The News (All World Gayatri Pariwar)
Home Editor's Desk World News Regional News Shantikunj E-Paper Upcoming Activities Articles Contact US

युग निर्माण में युवा शक्ति का सुनियोजन-

१. युग निर्माण अर्थात् आध्यात्मिक आंदोलन-युवाओं की रुचि धार्मिक, आध्यात्मिक आंदोलनों पर नहीं है। चूंकि युवा धर्म और आध्यात्म को एक समझते है तथा वर्तमान धार्मिक क्रियाकलापों को ही वास्तविक धर्म समझते है, अत: इनकी ओर युवाओं की रुचि नहीं रहती। जबकि धर्म और आध्यात्म अलग-अलग है तथा वर्तमान धार्मिक क्रियाकलाप धर्म का बाह्य स्वरुप मात्र है, वह उपासना पद्धति है। वास्तविक धर्म अर्थात् कर्तव्य होता है। उदाहरण- स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी प्रत्येक नागरिक का धर्म था...। अध्यात्म जीवन जीने की कला का नाम है, जीवन के समग्र विकास के लिए अनिवार्य आवश्यकता है।
२. क्या है व्यवहारिक अध्यात्म एवं क्यों आवश्यक है युवाओं के लिए- हमारे पास शक्ति की तीन मुख्य धाराएँ होती है। भौतिक शक्ति, धन शक्ति तथा विचार शक्ति। आज हम देखते है कि भौतिक शक्ति उदण्डता की ओर, धन की शक्ति व्यसनों की ओर तथा विचार की शक्ति कुचक्रों, घोटालों की ओर जा रही है। इन शक्तियों को यदि भटकने से, गलत रास्ते पर जाने से रोकना हो तो इन चेतना की शक्ति अर्थात् आध्यात्मिक शक्ति का नियंत्रण होना आवश्यक है और यही व्यवहारिक अध्यात्म है।
३.आध्यात्मिक आंदोलनों से युवाओं के कैरियर का क्या होगा?-वर्तमान में युवा पीढ़ी एवं उनके अभिभावकगण कैरियर को लेकर अत्यधिक चिन्तित रहते है। यह कैरियर है क्या? स्थूल संदर्भ में साधन-सामग्री को इच्छित स्थान तक पहुँचाने, ढोने वाले साधन को कैरियर कहते है। दूसरे रुपों में जीवन को भी कैरियर कहा जाता है। लाईफ कैरियर अर्थात जीवन का उद्देश्य।
सामान्य उद्देश्य- अपने आश्रितों के निर्वाह व्यवस्था हेतु सुख सुविधायें जुटाना। यह सामान्य कैरियर हुआ।
विशिष्ट कैरियर-अपने साथ-साथ समाज, राष्ट्र एवं मनुष्यता के के हित साधने के निर्वाह की भी जिम्मेदारी निभाने वाले व्यक्ति का जीवन श्रेष्ठ अर्थात् विशिष्ट कैरियर कहलाता है।
उच्च दक्षता की मशीन-कम इनपुट में अधिक आउटपुट देने वाला होता है। मनुष्य शरीर को भी भगवान ने उच्च दक्षता वाली बनाई है।
४. वर्तमान समय युवाओं के लिए टर्निग प्वाइंट है- अपने कैरियर को उच्च से उच्चतम में ले जाने अर्थात् जीवन लक्ष्य निर्धारण करने का यही सर्वोत्तम समय है। विद्यार्थी ११वीं कक्षा में तय करता है कि उसे इन्जीनियर बनना है कि डॉक्टर या प्रशासनिक अधिकारी। इसी आधार पर वह आगे पढ़ाई के लिए विषय का चयन करता है। ठीक इसी प्रकार युवाओं को जीवन लक्ष्य का निर्धारण करने का यही उपयुक्त अवसर है क्योंकि भौतिक उन्नति के सहारे जीवन का उद्देश्य प्राप्त नहीं किया जा सकता। जीवन के समग्र प्रगति के लिए भौतिक उन्नति के साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति आवश्यक है।
५. दशा और दिशा पर चिन्तन करें- दशा पर सबकी नजर है, दिशा पर किसी का ध्यान नहीं। सर्वविदित है कि किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति काफी मजबुत है, परंतु वह अनेक दुर्गुणों से भरा हुआ है जिसके कारण उसे न तो पारिवारिक सुख शांति मिल पाता है और नही लम्बे समय तब अपनी आर्थि क समृद्धि को बनाए रख पाता है। जबकि दूसरा व्यक्ति जिसके पास धन कम है लेकिन उसमे कोई दुव्र्यसन न होने के कारण अपनी श्रम के बदौलत धीरे-धीरे अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर लेता है, पारिवारिक आनंद की अनुभूति करता है। अत: सुखमय जीवन जीने के लिए दिशा पर ध्यान देना आवश्यक है।
६. स्वतंत्रता आंदोलन से हजार गुना बड़ा आंदोलन विचार क्रांति अभियान- विचार परिवर्तन से ही जीवन परिवर्तन एवं जीवन परिवर्तन से जीवन लक्ष्य की प्राप्ति संभव होगी। समस्त दु:खों, समस्याओं का मूल कारण नकारात्मक चिंतन ही है। यदि व्यक्ति का दृष्टिकोण बदल जाये तो यह संसार भी आनदंमय प्रतीत होगा। गुरु द्रोणाचार्य ने एक बार दुर्योधन को एक गाँव में भेजा और कहा कि उस गाँव में कितने सज्जन व्यक्ति है पता लगाकर आओ। उसी गाँव में युधिष्ठिर को भी भेजा कि उस गाँव में कितने दुर्जन व्यक्ति है पता लगाकर आओ। दुर्योधन वापस लौटकर बताया कि गुरुदेव उस गाँव में एक भी दुर्जन व्यक्ति नही है। कहने का मतलब यह है कि अच्छा-खराब, यह अपने देखने का नजरिया है। हमारे चिंतन में सकारात्मक है तो सभी जगह अच्छे नजर आयेंगे अन्यथा सभी जगह खराब ही दिखेंगे। अत: परिष्कृत चिंतन से ही सभ्य समाज का निर्माण होगा। स्वतंत्रता आंदोलन मात्र एक राजनैतिक क्रांति थी जबकि रामराज्य की स्थापना के लिए सामाजिक एवं नैतिक क्रांति की आवश्यकता है और इसके लिए करनी होगी विचार क्रांति।
७. युग निर्माण क्या है? वह कैसे होगा?-युग अर्थात् कालचक्र (समय) का निर्माण अर्थात् श्रेष्ठ समय का निर्माण। ऐसा परिवार, समाज व राष्ट्र जहाँ लोग एक दूसरे को ऊँचा उठाने में अपनी प्रतिभा, पुरुषार्थ, समय व धन का एक अंश नियमित लगाते हों ऐसे समाज की संरचना को श्रेष्ठ समाज एवं उस कालचक्र को श्रेष्ठ समय कहते है। इस श्रेष्ठ समय का निर्माण करना ही युग निर्माण है।
८. युवा शक्ति का नियोजन क्यों आवश्यक है? विश्व में व्याप्त विपरीत परिस्थितियों का परिवर्तन करने हेतु समय-समय पर क्रांति का सूत्रपात करना पड़ा है और अब की सभी क्रांतियों में युवा शक्ति की भूमिका सर्वाधिक रही है। चाहे वह आर्थक क्राति हो या सामाजिक, आध्यात्मिक क्रांति हो या राजनैतिक सभी में युवा शक्ति का ही बोलबाला था। आज भी विश्व समाज को जो परिवर्तन करने में विचार क्रांति अभियान के लाल मशाल को विश्वव्यापी बनाने में युवा शक्ति का पुन: आह्वान है। यह आज की न सिर्फ आवश्यकता है बल्कि अनिवार्यता भी है।
९. युवा क्या करें? कैसे जुड़े इस अभियान से? युवा रचनात्मक ओन्दोलन के माध्यम से नव निर्माण की ओर अग्रसर हों। परन्तु किसी भी आन्दोलन को प्रारम्भ करने के पूर्व पहले स्वयं का निर्माण करें अर्थात व्यक्तित्व निर्माण। व्यक्तित्त्व निर्माण के चार सोपान है- साधना, स्वाध्याय, संयम व सेवा।
साधना- साधना के दो खण्ड प्रथम उपासना- जीवन लक्ष्य की प्राप्ति हेतु प्राण शक्ति का अर्जन करना अर्थात अपने मनोबल, आत्मबल को बजमूत बनाना जिससे आप भौतिक एवं आध्यात्मिक दिशा में सफलता प्राप्त कर सकें। जीवन साधना- उपासना से प्राप्त दिव्य शक्तियों को धारण करना, अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित अर्थात समय का प्रबन्धन एवं आहार-विहार का सात्विक बनाये रखना।
स्वाध्याय- पे्ररणा, प्रकाश व अपनी ज्ञान को हमेशा बढ़ाते रहने के लिए युवाओं को नित्य अध्ययन करने की आदत डालनी चाहिए।
संयम- सभी प्रकार की शक्तियों को संयमित करते हुए जीवन यापन करना।
सेवा- अपने अहंकार को गलाते हुए सामाजिक कार्यों के लिए स्वयं को प्रस्तुत करना।
१०. अभियान का व्यवहारिक स्वरूप अर्थात सप्तसूत्रीय आन्दोलन- साधना, शिक्षा, स्वास्थ्य स्वावलम्बन, पर्यावरण संरक्षण, व्यसन मुक्ति एवं कुरीति उन्मूलन, नारी जाकरगण।






Click for hindi Typing


Related Stories
Recent News
Most Viewed
Total Viewed 666

Comments

Post your comment