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नौजवानो उठो! खुद को बदलो, जमाना बदल जायेगा - युवाक्रांति वर्ष विशेष


युगऋषि परम पूज्य पं. श्रीराम शर्मा आचार्य (‘वर्तमान युग की चुनौतियाँ और युवावर्ग’ पुस्तक से संकलित- संपादित) 

बदलते युग की चिंताएँ 
परिवर्तन चक्र तीव्र गति से घूम रहा है। सामाजिक स्थिति बहुत तेजी से बदल रही है। ऐसे में मनुष्य एक विचित्र से झंझावात में फँसा हुआ है। बाह्य रूप से चारों ओर भौतिक एवं आर्थिक प्रगति दिखाई देती है, सुख- सुविधा के अनेकानेक साधनों का अंबार लगता जा रहा है, दिन- प्रतिदिन नए- नए आविष्कार हो रहे हैं, पर आंतरिक दृष्टि से मनुष्य टूटता और बिखरता जा रहा है। उसका संसार के प्रति विश्वास, समाज के प्रति सद्भाव और जीवन के प्रति उल्लास धीरे- धीरे समाप्त हो रहा है। अब तो समाज में चारों ओर आपसी सौहार्द्र, समरसता एवं सात्विकता के स्थान पर कुटिलता, दुष्टता और स्वार्थपरता ही दृष्टिगोचर होती है। बुराई के साम्राज्य में अच्छाई के दर्शन अपवाद स्वरूप ही हो पाते हैं। समाज सेवा का क्षेत्र हो या धर्म- अध्यात्म अथवा राजनीति का, चारों ओर अवसरवादी, सत्तालोलुप, आसुरी वृत्ति के लोग ही दिखाई देते हैं। जहाँ चारों ओर धनबल और बाहुबल का नंगा नाच हो रहा हो, घपलों- घोटालों का बोलबाला हो, उस समाज में क्या वास्तविक प्रगति कभी हो सकती है? 

आधुनिकता का अभिशाप 
भोगवादी आधुनिकता के भटकाव में फँसी युवा पीढ़ी दुष्प्रवृत्तियों के दलदल में धँसती जा रही। विश्वविद्यालय और शिक्षण संस्थान, जो युवाओं की निर्माणस्थली हुआ करते थे आज अराजकता एवं उच्छृंखलता के केंद्र बन गए हैं। वहाँ मूल्यों एवं आदर्शो के प्रति कहीं कोई निष्ठा दिखाई ही नहीं देती। सर्वत्र नकारात्मक एवं विध्वंसक गतिविधियाँ ही होती रहती हैं। ऐसे शिक्षक व विद्यार्थी, जिनमें कुछ सकारात्मक और रचनात्मक कार्य करने की तड़पन हो, बिरले ही मिलते हैं। इसी का परिणाम है कि हमारा राष्ट्रीय एवं सामाजिक भविष्य अंधकारमय लग रहा है। 

इस प्रकार के दूषित वातावरण में युवापीढ़ी ऐसी कुसंस्कृति को अपनाने के लिए मजबूर है, जहाँ व्यक्तिगत जीवन में नैतिकता और नाते- रिश्तों की पवित्रता का कोई अर्थ नहीं रह जाता। यौन उच्छृंखलता को फैशन व आधुनिकता का प्रतीक समझा जाता है जिससे युवक- युवतियाँ आत्मघाती दुष्चक्र में उलझते जाते हैं। उनकी ऊर्जा और प्रतिभा किसी सार्थक कार्य में लगने के स्थान पर सौंदर्य प्रतियोगिताओं, फैशन शो और फिल्मों में बर्बाद होती है तथा अपराधी व बुरे लोगों के जाल में उनके फँसने की संभावनाएँ बढ़ती जाती हैं। उच्च आदर्शों एवं प्रेरणा स्रोतों के अभाव में वे नित नए कुचक्रों में उलझते रहते हैं। सामाजिक एवं राष्ट्रीय दायित्व बोध से कटे हुए  ऐसे लोगों का जीवन मात्र स्वार्थपरता के संकुचित घेरे तक ही सीमित रह जाता है। 

युवाओं से है आस 
माना कि हताशा व निराशा से ग्रस्त युवापीढ़ी में परिस्थितियों से जूझने की क्षमता चुकती जा रही है पर वह समाप्त नहीं हुई है। उसे विकसित करने के अनेकानेक साधन उपलब्ध हैं। सांस्कृतिक एवं मानसिक परतंत्रता के अदृश्य पाश से स्वयं को मुक्त करके विश्वक्रांति का अग्रदूत बनने की क्षमता भी उसमें है। युवाशक्ति ही राट्र की उज्ज्वल आशा का प्रतीक है। देश को दुर्गति से प्रगति के पथ पर ले जाने की शक्ति उसके रग- रग में समाई हुई है। शून्य से शिखर तक पहुँचने का पुरुषार्थ वही कर सकता है। 

संसार में आसुरी प्रवृत्ति के लोग तो सदैव रहे हैं, चाहे वह रामायण- महाभारत काल हो या आज का युग। हनुमान जी को भी रात के अंधेरे में लंका के राक्षसों के बीच एक देवस्वरूप व्यक्ति  विभीषण के रूप में मिल गया था। हम भी यदि थोड़ा सहज होकर देखें तो अपने आसपास अनेक  अच्छे व्यक्ति हमें मिल जाएँगे जो ईमानदार, चरित्रवान और नैतिक मूल्यों का पालन करने वाले हैं। वे सदैव जीवन के प्रति आशावादी एवं सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं। 

समस्या केवल इतनी भर है कि उन्हें बिगड़ने से किस प्रकार बचाया जाए और वे स्वयं भी किस प्रकार इस काजल की कोठरी से अपने को बचाकर बेदाग बाहर निकाल सकें। स्वयं को सुधार कर  ही वे सारे संसार को सुधार सकेंगे।‘अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है’, इस तथ्य को समझ लेने से ही सबका कल्याण होगा। 

इतिहास साक्षी है कि संसार में जितनी भी महत्त्वपूर्ण क्रांतियाँ हुई हैं, उनमें युवाओं की भूमिका  सदैव ही अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही है। उत्साह एवं उमंग से भरपूर युवाओं में पहाड़ से टकराने की ललक होती है। कठिन से कठिन परिस्थितियों से भी जूझने का साहस होता है। उनकी शरीरिक एवं मानसिक शक्तियाँ भी अपने विभिन्न रूपों में प्रस्फुटित होती हैं और असंभव को भी संभव कर दिखाने की क्षमता रखती हैं। 

दृष्टिटकोण बदलना होगा 
सर्वप्रथम युवाओं को अपने मन से निराशा एवं हताशा के भावों को जड़ से उखाड़ फेंकना होगा। अपनी शक्तियों पर, अपनी क्षमता व प्रतिभा पर, अटूट विश्वास जगाना होगा। यही विचार करना होगा कि संसार में ऐसा कोई कार्य नहीं जो हम न कर सकें। कल्पना करें कि आपके शरीर  में शक्ति स्रोत फूट रहा है, ऊ र्जा की धाराएँ प्रवाहित हो रही हैं, जो कठिन से कठिन कार्य को चुटकियों में पूरा कर सकती हैं। उज्ज्वल भविष्य हमारे स्वागत हेतु तत्पर है। अपने भीतर इस प्रकार का आत्मविश्वास दृढ़तापूर्वक स्थापित करने पर ही हम जीवन की अनेक चुनौतियों का सामना करने में सफल हो सकेंगे। 

आज मनुष्य स्व- केंद्रित हो गया है। वह केवल अपने लाभ की बात ही सोचता है। अपनी इच्छाओं की पूर्ति में लगा रहता है। स्वार्थ के आगे संयम तो स्वतः ही टूट जाता है। अमर्यादित आचरण से भी उसे संकोच नहीं होता। स्वयं के बाद वह अपने परिवार की बात सोचता है। पति- पत्नी और बच्चों तक ही वह सीमित रह जाता है। आगे समाज व राष्ट्र के बार में तो वह सोचता  ही नहीं। होना तो यह चाहिए कि पहले राष्ट्र और समाज कल्याण के कार्य करें और फिर अपने कुटुंब व परिवार के लिए, स्वयं का कल्याण तो स्वतः ही हो जाएगा। जब इस प्रकार की भावना मन में आएगी तो मनुष्य कभी भी दुखी नहीं होगा, चाहे कैसी भी समस्याएँ उसके सामने क्यों न आए। 

महत्त्व जीवन लक्ष्य का है 
आज तो लगभग सभी ने पैसा कमाना ही अपने जीवन का एकमात्र ध्येय बना रखा है। युवावर्ग में शिक्षा का उद्देश्य भी धन कमाना ही रह गया है। शिक्षा की वास्तविक उपयोगिता तो इसमें है कि हमारा ज्ञान बढ़े, हमारी प्रतिभा व क्षमता का विकास हो और हम इसके द्वारा समाज का एवं स्वयं का भला कर सकें। पर आज लोग डॉक्टर व इंजीनियर भी इसीलिए बनना चाहते हैं कि उसमें अधिक से अधिक धन कमाने की संभावना होती है। ऐसी शिक्षा से क्या लाभ? धन तो अशिक्षित व्यक्ति भी कमा लेता है। चोरी, डकैती, स्मगलिंग, अपहरण आदि के द्वारा कम समय में ही मनचाही राशि लोग एकत्रित कर लेते हैं। जब किसी भी प्रकार से धन कमाना ही मुख्य ध्येय है तो फिर चोर, डकैत और डॉक्टर, इंजीनियर में क्या अंतर रह जाता है ? 

ध्येय का महत्त्व शिक्षा से कहीं अधिक है। यदि ध्येय उचित है, सारे समाज के भले का है, जन कल्याण के लिए है तो वह व्यक्ति वंदनीय है, पूजनीय है। अपने जीवन का लक्ष्य निश्चित करते  समय हमें सुभाष, गाँधी, विवेकानंद, दयानंद, सरदार पटेल, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु, सुखदेव जैसे महान् युवा क्रांतिकारियों से प्रेरणा लेनी चाहिए। एक बार भली- भाँति ठोक- बजाकर अपना लक्ष्य निर्धारित कर लें। लक्ष्य जितना ऊँचा होगा, उपलब्धि भी उतनी ही ऊँची होगी। 

एक बार लक्ष्य के निर्धारित होने पर फिर इसे भूलें नहीं। दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ उस पथ पर बढ़ चलें। ‘उत्तिष्ठत् जाग्रत् प्राप्य वरान्निबोधत्’- इसे अपना ध्येय वाक्य बना लें। कठिनाइयों से, असफलताओं से कभी घबराएँ नहीं। जीवन में जितनी अधिक कठिनाइयाँ आती हैं, जितनी समस्याएँ आती हैं, हमारे अंतरमन में उनसे जूझने की क्षमता भी उसी अनुपात में बढ़ती जाती है। यदि हमारा आत्मविश्वास और ईश्वर विश्वास दृढ़ है तो कोई भी अवरोध अधिक समय तक  टिक ही नहीं सकता। 

साहस जुटायें, पहल करें 

संसार की चुनौतियों का सामना करने को तुम्हें अकेले ही आगे बढ़ना होगा। संभव है कि आगे चलकर और लोग भी सहयोग करने को आ जाएँ, पर उसके लिए प्रतीक्षा करने में समय नष्ट करना बुिद्धमानी नहीं है। अपने पौरुष, अपने साहस और अपने विवेक पर भरोसा रखो, तथा परमात्मा की कृपा पर अटूट विश्वास भी। सत्य के लिए, धर्म के लिए, न्याय के लिए एकाकी आगे बढ़ने को सदैव तैयार रहो। 

सफलता का मार्ग खतरों का मार्ग है। इन खतरों से जूझने का, कष्ट सहने का, कठोर परिश्रम करने का साहस तुम्हें हर दशा में सफल बनाएगा। तभी राष्ट्र की वर्तमान चुनौतियों का भी सफलतापूर्वक सामना कर सकेंगे। विश्वक्रांति एवं सांस्कृतिक सद्भाव का संवाहक देश आज आतंकवाद एवं उग्रवाद के विस्फोटों से ग्रस्त है। जातीय- सांप्रदायिक हिंसा देश की अस्मिता के लिए खतरा बनी हुई है। समूचा राष्ट्र भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा है। राष्ट्रव्यापी असंतोष, अव्यवस्था आज देश की रुग्ण स्थिति को दरसा रही हैै। 

ऐसी विषम स्थिति से जूझने की सामर्थ्य, ऐसे उल्टे प्रवाह को उलटकर सीधा करने का साहस, समवेत स्वर में ‘युवाशक्ति’ के बल पर ही संभव है। आज के राष्ट्रीय एवं सामाजिक परिवेश में युवा शक्ति से ही यह अपेक्षा की जा सकती है कि वह राष्ट्र को इस विकट स्थिति से उबारकर इसमें नयी चेतना का संचार कर सकेंगे।






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Gajendra kumar patidar
2017-08-26 09:35:05
nice