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सावित्री साधना से जुड़ी समूह साधना के पूरक बने हैं संगठन साधना सत्र

सत्रों के सफल प्रयोगों से उभरे उत्साह और कौशल के सद्परिणाम दिखने लगे हैं

भारतीय संस्कृति में साधना से सिद्धि के सिद्धान्त को हमेशा से महत्त्व दिया जाता रहा है। इसीलिए जीवन को साधना प्रधान बनाकर जीने वाले मनीषियों- महामानवों का यहाँ बोलबाला रहा है। युगऋषि ने भी ‘साधना से सिद्धि’ के सिद्धान्त को अपने जीवन और अपने युग निर्माण आन्दोलन में बहुत महत्त्व दिया है। हम सब ईश्वरी योजना से जुड़े हैं। जिसकी योजना होती है, वही उसके अनुशासनों का निर्धारण करता है और वही संसाधनों की व्यवस्था करता है। इसका सीधा अर्थ यह होता है कि हमें ईश्वरीय अनुशासन में चलने का अभ्यास करना होगा।

हमारी साधना : हमारी साधना का मुख्य आधार है ईश्वरीय अनुशासन के अनुरूप अपने चिन्तन- चरित्र और व्यवहार को ढालते रहना। जो काम हमें सौंपे गये हैं उनका मुख्य उद्देश्य हमारे व्यक्तित्व को पहले से बेहतर बनाना है।

हमारी सिद्धि : जैसे- जैसे हमारा व्यक्तित्व बेहतर बनेगा, वैसे ही वैसे हमारा कौशल भी निखरेगा और ईश्वरीय अनुदानों की व्यवस्था भी बनेगी। उक्त दोनों के संयोग से हमारे अगले चरण के कार्य सफल सिद्ध होने लगेंगे। हमारी सिद्धि का यही स्वरूप वाञ्छनीय है। चमत्कार दिखाने वाली सिद्धियाँ तो मनुष्य के अहंकार को बढ़ा देती हैं और ईश्वरीय मार्ग से भटका देती हैं।

उक्त आधार पर यह बात स्वयं सिद्ध हो जाती है कि जैसे- जैसे हमारी साधना पुष्ट होगी, वैसे ही वैसे इस दैवी अभियान के अन्तर्गत हमारे हिस्से में आने वाले कार्य सिद्ध होने लगेंगे। इसलिए हमें युगऋषि द्वारा निर्धारित साधनाओं के प्रकाश में अपनी आत्मसमीक्षा करते हुए तद्नुसार आत्म- शोधन, निर्माण और विकास के क्रम बनाने और अपनाने होंगे।

युग निर्माण अभियान के अन्तर्गत युगऋषि ने हमें दो तरह की साधनाएँ करने के लिए प्रेरित किया है। १. व्यक्तित्व परिष्कार- आत्म कल्याण के लिए तथा २. जनमानस के परिष्कार- लोक कल्याण के लिए। इन्हें उन्होंने क्रमशः गायत्री और सावित्री साधना कहा है। अभियान की सफलता के लिए हमें इन दोनों तरह की साधनाओं का स्तर क्रमशः बढ़ाते रहना होगा।

गायत्री और सावित्री साधना

गायत्री और सावित्री एक- दूसरे की पूरक धाराएँ हैं। उनका स्वरूप और महत्त्व समझकर ही हम अपनी साधनाओं को बेहतर बना सकते हैं। युगऋषि ने ‘सावित्री, कुण्डलिनी एवं तंत्र’ नामक वाङ्मय में इसे स्पष्ट करते हुए लिखा है-

व्यक्तिगत जीवन के दोष- दुर्गुणों, संचित कुसंस्कारों का निवारण करने के लिए, व्यक्तिगत मेधा, प्रज्ञा- प्रतिभा, श्रद्धा बढ़ाने के लिए वेदमाता गायत्री की उपासना की जाती है। इससे मनुष्य का चिन्तन, चरित्र और व्यवहार परिष्कृत होता है। इसलिए उसे देवमाता भी कहा गया है। सावित्री विश्वमाता है। उसका प्रभाव व्यक्ति विशेष तक सीमित न रहकर विश्वव्यापी पड़ता है। जनमानस का परिष्कार, लोककल्याण, वायुमण्डल की शुद्धि, वातावरण की परिष्कृति; यह सब सावित्री शक्ति के प्रतिफल हैं। उसमें ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना सन्निहित है।

गायत्री साधना व्यक्तिगत प्रगति के संकल्पों के साथ की जा सकती है और उसे व्यक्तिगत श्रम एवं साधनों से ही सम्पन्न करना होता है। सावित्री साधना के लिए सामूहिक पुरुषार्थ और सामूहिक संसाधनों का प्रयोग करना होता है। उसके लिए प्रत्येक साधक के अन्तःकरण में ‘आत्म कल्याण’ की जगह ‘लोक कल्याण’ के संकल्प ही होने चाहिए। दोनों का अपना- अपना महत्त्व है और दोनों की अपनी- अपनी मर्यादाएँ तथा सावधानियाँ भी हैं। युगऋषि के ही शब्दों में उन्हें समझें -


गायत्री और सावित्री का अन्तर समझने के लिए दीपक और सूर्य का उदाहरण ठीक पड़ता है। दीपक अपने घर में प्रकाश भर देता है। निजी कामकाज के लिए वह पर्याप्त भी है। उसे जलाना सुगम है। कोई बड़ा जोखिम भी नहीं है। तनिक- सी सावधानी से उसका उपयोग सदा- सर्वदा होता रहता है। उसके प्रयोग की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है।

युगऋषि ने स्पष्ट किया है कि सूर्य की बात भिन्न है। उसकी ऊर्जा अनन्त है। उसके लाभ भी बहुत हैं, किन्तु उसके उपयोग के लिए सावधानियाँ भी बहुत बरतनी पड़ती हैं, अन्यथा उससे नुकसान भी बड़े हो सकते हैं। लिखा है-

सूर्य की ऊर्जा से प्राणियों में सक्रियता आती है, पौधे विकसित होते हैं। फलों का बाहुल्य होता है, उसी से बादल बनते और बरसते हैं। सूर्य समुद्र के खारे जल को मेघ बनाकर मीठे जल में परिवर्तित करता है। ऐसे ही कारणों को देखते हुए उसे जगत की आत्मा कहा गया है।  किन्तु उसका उपयोग सरल नहीं है। वह अत्यंत कठिन भी है और जोखिम भरा भी। छोटे से आतिशी शीशे पर सूर्य की किरणें एकत्रित करने भर से आग जल उठती है और उससे भयंकर अग्निकाण्ड हो सकता है।

युगऋषि ने आज की परिस्थितियों के अनुसार दोनों साधनाओं (गायत्री और सावित्री) का संतुलित उपयोग करने के दिशा- निर्देश दिये हैं। व्यक्ति के आध्यात्मिक जीवन की विसंगतियों को दूर करने के लिए गायत्री साधना तथा सामूहिक समस्याओं के निवारण के लिए सावित्री साधना की अनिवार्यता बताई है। इस संदर्भ में उन्होंने लिखा है-

इन दिनों सामूहिक समस्याओं का तो कहना ही क्या? अकेला अणु युद्ध भी निकट से निकटतम आता चला जा रहा है। उसके अतिरिक्त भी पर्यावरण प्रदूषण, जनसंख्या विस्फोट, विकिरण, विषाक्तता की अभिवृद्धि, नित नये- नये रोगों की उत्पत्ति जैसे अनेकानेक कारण हैं जो मनुष्य को, उसकी निवास स्थली पृथ्वी को महाविनाश की चुनौतियाँ दे रहे हैं। इसका सामना करने के लिए सविता- शक्ति का प्रयोग असाधारण रूप से कारगर हो सकता है।

युगऋषि ने स्पष्ट किया है कि सावित्री साधना के प्रयोगों का प्रचलन पूर्वकाल में था। आज के समय में वह लुप्तप्राय हो गया है। उसे पुनः जाग्रत् करके उसका युगानुकूल प्रयोग किया जाना आवश्यक है। युगऋषि ने उसके विभिन्न प्रयोग समय- समय पर किए और कराये हैं। सन् १९५८ में किया गया ‘ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान’ सहित पहला १००८ कुण्डीय गायत्री महायज्ञ, ६२ में अष्टग्रही योग के संदर्भ में सामूहिक प्रयोग, चीन के साथ युद्ध के समय, बंगला देश के युद्ध के समय, स्काई लैब के कुप्रभाव से बचने के लिए सामूहिक साधना, उनकी व्यक्तिगत सूक्ष्मीकरण साधना, सन् १९८८ से २००० तक चलने वाला ‘युगसंधि महापुरश्चरण’ आदि इसी शृंखला के सफल प्रयोग रहे हैं।

बाद में वन्दनीया माताजी के प्रत्यक्ष संरक्षण में हुए संकल्प श्रद्धांजलि समारोह से लेकर आश्वमेधिक शृंखला के अनेक प्रयोग भी सावित्री साधना से ही संबंधित रहे। अब युग सृजन की इस महत्त्वपूर्ण वेला में इस समय की आवश्यकता के अनुरूप कुछ प्रयोग चलाये जा रहे हैं। गतवर्ष के ‘समूह साधना’ प्रयोग तथा इसवर्ष के ‘संगठन साधना सत्र’ भी इसी शृंखला के परस्पर पूरक अंग हैं।

दिशा और स्वरूप

पिछले साल ‘समूह साधना वर्ष’ घोषित किया गया था। परिजनों ने उस दिशा में पर्याप्त तत्परता दिखाई। लोक कल्याण के संकल्प के साथ देश- विदेश की हजारों संगठित इकाइयों ने सामूहिक साधना के लाखों छोटे- बड़े प्रयोग किये। सामूहिक संकल्प का सूत्र रहा- ‘‘हे परमात्मा! हम सबको सद्बुद्धि दें, उज्ज्वल भविष्य के मार्ग पर आगे बढ़ायें।’’ इस भाव के साथ गायत्री मंत्र के साथ ही अपनी- अपनी श्रद्धा के अनुसार इष्ट मंत्रों एवं इष्ट नामों के जप की भी छूट रही।

नैष्ठिक प्रयासों के अनेक लाभ हुए। साधकों, सहयोगियों की संख्या बढ़ने के साथ राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जन- जन में उभरी जागरूकता और लोक कल्याण की प्रवृत्तियों- घटनाओं में वृद्धि भी देखी गयी। उस दिशा में हुए लौकिक प्रयासों की सफलता के पुष्ट आधार इस प्रकार के आध्यात्मिक प्रयोगों से पुष्ट होते रहे। विचारशील व्यक्ति इस तथ्य का अनुभव स्पष्टता से कर रहे हैं। फिर भी आत्मसमीक्षा करने पर पाया गया कि ‘समूह साधना’ के अधिकांश प्रयोग केवल ‘सामूहिक जप- प्रार्थना’ तक ही सीमित रहे। समूह साधना का वह पक्ष ठीक से नहीं उभरा जिसके आधार पर देव शक्तियों के संयोग से ‘दुर्गा’ शक्ति का अवतरण हुआ था। जिसके आधार पर रीछ- बन्दरों का पुरुषार्थ अजेय समझे जाने वाली लंका पर भारी पड़ गया था। जिसके बल पर नन्हे- नन्हे ग्वालबाल अनेक राक्षसों को पराजित करने और गोवर्धन उठाने का श्रेय पा सके।

उक्त सभी प्रयोगों में दिव्य सत्ता का मार्गदर्शन और सहयोग जुड़ा था, यह सच है। लेकिन वह दिव्य सहयोग पाने में उन साधकों की समूह साधना का पुरुषार्थ भी मुख्य आधार बना था। दिव्य सत्ता का सहयोग हमारे अभियान के साथ भी जुड़ा हुआ है। लेकिन हमारी ‘समूह साधना’ अभी इतनी समर्थ नहीं बन पायी है कि युग की चुनौतियों को सहज भाव से पार करते हुए लक्ष्य तक पहुँचे। लाल मशाल वाले ‘युगदुर्गा’ के स्वरूप को साकार कर सके।

पूरक प्रयोग

इस वर्ष अंतःऊर्जा सत्रों के स्थान पर संगठन साधना सत्र चलाये जा रहे हैं। इन सत्रों में शक्तिपीठों और जोन- उपजोनों के वरिष्ठ परिजनों को बुलाया जा रहा है। समूह साधना वर्ष में सामूहिक प्रार्थना के प्रयोग हुए, अब उसके साथ सामूहिक पुरुषार्थ के प्रयोगों को जोड़े जाने की आवश्यकता और उसकी विधि- व्यवस्था उनके अंतःकरण में बिठाने के प्रयास किये जा रहे हैं। उसके बिंदु कुछ इस प्रकार हैं-

सामूहिक प्रार्थना के साथ सामूहिक पुरुषार्थ की भी साधना करनी है। उद्देश्य की पूर्ति के लिए आन्तरिक तड़पन होने पर ही सच्ची प्रार्थना में बल आता है। आन्तरिक तड़पन होने पर जैसे मन की सारी शक्ति प्रार्थना में लग जाती है, वैसे ही उद्देश्यपूर्ति के लिए पूरा पुरुषार्थ झोंक देने की प्रवृत्ति भी पनपती है। यदि प्रार्थना सच्ची है तो पुरुषार्थ उसके साथ स्वतः जुड़ जाता है। सामूहिक पुरुषार्थ बिना समर्थ संगठित तंत्र के संभव नहीं है।

हमारा संगठन सांसारिक परम्परा से नहीं, दिव्य अनुशासन से जुड़ा है। इसे समर्थ बनाने के लिए लौकिक नियमों से अधिक महत्त्व साधना क्रम को देना होगा। हमारा संगठन का आधार परिवारगत आत्मीयता है, उसके बिना केवल संस्थागत नियमों के बलबूते श्रेष्ठ परिणाम नहीं पाये जा सकते।सभी प्रतियोगियों को पूर्व संध्या पर संगठन साधना का संकल्प कराया जाता है। प्रतिदिन सवेरे, दोपहर तथा शाम को सभी प्रतिभागी एक साथ बैठकर सामूहिक ध्यान करते हैं, ताकि सामूहिक मन बने और सामूहिक पुरुषार्थ सधे।

हमने जो पुरुषार्थ अब तक किया है वह सराहनीय भले है, किन्तु पर्याप्त नहीं। कार्य का स्तर बढ़ रहा है, हमें भी अपने पुरुषार्थ का स्तर बढ़ाना ही होगा। सामने जो चुनौतियाँ हैं, वे ही अपनी पात्रता सिद्ध करने के सुअवसर हैं।  हमारी संगठन की रीतिनीति, गुरुवर के अंग- अवयव के नाते हमारे गुण, कर्म, स्वभाव में क्या विशेषताएँ उभरनी चाहिए? उसके लिए क्या क्रम अपनाने हैं?

विभिन्न प्रवृत्ति के व्यक्तियों, संगठन की विभिन्न इकाइयों, आन्दोलनों के विभिन्न समूहों में बेहतर तालमेल कैसे बैठ सकता है तथा उसके सद् परिणाम कैसे प्रकट होंगे?  जो किया है उसके अनुभवों के आदान- प्रदान तथा जो नया करना है उसके संकल्प लेने एवं व्यवस्था बनाने के लिए अनेक टोलियों में समूह चर्चाएँ की जाती हैं।

अपने क्षेत्र का विस्तार करने, परिजनों- समयदानियों की संख्या तथा गुणवत्ता बढ़ाने के लिए प्रचार, प्रशिक्षण और आन्दोलनों का निर्धारण।  संगठन, वित्त व्यवस्था, विविध आन्दोलनों के क्रम में आने वाली कठिनाइयों पर परिचर्चा, समाधान परक मार्गदर्शन तथा सहयोग।  इस प्रकार समय के अनुरूप सावित्री साधना के पूरक प्रयोग के रूप में यह सत्र चल रहे हैं। ११ सत्र पूरे हो चुके हैं। इसी क्रम में सत्र और होने हैं। आवश्यकतानुसार केन्द्र और क्षेत्रों में इस प्रकार के सत्रों का क्रम भविष्य में भी चलाया जाता रहेगा।

सद् परिणाम उभरने लगे

अभी तक जितने सत्र हुए हैं, उनके सद्परिणाम उभरकर सामने आने लगे हैं। जैसे-  शक्तिपीठों तथा जोन- उपजोन की संगठित इकाइयाँ एक ही सेना की विभिन्न टुकड़ियों की तरह तालमेल बिठाकर कार्य करने की स्थिति में आ रही है।

पुराने कार्यकर्त्ता और नये उभरते कार्यकर्त्ता परस्पर बड़े भाई और छोटे भाई की तरह बरताव करने की मनःस्थिति बना रहे हैं। बड़ों का प्यार, अनुभव और प्रोत्साहन छोटों को मिले; छोटों का आदर, पुरुषार्थ और सहयोग बड़ों को उपलब्ध होने के पहले से बेहतर आसार बन रहे हैं।  नये व्यक्तियों को प्रभावित करने, प्रभावितों को सतत सम्पर्क द्वारा संस्कारित और संगठित करके आवश्यक कार्यों में नियोजित करने की व्यवस्था बनने लगी है।

सगंठन का ढाँचा बेहतर बनाने, मंडलों की संख्या और गुणवत्ता बढ़ाने के अच्छे संकल्प उभरे हैं। उनके सक्रिय संगठित समूह (स- ) बनाने के, उन्हें प्रशिक्षण देने के संकल्प पर्याप्त मात्रा में उभरे हैं।  क्षेत्र के युगशिल्पियों को खोजकर, उन्हें तराशकर उनके क्षेत्रों में नियोजन की व्यवस्थाएँ बनी हैं। विभिन्न क्षेत्रों में वहाँ की परिस्थितियों के अनुरूप विविध आन्दोलनों को तीव्रतर गति देने के संकल्प उभरे हैं।







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jitendrakumarverma
2015-05-15 06:00:18
inshan jb haawan hota ha,thb dhrti compan hota haa!!!
shiv shankar
2015-05-02 16:50:49
It is most essential to follow directions from Yugtiarth Shantikunj for welfare of society
chunaramanju
2015-03-07 21:29:00
सच में स-3 की सरंचना की रीति नीति बनाने में जुट ना ह है
ishan agrawal
2015-03-01 20:51:00
isko padkar kubuddi ko chaodane ka prayash kar raha hoo


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