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वन्दनीया माताजी का बाहरी रूप अति सहज और आन्तरिक रूप अति दिव्य रहा

[हरिद्वार], Sep 07, 2016
उनकी दिव्यता का अनुभव करने वाले साधकों में दिव्यता का विकास सहज संभव है 
सबकी माँ- सच्ची माँ 

उनकी स्थूल काया के अन्दर दिव्य मातृत्व कितनी गहराई से भरा था, इसका उल्लेख गत आलेख के अंत में पूज्य गुरुदेव के शब्दों में किया जा चुका है। बचपन में भी उनकी वह विशेषता प्रकट होती रहती थी, भले ही कोई समझे या न समझे। 

उनके प्रिय खेल थे भगवान शिव की पूजा और गुड्डे- गुड़ियों की परवरिश करना। इन खेलों में उनके भावों की गहराई कुछ अलग ही होती थी। पूजा करते करते गहन ध्यान में डूब जाती थीं, समय का बोध नहीं रहता था। कोई पूछता, ‘‘लाली! यह क्या करती रहती है?’’ यह उमर तो खेलने की है। तो उनका जवाब होता था, ‘‘मेरा यह मन पसंद खेल है। इसमें मेरा मन खूब लगता है।’’ वास्तव में उनके इस बाल सहज कथन में एक गूढ़ तथ्य छिपा होता था। जैसे बच्चों का स्वभाव खेलने का होता है, वैसा उनका स्वभाव शिवत्व की साधना करने का था। शांतिकुंज में जब देव कन्याओं के साथ उनकी साधना प्रक्रिया चल रही थी, तब एक साधक परिजन ने उनसे संकोच सहित पूछा था, ‘‘माताजी, आप तो स्वयं सिद्धिदात्री हैं, आपको साधना करने की क्या जरूरत है?’’ माताजी का उत्तर था, ‘‘बेटे! साधना मेरे लिए आवश्यक नहीं, वह तो मेरा सहज स्वभाव है। इसकी आवश्यकता मुझे नहीं, तुम बच्चों को होती है। बच्चे तो बच्चे ठहरे। उनसे जाने- अनजाने में भूलें होती हैं, पाप भी हो जाते हैं। जब उनके परिणाम उभरते हैं तो वे पुकारते हैं- माताजी बचाओ! माँ के नाते मुझे उन्हें सँभालना ही पड़ता है, मेरी साधना इसीलिए होती है। यही मेरी साधना है।’’ बचपन में गुड्डे- गुड़ियों को सजाने- सँवारने में, उनकी बीमारी में उनका उपचार करने में वे अपने अन्दर के मातृत्व के भाव को तृप्त करतीं और प्रखर बनाती रहती थीं। अक्सर वे खेल के बीच भी गहन भावों में डूब जाती थीं। यह देख- देखकर उनके बड़े भाई श्री दीनदयाल जी ने उनसे प्यार भरा उलाहना देते हुए कहा, ‘‘लाली! तू बीच- बीच में इतनी गंभीर क्यों हो जाती है, जैसे सारी दुनिया का भार तेरे ही सिर पर हो?’’ 

उन्होंने भाई पर गहरी दृष्टि डालते हुए सहज भाव से कह दिया, ‘‘सो तो है! दुनिया का भार मेरे ऊपर नहीं तो किस के ऊपर होगा?’’ निश्चित रूप से बड़े भाई उनके कथन के रहस्य को समझ नहीं सके, किन्तु उनके कथन में यह तथ्य तो झलक ही रहा था कि वे अपने सूक्ष्म दायित्वों के प्रति कितनी सजग रहती थीं।
 
मथुरा में :- अखण्ड ज्योति कार्यालय तथा प्रेस के सभी कार्यकर्त्ताओं के प्रति उनका ममत्व छलकता ही रहता था। एक मशीन मैन था अब्दुल लतीफ। माताजी उसके लिए भी सहज भाव से चाय, भाोजन आदि की व्यवस्था कर दिया करती थीं। एक ब्राह्मणी विधवा को माताजी ने घर में आश्रय दे रखा था। वह बड़ी भावना के साथ ग्रहकार्य में सहयोगिनी बनी रहती थी। उसने माताजी से एक बार कहा, ‘‘माताजी, लतीफ के लिए भोजन आदि की व्यवस्था करना तो ठीक है, किन्तु उसके खाने के बर्तन तो अलग कर देने चाहिए।’’ माताजी के मन को उसकी सलाह ने वेदना पहुँचाई। वे बोलीं, ‘‘तू इतने दिनों से मेरे साथ रहकर भी मुझे समझ नहीं पायी? अरे मैं माँ हूँ, सिर्फ माँ। हिन्दू- मुसलमान सबकी माँ। मेरे लिए जैसा ओमप्रकाश और सतीश है, वैसा ही अब्दुल लतीफ भी है।’’ यह कहते हुए लतीफ के जूठे बर्तन स्वयं उठाकर सफाई के स्थान पर ले गयीं। यह सब देख- सुनकर अब्दुल लतीफ के भाव कुछ इस प्रकार फूट पड़े, ‘‘माँ! आप सचमुच माँ हो। आपका दर्जा फरिश्तों से भी ज्यादा बुलन्द है।’’ 

श्रद्धांजलि समारोह में :- पू.गुरुदेव के महाप्रयाण के बाद संकल्प श्रद्धांजलि समारोह की तैयारियाँ चल रही थीं। हरिद्वार में कनखल से लेकर हरिपुर कलाँ (देहरादून) तक नगर बसाये जा रहे थे। पंतद्वीप, बिरला फार्म जैसे विशाल मैदानों में झाड़- झंखाड़ हटाकर सफाई का दुर्गम कार्य हो रहा था। तमाम विषैले जीव- जन्तुओं से पाला पड़ रहा था। वन्दनीया माताजी अचानक उन स्थानों पर स्वयं सेवकों के बीच पहुँच गयीं। कहा, बच्चों का कार्य देखने, उत्साह बढ़ाने आयी हूँ। 

किसी ने पूछा, इतना ही कि कुछ और भी? कुछ सोचकर माँ बोली, ‘‘यहाँ बहुत विषैले जीव थे, उनसे बच्चों को खतरा हो सकता था। मैंने उन्हें शान्ति से अन्यत्र चले जाने को कह दिया है। पता नहीं सुनने वाले उनके कथन को कितना समझ पाये, लेकिन किसी ने कहा कि विषैले जीवों को मारा भी तो जा सकता है?’’ यह बात सुनते ही माताजी का स्वर तीखा हो गया, बोली, ‘‘क्यों मारोगे उन्हें? उनने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? एक तो तुम लोग उनके रहने के ठिकाने उजाड़ रहे हो, ऊपर से मेरे उन बेजुबान बच्चों को मारोगे भी?’’ सुनने वाले स्तब्ध रह गये। वन्दनीया माताजी मनुष्यों की ही नहीं, अन्य सभी प्राणियों की भी माँ हैं, इस गूढ़ तथ्य को अहसास उन्हें हुआ। 

लौकिक जीवन में भी उनके मातृत्व का प्रवाह अद्भुत रहा। उनके अपने गर्भ से पैदा सतीश (मृत्युंजय शर्मा) और शैलो (शैल जीजी) हों या पहली वाली माताजी (पू.गुरुदेव की पहली पत्नी) से पैदा ओमप्रकाश एवं दया हों अथवा गायत्री परिवार से जुड़े परिजन, उनके मातृत्व का पावन स्पर्श सभी को कृतकृत्य बनाता रहा। ऐसे अगणित परिजन मिलते हैं, जिन्होंने बताया कि गुरुदेव तो मुश्किल से समझ में आये, प्रारम्भ से ही ‘माँ’ के ममत्व ने उन्हें बाँध लिया था। पू.गुरुदेव स्नेह भरे व्यंग की भाषा में स्वयं भी कह करते थे, ‘‘माताजी रानी मक्खी हैं, बड़ी तेजी से बच्चे (मानसपुत्र) पैदा करती हैं। वास्तव में उनका मातृत्व अद्भुत है, जिन्हें उनका बोध हुआ या हो सके, वे सभी धन्य हैं।’’ 

कहियत भिन्न न भिन्न पू. गुरुदेव ने अपने अन्तरंग परिजनों से अनेक बार यह बात कही है कि उनमें और माताजी में कोई भेद न मानें। वे शिव और शक्ति की तरह, राम और सीता की तरह ‘कहियत भिन्न न भिन्न’ ही रहे। पू.गुरुदेव को दादा गुरुदेव ने यह बता दिया था कि कुछ समय बाद उन्हें पूर्व जन्मों की जीवन संगिनी का साथ पुनः मिल जायेगा। इसी तरह वन्दनीया माताजी को भी किशोरावस्था में शिवार्चन के क्रम में यह बोध होने लगा था कि एक दिव्य पुरुष के रूप में ‘शिव’ उनकी प्रतीक्षा में हैं। उन्हें उनके दिव्य कार्य में सहयोगिनी बनना है। माताजी के पिताजी ने जब पं.रूप किशोर के तपस्वी पुत्र श्रीराम मत्त से विवाह की बात चलायी, तब अपनी बड़ी बहू (माताजी की बड़ी भाभी) से ‘लाली’ का विचार जानने के लिए कहा था। भाभी की बात सुनकर उन्होंने थोड़ा ध्यान किया और उन्हें यह आभास हो गया कि यही वह दिव्य पुरुष हैं। उन्होंने भाभी से संक्षेप में कह दिया, ‘‘भाभी, दादा से कह देना मुझे सारी बातें स्वीकार हैं। वे जो कुछ करने जा रहे हैं, उसी में मेरा कल्याण है।’’ विवाह होने के बाद तो उनकी निर्मल और प्रबल समर्पण साधना ने उन्हें चेतना स्तर पर गुरुदेव के साथ एकाकार कर दिया था। यह तथ्य कभी गुरुदेव के तो कभी माताजी के शब्दों में प्रकट भी होता रहता था। विभिन्न घटनाओं से तार्किक और बुद्धिजीवी परिजनों को भी उनकी आन्तरिक एकरूपता का बोध होता रहता था। महाराष्ट्र के श्री विष्णुनारायण गोवरीकर मथुरा के शिविरों में अक्सर शामिल हुआ करते थे। उन दिनों गायत्री तपोभूमि में भोजनशाला की व्यवस्था नहीं थी, इसलिए साधकगण भोजन करने अखण्ड ज्योति संस्थान जाया करते थे। एक बार विष्णु जी अपनी पारिवारिक समस्याओं से बहुत परेशान थे। साधना क्रम में भी उनका मन उस मकड़जाल से निकल नहीं पाता था। शिविर के दूसरे दिन भोजन करते समय माताजी उनकी मनःस्थिति देखकर कहने लगीं, ‘‘बेटा, अब तुम मेरे पास आ गये हो। परेशान मत होओ, तुम्हारी तमाम परेशानियों से हम निपट लेंगे। तुम निश्चिंत मन से भोजन करो।’’ उन्होंने माताजी के कथन को सामान्य सहानुभूति के शब्द मानकर उस पर ध्यान नहीं दिया। उदास मन से ही भोजन करते रहे। उनकी यह स्थिति देखकर माताजी पुनः बोल पड़ीं। उनकी खेती और दुकान सम्बन्धी कठिनाइयों, पत्नी की बीमारी आदि सब का जिक्र करने लगीं। फिर बोलीं, ‘‘इतनी सब कठिनाइयों के बीच तुम्हारा चिन्तित होना भी स्वाभाविक है, किन्तु माँ के पास पहुँचकर भी चिन्ता का निवारण न हुआ तो माँ के होने का क्या फायदा? हम सब ठीक करेंगे।’’ वे हतप्रभ रह गये। घर के बाहर उन्होंने अपनी परेशानियों की चर्चा किसी से भी नहीं की थी, फिर माताजी कैसे सब जान गयीं? इस असमंजस में वे वापिस तपोभूमि पहुँच गये। वहाँ गुरुदेव को प्रणाम किया तो गुरुवर कहने लगे, ‘‘बेटे, जब माताजी ने तुम्हारी परेशानियों का जिम्मा अपने ऊपर ले लिया है तो फिर चिन्ता किस बात की?’’ अब उन्हें और भी अधिक आश्चर्य हो गया। जब शिविर के साथियों से इस असमंजस की चर्चा की तो अनेकों ने उन्हें दोनों की अभिन्नता के अपने भी अनुभव सुना दिये। वे अबोध बालक की तरह सुनते रहे। घर पहुँचकर जब उनकी समस्याओं के हल एक- एक करके अप्रत्याशित ढंग से होने लगे, तब उन्होंने गुरुदेव और माताजी की एकरूपता और उनकी सामर्थ्य को समझा। अपने पत्रों में उन्होंने इस अनुभव का जिक्र किया। तपोभूमि, मथुरा और शांतिकुंज, हरिद्वार के अन्तेवासी कार्यकर्त्ताओं से लेकर क्षेत्र के अनेक परिजनों को ऐसे अनुभव बहुत होते रहे हैं। 

महाशक्ति स्वरूपा माँ वे वास्तव में महाशक्ति रूप ही थीं। अक्सर लौकिक माता की सहजता में उनका वह दिव्य रूप छिपा रहता था। किन्तु समय- समय पर वह रूप खुल भी जाता था। उसकी झलक पाकर लोग आश्चर्य में पड़ जाते थे। ऐसे ही किन्हीं परिजनों को समझाते हुए पू.गुरुदेव ने कहा था :- ‘‘तुम लोग माताजी को साधारण न समझो, वे शक्तिरूप हैं, महाशक्ति हैं। वे अपने आध्यात्मिक ऐश्वर्य को छिपाकर सामान्य ढंग से रहा करती हैं। वे तुम लोगों के हित जिस सहजता के साथ कर देती हैं, उतना तो मैं भी नहीं कर सकता। उनके सम्पर्क मात्र से पूर्व जन्मों के कषाय- कल्मषों, कुसंस्कारों का नाश होता है। नये दिव्य संस्कारों का उदय होता है।’’ 

बाड़मेर के ठाकुर हनुमंत सिंह जागीरदार थे। कुसंगति से तमाम दोष- दुर्गुण उनमें आ गये थे। परिजन इस बात से बहुत परेशान थे। वे उन्हें किसी प्रकार तपोभूमि शिविर में ले आये। किसी साधना में उनका मन नहीं लगा, किन्तु माताजी के हाथ का सादा भोजन वे न जाने क्यों रुचिपूर्वक करते रहे। उनके विचार और भाव बदलने लगे। गलत भाव स्वभाववश मन में आते तो माताजी की सौम्य मूर्ति स्मृति में उभरने लगती। लगता, वे सब देख रही हैं। घर पहुँचकर भी उनकी वृत्ति पुरानी आदतों की ओर नहीं झुकी। लेकिन कुसंग के दबाव में उन्होंने मांस- मदिरा का सेवन कर ही लिया। उसी दिन से उनकी हालत बिगड़ने लगी। उल्टी, दस्त का सिलसिला दवाओं के बावजूद थमता ही नहीं था। लोग घबरा गये। लेकिन ठाकुर साहब को लगता था कि उनके सिरहाने बैठकर माताजी सिर सहलाती हुई कहती हैं, ‘‘बेटा! घबराना नहीं। यह विरेचन ‘शोधन’ चल रहा है। विकार बाहर जायेगा, मेरे भोजन में दिये संस्कार क्रमशः विकसित होंगे, सब ठीक हो जायेगा।’’ थोड़े दिनों में वे ठीक हो गये। वृत्तियाँ बदल गयीं। तपोभूमि में शिविरों में भाग लेने लगे। बड़ी भावना से वे कहते थे, ‘‘सधे हुए साधकों के मार्गदर्शक तो गुरुवर हैं, वे अवतारी हैं। लेकिन हम जैसे अनगढ़- निकृष्ट संतानों के लिए तो माताजी ही सब कुछ हैं।’’ उनका महाशक्तिस्वरूप पू.गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना के समय अचानक खुलकर सामने आ गया। उनके देहान्त के बाद श्रद्धांजलि समारोह के दौरान और अश्वमेधों के क्रम में तो वे सर्व समर्थ सत्ता के रूप में स्पष्ट दिखने लगी थीं। शरीर छोड़ने के बाद तो मानो प्रकृति के संचालन, परिवर्तन का सारा चक्र वही सँभाल रही हैं। परिजन उनकी कृपा और अपनी श्रद्धा के संयोग से उनके स्वरूप को समझकर सुनिश्चित लाभ उठा सकते हैं। 







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