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गुरुदेव की गीता सुनें, मोहग्रस्त न रहें

[Shantikunj,Pracharatmak],
भगवान कृष्ण को ज्ञान का और अर्जुन को कर्म का प्रतीक माना गया है। महाभारत में भगवान ने गीता का ज्ञान देकर उद्बोधन किया, अर्जुन ने गांडीव उठाकर युद्ध आरंभ कर दिया। ज्ञान और कर्म के सम्मिश्रण से धर्म की विजय हो सकी।

केवल ज्ञान पंगु के समान है और केवल कर्म अंधे के समान। अंधे और पंगु के मिलकर गहरी नदी पार करने की कथा प्रसिद्ध है। यदि अंधे ने पंगे को अपने कंधे पर न बिठाया होता और पंगे ने अंधे का मार्गदर्शन न किया होता तो दोनों ही निकम्मे बने नदी के किनारे पर बैठे रहते और उन्हें नदी पार कर लेने के अभीष्ट उद्देश्य में सफलता न मिली होती।

धर्म और अध्यात्म की उच्च दार्शनिक विचारधारा बहुत ही श्रेष्ठ और प्रशंसनीय है, पर केवल उस तथाकथित ज्ञान तक सीमित रह जाने से काम नहीं चल सकता। यदि गीता, रामायण, भागवत आदि का पाठ करते रहा जाय, कथा- प्रवचन सुनते रहा जाय, इतने मात्र से कोई कहने लायक प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता। कथा सुनने या अमुक पुस्तक का पाठ करने मात्र से जो लोग आत्मिक प्रगति की आशा लगाए बैठे हैं वे भ्रम में हैं। ज्ञान की सार्थकता तभी है जब वह कर्मरूप में परिणत हो सके। यदि वह सुनने- समझने तक ही सीमित रह गया तो उस ज्ञान को नपुंसक, निष्प्राण कहा जायेगा।

सद्ज्ञान की सार्थकता तभी है जब सत्कर्मों का रूप धारण करे। ज्ञान उपलब्ध हुआ या नहीं, इसकी परख इसी प्रकार की जा सकती है कि उसे इतनी गहराई तक हृदयंगम किया गया कि नहीं कि वह मान्यताएँ व्यवहार में उतर सकें। यों जानकारी के रूप में तो न जाने कितनी पुस्तकें, पत्रिकाएँ हम पढ़ते रहते हैं। मनोरंजन एवं समयक्षेप करके उन्हें एक कोने में रख देते हैं। उनसे ज्ञानवान बनने का लाभ किसे मिलता है? ज्ञान की दृष्टि से जो कुछ जाना गया है वह इतना प्रबल भी होना चाहिए कि उसे कार्यान्वित किये बिना रहा ही न जा सके। जीवन संघर्ष में पग- पग पर चलते हुए जो बाधाएँ आती हैं उनसे लड़ने के लिए जो काम आ सके, हथियार का काम दे सके, उसी को सच्चा ज्ञान मानना चाहिए।

अर्जुन बनें, मोहग्रस्तता से उबरें

युग की आवश्यकता को पूरा करने के लिए भगवान ने महाभारत रचा था और उसमें जो कृष्ण के सच्चे भक्त थे उन्होंने आगे बढ़कर भाग लिया था। अर्जुन संघर्ष से बचकर पूजापाठ जैसा सरल अवलम्बन पकड़कर काम चलाना चाहते थे, पर भगवान ने उन्हें वैसा करने नहीं दिया। क्योंकि जब मुहल्ले में अग्निकाण्ड हो रहा हो, घर के छप्पर जलते चले आ रहे हों, तब कौन ऐसा होगा जो उसे बुझाने की बजाय एकान्त में जाकर आसन- प्राणायाम की बात सोचें। कोई समय ऐसे भी होते हैं जब मनुष्य को कठिन कर्तव्य में संलग्न होना योग- समाधि से भी अधिक श्रेयस्कर होता है। जिन दिनों गीता कही गयी थी, उन दिनों इसी प्रकार की परिस्थिति थी। भगवान के सभी भक्तों को युग परिवर्तन का उद्देश्य पूरा करने के लिए किसी न किसी रूप में महाभारत में संलग्न होना पड़ा था।

आज ठीक वैसी ही परिस्थितियाँ हैं। आज गीता प्रवचन की बिलकुल वैसी ही आवश्यकता है, जैसी उन दिनों थी। आज मोहग्रस्त अर्जुन की स्थिति में भारतीय समाज अगणित कुण्ठाओं से ग्रस्त निष्प्राण जैसा बना पड़ा है। उसमें नवीन शक्ति अनुप्राणित करने की आवश्यकता है।

युग निर्माण आन्दोलन का प्रयोजन एक ही है कि अध्यात्म ज्ञान का प्रकाश जिन तक पहुँचे वे अपनी परिस्थितियों के अनुसार उसे कार्यरूप में परिणत करना आरंभ कर दें। व्यक्तियों की परिस्थितियाँ और योग्यताएँ विभिन्न प्रकार की होती हैं, इसलिए युग निर्माण आन्दोलन की पृष्ठभूमि में शतसूत्री कार्यक्रमों का विधान है। इस योजना में इसकी पूरी- पूरी गुंजायश है कि न्यूनतम प्रतिभा एवं हीनतम परिस्थितियों का व्यक्ति भी अपने सद्भाव को सत्कार्य में परिणत करते हुए युग निर्माण की भूमिका में किसी न किसी प्रकार भाग ले सके।

महाभारत युद्ध में शस्त्र चलाना ही एकमात्र काम न था। सेना के लिए भोजन बनाने से लेकर घायलों की चिकित्सा करने तक, घोड़ों को घास डालने से लेकर दैनिक गंदगी साफ करने तक अगणित कार्य थे और विभिन्न परिस्थितियों के सैनिक अपने- अपने ढंग से उन कार्यों को पूरा करते हुए योद्धाओं का कर्तव्य ही पूरा कर रहे थे। वर्तमान महाभारत में भी हममें से प्रत्येक व्यक्ति कुछ न कुछ कार्य कर सके उस दृष्टि से युग निर्माण योजना बनाई गयी है, जिसमें गिलहरी से लेकर वानरों तक के लिए समुचित कार्यक्रम मौजूद हैं।

आज का युगधर्म

असंयम और अनियमितताओं के कारण हमारा सार्वजनिक स्वास्थ्य बुरी तरह गिरता जा रहा है। व्यक्तिवादी स्वार्थ और संकीर्णताओं से भरी लालची दृष्टि हमारे राष्ट्रीय चरित्र में घुन की तरह लगी हुई है। चोर से लेकर संत तक हर कोई अपने व्यक्तिगत स्वार्थों की सिद्धि में ही सब कुछ मानकर उसी में निमग्न हो रहा है, जनहित के कार्यों में किसी को कोई रुचि नहीं। आलस्य से शारीरिक क्षमता और प्रमाद से मानसिक योग्यताओं का सत्यानाश होता रहता है।
हमारे दैनिक अभ्यास में सफाई, मधुरता, शिष्टाचार, सहिष्णुता, सज्जनता, नागरिकता जैसे मनोवांछित गुणों की कितनी कमी हो रही है यह किसी से छिपा नहीं है। विलासिता, आडंबर, फैशनपरस्ती, व्यसन- नशेबाजी आदि भौंडे कार्यों में कितना धन और समय बर्बाद होता है, उसे कौन नहीं जानता? नैतिक मर्यादाओं का उल्लंघन करने की उच्छृंखलता एवं अपराध करने की प्रवृत्ति बढ़ते- बढ़ते सार्वजनिक जीवन में संकट का रूप धारण कर रही है। चोरी, डकैती, ठगी, रिश्वत, जुआ आदि अर्थ प्रयोजनों के लिए होने वाले दुष्कर्मों की तो बाढ़- सी आ रही है। कामुकता की अभिवृद्धि गंदे साहित्य, गंदे चित्र और गंदे गीत के रूप में देखी जा सकती है। पत्नीव्रत धर्म और पतिव्रत धर्म की कड़ियाँ जिस प्रकार शिथिल होती जा रही हैं, यह हमारे भविष्य के अंधकारमय बनने के लिए कम भयावह नहीं हैं।

सामाजिक कुरीतियों का वीभत्स तांडव नृत्य अलग ही चल रहा है। धर्म के नाम पर साधु- ब्राह्मणों ने लूट- खसोट मचा रखी है। भिक्षुओं की बाढ़ जिस आँधी- तूफान की तरह बढ़ी है उसका भार वहन करने में जनता के कंधे टूटने लगे हैं। जन साधारण में उन सद्भावों की उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता की दिन- दिन कमी होती चली जा रही है जिनके कारण मनुष्य को महापुरुष बनने का और समाज को गौरवान्वित होने का अवसर मिलता है।
भगवान कृष्ण के सामने भी ऐसी ही विषम परिस्थितियाँ थीं। उन्होंने युद्ध के रूप में महाभारत खड़ा किया था। आज की परिस्थितियों में मनुष्य के बीच शस्त्रों द्वारा होने वाले युद्ध की आवश्यकता नहीं पर यह अनिवार्य हो गया है कि वर्तमान विषमताओं और विकृतियों से जूझा जाये और उन्हें परास्त कर उनके स्थान पर सतयुगी मान्यताओं एवं परिस्थितियों की प्रतिष्ठापना की जाये।

अब बारी हमारी है

धर्मराज्य की, रामराज्य की स्थापना हमारा उद्देश्य है। इसके लिए धर्म और असुरता के जूझना ही पड़ेगा। गीता यही सिखाती है। समय की यही पुकार है। अर्जुन को जो करना पड़ा था, वही हमें भी करना पड़ेगा। उसके बिना नैतिक एवं सामाजिक उत्थान हो नहीं सकेगा। उज्ज्वल भविष्य का निर्माण तो स्वयं ही करना होगा और उसके लिए रचनात्मक संघर्षों में उसी त्याग, बलिदान की भावना से संलग्न होना होगा, जिसमें कि युद्ध में संलग्न होने वाले अपने तन, मन, धन का मोह त्यागकर संलग्न होते हैं।

गीता प्रवचन का लाभ अर्जुन ने उठाया था। उसने भगवान द्वारा दिये गये ज्ञान को अपने कार्यरूप में परिणत करना तत्काल आरंभ कर दिया था। उसने विश्वास पूर्वक कहा था-

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत
स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव॥

‘‘हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और स्मृति भी मैंने प्राप्त कर ली है। अब मैं संदेहों से मुक्त होकर स्थित हूँ। अब मैं आपका कहना करूँगा।’’
इसी प्रकार हमें भी युग के अवतार- प्रज्ञावतार के वचनों को कार्यरूप में परिणत करने के लिए कटिबद्ध होना चाहिए। समाज के नवनिर्माण के लिए अपनी क्षमताओं का अधिकाधिक अंश प्रयुक्त करना चाहिए। भगवान ने गीता का ज्ञान अर्जुन को कर्म में परिणत कराने के लिए दिया था। अर्जुन ने उसी रूप में उसे शिरोधार्य भी किया था। अब हमारी बारी है कि हम अपने युगधर्म को समझें, योजना बनायें और वर्तमान युग के अत्यंत महत्त्वपूर्ण महाभारत ‘युग निर्माण आन्दोलन’ में अपना समुचित योगदान देते हुए मानव जीवन को सार्थक बनायें।
वाङ्मय खंड- संस्कृति श्रीमद्भागवत् एवं गीता, पृष्ठ १.१७५ से संकलित, संपादित







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chunaramanju
2015-05-02 12:14:52
We enlighten person sud devote time, resource,Contactual image in public, s taste refinement. It, s need of hour not deniable by awakened souls.
Chandrakant Vishwakarma
2015-01-26 21:48:11
guide line for living life- Jai Gurudev
Shubham chandrakar
2015-01-10 03:19:52
Gita guide us art of living, it helps us every moment of our life when we are happy or we are sad......
anuradha
2015-01-08 11:51:11
inspiring, heart touching...jai gurudev
Nikunj Agarwal
2015-01-07 07:36:02
Guiding and inspiring
Ravishankar Maharaj
2014-12-29 16:38:05
prakash ki puja me itni tanmayta honi chahiye ki andhakar ki taraf dhyan dene ka avkash hi n mile.
surendra singh tomar
2014-12-29 11:10:16
Must read and followed concept of ppg
devik darji
2014-12-22 21:50:40
Ha ram ha ram
Ram Kalyan Meena
2014-12-19 11:40:17
Sachmuch hi yah Yug Parivartan ki Mahabela he! Rishi-Yugma ke aashirwad se mujme Sahas ka sanchar ho raha he! Apni patrata viksit karne, paristhithiyo se talmel bhithakar adhiktam ANSHDAN avam SAMAYDAN karunga. Muj par Gurudev avam Mataji ke anudano ki varsha hoti rahti he.
Manharsuthar
2014-12-16 04:13:04
" Gita " sabda j bataavechhe tyaag. Gita Gita aem satta. Bolanese. Aage Jate. Tyaag tyag ho jayega. Isaka. Matalab hai ki aap tyag ki BHAVnaaye ae. Rakhe.
rajendra kr dwivedi
2014-12-15 12:09:38
geeta hame sahi mayne insaan banana sikhati hai
shiv shanker
2014-12-13 13:09:42
Geeta k sandesh aaj bhi prasangik hai..
topesh sharma
2014-12-11 20:29:30
Mahabharat.....
mahesh patil
2014-12-09 17:13:24
Sabka jeevan ujjwal bane,sabko sadghyan mile yahi sandesh hai
Babalu Vikas chaudhary
2014-12-07 19:10:52
i,u,we & they are proud on this mission
shiv shanker
2014-12-06 13:26:42
By adopting this we may be able to change our society.This is time every person must follow the teachings of Gurudev
Gaurav Kapil
2014-12-05 15:09:12
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2014-11-30 10:37:34
Mera bharat mahaan....


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