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हीनता से उबरें, महानता उभारें

[हरिद्वार],
अपना उद्धार स्वयं करो
भगवान ने मनुष्य को उन सब विशेषताओं से परिपूर्ण बना कर इस पृथ्वी पर भेजा है। जिसके  आधार पर वह अपना उद्धार-उत्थान, बड़ी सरलता से कर सकता है। उसके शरीर, उसके मन की रचना अलौकिक  है। उसकी अन्तरात्मा ऐसी शक्ति और सामर्थ्य से परिपूर्ण है, जिसके आधार पर अपने जीवन में स्वर्ग का और अपने समाज में शान्ति का अवतरण कर सकता है। पर यदि हम अपनी सामर्थ्य और शक्ति को भूले ही रहें उसका अपयोग ही न करें, तो गया-गुजरा, दुःख अभावों में ग्रस्त दीन-हीन जीवन बिताना ही पड़ेगा।
गीताकार ने अर्जुन को, और उसके माध्यम से मनुष्य मात्र को प्रेरणा दी है कि वह अपना उद्वार आप करे। अपने उत्कर्ष के लिए स्वयं कटिबद्ध हो। अपने उत्थान और पतन की जिम्मेदारियाँ स्वयं वहन करे।

उद्धरेदात्मनात्मानां नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
 गीता ६/५

हे अर्जुन/मनुष्य! अपना उद्धार आप कर, अपने आपको गिरने न दे। अपना आपा ही अपना मित्र है और अपना शत्रु है। जिसने अपने को जीत लिया-सुधार लिया, उसका आपा ही उसका मित्र बनकर अगणित विभूतियों के उपहार प्रदान करता है और जिसने अपने आपे को गिरा लिया वह स्वयं ही अपना शत्रु है। उस शत्रु से इतनी अधिक हानि होने की संभावना रहती है, जितनी संसार के सारे शत्रु मिलकर भी मनुष्य का अहित नहीं कर सकते।

मनुष्य को यह विश्वास करना ही चाहिए कि यदि उसे ऊँचा उठना है तो उसमें उसका निज का पुरुषार्थ ही प्रधान होगा। सहयोग करने वाले और आगे बढ़ने में मदद करने वाले सज्जनों की भी इस दुनियाँ में कमी नहीं हैं, पर वह मिलती तभी है जब मनुष्य अपनी पात्रता को कसौटी पर कस कर खरा सिद्ध कर देता है। सहायता का उपयोग भी तभी हो सकता है जब मनुष्य उसका पात्र हो अन्यथा कीचड़ में दूध डालने की तरह वह सहायता भी निष्फल चली जाती है।

प्रगति के पथ पर बढ़ चलने की परिस्थितियाँ उपलब्ध हों तो उसके लिए देवताओं से भी कुछ माँगना व्यर्थ है, क्योंकि मर्यादाओं का उल्लंघन करना जिस तरह मनुष्य के लिए उचित नहीं है, उसी तरह देवताओं की भी अपनी मर्यादाएँ हैं। जिसने अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत करने की, कठोर काम करने की तपश्चर्या की हो, वे केवल ऐसे ही सत्पात्रों को अपने अनुग्रह, अनुदान, वरदान दिया करते हैं।

दूसरों को दोष देना उचित नहीं

संसार में बुरे लोग हैं और उनमें बुराइयाँ भी कम नहीं हैं। उनकी गलतियाँ और बुराइयाँ भी हमें परेशान करती हैं और अनेक प्रकार की बाधाएँ खड़ी करके प्रगति का द्वार रोकती हैं। पर यह भी ध्यान देने योग्य है कि कोई वस्तु सजातीय एवं अनुकूल परिस्थितियों में ही बढ़ती एवं पनपती है। बुराई को अपना रूप प्रकट करने का अवसर तभी मिलेगा जब वैसी बुराई अपने अंदर भी हो। अपना स्वभाव उत्कृष्ट हो तो बुरे लोगों को भी झक-मार कर निरस्त होना पड़ता है।

क्रोधी मनुष्य को आक्रमण करने का अवसर उसी व्यक्ति पर मिलता है जो स्वयं भी क्रोधी हो। क्रोध से क्रोध बढता है और उसकी क्रिया-प्रतिक्रिया द्वंद्वयुद्ध का रूप धारण कर लेती है। यदि एक व्यक्ति नम्र, सहनशील, हँसमुख, क्षमाशील और दूरदर्शी हो तो क्रोधी स्वभाव का मनुष्य भी उसे उत्तेजित नहीं कर पाता। वह अपनी नम्रता और सज्जनता से उसे शान्त कर देता है और क्रोध का जो मूल कारण था, उसके समाधान का भी उपाय सोच लेता है। इसके विपरीत यदि दोनों ही क्रोधी हुए तो कोई बड़ा कारण न होते हुए भी केवल शब्दों की उच्छृ्रखलता लेकर परस्पर लड़ मरते हैं और मित्रता शत्रुता में बदल जाती है।

दुराचारी की दाल वहीं गलती है जहाँ सदाचार का पक्ष दुर्बल हो। ठग हमेशा लोभी पर हाथ साफ करते हैं। दरिद्रता आलसी के घर आती है। बीमारियाँ असंयमी पर हावी होती हैं। भय डरपोक को सताता है। अदूरदर्शी एवं जल्दबाज को चिन्ताएँ घेरती हैं। यदि अपना व्यक्तित्व सच्चा, खरा और मजबूत हो तो इन बाहरी विकृतियों को उलटे पाँवों लौटना पड़ेगा। पत्थर पर तलवार का प्रहार क्या सफल होगा?
ताली दोनों हाथों से बजती है। मक्खी गन्दगी पर बैठती है। घाव होगा तो उसमें कीड़े भी पड़ेंगे। यदि अपना पक्ष पहले से ही स्वच्छ रखा जाय तो सारे संसार के दोष मिलकर भी व्यक्ति का कुछ नहीं बिगाड़ सकते। चंदन के पेड़ में लिपटे रहने वाले अनेकों सर्प उसे विषैला नहीं बना सकते। दुष्टों की दुष्टता सज्जनों को खरोंच भले ही पहुँचाये, पर उन्हें परास्त नहीं कर सकती।

हम बदलेंगे-युग बदलेगा

दुनियाँ में जो काँटे-कंकड़ फैले हुए हैं, उन्हें बीनकर अपनी यात्रा के सभी मागों को हम निरापद बनाने का प्रयत्न करें तो इसमें सफलता मिल सकना कठिन है क्योंकि काँटे, कंकड़ों की संख्या अधिक है। जिन रास्तों पर हमें समय-समय पर चलना पड़ता है उनकी लम्बाई भी हजारों मील बैठती है। इन परिस्थितियों में यही उचित प्रतीत होता है कि काँटे बीनने की प्रक्रिया को सीमित करके हम अपने पैरों में जूते पहनने का उपाय पसन्द करें। यह अपेक्षाकृत सरल और सीधा उपाय है।
संसार के हर दुर्जन के सज्जन बनने की, हर बुराई को भलाई में बदल जाने की आशा करना वैसी ही आशा है जैसी सब रास्तों पर से काँटे-कंकड़ हट जाने की। यदि हमने इसी आशा को अपनी प्रसन्नता और सन्तुष्टि का आधार बनाया हो तो निराशा ही हाथ लगेगी। हाँ, यदि हम अपने स्वभाव एवं दृष्टिकोण को बदल लें तो यह कार्य जूता पहनने के समान सरल होगा और इस माध्यम से हम अपनी प्रत्येक परेशानी को बहुत अंशों में हल कर सकेंगे।

अपने स्वभाव और दृष्टिकोण में परिवर्तन कर सकना कुछ समयसाध्य और निष्ठासाध्य अवश्य है, पर असम्भव तो किसी भी प्रकार नहीं है। मनुष्य चाहे तो विवेक के आधार पर अपने मन को समझा सकता है, विचार और दृष्टिकोण में परिवर्तन कर सकता है। इतिहास के पृष्ठ अपने हलके और ओछे दृष्टिकोण को बदलकर संसार के श्रेष्ठ महापुरुष बन जाने वाले अनेक उदाहरणों से भरे पड़े हैं। अपनी विचार शैली की त्रुटियों को समझ सकना और उनको सुधार लेना बुद्धिमत्ता और उच्च साहस का काम है, लेकिन असम्भव नहीं।

मन ही कामधेनु है, मन ही कल्पवृक्ष

जीवन के उत्थान एवं पतन का केन्द्र मन है। यह मन जिधर चलता है, जिधर इच्छा और आकांक्षा करता है, उधर ही उसकी अपनी एक दुनियाँ बनकर खड़ी हो जाती है। उसमें ऐसा अद्भुत आकर्षण एवं चुम्बकत्व है कि जिससे संसार की वैसी ही वस्तुएँ, घटनाएँ, साधन-सामग्री, मानवीय एवं दैवी सहायता एकत्रित हो जाती हैं, जैसी कि उसने इच्छा एवं कामना की थी। पृथ्वी का कल्पवृक्ष मन ही है। मन को कामधेनु कहा गया है। यही कामना करता है और वही उनकी पूर्ति के साधन भी जुटा लेता है।   

आत्म-कल्याण की पहली सीढ़ी आत्म-निरीक्षण और दूसरी आत्म-सुधार है। जो अपनी समीक्षा करने और अपना सुधार करने की आवश्यकता को समझता है और उसके लिए ईमानदारी से तत्पर रहता है, वह गिरी हुई स्थिति में नहीं पड़ा रह सकता। उसके जीवन का विकास होने ही वाला है। उसे प्रगति के पथ पर चलते हुए एक दिन महापुरुषों की श्रेणी में अपनी गणना कराने का अवसर मिलने ही वाला है।

हमें अपने गुण, कर्म एवं स्वभाव का परिष्कार करना चाहिए। अपनी विचार पद्धति एवं गतिविधि को सुधारना चाहिए। जिन कारणों से हमें निम्न स्तरीय जीवन बिताने को विवश होना पड़ रहा है, उन्हें ढूँढना चाहिए और साहस एवं मनोबलपूर्वक उन सभी कारणों के कूड़े-कचरे को मन-मन्दिर में से झाड़ बुहार कर बाहर फैंक देना चाहिये। हम अपने उद्धार के लिए, उत्थान के लिए कटिबद्ध होंगे तो सारा संसार सहायता करेगा।

वाङ्मय-३१ ‘संस्कृति संजीवनी श्रीमद्भागवत एवं गीता’,  पृष्ठ १.१२४-१.१२८ से संकलित, सम्पादित


श्रम से मिली सफलता का मर्म

महर्षि धन्वन्तरि की पीठ पर एक घाव हो गया। वे उसकी दवा बनाने के लिए जड़ी-बूटियों की तलाश और उनके अनुसंधान के कार्यों में जुट गये। दूर-दूर तक घूमे, सैकड़ों जड़ी-बूटियाँ ढूँढ़ी, उनके गुण-दोषों का परीक्षण किया, पर किसी में भी अपने घाव को भरने की सामर्थ्य न पायी।

एक दिन इसी शोधकार्य में घूमते हुए महर्षि को एक आवाज़ सुनाई दी। यह आवाज़ एक जड़ी की थी। वह कह रही थी-महाराज! मैं आपके रोग की औषधि हूँ।
जड़ी दुर्लभ नहीं थी। प्रायः प्रतिदिन ही उससे महर्षि धन्वन्तरि का सामना होता था। अतः उन्होंने आश्चर्य के साथ पूछा, ‘‘मैं इतने दिनों से मारा-मारा फिर रहा था, अपने घाव से परेशान था। यह राज इतने दिनों से तूने मुझे क्यों नहीं बताया? जैसे आज बोली वैसे पहले भी बोल सकती थी।”

जड़ी बड़ी विनम्रता के साथ कहने लगी, ‘‘महाराज! मैं अनायास ही मिल जाती तो आप इतना बड़ा शोधकार्य कैसे करते? श्रम और संघर्ष के बिना आप लोकमंगल का माध्यम बनने का श्रेय-सौभाग्य और पुण्य कैसे अर्जित कर पाते?’’

जो अपनी समीक्षा करने और अपना सुधार करने की आवश्यकता को समझता है और उसके लिए ईमानदारी से तत्पर रहता है, वह गिरी हुई स्थिति में नहीं पड़ा रह सकता। उसके जीवन का विकास होने ही वाला है। उसे प्रगति के पथ पर चलते हुए एक दिन महापुरुषों की श्रेणी में अपनी गणना कराने का अवसर मिलने ही वाला है।








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Arun Yadav
2016-09-10 12:19:22
मन ही कामधेनु है, मन ही कल्पवृक्ष जीवन के उत्थान एवं पतन का केन्द्र मन है। यह मन जिधर चलता है, जिधर इच्छा और आकांक्षा करता है, उधर ही उसकी अपनी एक दुनियाँ बनकर खड़ी हो जाती है। उसमें ऐसा अद्भुत आकर्षण एवं चुम्बकत्व है कि जिससे संसार की वैसी ही वस्तुएँ, घटनाएँ, साधन-सामग्री, मानवीय एवं दैवी सहायता एकत्रित हो जाती हैं, जैसी कि उसने इच्छा एवं कामना की थी। पृथ्वी का कल्पवृक्ष मन ही है। मन को कामधेनु कहा गया है। यही कामना करता है और वही उनकी पूर्ति के साधन भी जुटा लेता है।
Aruin Yadav
2016-09-10 12:17:05
जो अपनी समीक्षा करने और अपना सुधार करने की आवश्यकता को समझता है और उसके लिए ईमानदारी से तत्पर रहता है, वह गिरी हुई स्थिति में नहीं पड़ा रह सकता। उसके जीवन का विकास होने ही वाला है। उसे प्रगति के पथ पर चलते हुए एक दिन महापुरुषों की श्रेणी में अपनी गणना कराने का अवसर मिलने ही वाला है।


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