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गुरुपूर्णिमा पर गुरुवर को उनकी मनपसंद भेंट देने की तैयारी करें

गुरुपूर्णिमा एक दिव्य अवसर

गुरुपूर्णिमा पर्व (१९ जुलाई) सामने है। इस अवसर पर प्रत्येक सच्चे शिष्य के अंदर गुरु के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करने की, कोई सार्थक श्रद्धांजलि चढ़ाने की, गुरु के प्रेम को धारण करने की, पात्रता बढ़ाने की, उमंगें उठती हैं। यदि ऐसा कुछ हो सके तो उससे जीवन की सार्थकता और गुरु की आंतरिक प्रसन्नता का बोध भी सुनिश्चित रूप से होता है। यह जीवन के सत्य की एक अद्भुत अनुभूति होती है, जिसके आगे तमाम लौकिक एवं पारलौकिक उपलब्धियाँ फीकी पड़ जाती हैं। सम्भवत: ऐसे ही सत्य की अनुभूति होने पर संत कवि 'कबीर' ने सहज भाव से कहा था

मुक्ति सत्य के साथ है, जतन करहु नहिं कोय।
खेती करिए अनाज की, सहज घासभुस होय।।

अर्थात्- मुक्ति तो सत्य के साथ- साथ सहज ही चलती है। उसके (मुक्ति के) लिए किसी को अलग से यत्न करने की जरूरत नहीं है। अनाज की खेती करने पर घास- भूसा आदि तो उसके साथ सहज ही प्राप्त हो जाते हैं।

समझें :- मुक्ति के लिए सत्य की जानकारी होना भर पर्याप्त नहीं, उसके लिए तो साधना के क्रमिक चरण बढ़ाते हुए अनुभूति तक पहुँचना पड़ता है। गुरुवर ने अपनी वसीयत- विरासत में यह तथ्य स्पष्ट किया है। लिखा है कि साधक पहले कल्पना, फिर मान्यता की सीढ़ियों पर चढ़ता हुआ अनुभूति तक पहुँचता है। इस तथ्य को निम्नलिखित उदाहरण से समझा जा सकता है।

बालक ने किसी अनुभवी को किसी आदर्श की चर्चा करते सुना- देखा। अनुभवी के चेहरे और हावभाव में उसे जिस उल्लास की अभिव्यक्ति दिखाई देती है, वह उसे आकर्षित करती है। प्रारम्भ में वह कल्पना करता है कि ऐसी अनुभूति मुझे भी हो सकती है। तब वह उस अनुभवी के जीवन सूत्रों का अनुगमन करने का प्रयास करता है। अनुगमन के प्रयास में उसे कई तरह की कठिनाईयाँ होती हैं, लेकिन उसकी कल्पना उसे बल देती रहती है और वह उसके सहारे कठिनाइयों को पार करता जाता है, तब उसे कुछ छुट- पुट एहसास होने शुरू होते हैं। कल्पना के साथ यह मान्यता जुड़ने लगती है कि ऐसा कुछ होता तो है। यह मान्यता उसकी साधना को और प्रखर बनाती है, उसके सहारे वह सहज अनुभूति के स्तर तक पहुँच जाता है। वह दिव्य अनुभूति मिलने पर उसे जीवन के लौकिक आकर्षण, जो कभी बहुत प्रिय लगते थे; वे अब बाधक- बन्धन जैसे दिखने लगते है, और वह उन भवबन्धनों से मुक्त हो जाता है।

स्पष्ट है कि उक्त उदाहरण में अनुभवी है गुरु और बालक है शिष्य। गुरु की दिव्य अनुभूतियों के अनुगमन की प्रेरणा उसे साधक बना देती है। शिष्य को ईमानदारी से प्रयास करते देखकर अनुभवी गुरु का अनुग्रह उसे मिलने लगता है। शिष्य की साधना और गुरु- अनुग्रह के संयोग से शिष्य भी सच्चे उल्लास की कल्पना, मान्यता की सीढिय़ों पर चढता हुआ उस सत्यानुभूति का अधिकारी बन जाता है, इसके पीछे- पीछे सिद्धि और मुक्ति स्वभाविक ढंग से चलने लगती है।

गुरुपूर्णिमा पर्व शिष्यों के लिए ऐसी दिव्यानुभूति की साधना हेतु प्रेरणा और अवसर लेकर आया है। उसे स्थूल पूजा उपचार और समारोह तक ही सीमित न रखकर दिव्यानुभूति की साधना और दिव्यानुदान के अनुपम अवसर की तरह प्रयुक्त करने- कराने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए। गुरुपूजन और गुरुदक्षिणा का मर्म समझकर उसे औपचारिकता से ऊपर दिव्य साधना बनाने का प्रयास करना चाहिए।

गुरुपूजा, गुरुदक्षिणा

गुरु की पूजा की जाय, उन्हें दक्षिणा दी जाय तो वे प्रसन्न होकर अपने दिव्य अनुग्रह प्रदान करते हैं, ऐसी आम धारणा बनी हुई है। इस धारणा को न तो सही कहा जा सकता है और न गलत। पूजा और दक्षिणा का मर्म समझ लिया जाय तो उक्त मान्यता सही है, अन्यथा केवल कर्मकाण्ड तक उसे सीमित मान लिया जाय तो यह गलत है।

गुरु का स्तर जिसने पा लिया है वह निन्दा और स्तुति के स्तर से बहुत ऊपर उठ जाता है। कोई उसकी निन्दा करे तो वह दु:खी हो जाय और स्तुति- चापलूसी करे तो खुशी से फूल जाय तो उसे तो अच्छा साधक, श्रेष्ठ व्यक्ति भी नहीं कहा जा सकता, गुरु का स्तर तो उससे बहुत ऊपर होता है। इसी प्रकार जो व्यक्ति अपने स्नेहियों से धन- साधन पाने की इच्छा रखता है, उसे तो एक सामान्य स्वावलम्बी- स्वाभिमानी व्यक्ति भी नहीं कह सकते, साधकों पर अजस्र अनुदानों की वर्षा करने वाले गुरु का स्तर तो इससे बहुत ऊँचा होता है। फिर भी यह सत्य है गुरुपूजन और गुरु दक्षिणा के माध्यम से साधक- शिष्य गुरु- अनुग्रह का अधिकारी बनता है।

पूजन के पीछे भाव है गुरु की प्रसन्नता- प्रियता प्राप्त करना। गुरु व्यक्ति रूप नहीं आदर्श, सिद्धांत रूप होते हैं। उन्हें केवल ज्ञानमूर्ति (शुद्ध ज्ञानरूप) कहा गया है। उनकी विशेष प्रसन्नता के लिए उनके आदर्श- अनुशासन के अनुगमन का भाव पुष्ट करना आवश्यक होता है। उनके पूजन की क्रिया द्वारा अपने क्रिया- कलापों को उनकी प्रसन्नता के अनुकूल बनाने का भावभरा संकल्प हो तो निश्चित रूप से पूजन प्रक्रिया हर साधक के लिए लाभकारी है।

भगवान श्रीराम ने राज्याभिषेक के बाद अपने प्रियजनों को संबोधित करते हुए कहा था :-
मम सेवक प्रियतम मम सोई ।।
मम अनुशासन मानइ जोई ।।

अर्थात् प्रिय तो सभी जन हैं, लेकिन विशेष प्रिय वही है, जो मेरे अनुशासनों का पालन करता है। यही भाव पूज्य गुरुदेव भी जीवनभर करते रहे। गुरुपूजन के द्वारा स्वयं की श्रद्धा और कुशलता को उनके आदर्शों- निर्देशों के अनुरूप ढालने का संकल्प होना चाहिए।

दक्षिणा के पीछे साधक का भावभरा प्रयास यह होता है कि उनके अनुग्रह जो कुछ हमें प्राप्त हैं, कम से कम उसका एक अंश तो उनके उद्देश्यों के लिए श्रद्धापूर्वक समर्पित करते रहा जाय। यह सर्वविदित सत्य है कि प्राप्त अनुदानों का सदुपयोग करने वालों को ही उच्चस्तरीय अनुदान मिलते हैं। दक्षिणा द्वारा यह साधना की जाती है कि प्रभु अनुग्रह से प्राप्त समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन आदि को प्रभु प्रयोजनों, गुरुकार्याे में लगाने का संकल्प और कौशल निरन्तर विकसित होता रहे। गुरुपूर्णिमा पर उक्त सिद्धान्तों के अनुसार ही गुरुपूजन एवं गुरु दक्षिणा की श्रेष्ठतर योजना- व्यवस्था बनाने के सत्प्रयास पूरी तत्परता से किये जाने चाहिए।

सारांश यह कि उनके आदर्शो- निर्देशों के अनुरूप अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत एवं समर्थ बनाने के नैष्ठिक प्रयास को 'पूजन' तथा उनके जीवनोद्देश्य, 'युग निर्माण' के निमित्त अपनी विभूतियों का अधिक अंश लगाने, पहले से बड़े लक्ष्य के लिए संकल्पित होने को 'दक्षिणा' माना जाना चाहिए। इसके लिए सभी शिष्य- साधकों को गहन मनन- चिन्तन पूर्वक अपने लक्ष्य निश्चित करने तथा पूरी तत्परता से उनकी पूर्ति के लिए जुट पडऩे की साधना तत्काल प्रारम्भ कर देनी चाहिए। इसे गुरु और शिष्य के बीच साझेदारी को पहले से श्रेष्ठ बनाने का प्रयास- पुरुषार्थ कहा जा सकता है।

गुरु- शिष्य की साझेदारी

कोई भी श्रेष्ठ पिता अपने पुत्र को और गुरु अपने शिष्य को भिखारी के रूप में नहीं, समर्थ साझेदार के रूप में देखना चाहता है। पूज्य गुरुदेव नवयुग निर्माण की ईश्वरीय योजना को लागू करने, गति देने के लिए आये, उसी के लिए उन्होंने प्रचण्ड तप- साधना की और अपने तप की सारी पूँजी उसी प्रयोजन के लिए झोंक दी। वे तो अपने उच्चस्तरीय साधना के नाते महाकाल के साथ एकरूप हो गये, किन्तु अपने प्रियजनों को वे प्रभु कार्य में प्रामाणिक, जीवन्त साझेदार तो बना ही देना चाहते हैं। इस संदर्भ में उनके निर्देश कुछ इस प्रकार हैं :-

''ज्ञान का अधिकाधिक संग्रह करो, ताकि बौद्धिक दृष्टि से सुसम्पन्न बन सको। संयम बरतो ताकि शरीर और मन की बलिष्ठता बढ़े। उदारता का समावेश अपने स्वभाव में बढ़ाओ, ताकि मित्रों और सहयोगियों की संख्या बढ़े। अपनी आन्तरिक महानता को खोजो और बढ़ाओ, ताकि मनुष्य जीवन का समुचित लाभ प्राप्त कर सको।

उन्होंने प्रभुकार्य में सहयोग करने वाले परिजनों को अपना शिष्य नहीं, अपने अंग- अवयव माना है। उसके लिए प्रचण्ड ऊर्जा- प्रवाह पैदा करने का कठिन कार्य उन्होंने पूरा कर दिया है और उसे आगे भी करते रहने का आश्वासन दिया है। ऊर्जा के सदुपयोग के लिए सही माध्यम बनने और उसे विस्तार देने की जिम्मेदारी उन्होंने अपने अंग- अवयवों को सोंपी है। उनके प्रामाणिक अंग- अवयव हम कैसे बनें, इसके लिए उनका निर्देश इस प्रकार है :-

''तुम सब हमारी भुजा बन जाओ, हमारे अंग बन जाओ यह हमारे मन की बात है। अब तुम पर निर्भर है कि तुम कितना हमारा बनते हो? समर्पण का अर्थ है दो का अस्तित्व मिट कर एक हो जाना। तुम भी अपना अस्तित्व मिटाकर हमारे साथ मिला दो व अपनी क्षुद्र महत्वाकांक्षा को हमारी अनन्त आध्यात्मिक महत्वाकांक्षाओं में विलीन कर दो। जिसका अहं मिट गया, वह पवित्र है। देखना है कि हमारी भुजा, आँख, मस्तिष्क बनने के लिए तुम कितना अपने अहं को गला पाते हो?

उनके उक्त निर्देश के अनुसार हमें गुरुपर्व पर अपनी प्रामाणिकता बढ़ानी चाहिए। जितनी हमारी यह पात्रता बढ़ेगी, उतना ही कार्य हम साध सकेंगे। महाकाल अपना कार्य कर रहे हैं, उसमें हमारी हिस्सेदारी हो, उसके लिए हमें अधिक समर्थ- प्रामाणिक बनना होगा। उन्होंने लिखा हैं :-

''यह निश्चित है कि निकट भविष्य में ही एक अभिनव संसार का सृजन होने जा रहा है। यह कार्य महाकाल करने जा रहा है। हमारे हिस्से में नवयुग की आस्थाओं और प्रतिक्रयाओं को अपना सकने योग्य जनमानस तैयार करना है। लोगों को यह बताना है कि अगले दिनों संसार का एक राज्य, एक धर्म, एक अध्यात्म, एक समाज, एक संस्कृति, एक कानून, एक आचरण, एक भाषा और एक दृष्टिकोण बनने जा रहा है। इसे अगले दिनों समस्त विश्व में, अगणित योजनाओं और प्रतिक्रियाओं के रूप में विकसित होना है।

हम अपनी समीक्षा करें कि जन मानस को प्रेरित- प्रशिक्षित करने की हमारी क्षमता आज कितनी है और उसे हम कितने समय में कितना विकसित कर सकते हैं? देश और विश्व के नये क्षेत्रों तथा भावनाशीलों, प्रतिभावानों के नये वर्गों तक उक्त प्रेरणा संचारित करने की हमारी पात्रता और तत्परता बढ़े तो गुरुवर का मन हर्षित हो। यदि ऐसी कुछ जिम्मेदारियाँ उठाई जायें तो उन्हें वे श्रेष्ठ दक्षिणा अवश्य मानेंगे।

उन्होंने परिजनों के व्यक्तित्व परिष्कार के बारे में अपनी अभिलाषा व्यक्त करते हुए लिखा है-
''हमारी अभिलाषा है कि गायत्री परिवार का हर सदस्य उत्कृष्ट प्रकार के व्यक्तित्व से सम्पन्न भारतीय धर्म और संस्कृति का सिर ऊँचा करने वाला सज्जन व्यक्ति बने। उसका जीवन उलझनों और कुण्ठाओं से भरा हुआ नहीं, वरन् आशा, उत्साह, सन्तोष एवं मस्ती से भरा हुआ बीते। अपनी श्रेष्ठता का अनुकरणीय आदर्श उपस्थित करना, इसी कसौटी पर हमारी वास्तविकता अब परखी जानी है। अब तक उपदेशों का कितना प्रभाव अन्त:करण पर हुआ? इस प्रश्र का उत्तर अब हमें आचरण द्वारा ही देना पड़ेगा।

इसी बात को वंदनीया माताजी ने इस प्रकार व्यक्त किया है।

''जीवन में आचरण की महिमा सबसे अधिक है। जिस मनुष्य के कहने और करने में अन्तर रहता है, उसकी बात का प्रभाव न तो दूसरों पर पड़ता है और न वह स्वयं कोई स्थाई सफलता प्राप्त कर सकता है।

हम उनके उपदेशों को पढऩे- सुनने और कभी- कभी वाणी से दुहरा देने में तो गौरव अनुभव करते हैं, किन्तु उसके परिणाम आचरण की कसौटी पर नापने की उनकी अभिलाषा जितने अंशों मे पूरी कर सके, उतने ही अंशों में हमारी गुरुपूजा सार्थक होगी।

प्रेम की पूँजी :- उक्त सभी दिव्य पुरुषार्थ करने के लिए गुरुवर ने प्यार की ,आत्मीयता की पूंजी को मुख्य माना है। उनका कथन है :-
''हमारी एक ही प्रमुख सम्पदा है- प्यार। इसी के बल पर तप, संतोष, विवेक, सेवा, स्वाध्याय, श्रम आदि अन्य सत्प्रवृत्तियों को स्थिर रूप से प्राप्त करने का अवसर मिला है। हमें यदि अंतरंग विभूतियाँ प्राप्त हुई और उनके आधार पर बाह्य जगत् में कुछ हलचलें उत्पन्न करने का अवसर मिला है तो एकमात्र कारण हमारे अन्त:करण में आदि से अंत तक लबालब भरा हुआ प्यार ही है। ईश्वर को माध्यम बनाकर उसकी कृषि की गई और जब वह उगा और फला तो उसका प्रकाश निकटवर्तियों से लेकर दूरवर्तियों तक व्यापक क्षेत्र में फैला।

प्रेम  तत्व के संवर्धन की साधना गुरुभक्ति से आरंभ होकर ईश्वर भक्ति तक जा पहुुँची। हमें इस प्रसंग में इतने अधिक आनंद उल्लास का अनुभव होता रहा है कि उसके आगे संसार का बड़े से बड़ा सुख भी तुच्छ लग सके। यह बढ़ती हुई पे्रम भावना, आत्म प्रेम, परिवार प्रेम और विश्व प्रेम में विकसित होती चली जा रही है।

उन्होंने अपनी प्रेम साधना का स्वरूप स्पष्ट करते हुए यह बताया है कि परिष्कृत प्रेम मनुष्य के पुरुषार्थ को श्रेष्ठ दिशा और प्रखरता देने में समर्थ होता है। वे लिखते हैं :-
मनुष्य जिसे प्यार करता है उसके उत्कर्ष एवं सुख के लिए बड़े से बड़ा त्याग और बलिदान करने को तैयार रहता है। अपने शरीर, मन, अंत:करण एवं भौतिक साधनों का अधिकाधिक भाग समाज और संस्कृति की सेवा में लगाने से रुका नहीं जाता। जितना भी कुछ पास दीखता है उसे अपने प्रिय आदर्शों के लिए लुटा डालने की हूक उठती है। कोई भी सांसारिक प्रलोभन उसे रोक सकने में समर्थ नहीं होता।

यदि हम वास्तव में ही अपने प्रयास- पुरुषार्थ से प्रसन्न करना चाहते हैं तो हमें उनके दिव्य स्पर्श का बोध करते हुए अपने अन्दर दिव्य प्रेम की पूँजी बढ़ानी होगी। फिर साधना, स्वाध्याय, संयम, सेवा आदि के सभी पुरुषार्थ उच्च स्तरीय होने लगेंगे।

पूज्य गुरुदेव ने अपने प्रेम के प्रभाव से परायों को भी अपना बना लिया। हमें अपने अन्दर प्यार का इतना स्तर तो बढ़ाना ही चाहिए कि युग निर्माण के लिए सहमत हर परिजन का विश्वास जीतकर उसे अपनत्व की डोर में बाँध लें। 






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Durgendra Kumar Dubey
2016-07-19 17:55:32
Pura lekh hriday ko chu gya.
OM PRAKASH SONI
2016-07-12 13:15:53
लेख पढ कर ऐसा अनुभव होता है गुरूजी से साक्षात्‍कार हो रहा हो, अपने में और सुधार की कोशिश करूंगा। सादर
Kaushal Prasad Sahu
2016-07-03 09:33:06
Guru Satta ko naman . Atma sudhar hi guru puja.
Jwala guddu
2016-06-24 21:37:56
bahut sundar lekh