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साहस का देवता और उसकी उपासना

मनुष्य जीवन का उद्देश्य

भगवान ने मनुष्य को अगणित शक्तियों का भाण्डागार बनाकर इस धरती पर इसलिए भेजा है कि वह उन क्षमताआें का उपयोग करके अपने लिए सुख- शान्ति, समृद्धि और प्रगति के साधन उपलब्ध करे तथा दूसरों के लिए मार्गदर्शन एवं सहयोग के सरंजाम जुटाये। मानव जीवन की सफलता इन शक्तियों को पहचानने, उन्हें विकसित एवं उपयुक्त दिशा में प्रयोग कर सकने पर निर्भर है।

मनुष्य अभावग्रस्त और दीन- दुःखी जीवनयापन करने के लिए पैदा नहीं किया गया। अभाव और क्लेश अपने आप को ठीक तरह न समझने और उसका समुचित प्रयोग न कर सकने का परिणाम मात्र हैं। अपनी उपेक्षा करना एक बहुत भारी अपराध है। नियति इसे सहन नहीं करती। इस प्रकार के अपराधी दुर्भाग्य के कुचक्र में पिसते हुए निरन्तर काँपते देखे जा सकते हैं।

अध्यात्म की प्रथम शिक्षा अपनी महत्ता को समझना, अपनी शक्तियों को ढूँढ़ निकालना औैर उनके सदुपयोग में जुट जाना है। इस साधना में प्रवृत्त व्यक्तियों के ऊपर ऋद्धि- सिद्धि छाया किये खड़ी रहती है और उस पर चँवर ढुलाती देखी गई है।


साहस एक विभूति

उच्च स्तर के लोग अपनी क्षमताओं को समझते और विकसित तो करते ही हैं, साथ ही इतना साहस और करते हैं कि अपनी विभूतियों के उपयोग का क्षेत्र लोभ- मोह एवं वासना- तृष्णा तक सीमित न रखकर उनका प्रयोगक्षेत्र उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता के लिए व्यापक बना देते हैं।

साहस ही किसी काम की पूर्ति करने के लिए प्रारंभिक कदम बढ़ाने की प्रेरणा देता है और काम का प्रारंभ ही उसकी आधी सफलता है। शेष आधी सफलता प्रयत्न से मिल जाती है। जब कार्य को पहले ही असंभव, कठिन मान लिया जाता है तो वह शुरू भी नहीं होता। जैसे- तैसे शुरू हो जाये तो अधूरा ही छूट जाता है। साहस सफलता का स्वप्र, संकल्प लेकर आता है।


श्रमशील बनो, दरिद्रता दूर करो

साहस के देवता की साधना के तीन अनिवार्य चरम हैं। प्रथम साधना है शारीरिक श्रम से प्रसन्नता अनुभव करना। आलस्य हमारा सबसे बड़ा शत्रु है, दरिद्रता औैर अस्वस्थता उसी के अभिशाप हैं। शरीर को आरामतलब बना लेना, बैठे- ठाले रहने में सन्तोष करना, मेहनत से जी चुराना, समय काटने के लिए मटरगश्ती करना, तथाकथित यार- दोस्तों में गपशप लड़ाते रहना एेसे दुर्गुण हैं जो जहाँ भी रहेंगे वहाँ दरिद्रता आकर रहेगी। पूर्व उपार्जित पूँजी धीरे- धीरे समाप्त हो जायेगी। मौका पाकर साथी और कर्मचारी अनुचित लाभ उठाने को उत्सुक होंगे और जो मुट्ठी में है, उसको सुरक्षित रख सकना भी सम्भव न रहेगा।

यह विचार सही नहीं है कि जो अमीर होते हैं, वे मौज करते हैं और जो गरीब हैं उन्हीं को श्रम करना पड़ता है। सचाई यह है कि जो श्रमशील हैं वे ही अमीर बनते हैं और जो आरामतलबी के शिकार हैं वे क्रमशः गरीबी के गर्त में चले जाते हैं।

प्रगति किसी भी दिशा में करनी हो, सफलता किसी भी क्षेत्र में पानी हो तो उसके लिए कठोर श्रम से ही काम चलेगा। चालाकी और बेईमानी के सहारे कई व्यक्ति बिना श्रम के भी सफलताएँ पाते देखे जाते हैं पर यह पूरी तरह ध्यान रखना चाहिए कि उन उपलब्धियों की जड़ें खोखली होती हैं। उनके विदा होते इतने भी देर नहीं लगती जितनी बादल की छाँह को। टिकाऊपन केवल परिश्रम के उपार्जन में है। शरीर और धन उनका पुष्ट रहेगा जो समय को श्रमशीलता के साथ जोड़े रहेंगे। गहरी नींद और कड़ी भूख का आनन्द उन्हें मिलेगा जो मेहनत- मशक्कत से अपने आपको थकाकर चूर करने में उत्साह एवं आनन्द अनुभव करते होंगे।


मन की साधना

साहस के देवता की साधना का दूसरा चरण है, मन की अस्त- व्यस्तता दूर करना। देखा गया है कि कितने ही अनावश्यक विचार मस्तिष्क में घुमड़ते रहते हैं। जिन बातों का अपने से सीधा सम्बन्ध नहीं, उन निरर्थक और अनर्गल बातों को सोचते रहते हैं जिससे चिन्तन की एक बहुत बड़ी शक्ति का महत्त्वपूर्ण अंश यों ही निरर्थक खर्च हो जाता है।

अपना व्यक्तिगत जीवनक्रम कितना अस्त- व्यस्त है और पारिवारिक ढाँचे को सुधारने, बदलने के लिए क्या- क्या किया जाना चाहिए? जिन कारणों ने अपने प्रगति पथ को अवरुद्ध कर रखा है, उन्हें कैसे व्यवस्थित किया जाय? यदि इन प्रश्नों पर हम अपनी शक्ति को लगायें, जीवन जीने की कला, समस्याआें के समाधान तथा उत्कर्ष की दिशा में होने वाले प्रयोगों एवं अनुभवों को पढ़ें, सुनें, समझें, उन पर चिन्तन करें तो हमारा मस्तिष्क हमारे लिए कल्पवृक्ष का काम कर सकता है। पर उसका अधिकांश भाग तो अनर्गल चिन्तन में ही नष्ट हो जाता है

तृष्णा, वासना, लोभ- मोह, शौक- मौज, द्वेष, दुर्गुणों के द्वारा उत्पन्न की हुई इतनी ज्यादा गुत्थियाँ सामने होती हैं कि उनका हल ढूँढ़ना ही मस्तिष्कीय विचारणा के लिए कठिन पड़ता है। एेसी दशा में बौद्धिक चेतना की ज्ञानवृद्धि एवं सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्द्धन में कैसे लगा जाय? इसी कुचक्र में पड़े हुए हम अपनी मानसिक क्षमताआें को नष्ट- भ्रष्ट करते रहते हैं और खाली हाथ इस संसार से उठ जाते हैं। यदि इस कुचक्र को तोड़ने की मनस्विता का परिचय दिया जा सके तो समझना चाहिए कि हमने साहस के देवता की पूजा का दूसरा चरण पूरा कर लिया।

परमार्थ का दुस्साहस

साहस के देवता की पूजा का अन्तिम एवं उत्कृष्ट चरण है अपने संकीर्ण स्वार्थों की परिधि से बाहर निकलकर परमार्थ के पुण्य- प्रयोजनों में अपनी विचारणा एवं उपलब्धियों को नियोजित कर सकना। व्यक्ति वस्तुतः तुच्छ है या महान्? उसकी परीक्षा एक ही कसौटी पर होती है कि उसने अपनी प्रतिभा का लाभ अपने या अपने स्त्री- बच्चों के लिए सुरक्षित रखा अथवा ईश्वर प्रदत्त इन विभूतियों को ईश्वरीय प्रयोजन के लिए, लोकमंगल के लिए लगाने का दुस्साहस कर डाला। दुस्साहस शब्द का प्रयोग इसलिए किया जा रहा है कि इन दिनों लोगों की मनोदृष्टि बेतरह स्वार्थपरता में जकड़ी हुई है। हर कोई केवल अपनी संकीर्ण स्वार्थपरता की पूर्ति में ही संलग्न है। धन, रूप, यश, भोग और पद से अधिक और किसी को कुछ नहीं चाहिए। पूजा- पाठ की आड़ में भी इन भौतिक प्रयोजन की पूर्ति ही छिपी रहती है। राम- रहीम का पल्ला भी इसीलिए पकड़ा जाता है कि सांसारिक सुख- साधनों का वह लाभ मिल जाय जो अपने पुरुषार्थ से प्राप्त नहीं किया जा सका। एेसे जमाने में जिसमें तृष्णा और वासना की पूर्ति से आगे की बात किसी को सुहाती ही नहीं- इस प्रकार का साहस दिखा सकना, जिसमें अपने लिए असुविधा और दूसरों के लिए सुविधा उत्पन्न होती हो, निस्सन्देह बहुत बड़ी हिम्मत का काम है। एेसे साहस का उच्चारण ही नहीं, प्रयोग जो कर सके उन्हें धारा का प्रवाह चीरते हुए उल्टी दिशा में चल सकने वाले राजा की तरह ही प्रबल पुरुषार्थी माना जायेगा।

प्राचीनकाल में ऐसे नर- रत्न घर- घर में पाये जाते थे, जो तुच्छ स्वार्थों को कुचलकर आदर्शवादिता के लिए अपना जीवन क्रम सँजोयें, पर आज तो वह इतिहास, पुराणों की चर्चा रह गई है। एक- दूसरे को बहकाने के लिए इस तरह की लम्बी- चौड़ी कथा, चर्चा परस्पर करते तो देखे- सुने जाते हैं, पर जो व्यवहार में भी उन सिद्धान्तों को ला सकें, दीख नहीं पड़ते। स्वार्थपरता और संकीर्णता की कीचड़ में जहाँ कीड़े कुलबुला रहे हैं, वहाँ कमल पुष्पों का खिलना एक अचरज ही कहा जायेगा। एेसा अचरज केवल साहसी और दुस्साहसी कर सकते हैं।

(वाङ्मय खंड- मनस्विता, प्रखरता और तेजस्विता,

पृष्ठ 10.15-16 से संकलित- सम्पादित)







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ABHIMANYU singh parihar sheopur
2015-02-04 16:26:45
ःःंंःंऐसे ही उत्कृष्ट विचार आज की जरूरत है।
dr.gajendra singh narwaria
2014-11-26 13:41:49
uttam
yashpal
2014-11-20 15:44:07
kuch or acche vihar ho to....
santosh pachpute
2014-11-17 17:18:26
nice...
Radhakant
2014-11-13 09:01:58
very good thinking .
Vinod madankar
2014-11-09 19:48:21
ःःंंःंऐसे ही उत्कृष्ट विचार आज की जरूरत है।


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