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नवयुग सृजन के लिए युगशक्ति का अवतरण

प्रेरणा, प्रोत्साहन, अग्रगमन का दायित्व अग्रदूतों को ही निभाना होगा

देवत्व उभारें, अग्रदूत बनें
भगवान निराकार है। उसका कर्तृत्व प्रेरणाओं तक ही सीमित रहता है। उन्हें क्रियान्वित करने का उत्तरदायित्व देवमानवों के कंधों पर आता है। युद्ध में योद्धा का पराक्रम और साहस ही जीतता है, पर प्रत्यक्षतः लड़ाई तो हथियारों से ही होती है, भले ही वे लोहे जैसी सस्ती धातु के ही क्यों न बने हों? शास्त्र गहन अध्ययन के आधार पर लिखे जाते हैं, पर वह कृत्य तो उँगलियों के सहारे कागज- कलम की सहायता से ही होता है। उसी प्रकार निराकार भगवान वर्चस्व प्रेरणाओं तक ही सीमित है। उनका कार्यान्वयन देवमाानवों को भूतकाल में भी करना पड़ा है और अब भी वही होना है।

‘देव’ आदर्श हैं और ‘मानव’ क्रिया समुच्चय है। दोनों का सम्मिलित स्वरूप ‘देवमानव’ है। उसे अवतार की झाँकी भी कह सकते हैं। सूर्य की स्वर्णिम किरणों का दिव्य दर्शन सर्वप्रथम पर्वत- शिखरों पर होता है। ऊषा की अरुणिमा धरती को आश्वासन देती है कि आलोक के अवतरण में अब देर नहीं।

युग- परिवर्तन की अवतारी प्रक्रिया के सर्वाधिक महत्त्व का कार्य यह है कि उसकी दिव्यता का संवहन करने में कुछ समर्थ आत्माएँ अग्रदूतों की तरह धरती पर आती हैं भावी गतिविधियों की पृष्ठभूमि बनाती हैं। हर अवतरण के साथ अग्रगामियों की, युगदूतों की एक बड़ी सेना होती है। उनका बाह्य स्वरूप भले ही सामान्य हो, पर वे भीतर से असामान्य होते हैं। सामान्य जनों को तो पेट पालने और संतति जनने के कुचक्र से आगे बढ़ने की न इच्छा होती है और न हिम्मत, किंतु असामान्यों पर कुछ दूसरा ही नशा छाया रहता है। उनका चिन्तन और कर्तृत्व इतना ऊँचा होता है, जिसकी सामान्यों के साथ कोई संगति नहीं बैठती। एक पाताल में धँसता है, दूसरा आसमान में उड़ता है।

देवमानवों का अस्तित्व यों तो आदर्शवादियों के रूप में सदा ही बना रहता है, पर युग अवतरण के समय उनके दिव्य दर्शन सुलभ होते हैं। रामावतार के रीछ- वानर, कृष्णावतार के ग्वाल- बाल, बुद्ध के भिक्षु, गाँधी के सत्याग्रही परिस्थिति से सामान्य और मनःस्थिति से महान थे। उनके पौरुष का प्रथम परिचय इस रूप में उभरा कि उन्होंने लोक- प्रवाह में बहने से इनकार कर दिया। भले ही वह उपहासास्पद बने, किंतु कष्टकर सेवा- साधना स्वीकार करने और विषमताओं से जूझने की तपश्चर्या में उन्हें तनिक भी कठिनाई प्रतीत नहीं हुई। जबकि सामान्य लोगों के लिए भीतरी और बाहरी दबाव तथा आकर्षणों से बच निकलना दुष्कर ही नहीं, असंभव जैसा लगता है।

युगपरिवर्तन जैसा महत्कार्य ऐसे अंतरंग सामर्थ्यवानों के बल पर ही संभव है। यह प्रयास केवल आत्मशक्तिसंपन्न व्यक्ति ही कुशलतापूर्वक संपन्न कर सकते है। स्मरण रखा जाना चाहिए कि व्यक्ति वही कुछ नहीं है जो वह बाहर से स्थूल रूप में दिखाई देता है, बल्कि उसकी मूल सत्ता तो उसकी चेतना है, जहाँ आस्थाओं की जड़ें विद्यमान रहती हैं, निष्ठाओं के बीज पोषण और अंकुरण को प्राप्त करते हैं। अतःआस्थाओं का शोधन और निष्ठाओं का परिष्कार किए बिना सुधार के सभी प्रयास व्यर्थ जाते हैं। आस्थाओं का परिष्कार ही नव- निर्माण का मूल आधार है और यह कार्य आत्मशक्ति संपन्न व्यक्तियों द्वारा ही किया जाना संभव है।

नवसृजन का गुरुमंत्र
आत्मशक्ति के द्वारा मनुष्य की व्यष्टिगत और समष्टिगत चेतना को परिष्कृत करके जिस नए युग के अवतरण की चर्चा इन पंक्तियों में की जा रही है, उसे यदि एकसूत्र में व्याख्यायित किया जाना हो तो वह सूत्र होगा- ‘मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण।’ इस लक्ष्य को प्राप्त करने, स्वप्न को साकार करने का मार्गदर्शन गायत्री के प्रत्येक अक्षर में निहित है। गुरुतत्त्व द्वारा मिलने वाली श्रद्धा, प्रेरणा, भाव संवेदना एवं अनुशासन का प्रकाश गायत्री मंत्र में सन्निहित है। इसलिए गायत्री को गुरुमंत्र कहा गया है।

कितने ही मंत्र हैं- वैदिक, पौराणिक, तांत्रिक मंत्रों की संख्या का ठीक- ठीक अनुमान भी लगा पाना संभव नहीं है। ऐसी स्थिति में गायत्री को ही गुरुमंत्र क्यों कहा गया? यह विचारणीय हो सकता है। भारतीय संस्कृति में गुरु की व्याख्या करते हुए उसके दो महत्त्वपूर्ण कार्य बताए गए हैं- एक ज्ञानवर्द्धन और दूसरा अशुभ निवारण। गायत्री की शक्ति के भी दो पक्ष हैं- पहला सृजनात्मक और दूसरा विध्वंसात्मक। गायत्री की सृजनात्मक शक्ति को ब्रह्मविद्या कहा जाता है और विध्वंसात्मक शक्ति को ब्रह्मास्त्र। साधक की तुलना राजहंस से की जाती है, जिस पर आरूढ़ गायत्री साधक का कल्याण करती है और दुखदायी विघ्नों का निवारण करती है।

इसी शक्ति की चर्चा जब युगशक्ति के अवतरण के संदर्भ में की जाती है तो (१) ‘परित्राणाय साधूनां’ और (२) ‘विनाशाय च दुष्कृताम्’ की अवतार प्रतिज्ञा पूरी होती है। सृजन और ध्वंस एक सम्मिलित पूरक प्रक्रिया है। नया कुछ निर्माण करना हो तो पुराने को हटाना पड़ता है, खेत में फसल उगानी हो तो पहले जमीन में उगी खरपतवार उखाड़नी पड़ती है, कपड़े को रँगने के लिए पहले धुलाई कर उस पर जमा मैल साफ करना पड़ता है। किसी भी क्षेत्र में निर्माण कार्य तभी पूरा होता है, जब वहाँ उपस्थित कूड़ा- कबाड़ा, गंदगी, मलिनता और कषाय- कल्मष हटाए जाएँ।

गायत्री के २४ अक्षरों में वे सभी सिद्धांत सूत्र रूप में सन्निहित हैं, जिनके आधार पर युगांतरकारी परिवर्तन प्रस्तुत होते हैं। ईश्वरीय शक्ति का अवतरण- प्राकट्य हर ऐसे संधिकाल में होता है जब परिवर्तन के अलावा कोई उपाय नहीं रह जाता। उसके स्वरूप और क्रिया- कलाप में हेरफेर अवश्य होता रहता है। हिरण्याक्ष राक्षस के वध के लिए उसे वाराह रूप धारण करना पड़ा, हिरण्यकशिपु के वध की शर्तों को पूरा करने के लिए उसे नृसिंह का रूप लेना पड़ा। आतताइयों का संहार करने के लिए परशुराम, मर्यादाओं की स्थापना के लिए राम और योग का कर्मप्रधान रूप प्रस्तुत करने के लिए कृष्ण अवतरित हुए।

सच्चे आस्तिक सिद्ध हों
आज ईश्वर के अस्तित्व को मानने और देवस्थानों पर प्रतिमा के सामने सिर झुकाने वालों का अभाव नहीं है। अभाव है उन व्यक्तियों का जिन्हें सच्चे अर्थों में आस्तिक कहा जा सके। ईश्वर के अस्तित्व को अस्वीकार करने वाला उतना नास्तिक नहीं है, जितना कि उसे मानते हुए भी आदर्शों और मर्यादाओं की अवज्ञा करने वाला। फलतः इन दिनों चारों ओर जितने भी संकट, जितनी भी समस्याएँ दिखाई देती हैं, उनके मूल को खोजें तो विदित होगा कि आज का संकट आस्थाओं का संकट है।

इस बार नवयुग की, युग गायत्री की अवतरण प्रक्रिया असुरता के उन्मूलन और देवत्व के उदय के सनातन उद्देश्य से परिपूर्ण है। परिस्थितियों के अनुरूप उस चेतना के उदय हेतु प्रयासों का स्वरूप भी भिन्न होगा। अवांछनीयता, असुरता को निरस्त करने का यह धर्मयुद्ध धर्मक्षेत्र में, अंतःकरण की गहराई में उतरकर लड़ा जाना है और जनमानस के परिष्कार द्वारा, आस्थाओं के परिशोधान द्वारा नवयुग के निर्माण में ग्वाल- वालों की, रीछ- वानरों की भूमिका निभाने के लिए हर जागरूक व्यक्ति को आगे आना है।

संकट की घड़ियाँ
वायु, जल और आहार में प्रवेश करती हुई विषाक्तता एक संकट है। बढ़ती हुई जनसंख्या, अणु- आयुधों और विस्फोटों की भरमार, मानवी चिंतन और चरित्र में निकृष्टता का असाधारण समावेश, अंतर्गृही परिस्थितियाँ एवं क्रुद्ध प्रकृति की विनाश लीला के मिलेजुले परिणाम मानव समाज के लिए अहितकर ही हो सकते हैं। युगसंंधि की इस वेला में इस खतरे से सावधान रहने और बिना किसी भय, आतंक के शौर्य और साहस के साथ इन्हें निरस्त करने के लिए प्रबल पुरुषार्थ प्रकट करने की आवश्यकता है।

ईश्वर का विधान
स्रष्टा अपनी इस कलाकृति का संतुलन इस सीमा तक नहीं बिगड़ने देगा कि विनाश की विभीषिका शालीनता की संस्कृति को निगल जाए। ऐसे अवसरों पर भगवान की युगांतरीय चेतना सूक्ष्मजगत में अवतारी प्रवाह बनकर गतिशील होती है और उस प्रवाह में जाग्रतात्माएँ नवसृजन के कार्यक्षेत्र में उत्साहपूर्वक उतरती हैं।

हमारा सामूहिक दायित्व
मनुष्य समाज एक शरीर की तरह है और उसके घटकों को सुख- दुःख में सहयोगी रहना पड़ता है। एक नाव में बैठने वाले साथ- साथ डूबते- पार होते हैं। मानवीय चिंतन और चरित्र यदि निकृष्टता के प्रवाह में बहेगा तो उसकी अवांछनीयता प्रतिक्रिया सूक्ष्मजगत में विषाक्त- विक्षोभ उत्पन्न करेगी और प्राकृतिक विपत्तियों के रूप में प्रकृति की प्रताड़ना बरसेगी। हर व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि वह अपनी सज्जनता तक ही सीमित न रहे वरन संपर्क क्षेत्र की अवांछनीयताओं से जूझे। जो इस समूह धर्म की अवहेलना करता है, वह भी विश्व- व्यवस्था की अदालत में अपराधी माना जाता है।






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