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पुरुषार्थ चतुष्टय- जीवन पथ के धर्म प्रधान चार सोपान

युगऋषि वेदमूर्ति, तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य (‘वर्तमान युग की चुनौतियाँ और युवावर्ग’ पुस्तक से संकलित- संपादित)

जीवन का उद्देश्य

मारे जीवन में जो भी अच्छी- बुरी परिस्थितियाँ आती हैं, वे हमारे कर्मों के फल हैं। मानव जीवन के रूप में परमात्मा ने हमें एक सुअवसर प्रदान किया है कि सत्कर्म करते हुए हम अपने जीवन को उन्नति के मार्ग पर ले जाएँ। कुकर्मों द्वारा इसका सर्वनाश न करें। भगवान ने हमें इस संसार में भेजा है, जिससे हम सभी प्राणियों के कल्याण हेतु अपनी प्रतिभा व क्षमता का नियोजन कर सकें। अपने पुरुषार्थ से अपने पाप कर्मों का प्रायश्चित्त भी करें और सत्कर्मों द्वारा पुण्यफल भी प्राप्त करें।

हम स्वयं को पहचानें और पूर्ण आस्था व ईश्वर विश्वास के साथ कर्मपथ पर बढ़ते रहें तो हमें पग- पग पर ईश्वरीय सहायता भी मिलती रहेगी। ईश्वर केवल उन्हीं की सहायता करता है, जो अपनी सहायता स्वयं करना चाहते हैं। हमें सतत सतर्क रहकर इसी विश्वास के साथ अपनी जीवनचर्या का निर्धारण करना होगा, तभी हम सफलतापूर्वक वर्तमान जीवन की तमाम चुनौतियों से पार पा सकेंगे।

पुरुषार्थ चतुष्टय का ताप्तर्य है कि हमारा पुरुषार्थ चार बिंदुओं- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पर आधारित हो। विद्वान मनीषियों ने गहन चिंतन- मनन के बाद हमारे कर्मों के लिए यह चार आधार निश्चित किये थे और इनका क्रम भी। उन्होंने उत्तम, चरित्रवान, सुसंस्कारित और परिष्कृत व्यक्तियों से युक्त समाज का निर्माण करने के लिए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की नसैनी हमें सौंपी थी।

धर्म- जियो और जीने दो

धर्म कोई उपासना पद्धति नहीं है। यह तो एक विराट् एवं विलक्षण जीवनचर्या है, जीवन जीने की कला है। ऋषि परम्परा द्वारा सिंचित, अवतारों और महापुरुषों द्वारा संरक्षित धर्म का महावृक्ष सनातन काल से पल्लवित एवं संवर्द्धित होता चला आ रहा है। इसमें ‘स्व’ का स्वार्थ नहीं है। इसकी छत्रछाया में समस्त विश्व ‘जीवेत एवं जीवयेत’ (जियो और जीने दो) के सिद्धान्त का पालन करते हुए सुख- शांतिपूर्वक जीवनयापन का आनन्द भोगता है। देश- विदेश में फैले अनेकानेक मत- मतान्तरों, उपासना पद्धतियों, कर्मकाण्डों के सह अस्तित्व के साथ अपने सांस्कृतिक एवं नैतिक मूल्यों में उत्तरोत्तर वृद्धि करना ही धर्म का मूल उद्देश्य है। इसी को हिन्दुत्व भी कहते हैं। धर्म ही मानव के समस्त क्रिया- कलापों को संचालित करके संपुष्ट समाज रचना को आलंबन प्रदान करता है। व्यक्ति, परिवार, समाज या राष्ट्र जब भी धर्म से परे हटकर अधर्म के कार्यों में लिप्त हो जाते हैं, वह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का कार्य ही करते हैं।

धर्म का अर्थ है कर्त्तव्य। मनुष्य का मनुष्य के प्रति कर्त्तव्य, अन्य प्राणियों के प्रति कर्तव्य, पेड़- पौधे व पर्यावरण के प्रति कर्त्तव्य, समाज और राष्ट्र के प्रति कर्त्तव्य। पूरी निष्ठा व ईमानदारी से, निःस्वार्थ भाव से अपने कर्त्तव्य का पालन करना ही सच्चा धर्म है, यही मानव धर्म है। हिंदू हो या मुसलमान, सिख हो या ईसाई, पारसी हो या यहूदी, यह तो सभी के लिए समान है।

अर्थ उपार्जन यज्ञभाव से हो

धर्म के बाद दूसरा स्थान अर्थ का है। अर्थ के बिना, धन के बिना संसार का कार्य चल ही नहीं सकता। जीवन की प्रगति का आधार ही धन है। उद्योग- धंधे, व्यापार, कृषि आदि सभी कार्यो के निमित्त धन की आवश्यकता होती है। यही नहीं, धार्मिक कार्यो, प्रचार, अनुष्ठान आदि सभी धन के बल पर ही चलते हैं। अर्थोपार्जन मनुष्य का पवित्र कर्त्तव्य है। इसी से वह प्रकृति की विपुल संपदा का अपने और सारे समाज के लिए प्रयोग भी कर सकता है और उसे संवर्द्धितसंपुष्ट भी। पर इसके लिए धर्माचरण का ठोस आधार आवश्यक है। धर्म से विमुख होकर अर्थोपार्जन में संलग्न मनुष्य एक ओर तो प्राकृतिक संपदा का विवेकहीन दोहन करके संसार के पर्यावरण संतुलत को नष्ट करता है और दूसरी ओर अपने क्षणिक लाभ से दिग्भ्रमित होकर अपने व समाज के लिए अनेकानेक रोगों व कष्टों को जन्म देता है। यही सब तो आजकल हो रहा है। धर्म ने ही हमें यह मार्ग सुझाया है कि प्रकृति से, समाज से हमने जितना लिया है, अर्थोपार्जन करते हुए उससे अधिक वापस करने को सदैव प्रयासरत रहें। हमारी यज्ञ परंपरा भी इसी उत्कृष्ट भावना पर आधारित है।

काम - त्यागभाव से भोग करो

धर्म और अर्थ के बाद काम को तीसरा स्थान दिया गया है। काम को धर्म और अर्थ दोनों पर ही आश्रित होना चाहिए। काम तो जीवन की प्राण- शक्ति है। यदि मनुष्य में कामना ही नहीं होगी, कुछ करने व पाने की लालसा नहीं होगी, तो वह मृतप्राय हो जाएगा। प्रगति का चक्र रुक जाएगा। कामेच्छा से प्रेरित होकर ही मनुष्य तरह- तरह के आविष्कार करता है, भौतिक सुख के साधन तैयार करता है और इसी में बहुमुखी प्रगति के दर्शन होते हैं।

परन्तु हमारे धर्मग्रंथों ने ‘तेन त्यक्तेन भुंजीथा’ का मंत्र भी तो हमें दिया है। त्याग भाव से भोग करो। संसार में जो कुछ भी है, समाज के लिए है। धर्मानुसार, विवेकपूर्ण चिंंतन के आधार पर ही उसका उपभोग करो। पहले त्याग करो, अन्य सभी का ध्यान रखो, फिर स्वयं उपभोग करो। दूसरों को खिलाकर तब स्वयं खाओ। काम को, अपनी इच्छाओं व लालसाओं को सबसे ऊपर समझकर उनके भार से समाज को जर्जर मत बनाओ अन्यथा अंततोगत्वा वह तुम्हारे ही संहार का कारण बनेगा।

मोक्ष - जीवन आनंदमय हो

मोक्ष का स्थान अंत में आता है। यह हमें तभी प्राप्त हो सकेगा जब हमारा अर्थ व काम दोनों ही धर्म से संचालित होंगे। धर्मानुसार आचरण न करने पर हमें अर्थ- सुख तो मिल सकता है, पर मन के कलुष व अशांति के अतिरेक में मोक्ष कहाँ मिलेगा? बाह्यदृष्टि से हम भले ही धन- धान्य, वैभव व सम्पन्नता से परिपूर्ण दिखाई दें, परन्तु अनगढ़, असभ्य और असंस्कृत होने से हम आर्थिक दृष्टि से भी कहीं अधिक घाटे में रहते हैं। दरिद्रता वस्तुतः असभ्यता की प्रतिक्रिया मात्र ही है। आलसी, प्रमादी, दुर्गुणी, दुर्व्यसनी मनुष्य या तो उचित अर्थोपार्जन कर ही नहीं पाते और यदि कुछ अर्जित भी कर लेते हैं तो उसे नशेबाजी व अन्य फिजूलखर्चियों में नष्ट कर देते हैं। मन में हर समय अशांति व भय बना रहता है। ऐसे में मोक्ष की कल्पना रात्रि में सूरज की खोज के समान है।






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Leeladhar Prasad Sahu
2016-05-05 15:39:05
Jay gurdeb
Ranjan kumar
2016-04-27 12:47:15
mujhe bahut achha laga mai es ke sath judana chahtahu plz....
Ramkumar Vajpai
2016-04-25 12:22:20
Shantikunj
jaydevbhai mangaldas suthar
2016-04-01 20:50:34
excellent