्ष्य की ओर साहसपूर्वक बढ़ते जाने में ही मनुष्य की महानता है। जो मन का गुलाम है, वह ईश्वर का भक्त नही हो सकता। जो ईश्वर भक्त है, उसे मन की गुलामी न स्वीकार हो सकती है, न सहन। प्रगति के लिए संघर्ष करो, अनीति को ...

सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

जीवन एक पाठशाला है जिसमें अनुभवों के आधार पर हम शिक्षा प्राप्त करते हैं। परोपकार से बढ़कर और निरापद दूसरा कोई धर्म नहीं। मनुष्य उपाधियों से नहीं, श्रेष्ठ कार्याें से सज्जन बनता है। प्रत्येक से प्यार करो, थोड़े में संतोष रखो और किसी को ...

सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

संसार में सच्चा सुख ईश्वर और धर्म पर विश्वास रखते हुए पूर्ण परिश्रम के साथ अपना कर्तव्य पालन मे है। जो अपना कर्तव्य करने से चूकता है, वह एक महान् लाभ से स्वयं को वंचित रखता है। अगर तुम चाहते हो कि लोग तुम्हारे साथ सच्चाई का बर्ताव करें, तो तुम स्वयं ...

सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

समस्त हिंसा, द्वेष, बैर, और विरोध की भीषण लपटें दया का संस्पर्श पाकर शांत हो जाती है। आत्मीयता को जीवित रखने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि गलतियों का उदारतापूर्वक क्षमा करना सीखें। परमात्मा सत्ता की सर्वज्ञता एवं सर्वव्यापकता के विश्वास पर जो ...

सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

आरोग्य परम लाभ है। संतोष परम धन है। विश्वास परम बंधु है। आत्म परम पुरुषार्थ है। जैसे शारीरिक व्यायाम करने से देह पुष्ट होती है, वैसे ही उपासना, साधना, आराधना द्वारा मनोबल बढ़ता है।जहाँ सच्चा प्रेम है- आत्मीयता है, वहाँ त्याग, उसर्ग और बलिदान की भावना ...

सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

दूसरों के साथ वह व्यवहार न करो, जो तुम्हें अपने लिए पसंद नही  जिन्हें लम्बी जिंदगी जीनी हो, वे बिना कड़ी भुख लगे कुछ भी न खाने की आदत डालें ।जिसनें जीवन में स्नेह, सौजन्य का समुचित समावेश कर लिया सचमुच वह सबसे बड़ा कलाकार है ।विपरीत परिस्थितियों में भी ...

सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

सभ्यता का स्वरूप है-सादगी, अपने लिए कठोरता और दूसरों के लिए उदारता ।योग्यता और परिस्थिति को ध्यान में रखकर महात्वाकांक्षाएँ न गढने वाला दुखी रहता और उपहास सहता है ।पढ़ने योग्य लिखा जाय,इससे लाख गुणा बेहतर यह है कि लिखनें योग्य किया जाय ।दूसरों के साथ ...

सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

आय से अधिक खर्च करने वाले तिरस्कार सहते और कष्ट भोगते हैं ।किसी का सुधार उपहास से नहीं, उसे नये सिरे से सोचने और अदलने  का अवसर देने से होता है ।जो जैसा सोचता और करता है,वह वैसा ही बन जाता है ।कुकर्मी से बढ़कर अभागा कोई नहीं, क्योंकि विपत्ति में उसका कोई स...

निष्पक्ष दृष्टि रखें (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

हर मनुष्य में अपने प्रति पक्षपात करने की दुर्बलता पायी जाती है। आँखें बाहर को देखती हैं, भीतर का कुछ पता नहीं। कान बाहर के शब्द सुनते हैं, अपने हृदय और फेफड़ों से कितना अनवरत ध्वनि प्रवाह गुंजित होता है, उसे सुन ही नहीं पाते। इसी प्रकार दूसरों के गुण-अवगुण...

जीवन की निर्भरता (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

जीवन इस बात पर निर्भर नहीं है कि हम अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में  कहाँ तक सफल होंगे? वरन् वह तो इस बात पर निर्भर है कि हम अपना प्रयोजन-दायित्व पूरा करने के लिए तैयार हैं या नहीं? तैयार हैं, तो ही जीवन का मूल्य है और महत्त्व है। तैयार नहीं हैं, तो ...

अपना उचित मूल्यांकन (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

स्मरण रखा जाना चाहिए और विश्वास किया जाना चाहिए कि इस संसार में मनुष्य के लिए न तो कोई वस्तु या उपलब्धि अलभ्य है तथा न ही कोई व्यक्ति किसी प्रकार अयोग्य है। अयोग्यता एक ही है और वह है अपने आपके प्रति अविश्वास। यदि अपना उचित मूल्यांकन किया जाये, तो कोई ...

शुभ- अशुभ (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

भविष्य की कल्पना करते समय शुभ और अशुभ दोनों ही विकल्प सामने हैं। यह अपनी ही इच्छा पर निर्भर है कि शुभ सोचा जाए अथवा अशुभ।  शुभ को छोड़कर कोई व्यक्ति अशुभ कल्पनाएँ करता है, तो इसमें किसी और का दोष नहीं है। दोषी है, तो वह स्वयं ही। इसलिए कि उसने शुभ चिंतन का ...

पात्रता की परख (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

भगवान् के साथ ब्लेकमेलिंग नहीं की जा सकती। आप कथा-कीर्तन, जप-तप, साधना, उपासना, अखण्ड कीर्तन आदि करते हैं, तो यह सब आपको मुबारक है। आप सिर्फ एक जबाव दीजिए कि आप अपनी पात्रता को विकसित करते हैं  कि नहीं? पात्रता की परख हर जगह होती है। आप वह उम्मीदें मत ...

जीवन के सार्थकता की कसौटी (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

मनुष्य न तो संपदाओं की दृष्टि से दरिद्र है, न विभूतियों की दृष्टि से असमर्थ। प्रश्र इतना भर है कि जो हस्तगत हुआ, उसका उपयोग किस प्रकार बन पड़ा। जो इस कसौटी पर खरा सिद्ध हो सका, समझना चाहिए कि उसका मनुष्य जन्म सार्थक हो गया।...

प्रगतिशील कौन? (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

प्रगति का अर्थ है- ऊर्ध्वगमन, उत्कर्ष, अभ्युदय। यह विभूतियाँ अंतःक्षेत्र की हैं। दृष्टिकोण और लक्ष्य ऊँचा रहने पर, इच्छा और आकांक्षा का स्तर ऊँचा उठता है। आत्म-गौरव का ध्यान रहता है। अपना मूल्य गिरने न पाये, यह सतर्कता जिसमें जितनी पाई जाती है, वह उतना ...

गलती सुधारें, आगे बढ़ें (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

गलती करना बुरा नहीं है, बल्कि गलती को न सुधारना ...

विजयी (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

जीवन एक संग्राम है। इसमें वही व्यक्ति विजय प्राप्त कर सकता है, जो या तो परिस्थितियों के अनुकूल अपने को ढाल लेता है या जो अपने पुरुषार्थ के बल पर परिस्थिति को बदल देता है। हम इन दोनों में से किसी का उपयोग कर जीवन संग्राम में विजयी हो सकते हैं।...

मूल उद्देश्य (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

देवत्व हमारी आवश्यकता है। दुष्प्रवृत्तियों से भय लगता है। पवित्रता हमें प्रिय है। अपवित्रता से दुःख मिलता है। निश्छलता से सुख मिलता है। छल और कपट के कारण जो संकीर्ण स्वभाव बनता है, उससे अपमान मिलता है। जो कुछ भी श्रेष्ठ है, सार्थक है, वही आत्मा है और ...

प्रगति में अवरोध (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

धर्म के प्रति जिसे, जितना प्रेम हो, वह अधर्म के प्रति उतना ही द्वेष रखे। जिसे ईश्वर भक्ति और आस्तिकता पर विश्वास हो, वह ईश्वर विरोधी नास्तिकता के एक मात्र आधार अनाचार से बचे और दूसरों को बचाये। इसके बिना ईश्वर और शैतान को, पाप और  पुण्य को एक ही समझने ...

पहचानने की सामर्थ्य (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

अपने बारे में यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि मैं कुछ नहीं हूँ, बल्कि यह मानना चाहिए कि मैं भी इस संसार का एक महत्त्वपूर्ण घटक हूँ। परमात्मा के इस उपवन का एक सुन्दर और उपयोगी, आवश्यक फूल हूँ, जिसे असमय कुँभलाने का कोई कारण नहीं है। दूसरों के प्रति और अपने ...

कुल्हाड़ा (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

अपराधों को रोका जाना चाहिए और अपराधियों को दण्ड दिया जाना चाहिए। इस उपचार से कोई असहमति नहीं, पर यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि अपराधों के विष वृक्ष की जड़ें काफी गहरी हैं। टहनियाँ काटने से कुछ काम नहीं बनेगा। कुल्हाड़ा तो उन जड़ों पर चलाया जाना चाहिए, जो ...

असावधानी (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

असावधानी, आलस्य, बेखबरी, अदूरदर्शिता ऐसी भूले हैं, जिन्हें अनेक प्रकार की आपत्तियों का उद्गम स्थल कह सकते हैं। गफलत में रहने वाले पर किसी भी तरफ से हमला हो सकता है। असावधानी में एक ऐसा दूषित तत्त्व पाया जाता है कि उसके फल से अनेक प्रकार की हानियाँ एवं ...

जागरूक रहें (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

जो दुनियाँ के छल, फरेव, ठगी, लूट, अन्याय, स्वार्थपरता, शैतानी आदि की ओर से सावधान नहीं रहता, उसे उल्लू बनाने वाले-ठगने वाले-सताने वाले अनेकों पैदा हो जाते हैं। जो जागरूक नहीं, जो अपनी रक्षा के लिए प्रयत्नशील नहीं रहता, उसे दुनिया के शैतानी तत्त्व बुरी तरह ...

ईश्वर दर्शन (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

ईश्वर का दर्शन-ईश्वर का अनुग्रह जीवन का लक्ष्य है। यह चर्म-चक्षुओं से संभव नहीं। चमड़े के बने नेत्र तो केवल जड़ पदार्थों को देख सकते हैं, चेतना तो इन्द्रियातीत है, उसकी अनुभूति ज्ञान-चक्षुओं से-विवेक दृष्टि से हो सकती है। अंतरंग को खोजने और बहिरंग को उसी ...

आत्मिक प्रगति (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

आत्मिक प्रगति का सार्वभौम उपाय एक ही है- क्रिया-कृत्यों के माध्यम से आत्म-शिक्षण। इसे प्रतीक पूजा भी कह सकते हैं। मनुष्य के मानस की बनावट ऐसी है कि वह किन्हीं जानकारियों से अवगत तो हो जाता है; पर उसे व्यवहार में उतारना क्रिया-अभ्यास के बिना उसके लिए ...

अन्वेषण (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

अपने आपको जानो, अपने को प्राप्त करो और अमृतत्व में लीन हो जाओ। इसी को ऋषियों ने दुहराया है और तत्त्वज्ञानियों ने इसे ही सारी उपलब्धियों का सार कहा है, क्योंकि जो बाहर दीख रहा है, वह भीतरी तत्त्व का ही विस्तार है। अपना आपा जिस स्तर का होता है, संसार का ...

दृष्टिकोण (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

प्रत्येक पिता यही चाहता है कि उसका पुत्र उसकी परम्परा एवं प्रतिष्ठा को अक्षुण्ण रखे। ईश्वर भी अपने युवराज मनुष्य से यही अपेक्षा करता है कि वह देव जीवन जिये, अपनी विचारणा में उत्कृष्टता और क्रियाकलाप में आदर्शवादिता की मात्रा न घटने दे। अपने ...

देवत्व (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

गुण, कर्म, स्वभाव में देवत्व की मात्रा बढ़ते रहने से उस आत्मसंतोष, लोकसम्मान और दैवी अनुग्रह की प्राप्ति होती है जिसकी उपलब्धि को पूर्णता की प्राप्ति कहते हैं। शास्त्रकारों ने इसी स्थिति का उल्लेख स्वर्ग, मुक्ति के, ऋद्धि-सिद्धि के, ईश्वर दर्शन के रूप ...

गुरुचरण (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

गुरुचरण केवल गुरुभक्त शिष्य के लिए ही नहीं, बल्कि उनके लिए भी कल्याणकारी है, जिनके कल्याण की कामना उस शिष्य के मन में उठती है। अपने गुरु का सच्चा शिष्य जिस किसी के लिए भी कल्याण की ...

परावलम्बन (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

बौद्धिक परावलम्बन के मुख्य कारण अशिक्षा, मानसिक संकीर्णता एवं अविकसित मन, बुद्धि इत्यादि हैं, जबकि भावनात्मक परावलम्बन भावों की अपरिपक्वता से उत्पन्न होता है।...

अन्तःकरण (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

विश्वास कीजिए कि शक्ति का केन्द्र आप ही हैं। सफलता, प्रभाव, आनन्द और सुख-दुःख की जड़ आपका अन्तःकरण में ही है। अतः उसे ही परिमार्जित करने की कोशिश कीजिए।...

समृद्धि (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

जो गुण हमारे व्यक्तित्व में नहीं हैं, उन्हें आत्मविश्वस द्वारा उत्पन्न कर सकते हैं। मानसिक समृद्धि का आधार यह विश्वास ही है।...

अटूट विश्वास (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

विश्वास कीजिए कि वर्तमान की निम्र स्थिति को बदल देने की सामर्थ्य प्रत्येक मनुष्य में पर्याप्त मात्रा में विद्यमान है। आप जो सोचते हैं, विचारते हैं, जिन बातों को प्राप्त करने की योजनाएँ बनाते हैं, वे आन्तरिक शक्तियों के विकास से अवश्य प्राप्त कर सकते ...

चित्त (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

चित्त का संशोधन और परिमार्जन हो जाए, तो उसमें जमें हुए जन्म-जन्मान्तरों के कुसंस्कार भी विनष्ट हो जाते हैं और चालू प्रारब्ध भोगों के अतिरिक्त भविष्य में बनने वाले दुःखमय ...

सद्गुरु कृपा (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

गुरु स्मरण, गुरुसेवा और गुरु की आज्ञा पालन से सब कुछ सम्भव हो सकता है। जो जन्म-जन्मान्तरों के तप से सम्भव नहीं होता, वह सद्गुरु की कृपा से सहज ही साकार हो जाता है।...

सर्वोच्च कक्षा (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

साधनामय जीवन की सर्वोच्च कक्षा की व्याख्या प्रस्तुत करनी हो, तो उसका सार यही होगा, साधक का सद्गुरु में ...

फल (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

मनुष्य पुरुषार्थ का पुतला है। पुरुषार्थ के अनुरूप रुचि, रुचि के अनुरूप कार्य और कार्य के अनुरूप ही फल मिलता है।...

वास्तविक अध्यात्म (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

चित्त या मन हमारी मान्यताओं, पूर्वाग्रहों, विश्वास, संस्कारों, शंकाओं, प्रतिक्रियाओं एवं ...

दुर्बलता बनाम दुःख (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

संसार दुःख सागर है, ऐसी मान्यता रखने वाले प्रायः वे ही लोग हुआ करते हैं, जो अपनी दुर्बलताओं के कारण संसार में सुख के दर्शन नहीं कर पाते। उनकी यह ...

कार्यशैली (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

यह सुनिश्चित तथ्य है कि जिस कार्य को मनुष्य पूरी दिलचस्पी से, जाग्रत् मन से, ध्यानपूर्वक करेगा; वह कार्य ठीक, निर्दोष और सुन्दर होगा। इस जागृति एवं दिलचस्पी की जितनी कमी होगी, काम उतना ही फूहड़ रह जायेगा और भूलें होंगी।...

अध्यात्म-जीवन (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

परमात्मा की परम सत्ता में प्रविष्ट होकर ही आध्यात्मिक साधन का चरम लक्ष्य प्राप्त होता है। आत्मा विश्वात्मा में मिलकर ही अनेकों जन्मों की यात्रा पूरी करती है। यही मोक्ष, जीवन-मुक्ति, प्रभु-दर्शन, आत्म-साक्षात्कार  का वास्तविक स्वरूप है? जीव ...

सच्चा आनन्द (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

परमात्मा की विराट् सत्ता ही सर्वत्र व्याप्त है। यह सारा दृश्य जगत् उसी में स्थित है। जब आत्मा उस विश्वात्मा की अनुभूति प्राप्त कर उसी में लीन हो जाती है, जब जीव चैतन्य और विश्व चैतन्य में एकाकार स्थापित हो जाता है, तभी अनिवर्चनीय आनन्द की ...

सर्वत्र व्याप्त (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

उस विश्वात्मा की, जो सर्वत्र ही व्याप्त है, अनुभूति प्राप्त कर मनुष्य निर्भय होकर विचरण करता है, सर्वत्र उसी के दर्शन करता है, तब उसे दूसरा कुछ और दिखाई ही नहीं देता।...

सनातन राजमार्ग (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

अध्यात्म साधना का परम लक्ष्य अपने दृष्टिकोंण को खण्ड-खण्डता, विभिन्नता, संकीर्णता से हटाकर सर्वत्र उस विश्वात्मा, परमात्मा की विराट् सत्ता का दर्शन और उसकी अनुभूति प्राप्त करना है। मनुष्य के लिए यही सत्य और सनातन राजमार्ग है।...

विश्वात्मा की अनुभूति (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

जिस क्षण उस विश्वात्मा की अनुभूति प्राप्त होगी, उसी क्षण समस्त पाप, ताप, अभ्यास जनित संस्कार और आचरण का अंत हो जाएगा, अनन्त आत्मबल विकसित होगा और सर्वत्र आनन्द रूपी अमृत के ही दर्शन होंगे।...

साधनामय जीवन (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

वस्तुतः मुक्ति जीवन के सहज विश्वास क्रम की वह अवस्था है, जहाँ मानवीय चेतना सर्वव्यापी विश्व-चेतना से युक्त होकर स्पन्दित होने लगती है और उसमें से परमार्थ कार्यों का मधुर संगीत गूँजने लगता है। तब व्यक्ति अपने सुख,अपने लाभ, अपनी मुक्ति को भूलकर सबके ...

बड़ी भूल (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

जब तक शरीर है, संसार में रहना है, भूख प्यास महसूस होती है, तब तक इस संसार को नाशवान्, ...

अध्यात्म विज्ञान (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

जो लोक-जीवन को पुष्ट न कर सके, जो व्यक्ति का ...

सबसे बड़ा पुण्य (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

मनोविकार ही समस्त आपत्तियों और अभावों की जड़ हैं, उनका समाधान करना है, तो लोगों की विचार पद्धति को ही सुधारना होगा। किसी के विचार सुधार देने, उसकी विचारणा सही कर देने से बढ़कर और कोई पुण्य परोपकार हो नहीं सकता। इससे बड़ा कर्म और कोई नहीं। ज्ञान-दान से, ...

स्वर्ग और सच्चा प्रेम (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

कबीर का एक दोहा-राम बुलावा भेजिया कबिरा दीना रोय।जो सुख प्रेमी संग में, सो बैकुण्ठ न होय॥ इस दोहे में बैकुण्ठ से अधिक प्रेमी के सान्निध्य को बताया गया है। कबीर प्रेमी को छोड़कर स्वर्ग जाने में दुःख मानते और रोने लगते हैं। वस्तुस्थिति यही है। सच्चे प्रेम ...

सार्थकता (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

पूजा-अर्चा का तात्पर्य ईश्वर को प्रसन्न करना नहीं, वरन् अपनी भक्ति भावना, प्रेम-प्रकृति को विकसित करना है। एक महत्त्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक व्यायाम की तरह ही पूजा-अर्चा की प्रक्रिया को माना जा सकता है, जिसके आधार पर पूजा काल में किया हुआ अभ्यास हमारे ...

सच्चरित्रता (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

तपश्चर्या और साधना की यों अनेकों विधियाँ प्रचलित हैं। साधक लोग आत्मबल बढ़ाने के लिए उनका उपयोग अपनी सुविधा और परम्परा के अनुसार करते भी है, पर सभी साधनाओं के मूल में सच्चरित्रता हैं। सदाचारी और परोपकारी प्रकृति के मनुष्य ही साधना में सफलता ...

आत्म-साक्षात्कार (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

ईश्वर भक्ति का अत्यधिक माहात्म्य बताया गया है। उसके असंख्य भौतिक एवं आत्मिक लाभ गिनाये गये हैं। वह प्रतिपादन सर्वथा सही है। भक्ति का प्रयोजन अपना मूल स्वरूप समझना और मायाजन्य दुर्गति से छुटकारा प्राप्त करना है। आत्मबोध को इसी परिवर्तन का केन्द्र ...

अवतरण (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

गुण, कर्म, स्वभाव के क्षेत्र में उत्कृष्टता का समावेश करते चलने वाली दिव्य धारा का जब अन्तःकरण में उभार आने लगे, तो समझना चाहिए कि ईश्वर का अवतरण हो रहा है। गर्मी की ऋतु आते ही हर वस्तु का तापमान बढ़ जाता है। समझना चाहिए कि व्यक्ति में ईश्वर का अवतरण आदर्शव...

बलिष्ठ शरीर (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

जन्म से लेकर मरणपर्यन्त शरीर का सारा ढाँचा श्रमशील रहता है। स्थिति बदल देना भर विश्राम है। हर अवयव अपनी नियत मर्यादा का पालन करता है और अपने जिम्मे का उत्तरदायित्व निबाहता है। कर्त्तव्यनिष्ठा, मर्यादाओं का पालन, उदार सहकारिता का निर्वाह, अनथक ...




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