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चैत्र नवरात्र से ऋतुचक्र का नया आवर्तन, नववर्ष भी प्रारम्भ होता है

इसे शक्ति साधना के साथ नये वर्ष में प्रवेश के शुभ समारोह का रूप भी दें
समय चक्र और पर्व

पर्वों- त्योहारों को पूरे विश्व में विभिन्न रूपों में मनाया जाता है। वर्षभर के समय चक्र में उनका अपना एक विशेष स्थान होता है। प्रतिवर्ष माह विशेष की निर्धारित तिथियों (तारीखों) में इन्हें मनाया जाता है। पर्व- त्योहार भले ही किन्हीं ऐतिहासिक प्रसंग विशेष से जुड़े हों अथवा प्राकृतिक ऋतुक्रम से; उनके लिए हर वर्ष में माह और तिथियाँ वही रहती हैं। वे प्रकृति के किसी खास काल- प्रवाह से जुड़े होते हैं।

समय की गणना आकाशीय पिण्डों की सापेक्ष गति (रिलेटिव वैलोसिटी) के आधार पर की जाती है। पृथ्वीवासियों के लिए सूर्य और चंद्र की सापेक्ष गति के आधार पर समय की गणना की जाती है। पृथ्वी अपनी धुरी पर पूरा एक चक्कर (३६० डिग्री या अंश) जितने समय में लगाती है, उसे अहोरात्र (दिन- रात) कहा जाता है। उसे साठ घटी या २४ घंटों में विभक्त किया गया है। इसके आगे की गणना में सप्ताह, माह और वर्ष आते हैं। सात दिन का एक सप्ताह और बारह माह का एक वर्ष विश्व स्तर पर सभी देशों में मान्य है।

सप्ताह के सात दिन ही क्यों? वर्ष में १२ माह ही क्यों? इसका समाधान केवल भारतीय ज्योतिष शास्त्र में मिलता है। सप्ताह का निर्धारण होरा चक्र के अनुसार होता है। आकाश को १२ राशियों में विभक्त किया गया है। पृथ्वी की सापेक्ष गति के अनुसार चन्द्रमा लगभग एक माह में और सूर्य एक वर्ष में १२ राशियों में घूम जाता है। सूर्य एक राशि में लगभग एक माह रहता है। इस आधार पर वर्ष के १२ माह होते हैं।

पृथ्वी के वातावरण पर सूर्य और चन्द्र दोनों का उल्लेखनीय प्रभाव पड़ता है। ऋतुओं पर सूर्य की स्थिति का तथा वृक्षों वनस्पतियों के गुणों और मनुष्य की मनोदशा पर चन्द्रमा का विशेष प्रभाव पड़ता है। मनोरोगियों की स्थिति के अध्ययन से यह तथ्य स्पष्ट होते रहे हैं। इसीलिए मनोरोगियों को अंग्रेजी में ‘ल्यूनेटिक’ अर्थात् चंद्र प्रभावित कहा जाता है।

भारतीय मनीषियोंं ने प्रयास यह किया है कि निर्धारित पर्व के मूल समय में सूर्य और चन्द्रमा की जैसी स्थिति थी, लगभग वैसी ही स्थिति हर वर्ष रहे। इसलिए उन्होंने महीनों को चन्द्रमा की स्थिति के अनुसार निर्धारित किया और वर्ष को सूर्य की स्थिति के अनुसार बनाये रखने की व्यवस्था बनायी। उनमें जो अन्तर आता है उसे चौथे वर्ष अधिक मास (एक माह अतिरिक्त) जोड़ कर सन्तुलित कर लिया जाता है। इसलिए प्रत्येक पर्व पर चन्द्रमा और सूर्य के प्रभाव प्रतिवर्ष लगभग समान स्थिति में बने रहते हैं। इस प्राकृतिक स्थिति का लाभ साधकों को बराबर मिलता रहता है।

अन्य परम्पराओं में यह सन्तुलन नहीं बन पाता। यूरोपीय परम्परा में सौर वर्ष ही १२ महीनों में विभक्त किया गया है। उनका सम्बन्ध चन्द्रमा की स्थिति से नहीं रहता। इसलिए यूरोपीय पर्वों पर केवल सूर्य की स्थिति ही पूर्ववत रहती है। अरब देशों की परम्परा में चन्द्रमा के अनुसार १२ माह निर्धारित हैं और उन्हें मिलाकर वर्ष पूरा कर लिया जाता है। यह चान्द्र वर्ष सौर वर्ष से ८- १० दिन छोटा होता है। इसलिए उनके पर्वों के साथ सूर्य की स्थिति, ऋतुओं की संगति नहीं बैठ पाती। एक परम्परा में चन्द्रमा और दूसरी परम्परा में सूर्य की स्थिति पर्वों में बदलती रहती है। उन्हें प्रकृति के सूक्ष्म प्रवाहों का सन्तुलित लाभ नहीं मिल पाता।

संवत्सर
चैत्र नवरात्र पर्व हर वर्ष चैत्र मास कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक ही मनाया जाता है। सूर्य की स्थिति लगभग वही रहने से यह पर्व प्रतिवर्ष वसन्त और ग्रीष्म के संधिकाल में ही पड़ता है। समय के वार्षिक चक्र की नयी शुरुआत भी यहीं से मानी जाती है। सौर वर्ष मानने वाले यूरोपीय देशों के महीनों पर ध्यान देने से भी यही बात सिद्ध होती है।

ऊपर उल्लेख किया जा चुका है कि बृहत् आकाश को १२ राशियों में विभाजित किया गया है। आकाश को अम्बर भी कहा जाता है। अंग्रेजी माहों के नाम (सितम्बर, अक्टूबर, नवम्बर, दिसम्बर) वास्तव में सप्त अम्बर (आकाश का सातवाँ विभाग) अष्ट अम्बर, नव अम्बर और दस अम्बर के अपभ्रंश हैं। इस हिसाब से जनवरी ग्यारहवाँ और फरवरी बारहवाँ माह सिद्ध होता है। वर्ष के ३६५ दिनों को १२ महीनों में बाँटने के क्रम में उन्हें ३० और ३१ दिनों का निर्धारित किया गया। अन्तिम माह फरवरी में शेष २८ दिन ही रह गये। इस तथ्य के आधार पर अंग्रेजी भाषा में मार्च का अर्थ ‘चल पड़ना’ भी इसी तथ्य के अनुकूल है। मार्च को ही प्रथम अम्बर, नववर्ष का प्रारम्भ माना जाना युक्ति संगत है। नवरात्र पर्व प्रतिवर्ष लगभग इसी माह में पड़ता है। अस्तु प्रकृति चक्र के अनुसार नये वर्ष का शुभारम्भ यहीं से माना जाना उचित है।

भारतीय संस्कृति की यह विशेषता रही है कि पर्वों को उत्साह भरे समारोह के साथ ही आत्मिक प्रगति, आध्यात्मिक विकास के लिए अनुकूल वातावरणयुक्त साधना से भी जोड़ा जाता रहा है। नये वर्ष का उपयोग श्रेष्ठ- शानदार ढंग से करना है तो उसके लिए प्रबल इच्छा के साथ पर्याप्त शक्ति भी तो चाहिए। इसीलिए नौ दिन शक्ति साधना करके अपने अन्दर की शक्तियों एवं विभूतियों को संयमित और पवित्र- प्रखर बनाकर नववर्ष का शुभारम्भ करने की परम्परा बना दी गयी। इसे विवेकपूर्ण ढंग से समय के अनुरूप प्रभावपूर्ण और आकर्षक बनाकर जन- जन को इससे जोड़ने के प्रयास किए जाने चाहिए।

उल्लास भरी साधना
तमाम लोग साधना को कठिन और नीरस- उबाऊ मानते हैं। यह उनके अज्ञानजनित- पदार्थवादी, संकीर्ण दृष्टिकोण के कारण है। साधना का, तप का उद्देश्य होता है इष्ट- कामना की पूर्ति। इष्ट लक्ष्य की प्राप्ति को जीवन का सबसे श्रेष्ठ सुख माना जाता है। जिस माध्यम से, जिस साधना से अपना प्रिय इष्ट- लक्ष्य मिलता है, उसका तो हर चरण प्रिय लगने लगता है। यदि ऐसा नहीं हो रहा है तो साधना के क्रम में कहीं भूल हो रही होती है।

इस तरह की चूक के मुख्य दो पक्ष होते हैं। एक तो ‘इष्ट’ के निर्धारण में कमी। लोगों की देखादेखी किसी काल्पनिक लाभ को लक्ष्य करके साधना का कर्मकाण्ड प्रारम्भ कर दिया जाता है। इष्ट लक्ष्य के प्रति असीम प्रेम- श्रद्धा का अभाव रहने से उसमें मन नहीं लगता। दूसरी बात यह कि अपना अभ्यास कच्चा होता है। अभ्यास की कमी से न तो पर्याप्त श्रम सध पाता है और न कौशल विकसित हो पाता है। इसीलिए श्रीमद् भगवद्गीता में लिखा है-
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।
अर्थात् मन को वश में करने के लिए अभ्यास (नियमित श्रम और कौशल का निखार) तथा वैराग्य (लक्ष्य के प्रति अनन्य प्रेम- अटूट श्रद्धा) की आवश्यकता पड़ती है। इस आधार पर यदि लक्ष्य के प्रति अटूट श्रद्धा तथा कर्मकाण्ड का समुचित अभ्यास हो तो साधना- क्रम उल्लास भरा होना निश्चित है। साधना- क्रम को विवेकपूर्वक निर्धारित करने से यह सुसंयोग सध सकता है।

लक्ष्य :- हर व्यक्ति (नर- नारी) की यह कामना होती है कि हमारा नया वर्ष बहुत सुन्दर बीते। उसके लिए अपने मनोभावों की शुद्धि करना तथा लक्ष्य तक पहुँचने के लिए पर्याप्त मनोबल, आत्मबल होना जरूरी है। साधना विधान में शामिल जप, तप, व्रत, संयम आदि से इन्हीं को बढ़ाया जाता है। नये वर्ष में जो अवसर हमें मिलने वाले हैं, उनका भरपूर लाभ उठाने के लिए हमें शक्ति अर्जित करनी ही है, ऐसा भावभरा संकल्प लेकर साधना में प्रवेश करना चाहिए।

अभ्यास :- अभ्यास क्रमशः बढ़ता है। इसीलिए संस्कृत का सूत्र है- ‘स्वल्पारंभः क्षेमकरः।’ छोटी शुरूआत टिकाऊ होती है। साधक की वर्तमान सामर्थ्य से थोड़ा अधिक करने का उत्साह लेकर मंत्र, जप, लेखन, पाठ संयम साधना आदि का निर्धारण करना चाहिए। इससे हर नवरात्र साधना अनुष्ठान से साधक की क्षमता का क्रमिक विकास होता रहता है।

उक्त दोनों सूत्रों को समझ- समझाकर हर साधक को उल्लास भरी साधना से जोड़ा जा सकता है। नवरात्र साधना को व्यापक और प्रभावशाली बनाया जा सकता है।

साधनामय समारोह
समारोहों से जन- जन में हर्षोल्लास का उभार आता है। हर्षाेल्लास से मनुष्य के अन्दर की कार्यक्षमता विकसित होती है। उस वातावरण में अनजान, नादान व्यक्ति भी उस धारा विशेष के साथ जुड़ने लगते हैं। लेकिन यहाँ यह ध्यान रखने की आवश्यकता है कि यह सब इष्ट लक्ष्य को पाने की साधना को प्रखर बनाने के लिए है। यदि यह तथ्य भुला दिया जाता है तो  पर्वो का उल्लास अनगढ़ मस्ती और व्यसन आदि की तरफ घूम जाता है। ऐसा सभी वर्गो में देखा जाता है।

क्रिसमस जैसे पर्व पर ईसा मसीह को नाम मात्र की श्रद्धांजलि देकर शराब पीने और मौज- मस्ती का आलम देखा जा सकता है। एक जनवरी- न्यू इयर्स डे पर भी अनगढ़ उछल- कूद और नशे में धुत्त लोगों के कारण दुर्घटनाओं की संख्या बढ़ जाती है। होली के समय भी अनगढ़ता के विकृत कर्तब दिखाई देने लगते हैं। नवरात्र के हर्षोल्लास के साथ भी नशा करके गरबा करने- रात्रि जागरण के स्वांग करने के दृश्य खूब देखे जा सकते हैं।

उक्त विसंगतियों से बचने के लिए और पर्वो का समुचित लाभ उठाने के लिए समारोहों को भी साधनामय बनाने के विवेकपूर्ण प्रयास किए जाने चाहिए।

कुछ बेहतर करें
इस नवरात्र पर कुछ विशेष, कुछ नवीन प्रयोग- प्रयास करने की योजना नैष्ठिक परिजनों को बनानी चाहिए, जैसे -
नवरात्र की सामूहिक साधनाओं के लिए उपयुक्त स्थल अधिक से अधिक संख्या में निश्चित किए जायें। साधकों को उल्लासभरी प्रखर साधना करने के लिए प्रेरित और संकल्पित कराया जाय। सामूहिक जप के साथ अंत में सामूहिक भजन, कीर्तन जैसे क्रम भी जोड़े जा सकते हैं। प्रत्येक सामूहिक साधना स्थल पर साधना तथा हर्षोल्लास के संतुलित समन्वय के लिए समर्थ साधकों, नैष्ठिक परिजनों को जिम्मेदारी सौंपी जाय।
* जैसे १ जनवरी के नववर्ष की पूर्व संध्या पर व्यापक हर्षोल्लास का वातावरण बनाया जाता है, वैसे ही नवरात्र प्रारम्भ की पूर्व संध्या पर प्रकृति चक्र के अनुकूल नववर्ष के शुभारंभ- स्वागत के लिए साधनात्मक समारोहों की व्यवस्था बनायी जा सकती है। विभिन्न संगठनों को इसके लिए प्रेरित- प्रोत्साहित करने के लिए पहले से सम्पर्क अभियान चलाया जा सकता है।
* पूर्व संध्या के दिन दुर्गा माता के संक्षिप्त पूजन के साथ भजन संध्या, भजनोपदेशक शैली से सत्प्रेरणायें जागरण, समूहगान, अभिनय नृत्य जैसे कार्यक्रमों के साथ नये वर्ष को अधिक श्रेष्ठ- प्रगतिशील बनाने के लिए व्यक्तिगत और समूह साधना करने की प्रेरणाओं का संचार किया जा सकता है।
* नवरात्र में जहाँ- जहाँ दुर्गा स्थापनाएँ की जाती हैं, वहाँ के संयोजकों से सम्पर्क- परामर्श करके उन्हें अधिक विवेक सम्मत रूप दिया जा सकता है। जैसे

• शक्ति साधना पर्व पर शारीरिक, मानसिक तथा आत्मिक शक्ति बढ़ाने के लिए गीतों या अभिनय द्वारा प्रेरणा देना।
• योग व्यायाम के प्रदर्शन, संयम साधना से शक्ति अर्जन के सूत्र समझाना।
• मन को सन्मार्गगामी बनाने के लिए श्रेष्ठ पुरुषों के प्रेरक संस्मरण सुनाने या सुगम अभिनय द्वारा प्रदर्शित करने के क्रम।
• आत्मिक शक्ति अर्जन के लिए इष्ट मंत्र या नाम के जप, लेखन, शक्ति के अनुसार व्रत अपनाने की प्रेरणा देने के क्रम।
• समारोहों में पर्यावरण संतुलन बनाये रखने के लिए मूर्ति निर्माण से लेकर उनके विसर्जन तक के लिए अनुशासन निश्चित करना।
• दुर्गा द्वारा आसुरी शक्तियों को परास्त करने के उदाहरण के साथ मनुष्य के स्वभाव में घुसी हुई आसुरी वृत्तियों को मार भगाने के लिए संक्षिप्त उद्बोधनों, गीतों, अभिनय द्वारा प्रेरणा देने के क्रम जोड़ना। इन्हीं विषयों पर छात्र- छात्राओं द्वारा कविताएँ, गीत एवं भाषण की प्रतियोगिताएँ भी करायी जा सकती हैं।

शक्ति साधना से अपने व्यक्तित्व को पवित्र और प्रखर बनाकर, जनसहयोग से दुर्गाशक्ति को जगाकर समाज और राष्ट्र को समुन्नत बनाने के नूतन प्रयोगों को नवरात्र साधना से जोड़कर नये वर्ष पर शानदार लक्ष्यों तक पहुँचने के लाभ चैत्र नवरात्र साधना द्वारा प्राप्त किए जा सकते हैं।






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