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विनाश के कगार पर खड़ी दुनिया की रक्षा अब दैवी हस्तक्षेप से ही संभव है

वैज्ञानिकों का मत है कि वातावरण में फैले प्रदूषण के कारण धरती पर मानव का अस्तित्व मात्र कुछ दशक का है
यदि आप वास्तव में मानते हैं कि आर्थिक विकास की अपेक्षा पर्यावरण का महत्त्व कम है तो अपनी रकम गिनते समय अपनी श्वास रोके रहने का प्रयास करिये। प्रो. गाय मैकफियरसन

धरती का तापमान बड़े तेजी से बढ़ता जा रहा है। वर्ष दर वर्ष धरती गरम होती जा रही है, पिछले रिकॉर्ड टूटते जा रहे हैं। दूसरी ओर ऋतुचक्र अनियमित होता जा रहा है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह घटनाक्रम सामान्य नहीं है। यह दुनिया बड़ी तेजी के साथ सर्वनाश की ओर जा रही है। लोगों को प्रत्यक्ष आँखों से यह परिवर्तन भले ही बहुत ज्यादा प्रभावित करता न दीखता हो, एअर कंडीशन और हीटरों के सहारे वह अपने को भले ही सुरक्षित महसूस करता दिखाई देता हो, लेकिन ऐसा करते हुए वह पर्यावरण संकट को बढ़ाता ही जा रहा है। इसके वीभत्स परिणामों से धरती पर जीवन का अस्तित्व ही खतरे में पड़ता जा रहा है। धरती का बढ़ता तापमान जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित कर रहा है।

• मौसम की अनियमितता से फसलें बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं, खाद्यान्न संकट खड़ा हो रहा है।
• सूखे और बाढ़ की घटनाएँ बढ़ती ही जा रही हैं।
• तीव्र मौसम परिवर्तन से व्यक्ति की जीवनी शक्ति क्षीण हो रही है, वह तरह- तरह की बीमारियों का शिकार होता जा रहा है।
• पर्यावरण प्रदूषण के कारण मानसिक रोग बड़ी तेजी से बढ़ रहे हैं। दुनिया में क्रोध, आक्रोश, प्रतिशोध, हिंसा, तनाव, आतंक जैसी जो घटनाएँ बढ़ रही हैं, उनका एक बड़ा कारण व्यक्ति की बदलती मनःस्थिति भी है।
• वैज्ञानिक एलिजाबेथ बोल्बर्ट का कथन है कि प्रतिदिन तेजी से बढ़ती गरमी के कारण लगभग १५० से २०० जीव प्रजातियाँ प्रतिदिन समाप्त हो रही हैं। उल्लेखनीय है कि धरती के हर जीव की पर्यावरण संतुलन में विशिष्ट भूमिका होती है। अनुकूल वातावरण के अभाव में मानवीय जीवन का अस्तित्व भी धीरे- धीरे समाप्त होने की ओर अग्रसर है।

मानवीय दुर्बुद्धि से उपजा है संकट
वैज्ञानिकों का कहना है कि धरती पर तापमान घटने- बढ़ने की घटनाएँ पहले भी होती रही हैं, लेकिन उनका कारण प्राकृतिक आपदाएँ जैसे ज्वालामुखी का फटना, उल्कापात या सूर्य की सतह पर होने वाले ऊर्जा विस्फोट रहा है। उनका कहना है कि पिछले ६,५०,००० वर्षों में धरती का तापमान इतनी तेजी से पहले कभी नहीं बढ़ा, जितना पिछले १५० सालों में बढ़ रहा है। इनका कारण प्राकृतिक नहीं, मानवीय है।

कारण : पिछले १५० वर्षों से आरंभ हुई वैज्ञानिक प्रगति ने हमारी जीवन शैली ही बदल दी है। व्यक्ति अपनी आवश्यकता से सैकड़ों गुना अधिक सुविधा, साधनों का उपयोग करने लगा है। इसके कारण हुए परिवर्तन कुछ इस प्रकार हुए हैं-
• प्रकृति ने लाखों वर्षों में कच्चे तेल और कोयले का जो भंडार एकत्रित किया था, उसका हमने अंधाधुंध दोहन कर डाला। इनकी ऊर्जा के उपयोग से सुख- सुविधाएँ खूब बढ़ीं।
• बिजली के उत्पादन से दुनिया का रूप ही बदल गया।
• रेल, हवाई जहाज तथा मोटर- गाड़ियों के उपयोग से परिवहन इतना तेज़ हो गया कि सारी दुनिया में एक छोटे गाँव के रूप में बदल गयी।
• एअर कंडीशन और हीटरों ने व्यक्ति को वातावरण की प्रतिकूलताओं से बचा लिया।
• औद्योगीकरण के कारण अनेकानेक सुविधा- साधन मिले। कुछ ही दशाब्दियों में चमत्कारिक परिवर्तन हो गये। आज से १०० वर्ष पूर्व कोई व्यक्ति आज की दुनिया की कल्पना तक नहीं कर सकता था।
इन सुख- सुविधाओं के अंबार लगने के साथ और भी बहुत सारे परिवर्तन हुए हैं।
• धरती पर से पर्यावरण में घुलने वाली जहरीली गैसों को पीकर उसे संतुलित करने वाली वन सम्पदा नष्ट होती चली गयी।
• पेड़ों की जगह धरती पर कॉन्क्रीट का जंगल बढ़ता ही चला जा रहा है।
• हवा में घुलते जहर के अलावा पानी, मिट्टी सब जहरीले होते जा रहे हैं।
• परम्परागत युद्धों की जगह अब दुनियाँ में मिसाइल, बम- गोलों की बरसात होने लगी है।
• आज सारा संसार अणु- परमाणु बमों के जखीरे पर बैठा है। यदि भूल से उसमें विस्फोट हो जाये तो हो सकता है यह अपना स्वर्गोपम धरालोक धूलि बनकर आकाश में ही छितरा जाए।

जेम्स हैनसन का कथन : द्वितीय विश्वयुद्ध के समय हिरोशिमा- नागासाकी पर गिराये गये परमाणु बम का प्रभाव हमने देखा है। नासा गोडार्ड इंस्टिट्यूट के पूर्व अध्यक्ष जेम्स हैनसन कहते हैं कि इन दिनों सारे विश्व में वैसे ४००,००० परमाणु बमों की ऊर्जा के बराबर ऊर्जा का उत्सर्जन प्रतिदिन हो रहा है, जिसके प्रभाव से वातावरण तेजी से गरम हो रहा है।

बढ़ता तापमान- बेकाबू हालत
धरती पर तापमान बढ़ने का कारण औद्योगीकरण के प्रभाव से ऊर्जा उत्सर्जन ही नहीं है, बल्कि कार्बन डाईऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड आदि ग्लोबल वॉर्मिंग गैसों की मात्रा वायुमण्डल में बढ़ते जाना भी है। वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड का प्रमाण ३२० पीपीएम तक सुरक्षित माना जाता है, लेकिन आज ४०५ पीपीएम तक पहुंच गया है। इनके बढ़ने के दुष्प्रभाव इस प्रकार हैं-
• पृथ्वी की रक्षा कवच कही जाने वाली ओजोन गैस की परत क्षीण हो रही है। यह गैस सूर्य से आने वाली विषैली किरणों को धरती तक नहीं आने देती। ओजन परत के नष्ट होने से लोगों में कैंसर जैसी अनेक बीमारियाँ बढ़ रही हैं।
• कार्बन डाईऑक्साइड की बढ़ी हुई मात्रा धरती से उत्सर्जित होने वाली ऊर्जा को अंतरिक्ष में जाने से रोकती है, जिससे धरती का तापमान बढ़ता ही जाता है।

वैज्ञानिक युग के आगमन से ही विषैली गैसों का उत्सर्जन किस तेजी से बढ़ रहा है, यह यहाँ दिये ग्राफ में देखा जा सकता है। हजारों वर्षों से यह ग्राफ एक हॉकी की स्टिक के सीधे डंडे जैसा दिखाई देता है, लेकिन पिछले १००- १२५ वर्षों से स्टिक के टेढ़े भाग की तरह अचानक इस तरह ऊँचा उठ गया है। यह सब इसलिए हुआ कि मनुष्य ने विज्ञान की उपलब्धियों के नशे में अपनी अनगढ़ कामनाएँ पूरी करने के लिए प्रकृति के अनुशासनों का उल्लंघन लम्बे समय तक किया है। इसी कारण स्थिति बेकाबू हो गयी है।

प्रो. गाय मैकफियरसन और उनकी ही तरह के कई वैज्ञानिकों को तो अब धरती को बचाने की कोई संभावना ही नज़र नहीं आती। उनके अनुसार पहले वैज्ञानिकों ने इक्कीसवीं सदी के अंत तक धरती के नष्ट होने की संभावना व्यक्त की थी, लेकिन उनका मानना है कि धरती का तापक्रम इसी तरह बढ़ता रहा तो २०४० में ही हम पूरी तरह से नष्ट हो जायेंगे। प्रो. गाय मेकफियरसन का कहना है कि यदि २००७ में ही हम सारी औद्योगिक गतिविधियाँ रोक देते तो इस धरती को प्रचलित तरीकों से बचाने की एक संभावना बन सकती थी। लेकिन अब विनाश लीला अपनी देहलीज पार कर चुकी है, इससे पीछे हटना संभव नहीं है।

एक उपाय है आत्मवादी जीवन
परम पूज्य गुरुदेव ने भी अपने विपुल साहित्य और उद्बोधनों में बार- बार पर्यावरण संकट के खतरों से हमें अवगत कराया है। उन्होंने इसे मानवीय आस्थाओं से जुड़ा आज का सबसे बड़ा संकट बताते हुए इससे बचने के लिए अपनी जीवन शैली बदलने और आत्मवादी जीवन जीने के लिए प्रेरित किया है। वैज्ञानिकों का आकलन और चिंताएँ अपनी जगह सही हैं, लेकिन परम पूज्य गुरुदेव ने लिखा है, ‘‘मनुष्य जाति का इस प्रकार नष्ट- भ्रष्ट हो जाना स्रष्टा को सहज स्वीकार नहीं हो सकता।’’
वैज्ञानिकों की तरह ही परम पूज्य गुरुदेव ने भी लिखा है, ‘‘परिस्थितियाँ इतनी जटिल हो चुकी हैं कि मनुष्य के सीमित प्रयास उनका समाधान नहीं कर सकते। उसके लिए सर्वसमर्थ ईश्वरीय सत्ता का हस्तक्षेप अनिवार्य हो गया है।’’
इस ईश्वरीय योजना को चरितार्थ करने के दो प्रमुख उपाय हैं- १. गायत्री (सूर्य) उपासना से विचार परिष्कार एवं २. जीवन शैली को यज्ञमय (सादगीपूर्ण- ईको फ्रैण्डली) बनाना।

सूर्य साधना
सूर्योपनिषद् में लिखा है- सूर्य आत्मा जगतस्तेस्थुश्च। अर्थात् सूर्य इस समस्त विश्व की आत्मा है।
परम पूज्य गुरुदेव ने ‘गायत्री का सूर्योपस्थान’ पुस्तक में लिखा है- पृथ्वी पर जितने जीव- जन्तु,, वृक्ष- वनस्पति दिखाई दे रहे हैं, वे सब सूर्य के अस्तित्व में होने के कारण ही हैं। सूर्य न होता तो जीवन नाम की कोई चीज भी न होती।...
हम अनुभव नहीं करते अन्यथा हमारे शरीर में जो प्राण और चेतना विकसित होती है, वह सूर्य की इस दृश्य प्रकाश शक्ति का ही प्रतिफल है। यह प्रकाश कण चाहे सीधे मिलते हों अथवा अन्न के द्वारा बात एक ही है। वनस्पति का ९५ प्रतिशत भाग सूर्य से विकसित होता है, पृथ्वी से तो कुल ५ प्रतिशत विकास सामग्री ही उसे मिलती है। ...
वैज्ञानिक अब तक सूर्य प्रकाश की स्थूल गतिविधियों को ही जान सके हैं, पर हमारा मानसिक संबंध भी सूर्य से है, वह हमारी विचारणा, भावनाओं को भी प्रभावित करता है। भारतीय योग द्वारा मिलने वाले चमत्कारिक लाभों का रहस्य यही है कि हम अपनी आत्मा, अर्थात् सूर्य की अक्षय शक्ति से संबंध स्थापित कर लेते हैं और उस शक्ति का मनमाना उपयोग कर सकने की स्थिति में हो जाते हैं।

परम पूज्य गुरुदेव धरती को विनाश से बचाने की जो बात करते हैं, उसका आधार गायत्री उपासना है। गायत्री का अधिष्ठाता देवता ‘सविता’ है। गुरुदेव लिखते हैं- असली सविता जो गायत्री मंत्र का देवता है, वह इस उदीयमान सूर्य से भी ऊँचा है। उसे असंख्य सूर्यों का सूर्य, परमशक्ति स्रोत, इस सृष्टि का नियामक और परिपुष्टकर्त्ता, विधाता, प्रजापति कहा जाता है। उसके साथ संबंध, संपर्क बनाकर यदि सान्निध्य लाभ लिया जा सके तो दृश्य सूर्य की अपेक्षा वह आध्यात्मिक सविता हमारे लिए असंख्य गुने सुख- साधन प्रस्तुत कर सकता है।

सूर्य को त्रयी विद्या कहा गया है। उसमें स्थूल तत्व (जिनसे शरीर बनते हैं), प्राण (जिनसे चेतना आती है) और मन (जो चेष्टाएँ प्रदान करता है) तीनों शामिल हैं। मनुष्य जो पदार्थ पृथ्वी से ग्रहण करते हैं, वे गायत्री उपासना से सूर्य के साथ तादात्म्य स्थापित कर सीधे भी प्राप्त किये जा सकते हैं। हमें उसके आध्यात्मिक लाभ तीनों- स्वास्थ्य, तेजस्विता और मनस्विता के रूप में मिलते हैं। जिस दिन पृथ्वी के लोग इस विद्या को ठीक- ठीक जान लेंगे, उस दिन सुख, शांति और समृद्धि का कोई अभाव नहीं रहेगा। युग परिवर्तन की इस संधि और संक्रान्ति अवस्था में उन लोगों को अधिक श्रेय- सम्मान मिलेगा, जो इस तत्वज्ञान के अवगाहन को सारे विश्व में फैलाने का प्रयत्न करेंगे।

यज्ञीय जीवन शैली
गायत्री उपासना प्राणशक्ति के अभिवर्धन के साथ व्यक्ति के चिंतन, चरित्र, व्यवहार और भावनाओं को भी प्रभावित करती है, व्यक्ति में विवेक, आत्मविश्वास जगाकर उसे सन्मार्ग की ओर प्रेरित करती है। सन्मार्गगामी व्यक्ति प्रत्यक्षवाद के तात्कालिक लाभों की अपेक्षा न रखते हुए आत्मवादी जीवन शैली अपनाने लगता है। भविष्य की विभीषिकाओं के संदर्भ में इसके सत्परिणामों के विषय में परम पूज्य गुरुदेव लिखते हैं-
इस शताब्दी के अंत में सूर्य की प्रचण्ड शक्तियों का पृथ्वी पर आविर्भाव होगा और उससे वह तमाम शक्तियाँ नष्ट- भ्रष्ट हो जायेंगी, जो मानसिक दृष्टि से अध्यात्मवादी नहीं होंगी। जो लोग सूर्य शक्तियों से संबंध बनाए रखेंगे, उनकी रक्षा और समुन्नति उसी प्रकार होगी, जिस तरह भयंकर ज्वार- भाटा आने पर भी समुद्र में पड़े फूलों का अनिष्ट नहीं होता, जबकि बड़े- बड़े जहाज यदि साधे न जाएँ तो उस अनंत जलराशि में डूबकर नष्ट हो जाते हैं। गायत्री उपासक इन परिवर्तनों को कौतूहलपूर्वक देखेंगे और उन कठिनाइयों में भी स्थिरबुद्धि बने रहने का साहस उसी प्रकार प्राप्त करेंगे, जिस प्रकार माँ का प्यारा बच्चा माता के क्रुद्ध होने पर भी उनसे भयभीत नहीं होता, वरन अपनी प्रार्थना से उन्हें शांत कर लेता है।

जड़ पदार्थ की विज्ञान की दृष्टि से भले ही स्थिति बेकाबू हो गयी हो, चेतना विज्ञान के आधार पर इसका उपचार संभव है।

मनुष्य अपनी चेतना को गायत्री उपासना- साधना से परिकृत करे तो उसकी सदेच्छाभरी प्रार्थना को परा चेतना स्वीकार कर लेगी। परिष्कृत आत्मचेतना मनुष्य की जीवन शैली को स्वार्थ की संकीर्णता से उबारकर प्रकृति के अनुशासन के अनुरूप ‘सादा जीवन- उच्च विचार’ के अनुसार ढाल देगी। प्रदूषण बढ़ाने वाले क्रिया- कलापों को नियंत्रित कर लिया जायेगा। मनुष्य के इस सत्प्रयास के प्रभाव से परा चेतना अपने स्नेह- अनुदानों से प्रकृति के बिगड़े संतुलन को पुनः सँभाल देगी। यज्ञीय (ईको फ्रैण्डली) जीवन शैली के साथ जुड़कर विज्ञान लोक कल्याण के नये आयाम खोलने में समर्थ हो जायेगा। सदेच्छापूर्ण मानवीय पुरुषार्थ एवं पराचेतना के समर्थ अनुदानों से धरती पर स्वर्ग जैसे सतयुगी वातावरण का निर्माण सहज ही हो जायेगा।






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