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होलिकोत्सव का स्वरूप विवेकयुक्त, प्रदूषण- अंधपरम्परा मुक्त रहे

[Haridwar], Mar 13, 2017
सुसंगठित सुनियोजित प्रयासों से पर्याप्त सफलता मिल सकती है

विवेकयुक्त परम्पराएँ

जन जीवन में परम्पराओं का विशेष महत्त्व रहा है। विकासमान पीढ़ी और जनसामान्य को संस्कृति के दार्शनिक स्वरूप का बोध बहुत कम होता है। वे तो उल्लास भरी परम्पराओं के माध्यम से ही अधिक प्रभावित होते हैं। समाज के विचारशील व्यक्ति किसी आदर्श उद्देश्य को पूरा करने के लिए कुछ नियम बनाते हैं। उनके सत्परिणामों के कारण उन्हें जन- जन अपना लेता है तथा वे कालान्तर में परम्पराओं का रूप ले लेते हैं। वही परम्पराएँ जब अविवेकपूर्वक अपनाई जाने लगती है, तो अंधपरम्पराओं का रूप ले लेती है। उनसे लाभ के स्थान पर हानि होने लगती है।

कुछ उदाहरण- पहले साधु संत एकान्त निर्जन स्थानों पर प्रकृति के सान्निध्य में रहकर साधना करते थे। वहाँ वे अग्नि की धूनी रमा लेते थे। उन दिनों वनों में सूखे पड़ों की लकड़ियाँ बहुतायत से मुफ्त में मिल जाती थीं। उनके माध्यम से अग्नि प्रज्वलित रखने के अनेक लाभ थे। हिंसक पशु अग्नि से दूर रहते हैं। अग्नि से कंद मूल आदि भून लेने से लेकर ठण्ड से बचाव के विविध लाभ मिल जाते थे। अपरिग्रही साधु वस्त्र भी कम से कम पहनते थे। शरीर पर भस्म लपेटने से त्वचा की सुरक्षा हो जाती थी।
अब स्थिति भिन्न है। वन बहुत घट गये हैं। लकड़ी बहुत महँगी मिलती है। अग्नि प्रज्वलन के अनेक सस्ते और सहज साधन उपलब्ध हैं। अधिकांश साधु- संत, आबादी के निकट आश्रम बनाकर रहते हैं। ऐसी स्थिति में धूनी जलाकर रखना पर्यावरण के लिए भी हानिकारक है और खर्चीला भी है।

अपरिग्रही साधु पानी के पात्र के रूप में तूँबी या नारियल के खोल से कमण्डलु बना लेते थे, यह उचित था। अब परिपाटी निभाने के लिए जो कमण्डलु खरीदे जाते हैं, उतने में तो धातु के कईर्पात्र पाये जा सकते हैं।

पर्वों के क्रम में भी इसी प्रकार विवेक की उपेक्षा करके परम्पराओं के नाम पर विसंगतियों को बढ़ावा दिया जा रहा है। होली के सन्दर्भ में भी बहुत कुछ ऐसा ही हो रहा है। जरूरत है कि पर्वों के उल्लास को सुरक्षित रखते हुए परिपाटियों में कुछ इस प्रकार का संशोधन किया जाय कि उनके मूल प्रयोजनों की पूर्ति भी होने लगे।

समीक्षात्मक दृष्टि
होली पर्व के साथ अनेक परिपाटियाँ जुड़ी हैं। उन्हें किन्हीं श्रेष्ठ आदर्शों को महत्त्व देने के लिए बनाया गया था। उनके बारे में विवेकपूर्ण समीक्षा करने की जरूरत है कि उनका स्वरूप क्या था? अब क्या हो गया? और उसे कैसा होना चाहिए?

होलिका दहन - प्रह्लाद अपने समय का एक प्राणवान सत्याग्रही था। उसका पिता हिरण्यकशिपु ईश्वरीय सामाजिक अनुशासनों की उपेक्षा करके अनीतिपूर्वक धन और यश कमाने में लगा था। प्रह्लाद ने सत्याग्रह किया। सत्याग्रही को विचलित और नष्ट करने के प्रयास असफल होते गये। उसकी बुआ होलिका द्वारा प्यार प्रदर्शन के नाम पर गोद में लेकर जला देने का कुचक्र रचा गया। प्रभुकृपा से प्रह्लाद बच गये, होलिका जल गयी। सत्य अग्नि- परीक्षा से जलता नहीं, निखरता है। इस तथ्य को स्मरण करने के लिए होलिका जलाई जाने की परिपाटी बनायी गयी।

किसी समय जंगलों में बड़ी मात्रा में सूखे झाड़- झंखाड़ फैले रहते थे। वसंत के पतझड़ की पत्तियाँ भी बहुत होती थी। उन्हें सामूहिक श्रमदान द्वारा अधिक से अधिक इकट्ठा करके होलिका दहन की रस्म पूरी की जाती थी। उस समय यह प्रक्रिया पर्यावरण की सहयोगी थी। इस दृष्टि से होली बड़ी से बड़ी रचने की स्वस्थ स्पर्धा चल पड़ी जो ठीक थी।

अब स्थिति भिन्न है। वनों का अनुपात न्यूनतम से भी कम हो गया है। ऐसे में चोरी जबरदस्ती से बड़ी से बड़ी होली जलाने की होड़ अनुचित है। श्रमदान पूर्वक झाड़- झंखाड़ इकट्ठे करके, प्रतीक रूप में होली जलाने की रस्म पूरी की जा सकती है। उद्देश्य पर दृष्टि रहे तो उमंग की दिशा ठीक दी जा सकती है। उस उत्साह को अश्लील साहित्य, चित्र, पोस्टर आदि इकट्ठा करने में लगाया जा सकता है।

नवान्न यज्ञ : भारतीय संस्कृति में यज्ञ को बहुत महत्त्व दिया गया है। गीता में लिखा है कि ‘जो व्यक्ति पहले यज्ञ करके बाद में पदार्थों का भोग करता है उसे धर्म की सनातन प्रक्रिया का लाभ मिलता है। जो अपने लिए ही पकाता है, वह तो पाप ही खाता है।’ इसी आदर्श के अनुसार होली को सामूहिक यज्ञ का रूप देकर नये अन्न की आहुतियाँ देकर उसी को प्रसाद रूप में वितरण करके यज्ञीय परिपाटी को पोषण दिया जाता था।

अब वह परंपरा लुप्तप्राय हो गयी है। केवल गेहूँ, चने की बालें भून कर बाँटने की प्रतीकात्मक परम्परा भर कहीं- कहीं रह गयी है। जो उत्साह कभी सत्य के संरक्षण, पर्यावरण शोधन एवं यज्ञीय परिपाटी के पोषण में लगता था, वह अब अधिकतर अनगढ़ हुल्लड़बाजी में लगने लगा है। विचारशील साहसी व्यक्ति पुनः इसे सही दिशा दे सकते हैं।

समता साधना : होली समता का पर्व है। उस दिन जाति भेद, वर्गभेद से ऊपर उठकर पिछले द्वेष, द्रोह को भुलाकर सब सामूहिक उल्लास से शामिल होते थे। सामूहिक स्वच्छता में सभी शामिल होते थे। जो उससे बचते थे, उन्हें स्नेहाधिकार पूर्वक साथ ले लेते थे। वह परिपाटी अब धूल कीचड़ की अनगढ़ होली की विसंगतियाँ में बदल गयी।

रंग गुलाल : पहले प्रकृति के अनुदानों से प्राप्त रंगों का प्रयोग होता था। वह रंग रंगीली मस्ती के साथ स्वास्थ्यवर्धक भी होते थे। टेसू (पलाश) के फूलों का रंग औैर प्राकृतिक उत्पादों से गुलाल बनते थे। अब रासायनिक रंग, गुलाल आदि से लेकर डामर, कालिख आदि का उपयोग होने लगा है। वह कैसा उल्लास जिससे अपना मन विकृत हो और साथियों के स्वास्थ्य पर भी आघात हो?

गले मिलकर आत्मीयता प्रकट करने की परिपाटी किसी रूप में अभी भी कायम है। उसे बाहरी औपचारिकता से ऊपर उठाकर आत्मीयता के विस्तार तक ले जाने की जरूरत है।

हम कर सकते हैं, जरूर करें
युगऋषि ने स्पष्ट किया है कि कमजोर मनोभूमि के लोग अपने उद्देश्य को भूलकर परिस्थितियों के प्रवाह में बहने लगते हैं। सबल मनोभूमि वाले लोग अपने संकल्पबल तथा तप पुरुषार्थ से परिस्थितियों को बदल देते हैं। उनके मार्गदर्शन एवं संरक्षण में सृजनशिल्पियों ने जमाने की हवा बदली है। गायत्री सब तक पहुँच गयी, यज्ञ में सभी शामिल होने लगे। सभी जाति वर्गों के नर- नारियों में से पुरोहित तैयार कर दिये गये। यह सब ऐसे असाधारण कार्य हैं, जिन्हें करने की कल्पना कुछ दशक पूर्व तक कोई नहीं करता था। सृजन सैनिक अपने इसी विवेक और साहस को लेकर मिल पड़ें, तो कुछ वर्षों में होली जैसे पर्वों को उनके गरिमामय सनातन स्वरूप तक पहुँचा देना बहुत कठिन नहीं है। कुछ प्रयोग तत्काल किये जा सकते हैं। कुछ सुझाव निम्नानुसार हैं

प्राणवान, प्रौढ़ और युवा परिजनों की संयुक्त टोलियाँ बनायी जायें। वे हर गाँव, मुहल्ले के मूर्धन्यों, होली समिति के सदस्यों से संपर्क करें। उन्हें पर्यावरणनिष्ठ (इकोफ्रेंडली) तथा संस्कृतिनिष्ठ होली मनाने की प्रेरणा दें। जितने बिन्दुओं पर सहज सहमति बने उन्हें चरितार्थ करने की व्यवस्था सहयोगपूर्वक बनायी जाय।

होली दहन : सत्यग्रही प्रहलाद की तरह लोकहित के लिए दृढ़तापूर्वक तत्पर होने के लिए प्रेरित किया जाय। प्रयोग रूप में होली को आदर्शनिष्ठ बनाने का लक्ष्य दिया जाय।

होली में झाड़ झंखाड़ों के अलावा चोरी- सीनाजोरी से उपयोगी लकड़ी डालने की अनगढ़ होड़ से बचा जाय। उस उत्साह को घर- घर सम्पर्क करके अश्लील साहित्य, चित्र, पोस्टर आदि इकट्ठे करके डालने की स्वस्थ स्पर्धा खड़ी की जाय।

यज्ञीय भाव : पहले कई जगह यह प्रथा रही है कि सामूहिक होली जलने के बाद वहाँ से अग्नि लाकर घर- घर उपलों की होली प्रतीक रूप में जलाई जाती थी। इस प्रथा को समयानुसार नवीन रूप दिया जा सकता है।

होली दहन के पूर्व विभिन्न होली समितियों के सदस्यों को यज्ञ में शामिल होने का आमन्त्रण दिया जाय। आमन्त्रित सदस्यों की संख्या के अनुसार १ से ५ कुण्डीय यज्ञ किया जाय। यज्ञ में देवपूजन आदि संक्षिप्त करके यज्ञ की सीमित आहुतियाँ करायी जायें। उसमें व्याख्या सहित नवान्न यज्ञ, क्षमावाणी, मातृभू पूजन, त्रिधा समता पूजन आदि कर्मकाण्ड कराये जायें। पूर्णाहुति करके यज्ञाग्नि सभी प्रतिनिधि सम्मान पूर्वक ले जायें। उसी अग्नि से होली में अग्नि स्थापन करके होली को यथा संभव यज्ञीय रूप दिया जाय। अश्लीलतादहन का क्रम घोषणापूर्वक किया जाय।

समता- साधना : होली दहन के समय जन सामान्य सुनने- समझने की स्थिति में लगभग नहीं ही रहते हैं। इसलिए उस समय तो नवान्न आहुति, प्रसाद वितरण तक ही सीमित रहा जा सकता है। अगले दिन होली खेलने वाले दिन पूर्व निर्धारण के आधार पर नीचे लिखे अनुसार कोई एक प्रयोग किया जा सकता है।

क- जहाँ पूर्व सन्ध्या पर सामूहिक यज्ञ किया गया था, वहाँ या किसी मान्य मन्दिर आदि पर सबेरे विभिन्न होली समितियों के सदस्य एकत्रित हों। एक दो प्रगतिशील गीतों के बाद मातृभू पूजन, त्रिधा समता पूजन आदि कराकर, राष्ट्रभक्ति एवं समता के भाव उभारे जायें। फिर वहीं से होली की टोलियाँ अनुशासित उल्लास के साथ अपने अपने क्षेत्र में होली खेलने निकल पड़ें। होली टोलियों के अनुशासन पूर्व निर्धारित रहे। क्षेत्र प्रतिष्ठित व्यक्ति भी साथ चलें। गीत नारों आदि के साथ क्षेत्र भ्रमण करते हुए स्नेह- उल्लास का वातावरण बनाया जाय।

ख- होली खेलने वाले दिन शाम को किसी एक स्थल पर होली मिलन समारोह रखा जाय। वहाँ उक्त कर्मकाण्ड मान्य प्रतिनिधियों से सम्पन्न कराये जायें। होली के एक दो प्रगतिशील गीत कराये जायें। उसके बाद पिछले दोष द्रोह भूलकर पुनः मित्र भाव से सबको गले लगाने का भावभरा अनुरोध करके गुलाल या होली की भस्म का तिलक करते हुए मिलन क्रम चलाया जाय। जिन व्यक्तियों के बीच किसी कारण वैमनस्य पैदा हो गया हो ऐसे कुछ व्यक्तियों को पहले से समझाकर सहमत कर लिया जाय। वे मंच पर वैमनस्य दूर करने, पुनः स्नेह सम्बन्ध बनाने की घोषणा करके गले मिलें तो सब समूह में अच्छा सन्देश जाएगा।

रंग गुलाल : सभी होली समितियों से प्रारम्भ में ही चर्चा करके गन्दी वस्तुएँ, जहरीले रंग आदि का उपयोग न करने के संकल्प करा लिये जायें। प्राकृतिक रंग गुलाल आदि के लिए पहले से ही व्यवस्थाएँ बनायी जा सकती हैं। इस दिशा में और भी अनेक संगठन प्रयत्नशील होते हैं तो उन सबके साथ मिलकर इस प्रक्रिया को अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता है।

कुछ अन्य क्रम : होली के सामूहिक जुलूस निकालने की परम्परा कई स्थानों पर होती है। नगर की होली दोपहर में निकल जाने के बाद रंग गुलाल का क्रम बन्द कर दिया जाता है। उस होली में अश्लीलता विरोधी, नशा निवारण सम्बन्धी झाँकियाँ आदि जोड़ी जा सकती हैं। शाम के कार्यक्रम में प्रेरक संगीत एवं कविता पाठ जैसे कार्यक्रम भी जोड़े जा सकते हैं। विद्यार्थियों के बीच होली के पहले ऐसी प्रतियोगिताएँ भी करायी जा सकती हैं। विजयी छात्रों को इस कार्यक्रम में शामिल और सम्मानित किया जा सकता है।

सृजन सैनिकों ने अपनी निष्ठा, सूझबूझ और कौशल से अनेक उल्लेखनीय परिवर्तन किये हैं। वे होली पर्व को भी पुनः गरिमामय स्वरूप दे सकते हैं। संकल्पित, सुनियोजित, संगठित प्रयास सफल होते रहे हैं। आगे भी होते रहेंगे। इस विश्वास के साथ आगे बढ़ें।






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