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‘सत्यमेव जयते’ की तरह ही ‘श्रम एव जयते’ के सूत्र को भी महत्त्व देना होगा

राष्ट्र को महान बनाने के लिए श्रमशीलता और श्रम के प्रति सम्मान की भावना बढ़ायें

भारत के प्रधानमंत्री जी ने देश के विकास के लिए ‘श्रम’ को ‘सत्य’ की तरह महत्त्व और सम्मान देने की अपील की है। ‘श्रम एव जयते’ को ‘सत्यमेव जयते’ की तरह प्रतिष्ठित करने की बात कही है। यह अपील भारतीय ऋषि परम्परा के अनुरूप है। श्रम की उपेक्षा वे ही करते हैं जो जीवन के ‘सत्य’ को समझ नहीं पाते। जो ‘सत्य’ को समझते हैं वे ‘श्रम’ को अनिवार्य और मनुष्य की गरिमा को बढ़ाने वाला मानते हैं। उक्त दोनों ही सूत्रों के साथ न्याय बरतने की दृष्टि से ही यह आलेख प्रस्तुत किया जा रहा है।

सत्, चित, आनन्द

हमारी संस्कृति में ईश्वर को सच्चिदानन्द (सत+चित्+आनंद) स्वरूप कहा गया है। सत् अर्थात् जो वास्तव में है, श्रेष्ठ है, सदैव है। चित् का अर्थ होता है चेतन, ऊर्जावान, सक्रिय। इन दोनों गुणों को अंगीकार करने से ही ‘आनंद’ की प्राप्ति संभव होती है। लौकिक तथा पारलौकिक दोनों प्रकार के जीवन में सफलता इन्हीं के माध्यम से प्राप्त होती है। जीवन समर में वही जीतता है।

सत्यमेव जयते

सत्- सद् को समझने वाला ही जीवन के सही आधारों को मान्यता देते हुए आगे बढ़ता और लक्ष्य तक पहुँचता है। सत्य से विरत व्यक्ति भ्रम में सही को गलत और गलत को सही मानकर गलत आधारों को मान्यता देते हुए आगे बढ़ता है और मृग- मरीचिकाओं के आकर्षण में भाग- भागकर जीवन गँवा देता है तथा अंत में हताशा और पश्चात्ताप का शिकार हो जाता है।

विडम्बना यह है कि आजकल अधिकांश व्यक्ति उक्त सूत्र को सिद्धांततः सही मानते हुए भी व्यवहारतः ठीक नहीं मानते। सत्य की साधना की जगह सत्य का प्रदर्शन भर पर्याप्त मानकर अपना काम चलाना चाहते हैं। सत्य को, ईमानदारी को नियम (रूल) नहीं, नीति (पॉलिसी) भर मानते हैं। ऐसे लोग ‘सत्यमेव जयते’ के सूत्र पर विश्वास नहीं करते।

सत्य की समझ भी अधिकांश व्यक्तियों को नहीं होती। वे सत्य समझने की जगह अपनी मान्यता को ही ‘सत्य’ सिद्ध करने के लिए जी- तोड़ प्रयास करते रहते हैं। सत्य को समझने और अपनाने के लिए विवेक और साहस दोनों को निखारना पड़ता है।

युगऋषि ने प्रज्ञापुराण- दूसरे खण्ड में सत्य का यथार्थ समझाते हुए लिखा है कि सत्य शब्दों तक सीमित नहीं होता, वह भावों से, उद्देश्यों से सिद्ध होता है। उदाहरण से समझें :-

दो ठग किसी व्यक्ति के मित्र बन जायें। समय पाकर एक ठग उसका बटुआ उठाकर साथी ठग की जेब में डाल दे। वह व्यक्ति पूछे- मेरा बटुआ कहाँ है? पहला ठग कसम खाकर कहे- ‘‘मेरे पास नहीं है।’’ दूसरा ठग कहे- ‘‘मैंने तो छुआ ही नहीं है।’’ शब्दों की दृष्टि से दोनों सत्य भाषण कर रहे हैं, किन्तु दोनों का उद्देश्य उस व्यक्ति को ठगना है। वे दोनों जानते हैं कि बटुआ उन्हीं की मिली- जुली साजिश से चुराया गया है। शब्दों के जाल में उसे उलझाकर वे सत्य का पालन नहीं करते, सत्य का गला ही घौंटते हैं।

इसके विपरीत डॉ. मरीज का मनोबल बढ़ाने के लिए होने वाले आपरेशन को सामान्य- सहज बताता है अथवा अभिभावक एक जिद्दी बच्चे को शान्त करने के लिए उसको बातों में बहला देते हैं तो उनके शब्द भले ही सच नहीं, किन्तु उनकी नियत, उनके उद्देश्य सत् होने के कारण वे सत्य के साधक ही कहे जायेंगे।

अस्तु ‘सत्यमेव जयते’ को जीवन में प्रतिष्ठित करना है तो सत्य के बोध का सद्विवेक तथा उसे जीवन में अपनाने का सद्साहस जाग्रत् करना होगा। जो जीवन के सत्य को समझेगा, वह ही श्रम के महत्त्व और गौरव को भी समझ सकेगा। अन्यथा सत्य और श्रम दोनों का प्रदर्शन भर करके किनारा कर लेगा।

श्रम एव जयते

जीवन का आधार सत् (सत्य) है तो जीवन का सहज स्वभाव चित्- चेतन है। जड़ निष्क्रिय और चेतन सक्रिय होता है। इस विश्व का गुण चेतनता- सक्रियता है। उपनिषद में विश्व की उत्पत्ति के सम्बन्ध में एक अलंकारिक आख्यान दिया गया है :-

‘‘परमेश्वर ने तप (विश्व- सृजन के उच्च उद्देश्य से पुरुषार्थ) किया। तप से उसे पसीना आया। उस पसीने से ही विश्व की उत्पत्ति हुई।’’ अर्थात् यह जीवन पुरुषार्थ- परिश्रम से ही उपजा है और उसी के माध्यम से सफल होता है। यहाँ परिश्रम को ‘तप’ क्यों कहा गया? इस बात को युगऋषि के विचारों के आधार पर समझें।

श्रम को सार्थक, गरिमामय बनाना है तो उसके लिए श्रम के साधक में तीन प्रवृत्तियाँ होनी ही चाहिए। क्. श्रम के प्रति सम्मान का भाव ख्. श्रम करने की पर्याप्त क्षमता फ्. श्रम की सृजनात्मकता। ‘तप’ शब्द के साथ यह तीनों भाव जुड़े रहते हैं। श्रम को भ्रमवश कोई छोटा भले कह ले, किन्तु ‘तप’ के साथ तो गौरवबोध जुड़ा ही रहता है। ‘तप’ को उद्देश्य सिद्ध होने तक निरंतर चालू रखा जाता है, यह श्रम की क्षमता का बोधक है। तप किसी अच्छे उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया जाता है, इसलिए श्रम की सृजनात्मकता भी उसके साथ जुड़ी होती है। इसीलिए उपनिषद्कार ने श्रम को ‘तप’ के रूप में व्यक्त किया है। श्रम की प्रतिष्ठा करनी है तो हमें भी उसे ‘तप’ के पवित्र और गरिमामय भाव से ही अपनाना होगा।

दुर्भाग्य से आज श्रम को छोटा, गरिमा गिराने वाला कार्य समझा जाने लगा है। हमें यह मान्यता बदलनी होगी। श्रम के प्रति सम्मान का भाव जाग्रत् करना होगा।

श्रम की गरिमा समझें

ईशावास्य उपनिषद् में कहा गया है:- ‘‘कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।’’ कर्म करते हुए हम सौ वर्ष जीने की इच्छा करें। आराम करते हुए, मौज- मजा करते हुए, चैन की वंशी बजाते हुए, सौ वर्ष जीने के लिए क्यों नहीं कहा उपनिषद् के ऋषि ने? इसीलिए कि श्रम के अभाव में आराम, आनंद, यहाँ तक कि सौ वर्ष जीने का अधिकार भी छिन जाता है हम से। श्रम के साथ ही जीवन अपनी महानता और समृद्धियों के परदे खोलता है। जीवन की पूर्णता प्राप्त करनी है तो परिश्रम करना पड़ेगा।

स्वामी विवेकानंद ने कहा है- ‘‘श्रम ही जीवन है। जिस समाज में श्रम को महत्त्व नहीं मिलता, वह जल्द ही नष्ट हो जाता है।’’

अमेरिका के धनकुबेर हैनरी फोर्ड ने लिखा है- ‘‘हमारा काम हमें जीने के साधन ही प्रदान नहीं करता वरन स्वयं जीवन प्रदान करता है।’’

पं. नेहरू ने अपनी आत्मकथा में एक स्थान पर लिखा है- ‘‘काम के भार से ही मैं अपने शरीर और मस्तिष्क की स्फूर्ति तथा क्षमता कायम रख पाता हूँ।’’

हमारा काम ही हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। जीवन में महान संभावनाओं के द्वार खोलता है। श्रम ही उन्नत जीवन और उज्ज्वल भविष्य का ठोस आधार है। बार्टन ने लिखा है- ‘‘श्रम एक शक्तिशाली चुंबक है जो श्रेष्ठताओं को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है।’’

कई लोग यह कहते हैं कि हमने अमुक श्रम किया तो हमें क्या मिला? इसका उत्तर यह है कि यदि श्रम को साधना के भाव से किया जाये तो वह मनुष्य को बहुत कुछ देता है।

श्रम ही आनंद और प्रसन्नता का जनक है। डॉ. विश्वेश्वरैया ने कहा है- ‘‘श्रम से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य प्राप्त होता है और उससे संतोष एवं प्रसन्नता।’’ श्रम का अर्थ है- आनंद और अकर्मण्यता का अर्थ है- दुःख, परेशानी। श्रमशील व्यक्ति ही अधिक संतुष्ट और आनंदित रह सकता है। इसके विपरीत अकर्मण्यता मनुष्य को बुराइयों तथा नीरसता की ओर ले जाती है।

जो व्यक्ति श्रम की गरिमा को समझेगा वही श्रमनिष्ठ बनेगा और श्रम देवता के अद्भुत अनुदान प्राप्त करेगा।

श्रम के अनुदान

श्रम करने वालों को जीवन के कुछ अति मूल्यवान अनुदान सहज ही मिल जाते हैं। जैसे-

स्वस्थ शरीर श्रमशीलों को ही स्वस्थ और निरोगी देखा जाता है। श्रम से जी चुराने वाले तो तमाम चिकित्सकों और दवाओं का सहारा लेकर भी रोगों के शिकार बने रहते हैं। स्वस्थ- निरोग रहने के लिए श्रम जरूरी है। वह चाहे उत्पादक श्रम के रूप में किया जाय, चाहे व्यायाम के रूप में अथवा पैसे देकर फिजियोथैरेपिस्ट द्वारा कराया जाय। रोगों को दूर करने तथा आरोग्य लाभ देने के मोर्चे पर श्रम ही जीतता है।

विश्राम का सुख यह सुख वास्तव में श्रम से थकने वाले को ही मिलता है। श्रम की थकान के बिना, मोटे गद्दों पर वातानुकूलित कमरे में भी लोगों की नींद उचटी- उखड़ी सी रहती है। बहुतों को तो नींद की गोली खाकर बनावटी नींद लेनी पड़ती है। दूसरी ओर श्रमशील व्यक्ति कहीं भी पैर पसार कर लेटते ही गहरी नींद का सुख प्राप्त करता है। जब उठता है तो पूरी तरह तरोताजा, स्फूर्ति से भरा होता है।

भोजन का सुख भोजन का भी सही सुख उसे मिलता है जिसे कड़ी भूख लगती है। कड़ी भूख का भी संबंध कड़ी मेहनत से होता है। अधकच्ची भूख में लोग स्वाद पैदा करने के लिए न जाने क्या- क्या टंट- घंट करते हैं, किन्तु उन्हें भोजन से वह सुख- संतुष्टि नहीं ही मिल पाती जो कड़ी भूख वालों को सामान्य आहार से भी मिल जाती है।

संतोष और आनंद की प्राप्ति श्रमशील को होने की बात महापुरुषों के जीवन प्रसंगों में पहले स्पष्ट की जा चुकी है। अस्तु श्रम को साधना मानकर करने वाले व्यक्ति इन सभी अनुदानों को सहज ही प्राप्त कर लेते हैं।

श्रम से निखरती है प्रतिभा

बहुधा बुद्धिजीवी- प्रतिभाशाली व्यक्ति शारीरिक श्रम में समय न गँवाकर अपने विशेष कार्यों को ही प्राथमिकता देते हैं। किन्तु जीवन का सत्य समझने वाले प्रबुद्धजन भी शारीरिक श्रम के द्वारा अपनी शारीरिक एवं मानसिक क्षमता को विकसित करते औैर निखरते हैं। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर प्राचीन काल में राजा- रहीसों के बच्चे भी ज्ञान के साथ श्रम- साधना भी करते थे।

रूस के संत, सुधारक, साहित्यकार श्री लियो टॉल्सटाय ने भी इस सत्य का अनुभव किया और लिखा है। पहले वे ४० साल तक केवल लेखन कार्य पर ही ध्यान केन्द्रित करते थे। बाद में उन्होंने श्रम का महत्त्व समझा औैर उसका अनुभव किया, तब उन्होंने लिखा कि जितना लेखन कार्य मैंने ४० वर्ष में किया, श्रम से निखरी प्रतिभा के नाते उतना कार्य बड़ी सहजता से १४ वर्ष में किया जा सकता था।

कबीर बुनकर थे, रैदास चर्मकार का काम करते थे, नन्दा नाई थे, नामदेव दर्जी का काम करते थे। श्योनाक सफाई का काम करते थे, रैक्ये ऋषि गाड़ी में सामान ढोते थे। इन श्रमपरक कार्यो से उनकी गरिमा गिरी नहीं बल्कि प्रतिभा निखरी तथा प्रतिष्ठा बढ़ी। फिर श्रमपरक कार्यों से हमारी प्रतिष्ठा क्यों गिरेगी?

भगवान कृष्ण ने इसी तथ्य को समझाते हुए लोगों को स्वधर्म की शिक्षा दी और कहा कि अपना- अपना कर्म करते हुए प्रत्येक व्यक्ति मोक्ष का अधिकारी है, चाहे वह कोई भी क्यों न हो। इतना ही नहीं, इस कर्म- धर्म की, श्रम की प्रतिष्ठा के लिए उन्होंने अपने जीवन में सब कर्म किए। ग्वाला बनकर गाय चराईं। गोबर के उपयोग का आंदोलन चलाया। सारथी बनकर रथ हाँका। जमीन साफ की। झूँठी पत्तलें उठाईं। अतिथियों के पैर भी धोए और गीता का महान उपदेश भी दिया। शांतिदूत बनकर कौरवों- पांडवों के बीच संधि कराने का प्रयत्न किया, तो योद्धा बनकर लड़े भी। गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए योगी भी बने रहे।

भगवान श्रीकृष्ण के इस मार्ग का अनुसरण करके महात्मा गाँधी, लोकमान्य तिलक, संत विनोबा भावे, परम पूज्य गुरुदेव आदि महान बने तो हमें उस मार्ग को अपनाने में संकोच क्यों होना चाहिए?

श्रम का संतुलन

श्रम में शारीरिक के साथ मानसिक श्रम को, शारीरिक तत्परता के साथ मनोयोग को भी जोड़कर रखना चाहिए। इनके संतुलन से ही श्रम का संतुलन बनता है। शारीरिक श्रम करने वाले बहुधा मानसिक श्रम से बचते हैं, इसलिए उन्हें मूर्ख, गँवार जैसे शब्दों से संबोधित किया जाता है। पढ़े- लिखे लोग शारीरिक श्रम के अभाव में दुर्बल, रोगी जैसी स्थिति में रहते हैं। मानसिक कमजोरी के कारण श्रमिक खेत में उन्नत फसल तथा फैक्ट्रियों में श्रेष्ठ उत्पादन करने में सफल नहीं होते। उन्हें मानसिक विकास के अवसर दिए जाने चाहिए। इसी प्रकार मानसिक श्रम करने वालों को संकल्पपूर्वक शारीरिक श्रम के कार्यों को अपनाना चाहिए।

युगऋषि ने लिखा है ‘‘संतुलित श्रमनिष्ठा का महत्त्व भी समझा जाय। हमारा जीवन पक्षाघात के रोगी की तरह न रहे। चिंतन एवं क्रियाशीलता दोनों को ही उत्तरोत्तर विकसित करने की रुचि जगाई जा सके तो होने वाले परिणामों को देखकर चमत्कृत होना पड़ेगा। समूचे व्यक्तित्व का कायाकल्प हो सकेगा।’’

संभवतः इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखकर एमर्जेंसी के समय यह वाक्य जगह- जगह लिखा गया था- ‘‘कड़ी मेहनत, दूरदृष्टि, पक्का इरादा, अनुशासन।’’ यह सूत्र श्रम की प्रतिष्ठा की दृष्टि से आज भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। युगऋषि का कथन है कि ‘‘श्रम की समग्रता एवं संतुलन के अलौकिक रहस्य को समझें और आचरण में लायें तो हम स्वयं को समाज की अग्रिम पंक्ति में पायेंगे। यह एक प्रकार की जीवन साधना और प्रत्यक्ष फल देने वाली चमत्कारी विद्या है।’’







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