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भगवद्भक्ति का श्रेष्ठ रूप है सेवा - परोपकार

[हरिद्वार], Aug 11, 2016
प्रेम की पवित्रता से प्रेरित निःस्वार्थ-निष्कपट सेवा का मार्ग अपनायें, परमात्मा का सच्चा प्यार पायें

प्रेम परमात्मा है, सेवा उसकी भक्ति

हृदय में निवास करने वाला प्रेम परमात्मा का ही रूप है। जनसेवा के माध्यम से मनुष्य इसी हृदयस्थ प्रेम को, परमात्मा को परितृप्त करता है और इस प्रकार वह जनसेवा के माध्यम से परमात्मा की ही भक्ति करता है। जिस मनुष्य के हृदय में जन- जन के लिये प्रेम का प्रवाह बह रहा होगा, वही जनसेवा में प्रवृत्त होगा।

इसके अतिरिक्त जन- जन परमात्मा- रूप है। संसार में मात्र मनुष्य ही क्या, सारे जड़- चेतन उसी एक परमात्मा के रूप हैं। किसी की सेवा करने वाला व्यक्ति वास्तव में हाड़- माँस से बने किसी के शरीर की सेवा नहीं करता, बल्कि देह के माध्यम से उसकी उस आत्मा को ही परितृप्त करता है जो परमात्मा का प्रतिनिधि स्वरूप है। अपने प्रेम और दूसरे की आत्मा को तुष्ट करके मनुष्य एक प्रकार से परमात्मा की दुहरी उपासना ही करता है, दुहरा पुण्य प्राप्त करता है।

सेवा के विविध अनुशासन

सेवा करने का अपना महत्व है, किन्तु सेवा के स्वरूप का भी महत्व कम नहीं है। निःस्वार्थ, निष्कपट और अहेतुक सेवा ही भगवद्भक्ति की कोटि की मानी जायेगी। वह सेवा जिसमें मनुष्य का कोई स्वार्थ निहित होता है, चाहे वह स्वार्थ स्थूल हो अथवा सूक्ष्म, प्रत्यक्ष हो अथवा परोक्ष सेवा की उस कोटि में नहीं आता, जिसे भगवद्भक्ति कहा जाता है। यदि ऐसा होता तो स्वामी सेवा, सरकारी सेवा, भय, लोभ अथवा दबावजन्य सेवाएँ भी भगवद्भक्ति ही मानी जातीं, किन्तु ऐसा नहीं है।

सेवा कर्म में निःस्वार्थता ही नहीं निर्मोहता की भी आवश्यकता है। बहुत सी ऐसी सेवाएँ भी हो सकती हैं जो उपर्युक्त विकारों से मुक्त होने पर भी भगवद्भक्ति की कोटि में नहीं आतीं। जैसे किसी की सेवा करते समय विषमता का भाव होना, घृणा अथवा जुगुप्सा की गंध होना, अपने को अपदस्थ अथवा तुच्छ समझना। सेवा कर्म पर यह कतिपय आरोपण भी सेवा- सत्कर्म को उसकी पुण्यवती स्थिति से भिन्न कर देते हैं।

इसी क्षेत्र में सेवा की विविध श्रेणियाँ हैं। प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय। प्रथम श्रेणी की सेवा वह है, जिससे किसी को स्थायी सुख लाभ हो। द्वितीय श्रेणी की सेवा वह है जिससे किसी का दीर्घजीवी दुःख दूर हो और तृतीय श्रेणी की सेवा वह है जिससे किसी की सामयिक आवश्यकता अथवा आपत्ति दूर हो।

सर्वश्रेष्ठ सेवा- ज्ञानदान

इस श्रेणियों में ज्ञानदान की सेवा प्रथम श्रेणी की है, क्योंकि ज्ञानालोकित किया हुआ मनुष्य संसार के समस्त दुःखों से छूट जाता है। न उसे शारीरिक कष्ट सताता है, न मानसिक और न आर्थिक। वह सारे कष्ट- क्लेशों से एक साथ ही मुक्त होकर चिदानन्दमय हो जाता है। ऐसी ज्ञानमूलक सर्वांगीण सेवा का श्रेय उन ऋषि, मुनियों और संत- महात्माओं को सबसे अधिक प्राप्त हुआ, जिन्होंने अज्ञानान्धकार में भटकती हुई मानवता को प्रकाश का पथ दिखाया।

ज्ञानदान में भी मनुष्य को परमात्मा की ओर अधिकाधिक उन्मुख करना ही श्रेयस्कर सेवा है। जो व्यक्ति जितने व्यक्तियों को उस प्रभु की ओर अग्रसर करता है वह मानो उतनी ही संख्या में, उतने ही रूपों में एक साथ परमात्मा की सेवा करता है। परमात्मा की ओर उन्मुख होने वाले व्यक्ति के पुण्य का एक अंश प्रेरणा देने वाले को भी प्राप्त होता है। अस्तु, परमात्मा की ओर ले जाने वाला ज्ञानदान करना सर्वोपरि सेवा है, सर्वश्रेष्ठ भगवद्भक्ति है।

सहृदयता- सहानुभूति

द्वितीय श्रेणी की सेवा के अन्तर्गत वे सेवाएँ आती हैं, जिनसे किसी का दीर्घजीवी दुःख दूर हो। सहानुभूति तथा सहृदयता द्वारा किसी बिगड़ती हुई स्थिति को सँभालने में सहायता करना, किसी निरपराध की रक्षा करना, किन्हीं की शत्रुता मिटाना और वैमनस्य दूर करना तथा किन्हीं अनाथ- निराश्रितों को आश्रय देना, इस प्रकार की सेवाओं से एक दीर्घकाल तक कष्ट पाने वाला जीवन भी प्रकाश की किरण पा लेगा, जिससे उसकी आत्मा आजीवन उपकारी को शुभाशीष देती रहेगी।

इस प्रकार की सेवाओं में जहाँ वैयक्तिक हित होता है, वहाँ एक प्रकार से समाज का भी हित साधन होता है। सहायता, सौहार्द एवं सहानुभूति के आधार पर जिन व्यक्तियों का दुःख दूर किया जायेगा वे परस्पर सहायता एवं सहयोग आदि मानवीय गुणों का महत्व समझेंगे। इससे उनका मानसिक विकास होगा और वे दूसरों की सेवा में भी प्रवृत्त होंगे। इस प्रकार अच्छे नागरिकों की वृद्धि से सामाजिक वातावरण में एकात्मकता का सन्निवेश होगा।

सामयिक सहायता

आवश्यकता आ पड़ने पर किसी की आर्थिक सहायता करना, किसी रोगी के उपचार का प्रबंध कर देना, किसी विद्यार्थी की फीस दे देना, किसी को छोटा- मोटा काम करा देना, विद्यालय, धर्मशाला, गौशाला, अनाथालय आदि बनवा देना तृतीय श्रेणी की सेवाएँ हैं। इस प्रकार की सेवाओं की पृष्ठभूमि में किसी सक्षम व्यक्ति की उदारता, दया अथवा सहानुभूति रह सकती है, किन्तु बहुधा वह स्थायी नहीं, आकस्मिक अथवा तात्कालिक होती है। संस्थाओं अथवा आश्रय भवनों के निर्माण में तो बहुधा लोगों की दिखाने की वृत्ति, लोकेषणा अथवा अहंकार का भाव ही रहता है।

यद्यपि इस प्रकार की भावना के साथ कोई भी सेवा बहुत सराहनीय अथवा श्रेयस्कर नहीं है, तथापि सामाजिक दृष्टि से इनका अपना महत्व है। अनुकरण करके अन्य लोग भी इस प्रकार के कार्य करने के लिए उत्साहित हो सकते हैं। सुविधा पाने वाले व्यक्तियों को समाज के प्रति आस्था एवं श्रद्धा हो सकती है। शिक्षा- संंस्थाओं द्वारा विद्या का प्रचार होता है और विद्यार्थियों में से किसी भी अच्छे और ऊँचे महात्मा के निकल आने की सम्भावना रह सकती है। विशुद्ध भगवद्भक्ति न होने पर भी इस प्रकार की सामाजिक एवं सार्वजनिक सेवाओं का भी अपना मूल्य और महत्व है। सम्भव है इनसे लोग आध्यात्मिकता की ओर अधिक न बढ़ें, किन्तु सामाजिकता की ओर बढ़ने की प्रेरणा तो पा ही सकते हैं।

सभी प्रकार की सेवाओं का महत्व है और आवश्यकता भी है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने क्षेत्र, अपनी सीमा तथा क्षमता के अनुसार कुछ न कुछ सेवाकार्य अवश्य करना चाहिए। सेवा के हजारों प्रकार हो सकते हैं। वह प्रत्येक कार्य सेवा ही है जिससे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष किसी भी रूप में संसार का दुःख- दर्द दूर हो और हितकारी परिस्थितियाँ उत्पन्न हों।

संसार में जो कुछ भी व्यापार व व्यवहार हो रहा है, वह सब एक- दूसरे की सहायता से चल रहा है। यदि नित्य प्रति के सामान्य व्यापार तथा व्यवहार से स्वार्थ, संकोच, छल, कपट निकाल दिया जाये तो यह माना जायेगा कि संसार का प्रत्येक व्यक्ति मानवता की निष्काम सेवा ही करता है।

वाङ्मय- ५४ ‘मनुष्य में देवत्व का उदय’,
पृष्ठ १.३८ एवं १.८३ से संकलित, सम्पादित

परमार्थ में निहित है सच्चा स्वार्थ

महाप्रभु ईसा अपने शिष्यों से कहते थे - “तुम मुझे प्रभु कहते हो, मुझे प्यार करते हो, मुझे श्रेष्ठ मानते हो और मेरे लिए सब कुछ समर्पण करना चाहते हो। सो ठीक है। परमार्थ बुद्धि से जो कुछ भी किया जाता है, जिस किसी के लिए भी किया जाता है वह लौटकर उस करने वाले के पास ही पहुँचता है । ”

दूसरो को प्रसन्न करना अपने आपको प्रसन्न करने का ही क्रिया-कलाप है। गेंद को उछालना अपनी माँसपेशियों को बलिष्ठ बनाने के अतिरिक्त और क्या है? गेंद को उछालकर हम उस पर कोई एहसान नहीं करते। यदि खेलना बन्द कर दिया जाय तो उन क्रीड़ा उपकरणों की क्या क्षति हो सकती है? अपने को ही बलिष्ठता के आनन्द से वंचित रहना पड़ेगा।

प्रार्थना की सार्थकता

प्रार्थना उसी की सार्थक है जो आत्मा को परमात्मा में घुला देने के लिए व्याकुलता लिए हुए हो। जो अपने को परमात्मा जैसा महान बनाने के लिए तड़पता है, जो प्रभु को जीवन के कण-कण में घुला लेने के लिए बेचैन है, जो उसी का होकर जीना चाहता है, उसी को भक्त कहना चाहिए, दूसरे तो विदूषक हैं। 

लेने के लिए किया हुआ भजन वस्तुतः प्रभुप्रेम का निर्मम उपहास है। भक्ति में तो आत्म-समर्पण के अतिरिक्त और कुछ होता ही नहीं। वहाँ देने की ही बात सूझती है, लेने की इच्छा ही कहाँ रहती है?

भक्ति का मर्म

ईश्वर रूठा हुआ नहीं है कि उसे मनाने की मनुहार करनी पड़े। रूठा तो अपना स्वभाव और कर्म है, मनाना उसी को चाहिए। मन को मना लिया, आत्मा को उठा लिया तो समझना चाहिए कि ईश्वर से की गयी प्रार्थना सफल हो गयी और उसका अनुग्रह उपलब्ध हो गया।

ईश्वर के प्रति विश्वास सत्कर्मों की कसौटी पर ही परखा जा सकता है। जो भगवान पर भरोसा करेगा, वह उसके विधान और निर्देश को भी अंगीकार करेगा। भक्ति और अवज्ञा का तालमेल बैठता कहाँ है?

प्रभु की ज्योति का अवतरण

हम अपने आपको प्यार करें ताकि ईश्वर से प्यार कर सकने योग्य बन सकें। हम अपने कर्त्तव्यों का पालन करें ताकि ईश्वर के निकट बैठ सकने की पात्रता प्राप्त कर सकें। जिसने अपने अन्तःकरण को प्यार से ओत-प्रोत कर लिया, जिसके चिन्तन और कर्त्तत्व में प्यार ही प्यार है, ईश्वर का प्यार केवल उसी को मिलेगा। जो दीपक की तरह जलकर प्रकाश उत्पन्न करने को तैयार है, प्रभु की ज्योति का अवतरण उसी पर होगा।








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Kishn choudhary
2016-10-03 09:58:44
Good feeds


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