The News (All World Gayatri Pariwar)
Home Editor's Desk World News Regional News Shantikunj E-Paper Upcoming Activities Articles Contact US

आदर्श ग्राम योजना को तेज गति से लागू करने का समय आ गया

    देश की ७०% जनता ग्रामवासी है, ग्रामोत्थान के बिना राष्ट्रोत्थान कैसे होगा? राष्ट्रसेवी ग्रामसेवा में जुटें
    ‘विश्वं पुष्टं ग्रामे अस्मिन अनातुरम्।’ - अथर्ववेद

अर्थ :- इस गाँव में आतुरता रहित परिपुष्ट विश्व हो।
भावार्थ :- जैसे विश्व अपने आप में समग्र-परिपूर्ण है, वैसे ही गाँव भी पुष्ट (समर्थ) और आतुरता (चिंता-परेशानी) रहित एक समग्र इकाई के रूप में विकसित-स्थापित हों।

गाँवों की महत्ता

भारत ग्राम प्रधान देश है, इसलिए राष्ट्रोत्थान के लिए ग्रामोत्थान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। ऋषियों ने तो गाँवों के हितों को सीधे विश्वहित से जोड़ा है। 
स्वतंत्रता आन्दोलन के क्रम में राष्ट्र को समर्थ बनाने के लिए महामना मालवीय जी ने गाँवों के उत्कर्ष को महत्त्व देते हुए एक श्लोक की रचना की थी-

ग्रामे-ग्रामे सभाकार्या, ग्रामे-ग्रामे कथा शुभा।
पाठशाला-मल्लशाला, प्रति पर्वा महोत्सवा॥


अर्थात्- गाँव-गाँव में सभायें (जनता को जागरूक बनाने और दिशा देने के लिए) आयोजित हों। गाँव-गाँव में शुभ कथाएँ (जनता के आध्यात्मिक विकास के लिए) की जायें। शिक्षा संवर्धन के लिए पाठशालाएँ तथा स्वास्थ्य सुधार के लिए व्यायाम शालाएँ खोली जायें। जन-जन में सांस्कृतिक जागरूकता, उल्लास और सहकार बढ़ाने के लिए पर्वों के सामूहिक आयोजन किये जायें।

अन्तर्राष्ट्रीय दबाव बन जाने पर भारत को स्वतंत्रता मिलना निश्चित हो गया था, तब गाँधी जी ने भी ग्राम सुधार को प्रधानता देते हुए नये सृजनात्मक आन्दोलन चलाने की प्रेरणा दी थी। विनोबा जी का भूदान आन्दोलन तो ग्राम आधारित ही था। उन्होंने कहा था कि बड़े नगर तो शरीर में कैन्सर के जख्म की तरह बढ़ रहे हैं, राष्ट्र के सुधार-विकास के लिए गाँवों को केन्द्र मान कर चलना चाहिए।

भारत स्वतंत्र होने पर गाँवों को महत्त्व देने पर चर्चाएँ तो होती रहीं, किंतु उस दिशा में आवश्यकता के अनुकूल कार्य नहीं किए जा सके। जीवन की आधारभूत सुविधाएँ ७० प्रतिशत गाँववासियों तक पहुँचाने से अधिक जोर ३० प्रतिशत नगरवासियों को उपलब्ध कराने पर ही दिया जाता रहा। योजनाएँ बनीं भी, चली भी, लेकिन उन पर समुचित ध्यान न दिये जाने के कारण उनके वांछित परिणाम सामने नहीं आ सके। युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव ने मालवीय जी तथा गाँधी जी के विचारों को महत्त्व देते हुए अपने अभियान को नगरों के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्र में गति देने की व्यवस्था बनायी। उन्हीं के निर्देशों का अनुसरण करते हुए अपने संगठन ने हर जिले में कम से कम एक आदर्श ग्राम विकसित करने का लक्ष्य रखकर अपनी गतिविधियाँ चलायीं, जो क्रमशः गति पकड़ रही हैं।

आदर्श ग्राम कैसा ?


सरकारी स्तर पर भी आदर्श ग्रामों की चर्चा की जाती रही है। उनके अनुसार गाँव में सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, चिकित्सा जैसी स्थूल सुविधाएँ पहुँचा देने भर से गाँव को आदर्श गाँव माना जा सकता है। उसमें गाँव में रहने वालों के चिंतन, चरित्र, व्यवहार को बेहतर बनाने का कोई सूत्र नहीं है। सुविधा एवं सम्पन्नता बढ़ना जरूरी तो है, लेकिन मानवीय विकास की दृष्टि से पर्याप्त नहीं। यदि नर-नारियों की प्रवृत्तियाँ ठीक न हों तो प्राप्त सुविधा-साधनों से सुख-शांति की जगह अहंकार और आपाधापी बढ़ने लगते हैं। सुख-शांति, संतोष के लिए बाहर के संसाधनों के साथ व्यक्ति और समाज में सत्प्रवृत्तियाँ भी जरूरी समझी जाती हैं। इसलिए अपने कार्यक्रम में आदर्श ग्राम की परिभाषा कुछ इस प्रकार की गयी है-

‘‘संस्कारयुक्त, व्यसन-कुरीति मुक्त, स्वच्छ, स्वस्थ, सुशिक्षित, स्वावलम्बी, सहयोग-सहकार से भरापूरा गाँव।’’

इन्हीं सूत्रों के आधार पर अपना अभियान आगे बढ़ाया जा रहा है।
एक सुयोग:-  इस वर्ष १५ अगस्त को लाल किले से ‘आदर्श ग्राम योजना’ लागू करने की घोषणा की गयी। अपील की गयी कि प्रत्येक सांसद और विधायक अपने-अपने कार्यक्षेत्र में कम से कम एक आदर्श ग्राम बनाने के लिए गंभीरता से प्रयास करें। प्रधानमंत्री द्वारा घोषणा होने के तुरंत बाद ही शांतिकुंज आन्दोलन प्रकोष्ठ ने अपनी योजना उनकी वेबसाइट पर पहुँचा दी। आशा की जाती है कि केन्द्रीय सरकार का प्रारूप सामने आने वाला है, उसमें अधिकांश ऋषि सूत्रों का समावेश होगा।

अपने प्रयास तो चल ही रहे हैं, जल्दी ही इस संदर्भ में सरकारी तंत्र भी सक्रिय होगा। निश्चित रूप से सरकारी तंत्र के लोगों को जनता के बीच ऐसे लगनशील और अनुभवी व्यक्तियों की खोज होगी, जो इस महत्त्वाकांक्षी-कल्याणकारी योजना को सार्थक स्वरूप दे सकते हैं। इससे आदर्श ग्राम योजना को तीव्रतर गति से आगे बढ़ाने में बहुत योगदान मिलेगा। अपने अभियान से जुड़े प्राणवान परिजनों को प्राप्त अवसर का समुचित लाभ उठाने के लिए पूरी तत्परता बरतनी चाहिए। योजना के प्रारूप को स्वयं भली प्रकार समझकर इसे संबंधित प्रभावशाली व्याक्तियों के संज्ञान में लाने के प्रयास भी करने चाहिए।

स्पष्ट स्वरूप समझें

आदर्श ग्राम सम्बन्धी अपनी परिभाषा और उसके सूत्रों को लागू करने की दृष्टि सबके ध्यान में रहे। सूत्रों के संक्षिप्त विवरण इस प्रकार हैं :
संस्कारयुक्त गाँव:- गाँवों के नर-नारियों के मानवोचित संस्कार जाग्रत रहें। संस्कारवान व्यक्ति उसे कह सकते हैं, जिसमें भावनाएँ श्रेष्ठ, विचार सुलझे हुए, पुरुषार्थ प्रखर और कर्म सबके लिए हितकारी हों। उनमें स्नेह, समता, उदारता, करुणा, श्रमशीलता, सुव्यवस्था, शालीनता, सहकारिता, जैसी सत्प्रवृत्तियों के जागरण के प्रयास किये जाने चाहिए। भारत धर्मप्राण देश है। सभी धर्म-सम्प्रदायों में श्रेष्ठ गुणों, दैवी प्रवृत्तियों को महत्त्व दिया गया है। लोगों की ईश्वर निष्ठा और समाज निष्ठा जाग्रत करते हुए उनमें मानवीय सत्प्रवृत्तियों को विकसित किया जा सकता है। साधना, स्वाध्याय, संयम, सेवा, के मार्ग से उन्हें आगे बढ़ाया जा सकता है। इसके लिए अनेक गतिविधियाँ अपनायी जा सकती हैं। जैसे-

     धार्मिक आयोजनों, कथाओं, प्रवचनों, संस्कारों, त्यौहारों के सार्थक आयोजन।
     धार्मिक स्थलों, चौपालों पर सामूहिक रूप से तथा घर-परिवारों में अपने स्तर पर साधना का क्रम।
     देवालयों, धर्म स्थलों को जन जागरण केन्द्र के रूप में विकसित करके विभिन्न गतिविधियाँ चलाना।
     शिक्षा के साथ विद्या-नैतिक शिक्षा की गतिविधियाँ जोड़ना।
     सद्वाक्यों के स्टिकर लगाने तथा दीवार लेखन की व्यवस्था बनाकर।

व्यसन-कुरीति मुक्त गाँव:- नशा, व्यसन, फैशन तथा विभिन्न सामाजिक कुरीतियों के कारण व्यक्तियों और समाज को समय, शक्ति, साधनों का भारी मूल्य चुकाना पड़ता है। वे निरर्थक ही नहीं, बहुत हानिकारक भी सिद्ध होते हैं। इसलिए गाँव वालों को प्रेरणा दी जाये कि -
‘व्यसन, कुरीतियों से बचायें सृजन में लगायें’
हिसाब लगाकर देखा जाए तो पता पड़े कि जितने समय-साधन इनमें लगते हैं, उतने से तो जनहित की बड़ी-बड़ी योजनाएँ पूरी की जा सकती हैं। इस दिशा में उठाने योग्य कदम-
 नशामुक्ति के लिए प्रेरणा देना, रैलियाँ निकालना, प्रदर्शनियाँ, नुक्कड़-नाटक आदि करना।

     नशामुक्ति के लिए परामर्श-उपचार केन्द्र चलाना।
     सार्वजनिक स्थलों पर नशीले पदार्थों की बिक्री और उपयोग पर प्रतिबंध।
     अंध विश्वास, टोने-टोटके, गलत चलन आदि से बचने की प्रेरणा देना।
     विवाह सहित सभी संस्कारों को प्रदर्शन और अपव्यय से बचाकर उनकी शालीन एवं किफायती पद्धतियाँ अपनाना।
     मृतक भोजों की खर्चीली लोकरीति की जगह श्राद्ध की शास्त्र सम्मत सस्ती रीति-नीति अपनाना।
     परम्परा की तुलना में विवेक को महत्व देना।

स्वच्छ गाँव:- युगऋषि ने कहा है ‘‘स्वच्छता सभ्यता ही पहली शर्त है।’’  और ‘‘गंदगी की घृणित असभ्यता से बचा जाये।’’  यह भी सभी जानते हैं कि गंदगी रोगों की खदान होती है। स्वच्छता का अभ्यास कर लिया जाये तो स्वास्थ्य सुधरे, गौरव बढ़े तथा सम्पदा भी रहे। अपनाने योग्य कुछ सूत्र यह हैं-

     पानी निकास की व्यवस्था-नालियाँ, सोकपिट आदि बनाना।
     शौचालय बनाना, खुले में शौच जाने से बचना।
     सड़ने वाली वस्तुओं को खाद में परिणित किया जाये, अन्य के रीसाइकल करने की व्यवस्था बने। इससे गंदगी ही आमदनी का स्रोत बन सकती है।
     महात्मा गाँधी को उनकी १५०वीं जयंती-२०१९ तक स्वच्छ भारत की भेंट देने की राष्ट्रीय योजना के नाते भी जन-जन को स्वच्छता अभियान से जोड़ देना चाहिए।

स्वस्थ गाँव:- कहावते हैं - ‘‘तंदुरुस्ती हजार नियामत’’ और ‘‘पहला सुख निरोगी काया’’
इसके लिए अपनाने योग्य कुछ गतिविधियाँ -

     श्रमशीलता के प्रति सम्मान का भाव विकसित करना।
     योग-व्यायाम, प्राणायाम, खेल-कूद केन्द्रों की स्थापना। समय-समय पर इनकी प्रतियोगिताएँ कराना।
     अंकुरित अन्न, मौसम के शाक, फल, जवारे के रस का प्रयोग करना।
     स्वास्थ्यप्रद सस्ते आहारों का महत्त्व समझाना, व्यवस्था बानाना।
     जड़ी-बूटियों, एक्यूप्रेशर जैसे सुगम नुस्खों से उपचार का प्रबंध करना।

सुशिक्षित गाँव:- शिक्षा विहीन व्यक्ति एक प्रकार से अंधा होता है, जो ज्ञान की बात सुनभर सकता है, पढ़ नहीं सकता। इसके लिए विविध प्रयास हों-

    स्कूलों में बच्चों को भेजने तथा शिक्षा का स्तर सुधारने के प्रयास करना।
     बच्चों के लिए बाल संस्कार शालाएँ, एकल विद्यालय, कामकाजी विद्यालयों की व्यवस्था करना। बिना मूल्य या सस्ती कोचिंग देने, ट्यूशन पढ़ाने की रूपरेखा बनाना।
     प्रौढ़ पाठशालाएँ चलाकर वयस्क पुरुषों-महिलाओं को शिक्षित बनाना।

स्वावलम्बी गाँव:-ग्रामवासियों के लिए संस्कृति तथा आर्थिक स्वावलम्बन का शिक्षण तंत्र बनाना। इनके बिना गाँवों से शहरों की ओर होने वाला पलायन नहीं रोका जा सकता। चलाने योग्य गतिविधियाँ ये हैं-

     कृषिकार्य को अधिक लाभदायक और उन्नत बनाया जाये। जैविक कृषि के लाभ समझायें, शिक्षण व्यवस्था बनायें।
     कुटीर उद्योगों, ग्रामोद्योगों की प्रेरणा एवं प्रशिक्षण का तंत्र बनायें।
     गाँव में होने वाले उत्पाद कच्चे माल के रूप में न बेचे जाकर उन्हें तैयार माल के रूप में बाजार में ले जाने की व्यवस्था बने।
     गाँव के उपयोग की अधिकांश वस्तुएँ गाँवों में ही पैदा हों। सामान के बदले सामान की पूर्ति की व्यवस्था बने।
     ग्राम पंचायत, ग्राम सभा के निर्णयों को लागू करें। गाँव के श्रम का गाँव में ही नियोजन करने की व्यवस्था बने। श्रम के प्रति सम्मान, श्रम की क्षमता का विकास हो।
     ऋषि-कृषि से खेती को स्वावलम्बी बनाने, खाद, कीटनाशक, फसलों-पौधों के रोगों के नियमन के लिए जैविक विधियों को सिखाने लागू करने की व्यवस्था बने।

स्वावलम्बी लोकसेवी मंडलों (स्वालोकम) का गठन किया जाये। एक-एक मंडल एक-एक कार्य को आर्थिक स्वावलबन और परमार्थ भावना से चलाये। उत्पादों को प्रामाणिक बनाये रखा जाये।
सहयोग-सहकार से भरापूरा गाँव:-
ग्राम शब्द समूह का प्रर्याय है। जहाँ समूह है वहाँ सहयोग-सहकारिता भी जरूरी है, नहीं तो परस्पर आपाधापी एवं झगड़े-झंझटों में ही अधिकांश शक्ति खर्च हो जाती है। प्रतिभा, शक्ति, साधन सदुपयोग की जगह दुरुपयोग में लगने लगते हैं। इस ओर सार्थक प्रयास हों।

      गाँव में जाति, धर्म, पार्टी-भेद को भुलाकर गाँव की मिट्टी के प्रति वफादारी का भाव जागायें।
     सामूहिक निर्णय, सामूहिक श्रमदान, अंशदान की प्रवृत्तियाँ विकसित की जायें।
     मतभेदों , झगड़ों का निवारण ग्राम सभा, पंच फैसलों से करने का प्रयास किया जाये, मुकदमेबाजी से बचा जाये।
     सभी धर्म-सम्प्रदायों के आयाजनों में सभी सहयोग एवं भागीदारी करें। मुख्य पर्वों-त्यौहारों के सामूहिक प्रेरक आयोजन किये जायें।
     पाठशाला, मंदिर, पार्क, तालाब, कुओं आदि का निर्माण, प्रबंधन, जीर्णोद्धार सामूहिक श्रमदान एवं सहयोग से करें। फावड़ा वाहिनी, सुरक्षा वाहिनी गठित की जायें।
     जल संरक्षण, जल स्रोतों को सुरक्षित रखना, वृक्षारोपण, हरियाली संवर्धन जैसे कार्य हैं।

सभी विषयों से संबंधित पुस्तकों के पुस्तकालय वाचनालय बनाये जायें। विशेषज्ञों के आदान-प्रादान से प्रेरणा एवं प्रशिक्षण देने की व्यवस्था बनाई जाये।
अपने मिशन के प्रयास इस दिशा में जहाँ-जहाँ चल रहे हैं। उनकी जानकारी अपने क्षेत्रों के सांसदों, विधायकों, अधिकारियों को दें तथा उनके सहयोग से अभियान को गतिशील बनाने की योजना बनाकर उस पर अमल करें।   










Click for hindi Typing


Related Stories
Recent News
Most Viewed
Total Viewed 1782

Comments

Post your comment

rishi
2014-10-28 13:08:40
it is great mission. We must have biogas plant, gram udyog, toilet. water drainage, driking water, cattle pond. school with sadhana kendra, dairy depot. etc. I will be happy if i could be the part of implementation
Pramod Sahu
2014-10-27 23:54:42
Truly eye-opening.. Gurusatta’s dream “Gramothhan ki Or” is in full swing across the country and the top intellectuals have started working on this. There is going to be a big change in near future..
DINESH SAHU GAYATRI PARIWAR MULTAI
2014-10-15 16:44:44
aadharsh gram yojana gurusatta ke vichar hai jo puri hongi. jay gurudev
awanish,prgya yuva mandal noida
2014-10-14 18:56:45
KOI MANE YA NA MANE KARE YA NA KARE MAHAKAL KI YOJNA SAFAL HO KE RAHEGI, YUGNIRMAN HO KE RAHEGA CHAHE RISHISATTA KISI BHI MADHYAM SE KARE YUGNIRMAN SUNISHCHIT HAI, JAI MAHAKAL
awanish,prgya yuva mandal noida
2014-10-14 18:55:35
KOI MANE YA NA MANE KARE YA NA KARE MAHAKAL KI YOJNA SAFAL HO KE RAHEGI, YUGNIRMAN HO KE RAHEGA CHAHE RISHISATTA KISI BHI MADHYAM SE KARE YUGNIRMAN SUNISHCHIT HAI, JAI MAHAKAL