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सामाजिक

जो औरों के काम आयें

समय की माँग के अनुरूप दो दबाव इन दिनों निरंतर बढ़ते जा रहे हैं। एक व्यापक अवांछनीयताओं से जूझना और उन्हें परास्त करना, और ...

नवनिर्माण करती देवसंस्कृति पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

देवसंस्कृति आदिकाल से ही समूचे विश्व के हर क्षेत्र एवं समुदाय को सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों से अनुप्राणित करने में समर्थ रही है। यदि विश्व को आज की परिस्थितियों में एक सूत्र में बांधने की बात सोची जाए, तो एक ही संस्कृति विश्व संस्कृति की बात ...

नीति रहित भौतिकवाद से उपजी दुर्गति पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

ऊँचा महल खड़ा करने के लिए किसी दूसरी जगह गड्ढे बनाने पड़ते हैं। मिट्टी, पत्थर, चूना आदि जमीन को खोदकर ही निकाला जाता है। एक जगह टीला बनता है तो दूसरी जगह खाई बनती है। संसार में दरिद्रों, अशिक्षितों, दु:खियों, पिछड़ों की विपुल संख्या देखते हुए विचार उठता ...

पुण्यफल प्रदाता शान्तिकुञ्ज का अखण्ड दीपक

शास्त्रों- पुराणों में ऐसा उल्लेख पढ़ने को मिलता है कि यदि घृत से कोई दीपक लगातार 20 वर्षों तक जलता रहे, तो वह सिद्ध हो जाता है, जिसके दर्शन मात्र से ही अनेकानेक पापों का प्रक्षालन हो जाता है। ऐसी ही एक सिद्ध ज्योति शांतिकुंज में है, जो पिछले ८७ वर्षों से ...

निरोगी काया डॉ० चिन्मय पण्ड्या

मनुष्य जन्म अगणित विशेषताओं और विभूतियों से भरापूरा है। हर किसी को यह छूट है कि जितना महापुरुषों, संतों ने अपने आपको ऊँचा उठाया है, पर यह संभव तभी है, जब शरीर और मन पूर्णतया स्वस्थ हो। जो औरों के लिए, जितना उपयोगी और सहायक सिद्ध होता है, उसे उसी अनुपात ...

अपने आपको जानो, समझो और सुधारो (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

परमात्मा अपनी विशाल दुनिया का मालिक है, पर आत्मा को भी अपने सत्ता क्षेत्र में पूर्ण आधिपत्य प्राप्त है। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है। अपनी दुर्बुद्धि से उसे बिगाड़ सकता है और सत्प्रवृत्तियाँ अपनाकर बना भी सकता है। अपने कमरे में सूर्य की ...

राष्ट्र निर्माण के लिए राष्ट्र भाषा की प्रगति भी अनिवार्य (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

बाबू राजेन्द्र प्रसाद का विद्यारंभ संस्कार उस जमाने के रिवाज के अनुसार एक मौलवी के पास उर्दू- फारसी में कराया गया था। नतीजा यह हुआ कि वे स्कूल और कालेज में भी इण्टर तक अँग्रेजी के साथ उर्दू- फारसी ही पढ़ते चले गये; पर जब वे कलकत्ता जाकर बी.ए. में भर्ती हुए, त...

सभ्य समाज की सुसंस्कृत रचना और पुस्तकालय (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

रौम्यां रोलां ने एक बार भाषण में कहा- किसी राष्ट्र का लोकतंत्रात्मक जीवन विघटित और विशृंखलित हो जाता है, तो उसे सभ्य और सुसंस्कृत बनाने के लिए मूक विचार क्रान्ति की आवश्यकता होती है।       ‘मूक विचार क्रान्ति का तात्पर्य क्या है?’ यह पूछा ...

समाज सुधार के लिए सत्संग का महत्त्व (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

व्यक्ति और समाज का पारस्परिक घनिष्ठ संबंध है। यदि समाज समुन्नत और शिक्षित व चरित्रवान् है, तो उसमें रहने वाला एक नवीन व्यक्ति भी उसी प्रकार बनने का प्रयत्न करेगा। इसके विपरीत, यदि समाज में बुरे लोगों का बहुमत है, तो हो सकता है कि वह सारा समाज ही एक न एक दि...

सत्संग से सम्भव है आचार- विचार का बदलाव (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

अधिकांश जन सत्संग का अर्थ भ्रम से प्रायः यह लगा लेते हैं कि जहाँ माला फेरने का उपदेश होता हो, जहाँ भक्ति की गंगा बह रही हो, वही सत्संग है। सत्संग का यह सीमित अर्थ है। वास्तव में सत्संग वह संग है, जहाँ महापुरुषों व संतों के द्वारा हमें अपनी धर्म- नीति, ...

हम अपना भविष्य और चरित्र स्वयं बनाते हैं (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता है। निज का उत्थान- पतन उसके वश की बात है। यह तथ्य जितना सच है, उतना ही यह भी सही है कि वातावरण का प्रभाव अपने ऊपर भी पड़ता है और अपने व्यक्तित्व से परिवार एवं समाज का वातावरण भी प्रभावित होता है। बुरे वातावरण में रहकर ...

राष्ट्र की प्रगति का मूल आधार- चरित्रनिष्ठा (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

मनुष्य की सर्वोपरि सम्पदा उसकी चरित्रनिष्ठा है। यह एक ऐसा शब्द है, जो मानव के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का उद्बोधन करता है। व्यक्तिगत जीवन में कर्त्तव्य परायण, सत्यनिष्ठा, पारिवारिक जीवन में स्नेह- सद्भाव एवं सामाजिक जीवन में शिष्टता- शालीनता, ...

राष्ट्रोत्थान में नैतिकता की अनिवार्य आवश्यकता (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

किसी भी मनुष्य, समाज या राष्ट्र की उन्नति का लक्षण है- सुख, शांति और सम्पन्नता। यह तीनों बातें एक- दूसरे पर उसी प्रकार निर्भर है जिस प्रकार किरणें सूर्य पर और सूर्य किरणों पर निर्भर हैं। जिस प्रकार किरणों के अभाव में सूर्य का अस्तित्व नहीं और सूर्य के ...

राष्ट्र का आर्थिक अभ्युदय एवं नैतिक मूल्य (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

भारत गाँवों का देश है, यहाँ की ७५ प्रतिशत जनता देहातों में बसती है। इतने बड़े समुदाय की उन्नति तभी संभव है, जब उनमें संव्याप्त निर्धनता एवं अशिक्षा- निवारण के साथ ही जीवन स्तर को ऊँचा उठाने को प्राथमिकता मिले। ग्रामीण विकास की योजनाओं का सफलतापूर्वक ...

नारियों का पौरोहित्य की दिशा में बढ़ते कदम

     भारत वर्ष में सदा से स्त्रियों का समुचित सम्मान रहा है। उन्हें पुरुषों की अपेक्षा पवित्र माना जाता रहा है। स्त्रियों को बहुधा देवी सम्बोधन से सम्बोधित किया जाता है। नाम के पीछे जन्मजात उपाधि देवी प्रायः जुड़ी रहती है, जैसे शांति देवी, दया देवी ...

पारिवारिकता का अभिनव स्वरूप (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

संयुक्त परिवार पद्धति को अब वैज्ञानिकता के आधार पर व्यावहारिक स्तर पर नये रूप से पुनर्जीवित करना ही उचित है। संयुक्त परिवार व्यवस्था के विघटन के बाद अभी जो वैकल्पिक संस्थाएँ प्रचलित हुई हैं, उनमें से कोई भी उस व्यवस्था के आधारभूत तत्त्वों की ...

पारिवारिकता क्यों? (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

थोड़े से ऐसे जीवों के, जो एक साथ खाते- पीते, सोते और उठते- बैठते हैं, एक ही घर में रहने से परिवार नहीं बन जाता। इस प्रकार तो हम घर की ईंटों को ही परिवार कह सकते हैं। किसी परिवार के आधे लोग चाहे पृथ्वी के भिन्न- भिन्न भागों में रहते हों; पर उसे सुख- संपदापूर्ण ...

सम्मिलित रहें या पृथक् हो जायें (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

सहयोग की भावना मनुष्य जाति की उन्नति का मूल कारण है। हमारी एकता- शक्ति, सामाजिकता, मैत्री भावना, सहयोग परायणता ही हमारी आधुनिक सभ्यता का मूल मंत्र है। सभ्यता के प्रारंभ में मनुष्यों ने आपस में एक दूसरे को सहयोग दिया, अपनी स्थूल और सूक्ष्म शक्तियों को ...

सम्मिलित कुटुम्ब के लाभ (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

मानसिक दृष्टि से विचार कीजिए, तो सम्मिलित कुटुम्ब के अनेक लाभ हैं। साथ- साथ रहने से सामाजिकता की वृद्धि होती है, मनोरंजन रहता है और तबियत लगी रहती  है। चित्त ऊबता नहीं। बच्चों की मीठी- तोतली बोली, माता का सुखद वात्सल्य, भाई- बहिनों का सौहार्द्र, पत्नी ...

पारिवारिकता से जुड़ा असाधारण दायित्व (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

परिवार और कुटुम्ब दोनों समान अर्थबोधक प्रतीत होते हैं; पर वस्तुतः उनके बीच असाधारण अंतर है। वंश परिकर से जुड़ने वालों का समूह कुटुम्ब कहा जाता है। यह विवाह- प्रजनन की परिणति है, जिसके साथ वे सभी प्रवृतियाँ जुड़ती हैं, जो वंशवृद्धि के अतिरिक्त वंश विकास ...

संयुक्त परिवार हर तरह से उपयोगी (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

 संयुक्त परिवार के गुणों और दोषों दोनों का विचार एवं स्मरण आवश्यक है। संगठन और सहयोग से, प्रेम एवं आत्मीयता से उपलब्ध होने वाले आनंद तथा लाभ सम्मिलित परिवारों की स्वाभाविक उपलब्धि हैं; किन्तु ये अच्छाइयाँ, तभी तक बनी रहती हैं, उनके सुफल तभी तक मिलते ...

परिवार अर्थात् सहकारी परिकर (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

व्यक्ति और समाज की मध्यवर्ती कड़ी है- परिवार। व्यक्ति को अपनी सूझ- बूझ, व्यवस्था, क्षमता, सुसंस्कारिता आदि गुण- कर्म से संबंधित विशेषताएँ बढ़ानी पड़ती हैं। इनका अभ्यास न होने पर कोई किसी क्षेत्र में प्रगति नहीं कर सकता। जीवनयापन की सुनियोजित विधि- ...

परिवारों में सहकारिता का समावेश (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

बिखराव उसी सीमा तक सहन होता है, जिससे एकता में कोई व्यवधान न पड़े। ईश्वर एक से अनेक हुआ तो; पर उसने विराट् ब्रह्म के रूप में विश्व ब्रह्माण्ड की एकता भी बनाये रखी। शरीर में कितने अंग- अवयव विभिन्न प्रकार के विनिर्मित तो हुए, पर उन सबका सहयोग एक समग्र शरीर की ...

वृहत्तर परिवारों की संरचना- सामयिक आवश्यकता (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

एकाकी मनुष्य न प्रगति कर सकता है और न प्रसन्न रह सकता है। मानवी संरचना ही कुछ ऐसी है कि जिसमें मिल- जुलकर चलने और सहयोगपूर्वक आगे बढ़ने की व्यवस्था है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है, उसे अन्यान्य प्राणियों से आगे बढ़कर जिस ऊँचाई तक चढ़ने और साधन- सम्पन्न बनने ...

वृहत्तर परिवार व्यवस्था पर एक स्वस्थ चिन्तन (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

प्राचीन काल में बिरादरियों की पंचायतें होती थीं। उनमें बुद्धिमान्, परिपक्व और प्रभावशाली लोग पंच, सरपंच की भूमिका निभाते थे। वोट डालकर चुनाव तो नहीं होतेथे;पर उनका सम्मिलित स्वरूप अनायास ही पंचायत जैसा बन जाता था। उन दिनों एक व्यवसाय के लोग एक बिरादर...

परिवार का आदर्श और विकास (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

एक ही रक्त और कुल के क्यों न हों, अनेक लोगों का एक साथ रहना मात्र ही पारिवारिक जीवन नहीं है। एक साथ, एक घर में अनेक भाई और उनके बच्चे रहते हों; किन्तु  वे आपस में लड़ते, संघर्ष करते और कलह मचाते रहें, तो इससे पारिवारिक जीवन का उद्देश्य पूरा नहीं होता। इस ...

परिवारिकता अपनाने में ही मनुष्य का कल्याण (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

परिवार एक संस्था है, जिसमें विभिन्न स्तर के व्यक्तियों का समुदाय न केवल साथ- साथ रहता है, वरन् एक दूसरे के साथ आत्मीयता के सूत्र में बँधता है और कर्तव्य  एवं अधिकार की आचार- संहिता का भी परिपालन करता है। इस प्रकार का जनसमुदाय जहाँ भी बनता हो, उसे निःसंकोच...

पारिवार की महिमा और गरिमा बनाए रखें (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

लौकिक जीवन में मनुष्य को अनेक कठिनाइयों, समस्याओं और उलझनों का सामना करना पड़ता है। ये गलतियाँ मनुष्य को मानसिक रूप से थका डालती हैं और कभी  जीवन को नीरस तथा बोझिल भी बना देती हैं। यदि मनुष्य पर पारिवारिक उत्तरदायित्व न हों, तो इन चुनौतियों का ...

पारिवारिक पंचशीलों का परिपालन (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

बौद्ध धर्म में मनुष्य जाति के अनेक वर्गों के लिए उनके कार्यक्षेत्र के अनुरूप पाँच- पाँच प्रमुख ‘शील’ अनुशासन बनाये गये हैं। शासन, समाज, धर्म, शिक्षा, स्वास्थ्य, उपार्जन आदि क्षेत्रों में काम करने वाले इन मर्यादाओं का पालन करें, यही उनका शील है। ये ...

डॉ. राधाकृष्णन की शिक्षकों से अपेक्षाएँ (डॉ. प्रणव पण्ड्या) )

शिक्षक न केवल विद्यार्थी के व्यक्तित्व का निर्माता, बल्कि राष्ट्र का निर्माता भी होता है। राष्ट्र का मूर्त रूप वहाँ के नागरिक होते हैं। किसी राष्ट्र के भावी नागरिकों को गढ़ने वाले शिक्षकों की भूमिका अति महत्त्वपूर्ण है। वैसे तो शिक्षक का ...

राष्ट्र निर्माण में शिक्षकों की महती भूमिका (डॉ. प्रणव ण्ड्या)

भारत देश गुरुकुल परम्परा के प्रति समर्पित रहा है। यहाँ के वशिष्ठ,संदीपन धौम्य आदि के गुरुकुलों से राम, कृष्ण, सुदामा जैसे शिष्य निकले, जिन्होंने अपना जन्म तो सार्थक किया ही, साथ ही विश्व वसुधा को सद्ज्ञान का आलोक प्रदान किया और इतिहास को भी धन्य ...

मानव जीवन को सुसंस्कृत बनाने की अद्भुत विधा

भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है- जन्म से लेकर मृत्यु तक मानव जीवन को सार्थक बनाने हेतु संस्कारों द्वारा सतत शोधन तथा आत्मसत्ता के अभिवर्धन की अभिनव व्यवस्था। मानव कल्याण की महान् परंपराओं में जितने भी आयोजन एवं अनुष्ठान हैं, उनमें सबसे बड़ी ...

राष्ट्र भाषा की अंतर्वेदना (डॉ. प्रणव पण्ड्या)

किसी भी राष्ट्र की अपनी एक राष्ट्रभाषा होती है, उसे ही जनमानस की भी भाषा होनी चाहिए। जब तक राष्ट्रभाषा, लोकभाषा का रूप नहीं ले लेती, तब तक उस भाषा का पूर्ण विस्तार संभव नहीं होता। राष्ट्रभाषा उस देश की सांस्कृतिक अस्मिता होती है और उसमें उस राष्ट्र की ...

देवसंस्कृति विश्वविद्यालय का गरिमामय परिवेश

हमारे देश में कुल ३०६ विवि हैं। देवभूमि उत्तरांचल में कुल ७ विवि हैं। इनमें से तीन विवि प्रसिद्ध तीर्थ नगर हरिद्वार में ज्ञानदान का पुण्य कार्य कर रहे हैं। इन तीन में एक देसंविवि है जिसकी स्थापना अभी दो वर्ष पहले ही हुई थी। कम समयावधि में ही ...

सहायता (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

जिस प्रकार संसार की सभी वस्तुएँ-मान, पद, धन-दौलत, यौवन इत्यादि क्षणिक हैं, उसी प्रकार दूसरों की सहायता भी अस्थाई एवं अनिश्चित होती है।...

परिवार से ही निकलते हैं हीरे (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

समाज निर्माण की बात सोचने वालों को यह तथ्य भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि समाज की स्वतंत्र सत्ता कुछ नहीं है, वह परिवारों का समुच्चय मात्र है। परिवार जैसे हों, उनका मिला- जुला स्वरूप ही समाज का भला- बुरा स्तर बनकर सामने आ खड़ा होगा। सरकारी कर्मचारी और ...

अभिभावकों की शिक्षा के ऊपर निर्भर पारिवारिक सुख- शान्ति (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

बच्चों के बढ़ने के साथ ही माँ- बाप में उनका विवाह करके घर बसाने की, सुखी- समृद्ध बनाने की बड़ी- बड़ी कल्पनाएँ उठने लगती हैं। माँ सोचती है- नई बहू का मुँह देखकर कब सौभाग्यवान बनूँगा? उधर पिता भी सोचते हैं- नई बहू आकर घर को स्वर्ग बनायेंगी। घर का प्रत्येक ...

बड़ों का सम्मान करना छोटों का कर्तव्य है (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

संसार में समझदार और वृद्ध पुरुषों की कमी नहीं है। उनके अनुभव और ज्ञान से नई पीढ़ी का भारी मार्गदर्शन होता है। इसीलिए दनकी महत्ता को सदा से अक्षुण्ण रखा जाता है। गुरुजनों की सेवा, शिक्षा और आज्ञा का समुचित ध्यान रखना कर्तव्य माना गया है। वैसा ही ...

परिवार में भावनात्मक एकरूपता (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

आदर्श परिवार की स्थापना और आदर्श परिवार व्यवस्था का अनुपम लाभ उठाने के लिए हर व्यक्ति के मन में आकांक्षा उठती है। उसके अनेक नियम, उपनियम बनाये गये हैं। परिवार के सदस्यों में कतिपय गुणों के विकास और शिष्टाचारों के निर्वाह की बात भी कही जाती है। यह सभी ...

परिवार में सहयोग और सद्भावना की आवश्यकता (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)

परिवार में सहयोग और सद्भावना की आवश्यकता (पं. श्रीराम शर्मा आचार्य) आमतौर से यह देखा जाता है कि आजकल परिवार के परिजन परस्पर सेवा की भावना नहीं रख पाते है। जैसे- तैसे परिवार तो दिखाई देते हैं, पर भीतर की परिवारीय भावना मर चुकी होती है। ऐसा लगता है कि सभी ...




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