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वसन्त पर्व पर आयोजित किये जाने वाले कार्यक्रमों के विविध स्वरूप

वसंत पर्व आयोजन के अनेक प्रारूप बन सकते हैं। उन सबको मिला कर उसके दो प्रमुख वर्ग माने जा सकते हैं।
1. शक्तिपीठों- प्रज्ञा संस्थानों में सम्पन्न किए जाने वाले कार्यक्रम। 2. अन्य सामाजिक संगठनों और शिक्षण संस्थानों में किए जाने वाले कार्यक्रम। 
1. प्रज्ञा संस्थानों में :- हर वर्ष वसंत पंचमी को माँ सरस्वती के अवतरण पर्व और युगऋषि के आध्यात्मिक जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। प्रात: सामूहिक जप, यज्ञ आदि क्रम स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार चलाये जाते हैं। इस बार पर्वायोजन को आत्मकल्याण और लोककल्याण की दृष्टि से अधिक व्यापक और प्रभावी बनाया जाना है। प्रस्तावित रूपरेखा इस प्रकार है। 
• सभी साधकों को अपना साधनात्मक स्तर बढाने के लिए सूचित- प्रेरित किया जाय। साधकगण पर्व के एक सप्ताह पहले से ही गहन चिन्तन- आत्मसमीक्षा करके अपनी जीवन साधना के लिए उच्चतर लक्ष्य निर्धारित करें। तद्नुसार कुछ विशेष साधना- प्रार्थना का क्रम चलायें। 
• प्रात:काल निर्धारित स्थलों पर एक घंटे का सामूहिक जप एवं यज्ञादि का क्रम रखा जाय। उसमें सभी साधक अपने लक्ष्यों के अनुरूप संकल्पों को पूरा करने के लिए गुरुसत्ता- परमात्मसत्ता से प्रार्थना करें। पूर्णाहुति के पहले हाथ में अक्षत- पुष्प लेकर आत्मोत्कर्ष के संकल्प लें, तब पूर्णाहुति करें। 
• अंत में प्रसाद- अमृताशन जैसी व्यवस्थाएँ भी सुविधानुसार रखी जा सकती है। सायंकाल:- वसंत पर्व की दिव्य प्रेरणाएँ, मनुष्य मात्र के लिये उज्जवल भविष्य लाने वाली युग निर्माण योजना के सूत्र जन- जन तक पहुँचाने के लिये विराट सभा जैसा स्वरूप दिया जाए। समय स्थानीय सुविधा के अनुसार नियत करें। 
• उसमें अपने परिजनों के साथ ही विभिन्न प्रगतिशील संगठनों के प्रतिनिधियों, क्षेत्र के प्रतिष्ठित व्यक्तियों एवं भावनाशील नर- नारियों को शामिल होने के लिए आमंत्रित- प्रेरित किया जाए। • मंच पर मशाल का एक बड़ा चित्र स्थापित किया जाए और उसके साथ माता सरस्वती का भी चित्र रखा जाए। सम्मानित आमंत्रित विशिष्ट व्यक्तियों के बैठने की अलग से सम्यक व्यवस्था बनायी जाए। पर्व पूजन के लिये कुछ विशिष्ट प्रतिनिधियों को पहले से तैयार किया जा सकता है। • कार्यक्रम की कुल अवधि लगभग ढाई घण्टे रखी जाए। प्रारंभ में वातावरण और व्यवस्था बनाने के लिये कुछ भजन- कीर्तन करने का समय उसके अतिरिक्त रखा जा सकता है। प्रस्तावित क्रम इस प्रकार रखा जा सकता है। • चयनित प्रतिनिधियों द्वारा दीप प्रज्वलन, पुष्पांजलि, सरस्वती वंदना 15 मिनट। • भजनोपदेश शैली में युगऋषि के जीवन पर प्रकाश डालने और वसंत की प्रेरणा देने का क्रम अथवा मिशन के एवं आमंत्रित कुशल वक्ताओं द्वारा उक्त विषयों पर प्रेरक उद्बोधन- 45 मिनट। • चयनित प्रतिनिधियों द्वारा पर्व पूजन- 30 मिनट। • पर्व संकल्प को समझाते हुए संकल्प कराना, जयघोष- शांतिपाठ आदि- 15 मिनट। • स्थानीय व्यवस्था के अनुसार विशिष्ट अतिथियों का स्वागत करने, साहित्य भेंट देने के क्रम जोड़े जा सकते हैं। 
2. शिक्षण संस्थानों में:- विभिन्न विद्यालयों में सरस्वती पूजन के नाम पर कार्यक्रम रखे जा सकते हैं। भारतीय संस्कृति ज्ञान परिक्षा के माध्यम से या सहज ही जिन शिक्षण संस्थानों के व्यवस्थापकों से संपर्क हो उन्हें इसके लिए प्रेरित किया जा सकता है। कार्यक्रम कुछ इस प्रकार रखे जा सकते हैं। (समय एक से डेढ़ घण्टा) • दीप प्रज्वलन, सरस्वती वंदना- 15 मिनट। • मिशन के प्रतिनिधि द्वारा वसंत का संदेश एवं पर्व पूजन- 40 मि. • बच्चों द्वारा प्रस्तुतियाँ (गायन- वादन आदि)- 30 मि. • अध्यक्षीय भाषण- 10 मिनट। यदि हो सके तो पर्व के एक दिन पूर्व अथवा समारोह के पूर्व बच्चों की कुछ प्रतियोगिताएँ (कविता प्रस्तुति, गीत आदि) रखी जा सकती है। विजयी बच्चों द्वारा प्रस्तुति तथा उन्हें इनाम देने का क्रम समारोह में जोड़ा जा सकता है। • शिक्षण संस्थानों में जो संस्कृति मण्डल चल रहे हों, उनके संचालकों को सम्मानित करने तथा नये मण्डल गठित- संचालित करने के प्रयास किये जायें। आशा है कि परिजन योजनाबद्ध प्रयास करेंगे और वसन्त पर्व पर विद्या विस्तार की एक व्यापक लहर पैदा कर दिखायेंगे।






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