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गायत्री और गंगा: मानस में प्रवाहित होने वाली दिव्य धाराएँ

      आज गायत्री जयंती का पुण्य पर्व है तथा गंगा दशहरा भी आज है। गायत्री को आत्मा कहते हैं तथा गंगा को काया कहते हैं। आत्मा एवं काया का जन्म एक ही दिन हुआ था। आज के दिन गंगा इस धरती पर आई थी।
     मित्रो! हमारा ख्याल है कि गंगा सर्वप्रथम भगीरथ की अंतरात्मा में कैसे आयी होगी? सामान्य मनुष्य बड़ा तेज एवं चालाक होता है। उसे अपने अलावा किसी की बात समझ में नहीं आती। उसे तो केवल स्वार्थ ही दिखाई पड़ता है। ऐसे मनुष्य को कर्त्तव्य, समाज की सेवा, परमार्थ तथा भगवान समझ में नहीं आते। उसके मन में हमेशा शैतान हावी रहता है। उसे पेट के अलावा कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। परन्तु भगवान जब एक इन्सान के मन में आये होंगे, जिसका नाम था भगीरथ, तो उसने (भगीरथ ने) यह सोचा होगा कि एक मनुष्य की सुख-सुविधा से ज्यादा महत्त्व की है समाज की-संस्कृति की सेवा। उसने यही सोचा और क्या कर डाला? उसने गंगा से भक्ति का नाता जोड़ डाला। यह भक्ति का प्रतीक है।
    यह भक्ति अंतरात्मा में से उमगती है। भगीरथ एक राजकुमार था। उसके राजपाट थे, परन्तु उसने आदमी की खुशहाली के लिए अपना स्वार्थ, लोभ त्याग दिया। भगवान की भक्ति आती है तो करुणा के रूप में आती है, दया के रूप में आती है।
    भगीरथ के हृदय में भी माता का उदय हुआ था। उसके सीने में, कलेजे में करुणा बही होगी। यह भावना की गंगा थी, जो विशाल होती चली गयी। भगीरथ ने गंगा को मजबूर कर दिया कि आप स्वर्ग में बैठी हैं तथा धरती के लोग एक-एक बूँद पानी के लिए मजबूर हो रहे हैं, आपको शर्म आनी चाहिए। स्वर्ग की गंगा जो महलों में रहती थी, आराम का जीवन जीती थी, वह भगीरथ की करुणा, त्याग एवं परमार्थ की भावना को देखकर मजबूर हो गई इस धरती पर आने के लिये। गंगा ने सारे समाज को धन्य कर दिया। हम किसी औरत की जयंती मनाने नहीं आये हैं। उदारता की, इन्सानियत की जयंती मनाने आये हैं। गायत्री को हम माता कहते हैं, गंगा को भी हम माता कहते हैं। माता कोई देवी या औरत का नाम नहीं है। माता एक आदर्श का नाम है, सिद्धान्त का नाम है।
    मित्रो! अगले दिनों लोगों को खाने से ज्यादा मजा खिलाने में आयेगा। अकेले खाने वालों को अगले दिनों लोग यह कहेंगे कि आपको शर्म नहीं आती है, आप खाते चले जाते हैं, खाते चले जाते हैं। आपको शर्म आनी चाहिए। पड़ोसी तथा पीड़ित-पतित एवं भूखे लोग आपको दिखलाई नहीं पड़ते हैं। केवल अपना पेट, अपनी बीबी, अपने बच्चे ही दिखलाई पड़ते हैं। आपके भीतर से जब गायत्री माता उदय होंगी तो आपको चमकाकर रख देंगी। आपके विचारों में परिवर्तन कर देंगी। आपको सारा परिवार, समाज देश दिखलाई पड़ेगा। आप देवता बनते चले जाएँगे।
    गायत्री माता हंस पर बैठकर कमण्डलु लेकर नहीं आती है, वह केवल करुणा के रूप में, दया के रूप में आपके अंदर आयेगी। यही उसका स्वरूप है जो आपको देवता बनाकर जाएगी। उस समय आपको देवता की तरह से जीना पड़ेगा। आप हैवान तथा शैतान की तरह से नहीं जी सकते हैं। आप मालदार एवं पूँजीपति की तरह से जी नहीं सकेंगे। आपके जीने एवं रहने का ढंग अजीब हो जाएगा। आप बाँटकर खायेंगे तथा दूसरों की मुसीबतों को बँटाने का काम करेंगे। आप अपनी खुशहाली को बाँट देंगे, तब प्रसन्नता आपके अंदर से आ जाएगी।
समझदार-शानदार इंसान बनें
    आने वाले दिन हमको बहुत शानदार दिखलाई पड़ रहे हैं। आपको दिखाई पड़ रहा है या नहीं, हम नहीं कह सकते। इस बार गायत्री माता सभी को देवता बनाना चाहती हैं। वे सभी को महान बनाना चाहती हैं। इस समय आप लोगों को कुछ विशेष काम करने हैं। आप सब लोग लोभ, मोह की बेड़ियों को काट डालिये। अरे ये हथकड़ियाँ आपके हाथों में लगी हैं, उसे काटिये। ढेरों की ढेरों अकल, समय हर आदमी के पास है। आपने अभी तक इसे बेकार में खर्च किया है तथा बर्बाद किया है। अब आप समझदार आदमी बन जाएँ तथा इसका उपयोग अब आप सही ढंग से करना सीखें। आप कम में गुजारा करना सीखिये। औसत भारतीय का जीवन जीना सीखिये, ताकि कुछ राष्ट्र एवं समाज के लिए भी खर्च कर सकें।
    आप अपने बच्चों को संस्कारवान बनाने का प्रयास करें। आपका बच्चा लुहार, बढ़ई हो जाए तो कोई हर्ज की बात नहीं है। अगर आप बड़े आदमी, जैसे-वकील, दरोगा, डॉक्टर, इंजीनियर न बनाकर उसे संस्कारवान बनाएँ तो बेहतर है। ये बड़े आदमी आपके लिये, अपने लिये, समाज के लिये समस्या बन जाएँगे तथा तबाही लाएँगे। आप उन्हें संस्कारवान बनाएँ। आप अपने विचारों में अगर परिवर्तन कर सकें, तो बहुत मजा आयेगा। आज गायत्री का जन्मदिन है, अगर वह आपके जीवन में आ गयी तो वास्तव में आपको धन्य कर देगी।
    आज गायत्री जयंती के दिन आपसे प्रार्थना है कि आप लोकहित के लिये जीवन जीना सीखें। प्रभु के चरणों में समर्पित हों, तो आपका यह पर्व मनाना सार्थक होगा, यह नसीहत हम आपको इस पावन पर्व के दिन दे रहे हैं। यह नसीहत हमारे गुरु ने हमें दी थी। उसके पहले हमारी माताजी ने दी थी। वे एकादशी का व्रत करती थीं और उस दिन वे ‘सीधा’ निकालकर देती थीं और कहती थीं, ‘‘हमने पेट काटकर बचाया है, इसे मंदिर में देकर आओ। ’’ पेट काट कर बचाना और लोकहित में, यानी कि भगवान को देना-इसी का नाम यज्ञ है। आप हवन तो करते हैं, परन्तु कुर्बानी, परोपकार, सेवा के लिये कुछ करना नहीं चाहते हैं। मित्रो, इसी का नाम अग्निहोत्र है, इसी का नाम यज्ञ है। अगर आप भी इस यज्ञ की प्रवृत्ति, लोकहित का जीवन जीने की प्रवृत्ति लेकर चले जाएँ तो आपका जीवन धन्य हो जाएगा। हम मरते-मराते, जीवन के अंतिम क्षणों में आपको एक नसीहत देकर जाना चाहते हैं कि आप एक शानदार आदमी बनें। लोकहित का जीवन जीना सीखें।
    आज गायत्री जयंती के दिन हम एक बात और कहना चाहते हैं कि अगर आप आज अपने गुरु की नसीहत के मुताबिक, गायत्री माता की नसीहत के मुताबिक, जो करुणा और दया की प्रतीक है-लोकमंगल हेतु अपनी अक्ल, अपने धन, अपने समय को लगा सकेंगे, तो आपका जीवन धन्य हो जाएगा।
    यह समय बीजारोपण का है। यह गायत्री जयंती का, प्रज्ञावतार का दिन है। यह सारे विश्व में फैलने वाली है, आप देख लेना। गायत्री महामंत्र, जो विवेक, सद्विचार, सद्भावना, प्रेरणा, शालीनता, उज्ज्वल भविष्य, नये युग का मंत्र है, यह सारे विश्व में फैलने वाला है। यह मत्स्यावतार की तरह फैलने वाला है, यह हम आपको दिखा देंगे। ब्रह्माजी ने जिस मछली को कमण्डलु, तालाब, नदी, समुद्र में डाला था, वह बढ़ती चली गई। आने वाले दिनों में यह गायत्री माता भी इसी प्रकार बढ़ने वाली है, आप विश्वास रखें। इस प्रकार की कथा आपने सुनी है, परन्तु हमारे जैसा नाचीज आदमी यह कह रहा है, आप नोट कर लें। आगे गायत्री भी मछली के रूप में सारे विश्व में फैलने वाली है। 






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