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छोड़ो ढर्रे का चिंतन, बदलो अपना जीवन

त्यागने के लिए हर किसी को विवश होना पड़ता है। किसी से चोर छीनता है, किसी से बेटा। पेट भरने और तन ढकने के अतिरिक्त और किसी के पल्ले कुछ नहीं पड़ता। जब विरानों के लिए ही सब कुछ छोडऩा है तो इन विरानों का स्तर कुछ ऊँचा क्यों न उठा लिया जाय? जब अपना उपार्जन, श्रम, सहयोग किसी को देना ही है तो उन्हें देवताओं, ऋषियों एवं सदुद्देश्यों के लिए ही क्यों न दिया जाय ? 

अध्यात्मवादी चिंतन

युगसंधि की ब्रह्मवेला में जाग्रत् आत्माओं को वास्तविकता समझनी चाहिए। कहने- सुनने को तो आदर्शवादी बकवास आये दिन चलती रहती है, पर वस्तुतः उसमें कुछ सार नहीं। अध्यात्म का लाभ और चमत्कार मात्र उन्हीं को मिलता है जो उसे कल्पना लोक की आड़ न मानकर जीवन दर्शन के रूप में मान्यता देते और तदनुरूप दिशाधारा का निर्धारण करते हैं।

सोचा जाय कि अन्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य को जो विशेष मिला है वह शौक, मौज भर के लिए है? विचारा जाय कि चौरासी लाख के चक्र से छूटने के, पूर्णता तक पहुँचने के, ईश्वर के साथ अनन्य होने के इस स्वर्ण सुयोग को आगे भी इसी तरह नष्ट करते रहना उचित है, जैसा कि अब तक किया जाता रहा? लोग क्या कहते और करते क्या हैं? इसे देखने, सुनने और इन्हीं का अनुसरण करने से तो एक के पीछे एक- एक करके गर्त में गिरने वाली भेड़ों की तरह अपनी भी दुर्गति ही होनी ही है। क्या इस दुर्भाग्य से बचा नहीं जा सकता?

पेट- प्रजनन तक अन्यान्य प्राणियों को सीमित रखना शोभा देता है, मनुष्य को नहीं। अन्य प्राणियों को साधन सीमित मिले हैं। उनकी शरीर संरचना और बौद्धिक क्षमता इतनी ही है कि अपना निर्वाह जीवन भर चला सकें। किन्तु मनुष्य तो स्रष्टा का युवराज है। उसे इतना मिला है कि अपनी विशेषताओं के सहारे तनिक- सा श्रम- मनोयोग लगाकर अपनी जरूरतों को चुटकी बजाते उपार्जित कर सकता है और शेष विभूतियों से आत्मकल्याण और लोककल्याण जैसे उच्च उद्देश्यों की पूर्ति कर सकता है।

साहस करें, सोच बदलें

इसके लिए बहुत कुछ करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। मात्र दृष्टिकोण उलटना और कार्यक्रम बदलना पड़ता है। मकड़ी अपना जाल आप बुनती है और उसमें फँसकर छटपटाती और जिस- तिस को दोष देती है। किन्तु जब अपना चिन्तन उलटती है तो अपने बुने जालों के धागों को समेटती, निगलती चली जाती है। निविड़ दीखने वाले बन्धन देखते- देखते साँझ के रंगीन बादलों की तरह अदृश्य होने लगते हैं।

इस प्रकार के परिवर्तन से व्यवस्था बिगड़ती नहीं वरन् और भी अच्छी बन जाती है। किन्तु उस अदूरदर्शिता को क्या कहा जाय जो अभ्यस्त ढर्रे के रूप में सिर से पैर तक लद गई है। कोई चाहे तो उसे सहज ही उतार भी सकता है। माया छाया की तरह है वह आगे- आगे चलती और नेतृत्व करती है। किन्तु जब प्रकाश की ओर पीठ किये रहने की प्रक्रिया बदलती जाती है, दिशा को उलट दिया जाता है तो सूर्य के सम्मुख होते ही छाया पीछे दौड़ने लगती है।

परिस्थितियों की विवशता के सम्बन्ध में ऐसा ही सोचा जाता है कि वही बाधक हो रही हैं, किन्तु ऐसा है नहीं। चिन्तन का प्रतिगामी ढर्रा ही बाधक है। इस आन्तरिक परिवर्तन के लिए जो साहस जुटा लेते हैं वे देखते हैं कि प्रगति पथ पर बढ़ चलने की कितनी सहज सुविधा उपलब्ध थी। अदूरदर्शी आदतों ने ही उस सौभाग्य से मुँह मोड़ा जो ईश्वर ने हर किसी को जीवन लक्ष्य पूरा कर सकने के निमित्त उदारतापूर्वक प्रदान किया है।

महामानवों में से प्रत्येक का जीवन क्रम इसका साक्षी है कि उन्होंने परिस्थितियों को अपरिहार्य नहीं माना और उनके न बदलने पर अपना ढर्रा बदलने का साहस जुटाया। जो भीतर की गुत्थी सुलझा सके, उनके लिए बाहरी समस्याओं का हल निकलते देर नहीं लगती। प्रपंच का जंजाल तो भीतर ही भरा पड़ा है। अपच होने से ही स्वादिष्ट व्यंजन कड़ुवे लगते हैं।

यदि विलासी लिप्सा और संग्रह की तृष्णा को हल्का किया जा सके तो औसत भारतीय जैसा नैतिक निर्वाह आसानी से उपार्जित हो सकता है। यदि परिवार को बढ़ाने की मूर्खता न की जाय, उसे स्वावलम्बी, सुसंस्कारी बनाना भर कर्तव्य माना जाय तो उस परिपोषण के लिए सामान्य प्रयास से ही काम चल सकता है। बोझिल जीवन तो उनका होता है जो अमीरी के स्वप्र देखते और उत्तराधिकारी को वैभव से लादने की ललक सँजोये रहते हैं।
बोझ दुश्चिंतन भर का है। न किसी के लिए पेट भारी पड़ता और न परिवार। बोझिल तो वह मूर्खता है जो लिप्सा- तृष्णा के रूप में जोंक की तरह शिराओं में दाँत गढ़ाये रहती है। आवश्यकता हर किसी की पूरी हो सकती है, पर तृष्णा की आग को बुझा सकना कितने ही प्रचुर वैभव से सम्भव नहीं हो सकता। ईंधन पड़ने पर वह शान्त कहाँ होती है, दूनी- चौगुनी भड़कती है।

जहाँ चाह, वहाँ राह

जाग्रतों को मोहग्रस्तों की तरह नहीं सोचना चाहिए, उन्हें सुख में ही लिप्त नहीं रहना चाहिए, सन्तोष भी उपार्जित करना चाहिए। बड़प्पन ही पर्याप्त नहीं, महानता भी अभीष्ट है। वाहवाही लूटने के लिए उद्धत प्रदर्शन का सरंजाम जुटाने में सार नहीं, महत्त्व उस लोकश्रद्धा का है जो उत्कृष्टता और उदारता अपनाने पर प्रचुर परिमाण में उपलब्ध होती और अन्तरात्मा को आनन्दभरी पुलकन से परितृप्त करती है।

हर जागरूक को इन दिनों इसी स्तर का प्रगतिशील चिन्तन अपनाना चाहिए और ढर्रे में ऐसा परिवर्तन करना चाहिए जिससे इस विषम वेला में आपत्ति धर्म का निर्वाह कर सकना सम्भव हो सके। ढूँढ़ने पर हर किसी को राह मिलती है। यदि आकांक्षा सच्ची हो तो कोई हल निश्चत रूप से ऐसा निकल सकता है जिसमें निर्वाह भी कठिन न पड़े और जीवन लक्ष्य पाने तथा युगधर्म निभाने का अवसर भी मिलता रहे।

बेटों को बैरिस्टर बनाने और लड़की को कुबेर के घर में भेजने का नशा हल्का किया जा सके और उन्हें औसत नागरिकों की तरह निर्वाह करने और सुसंस्कारी गतिविधियाँ अपनाने के मार्ग पर चलाया जा सके, तो प्रतीत होगा कि पहाड़ जैसा बोझ उतरकर हल्का हो गया। सन्तानें स्वावलम्बी हो जाने पर छोटे परिवार से विदाई लेनी चाहिए और बड़े परिवार (विश्व परिवार) की बात सोचनी चाहिए।

परिस्थितियाँ असंख्यों की ऐसी हैं जिनको युगधर्म के निर्वाह की समुचित सुविधाएँ प्राप्त हैं। हथकड़ियाँ मोह की और बेड़ियाँ लोभ की हैं जो एक कदम आगे बढ़ने और एक परमार्थ कर देने में अवरोध अटकाती है। इन्हें तोड़ा न जा सके तो ऐंठ- मरोड़कर ढीला तो किया ही जा सकता है। इतने भर से दौड़ना न सही, घिसटना तो निश्चित रूप से सम्भव हो सकता है।

धनी अकेले भामाशाह ही नहीं हुए हैं। मरण अकेले भगत सिंह के हिस्से में ही नहीं आया है। जेल अकेले नेहरू- पटेल ही नहीं गये हैं। मुसीबतें बहुतों को आती हैं, त्यागने के लिए हर किसी को विवश होना पड़ता है। किसी से चोर छीनता है, किसी से बेटा। पेट भरने और तन ढकने के अतिरिक्त और किसी के पल्ले कुछ नहीं पड़ता। जब विरानों के लिए ही सब कुछ छोड़ना है तो इन विरानों का स्तर कुछ ऊँचा क्यों न उठा लिया जाय? जब अपना उपार्जन, श्रम, सहयोग किसी को देना ही है तो उन्हें देवताओं, ऋषियों एवं सदुद्देश्यों के लिए ही क्यों न दिया जाय? इस उदारनीति को अपनाने वाले बैंक में जमा की गई पूँजी की तरह ब्याज समेत लम्बा लाभ पाते हैं, जबकि मोह के गर्त में धकेली हुई उपलब्धियाँ निरर्थक ही नहीं जातीं, विघातक प्रतिक्रिया भी उत्पन्न करती है।

दूसरों से बात करने में समय और चातुर्य का कचूमर निकल जाता है। यदि अपने से भी एकान्त में जी खोलकर समझदारी की बात की जा सके और अभिन्नों के सहयोग से बनने वाली सृजनात्मक योजना बनाने जैसा कुछ किया जा सके तो अन्तःलोक में पड़े देवता ही जागृत होकर ऐसा परामर्श एवं सहयोग देने लगेंगे जिन्हें पाकर समस्त अभाव की पूर्ति और समस्त वैभव की उपलब्धि हो सकती है।

वाङ्मय- उपासना योग,
पृष्ठ- ३.८७ से संकलित- संपादित  






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Comments

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G.N.Mishra
2016-03-14 17:47:43
Sargarbhit lekh hai.