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भारत के तत्त्वज्ञान को विश्वव्यापी बनाया जाय

आज की दुर्गति और हमारे दायित्व 

भौतिकवाद की बाढ़ चरम सीमा पर है। मनुष्य छोटा, बौना होता और सिकुड़ता चला जा रहा है। विलासिता और आपाधापी के अतिरिक्त उसे कुछ सूझ नहीं रहा है। तुच्छ स्वार्थों के लिए व्यक्ति और राष्ट्र एक- दूसरे का सर्वनाश करने पर उतारू हैं। बुद्धिवाद, अर्थतंत्र और विज्ञान- विकास जिस दिशा में बढ़ रहे हैं, जिस लिप्सा के लिए लालायित हैं, उस ओर बढ़ते चरण अगले दिनों मनुष्य जाति को सामूहिक आत्महत्या के लिए विवश करेंगे। दुष्प्रयोजनों में लगी हमारी बुद्धि, चेष्टा और सम्पदा संसार में नारकीय वातावरण उत्पन्न करती चली जा रही है। उसका परिणाम किस दुःखद दुर्भाग्य में होगा, उसकी कल्पना करने मात्र से सिहरन उठती है। 
  
जीवन और मृत्यु के चौराहे पर खड़ी मनुष्य जाति कुछ भी करती रहे और हम मूक दर्शक बने देखते रहें, यह उचित न होगा। इतिहास साक्षी है कि विश्व की समग्र प्रगति में भारत ने अपने विकास के आरम्भ से ही असाधारण योगदान दिया है। इस देश के देवमानव सदा से अपने को विश्वमानव मानते रहे हैं और क्षेत्र विशेष की परिधि में अपने को सीमित न रखकर समस्त संसार की अवगति को प्रगति में बदलने के लिए भागीरथी प्रयत्न करते रहे हैं। 

विश्व- परिवार की सनातन मान्यता 
  
इस देश में निर्वाह की समुचित सुविधाएँ रही हैं। रत्नगर्भा भारतभूमि के वरद् पुत्रों को कभी किसी बात का अभाव- दारिद्र्य नहीं रहा। वे समस्त विश्व को अपना सेवा- क्षेत्र मानकर सुदूर भूखण्डों में अत्यंत कठिन यात्राएँ करते रहे हैं और अविकसित पड़े भूखण्डों के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए अपने ज्ञान- विज्ञान का पूरा- पूरा अनुदान प्रदान करते रहे हैं। वन्य जीवन जैसा जीवनयापन करने वाले मनुष्यों को कृषि, पशु- पालन व्यवसाय, शिल्प, वाहन, परिवहन, शिक्षा, चिकित्सा, समाज संगठन, शासन, धर्म- संस्कृति आदि से परिचित कराया और उन्हें सुविकसित स्तर तक पहुँचाया। ऐसे अनुदानों ने ही भारत को जगत के कोने- कोने में जगद्गुरु का भावभरा सम्मान प्राप्त कराया। 
  
यह सब इसलिए संभव हो सका कि यहाँ के निवासियों ने समस्त विश्व को अपना घर- परिवार माना और सार्वभौम सुख- शांति को अपनी निजी प्रगति मानकर किसी भौतिक महत्त्वाकांक्षा से प्रेरित होकर नहीं, वरन सर्वजनीन उत्कर्ष के लिए वे अपने अस्तित्व को समर्पित करने में गर्व अनुभव करते रहे। 

पतन की ओर बढ़ते कदम 
  
आज की स्थिति में संसार भूतकालीन पिछड़ेपन की अपेक्षा कहीं अधिक दुर्गतिग्रस्त है। अतीत का पिछड़ापन अन्न, वस्त्र, निवास, शिक्षा, चिकित्सा आदि की दृष्टि से ही अभावपूर्ण था। उन दिनों आवश्यकताएँ और आकांक्षाएँ सीमित रहने से भी लोग उन परिस्थितियों में ही किसी प्रकार तालमेल बिठा लेते थे और बिना उद्विग्नता की जिन्दगी जी लेते थे। आज हम बुद्धि, धन और सामग्री से सुसम्पन्न होते हुए भी उन आदिमकाल के मनुष्यों की अपेक्षा कहीं अधिक दुःखद परिस्थितियों में पड़े हुए जल रहे हैं, गल रहे हैं। संसार में कहीं भी चैन नहीं, कहीं भी शांति नहीं, कहीं भी संतोष नहीं। उद्वेग और संक्षोभ से आज मनुष्य जाति का प्रत्येक सदस्य बेतरह जल रहा है। 

भावनात्मक निकृष्टता, विचारणाओं और आकांक्षाओं का पशु प्रवृत्ति तक उतर आना, वासना और तृष्णा के लिए सर्वतोभावेन समर्पण, विलासिता और लिप्सा- लालसा में चरम सुख की मान्यता- व्यक्तिवादी स्वार्थपरता की प्रबलता, उदारता और आत्मीयता का परित्याग जैसी दुष्प्रवृत्तियों ने मनुष्य को पशु से भी नीचे गिराकर पिशाच बना दिया है। इस स्तर का प्राणी अपनी हलचलों से मात्र अनाचार ही उत्पन्न करेगा और उसके दुष्परिणाम पग- पग पर शोक- संताप उत्पन्न करने वाले होंगे। निकृष्ट व्यक्ति शारीरिक- मानसिक आधि- व्याधियों में ही ग्रस्त रहेगा और निरन्तर दुःख पायेगा। यही आज की स्थिति का सही विश्लेषण है। 
  
विज्ञान ने अनेकानेक साधन उत्पन्न कर दिये हैं। आर्थिक प्रगति ने हमें अनेक सुखोपभोग की आकर्षक उपलब्धियाँ प्रदान की हैं। शिक्षा के विकास ने हमारी बुद्धि को तर्क प्रधान और भली प्रकार से चतुर (कुशल) बना दिया है। इस युग की यह उपलब्धियाँ सर्वविदित हैं। यदि हमारा चिन्तन, व्यक्तित्व और लक्ष्य भी परिष्कृत रहा होता तो निःसंदेह यह धरती पर स्वर्ग से कहीं अधिक सम्पन्नता और प्रसन्नता बिखरी पड़ी होती। 
  
पर हुआ उल्टा ही। जहाँ समृद्धि बढ़ी, वहाँ सद्बुद्धि का लोप हुआ है। वस्तुस्थिति यह है कि विकास के नाम पर विनाश के ही गर्त में गिरे हैं। यदि यही स्थिति कुछ समय और चलती रही तो हम वहाँ जा पहुँचेंगे जहाँ से फिर कभी उभर सकना संभव न हो सकेगा। 

समृद्धि से पहले आत्मरक्षा जरूरी 

आज का भारत भौतिक प्रगति में बेशक पिछड़ गया है। हजार वर्ष की लम्बी पराधीनता ने हमारी नस तोड़कर रख दी है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भी जो सम्भव था, वह हमारी अनुभवहीनता ने करने नहीं दिया। हम कई क्षेत्रों में विशेषतया सामाजिक प्रखरता के क्षेत्रों में अभी काफी पीछे हैं। यह सब होते हुए भी एक चुनौती है कि हम अपना घर ही सँभालने, सँजोने में लिप्त न रहें, वरन् सारे गाँव के छप्परों में जो आग लग रही है, उसकी ओर भी ध्यान दें अन्यथा घर बनाने के हमारे सारे प्रयत्न व्यर्थ चले जायेंगे और गाँव के अन्य लोगों के साथ ही हमारा भी सब कुछ जलकर नष्ट हो जायेगा। 
  
इस सर्वभक्षी दावानल की ओर से इसलिये आँखें मूँदे नहीं रह सकते कि हमें अपने मतलब से मतलब रखना चाहिए। अब सारी दुनियाँ एक है। एक का विकास तो एक बार दूसरे के पिछड़ेपन को न भी दूर करे पर विनाश की आग उतनी व्यापक होगी, जिसमें सभी जलेंगे। आज जो अनैतिकता का, उच्छृंखलता का, भोगवाद का, निष्ठुरता- स्वार्थपरता का दावानल धधक रहा है, उसकी आग से हम शान्तिप्रिय लोग भी अछूते न रह सकेंगे। कोई चिन्गारी हमारे टूटे- फूटे घर को भी जलाकर खाक कर देगी और घर बनाने के हमारे सुखद प्रयास अकाल मृत्यु के उदर में समा जायेंगे। 
  
अपने देश की भौतिक प्रगति के लिए प्रयास अत्यंत आवश्यक हैं, किन्तु इन प्रयासों को ही पर्याप्त न मानें वरन् चिन्तन और चरित्र में घुसी हुई विकृतियों के निराकरण के लिए भी ध्यान दें और प्रयत्न करें। यह कार्य हमें अपने देश में तो करना ही है, साथ ही व्यापक क्षेत्र पर भी दृष्टि रखी जाय। विश्व परिवार की, विश्व मानव की, विश्व एकता की  बात को भुला न दिया जाय। 

भारतीय दर्शन से बदलेगी दुनिया 
  
आज की स्थिति में भी भारत विश्व का नेतृत्व दार्शनिक क्षेत्र में कर सकता है। उसका अध्यात्म इतना उत्कृष्ट है कि उसे किसी देश, जाति और काल की सीमा में बाँधा नहीं जा सकता वरन् सार्वभौम, सार्वजनीन और सार्वकालिक कहा जा सकता है। भटकाव को सही राह पर लाने की उसमें पूरी- पूरी क्षमता है। 

संसार के अन्य देशों ने हमें बहुत कुछ दिया है। हम और कुछ तो नहीं पर उत्कृष्ट स्तर का ऐसा तत्त्वदर्शन दे सकते हैं, जिससे भटकी हुई मानव जाति अपनी स्थिति पर पुनर्विचार करने और दिशा- प्रवाह बदलने के लिए तत्पर हो सके। यद्यपि यह परोक्ष, अदृश्य और सूक्ष्म है, फिर भी इतना महत्त्वपूर्ण है कि सर्वभक्षी दावानल पर अजस्र अमृत वर्षा होने जैसा जादुई परिणाम उत्पन्न हो सकता है। विनाश के नाम पर चल रही अन्धी घुड़दौड़ विकास के पथ पर मोड़ी जा सकती है। 
  
दर्शन मनुष्य जाति का प्राण है, जीवन है, प्रकाश है और बल है। नास्तिकतावादी, भोगवादी दर्शन ने हमें नर- पशु बना दिया है। यदि स्थिति उलट दी जाय और जनमानस में आदर्शवादी उत्कृष्टता की मान्यताएँ जमने लगें तो स्थिति का कायाकल्प हो सकता है, दुर्बुद्धि की आग में भुन रहे संसार को आज भी भारतीय तत्त्वदर्शन- अध्यात्म बहुत कुछ दे सकता है। इतना दे सकता है कि मरण को जीवन में बदला जा सके। 
  
विश्व को हमने असंख्य अनुदान दिये, उसके बदला हमें कुछ भी न मिला हो ऐसी बात नहीं है। संसार को समुन्नत बनाने के प्रयास में भारत की अपनी परिस्थितियाँ भी सुविकसित हुई थीं। विश्व सेवा का विशाल क्षेत्र हमारे अपने क्षेत्र को भी उस सेवा- साधना के परोक्ष लाभों से लाभान्वित हुए बिना खाली हाथ न रहने देगा। 

(वाङ्मय खंड- समस्त विश्व को भारत के अजस्र अनुदान, पृष्ठ ५.५५ से संकलित- संपादित)






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