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श्रद्धा के सिंचन से ही सुलझेंगी बुद्धिवाद से उपजी विभीषिकाएँ

[Shantikunj], Jul 08, 2017
श्रद्धा ही एक ऐसा प्रकाश है, जो मनुष्य को अनन्त अन्धकार में खोने से बचाये रहता है। श्रद्धावान को जहाँ अपने प्रति स्रेह रहता है, वहाँ दूसरों के प्रति भी। आज बुद्धि के अतिरेक के युग में इसी श्रद्धा नामक मानव मूल्य का अभाव हो गया है। जिस दिन मनुष्य में श्रद्धा के भाव की बहुलता हो जायेगी, बुद्धिवादिता का नियमन होगा, तब आज के ध्वंससूचक बौद्धिक चमत्कार सृजन सम्बन्धी वरदान बन जायेंगे।

बुद्धि की अकूत सामर्थ्य
मनुष्य को परमात्मा ने बुद्धि नामक एक अतुलनीय शक्ति प्रदान की है। इसी के आधार पर मनुष्य लाखों- करोड़ों अन्य प्राणियों के बीच सृष्टि का अप्रतिम स्वामी बना है। इतना ही नहीं, मनुष्य ने बुद्धि- बल पर संसार को सुन्दर से सुन्दर बनाया है। बिना किसी के बतलाये उसने सृष्टि के गोपनीय रहस्यों को बुद्धि के बल पर खोज निकाला है। जीवन में न जाने कितनी सुख- सुविधाओं का समावेश किया है।

बुद्धि ने मानव को केवल भौतिक विभूतियों तक ही ले जाकर नहीं छोड़ दिया, बल्कि उसने उसे आत्मा- परमात्मा, पुरुष और प्रकृति के रहस्यों तक भी पहुँचा दिया है। मनुष्य की बुद्धि आज जीवन- मृत्यु के रहस्यों को खोज निकालने पर तुली हुई है। संसार के कारणभूत पंच- तत्वों पर विजय प्राप्त कर उन्हें अपना आज्ञाकारी बना रही है। प्रकृति की पराधीनता से मुक्त होकर मानव आज बुद्धिबल पर स्व- निर्भर होने का प्रयत्न कर रहा है। उसकी अब तक की प्रगति देखते हुए यह बात असम्भव नहीं दिखाई देती कि वह जब जिस ऋतु को चाहे उत्पन्न कर ले और जब जिस वातावरण का चाहे निर्माण कर ले। आज का युग मानवीय बुद्धि- शक्ति का प्रमाण सूचक साक्षी बना हुआ है।

हमारे युग की विडंबना
मानव बुद्धि की शक्ति ऐसी अमोघ है कि यदि वह चाहे तो संसार को दो दिन में ही नष्ट कर दे और चाहे तो उसे स्वर्ग बना दे। किन्तु आज की परिस्थितियाँ देखते हुए ऐसा नहीं लग रहा है कि मानवीय बुद्धि की यह शक्ति संसार को स्वर्ग के रूप में परिणत करेगी। इसके अधिकाधिक नरक बनने की सम्भावनाएँ अवश्य दृष्टिगोचर होने लगी हैं। आगे की बात तो छोड़ दीजिए, आज के दिन भी संसार एक नरक से क्या कम बन गया है? जिधर देखो, दुःख- पीड़ा, शोक- संताप, आवश्यकता एवं अभाव का ही ताण्डव होता दृष्टिगोचर हो रहा है। मनुष्य, मनुष्य के लिए भूत- प्रेतों की तरह शंका का स्वरूप बना हुआ है। सुख- सुविधा के अगणित साधन संचित हो जाने पर भी मनुष्य को उनका कोई लाभ नहीं मिल रहा है। जिस एक आश्वस्तता एवं निश्चिन्तता प्राप्त करने के लिए मनुष्य की बुद्धि पूरी शक्ति से लगी हुई है, उसके दर्शन भी सम्भव नहीं हो रहे हैं। निस्संदेह आज के युग के बुद्धिमान मनुष्य की यह दुर्दशा तरस का ही विषय है।

बुद्धि का नियमन कीजिए
अब प्रश्न यह है कि आज के इस बुद्धि- विकास के युग में इन विकृतियों का कारण क्या है और क्या है इनके समाधान का उपाय? अब वह समय आ गया है, जबकि मनुष्य को रुक कर सोचना, विचार करना है, अन्यथा बुद्धिवाद से हाँका हुआ संसार शीघ्र ही अपना विनाश कर लेगा।

बात वास्तव में यह है कि मनुष्य ने आज बुद्धि को तो विकट रूप से बढ़ा लिया है, किन्तु उस पर नियन्त्रण करना नहीं सीखा है। बुद्धि की शक्ति का एक उज्ज्वल पक्ष तो एक अँधियारा पक्ष भी है। आक्रमण, अत्याचार, अन्याय, उत्पीड़न, शोषण, लाभ- लोभ, छल- कपट, वंचना- प्रताड़ना, विजय, आतंक, अभियान, नोच- खसोंट, लूट- मार, छीना- झपटी, चोरी- मक्कारी, ध्वंस अथवा विनाश की आसुरी वृत्तियाँ भी मनुष्य के बुद्धि- बल पर ही सफल हुआ करती हैं।

बुद्धि का अनियन्त्रित विकास केवल दूसरों के लिए ही दुःखदायी नहीं होता, स्वयं अपने लिए भी हानिकर होता है। अति बुद्धि सम्पन्न मानव को चिन्तन, असन्तोष की ज्वाला में ही जलना होता है। वह बहुत कुछ पाकर भी कुछ नहीं पाता। एक बुद्धिवादी कितना ही शास्त्रज्ञ, विशेषज्ञ, दार्शनिक, वैज्ञानिक, तत्त्ववेत्ता आदि क्यों न हो, बुद्धि का अहंकार उसके हृदय में शान्ति को न ठहरने देगा। वह दूसरों को ज्ञान देता हुआ भी आत्मिक शान्ति के लिए तड़पता ही रहेगा। बुद्धि की तीव्रता पैनी छुरी की तरह किसी दूसरे को अथवा स्वयं उसको दिन- रात काटती ही रहती है। मानव की अनियन्त्रित बुद्धि की शक्ति मनुष्य जाति की बहुत बड़ी शत्रु है। अतएव बुद्धि के विकास के साथ- साथ उसका नियन्त्रण भी आवश्यक है।

श्रद्धा से सृजन की ओर
किसी शक्तिशाली का नियन्त्रण तो उससे अधिक शक्ति से ही हो सकता है। तब भला समग्र सृष्टि को अपनी मुट्ठी में करने वाली शक्ति बुद्धि का नियन्त्रण करने के लिए कौन- सी दूसरी शक्ति मनुष्य के पास हो सकती है? मनुष्य की दूसरी शक्ति है श्रद्धा, जिससे बुद्धि जैसी उच्छृंखल शक्ति पर अंकुश लगाया जा सकता है, उसका नियन्त्रण- नियमन किया जा सकता है। बुद्धिबल को ध्वंस की ओर जाने से रोक कर सृजन के मार्ग पर अग्रसर किया जा सकता है।

विशुद्ध बुद्धिवादी के पास स्नेह, सौजन्य, सौहार्द्र, सहानुभूति, भ्रातृत्वभाव जैसी कोमलताएँ नहीं होतीं। इन मानवीय गुणों की जननी श्रद्धा ही है। श्रद्धालु अन्तःकरण वाला मनुष्य सेवा- सहयोग, क्षमा- दया, परोपकार तथा परमार्थ में विश्वास करता है, न्याय और नियम उसकी विशेषताएँ हुआ करती हैं।

मानवता के इतिहास में दो परस्पर विरोधी ख्याति के व्यक्तियों के नाम पाये जाते हैं। एक वर्ग तो वह है, जिसने संसार को नष्ट कर डालने, जातियों को मिटा डालने तथा मानवता को जला डालने का प्रयत्न किया है। दूसरा वर्ग वह है जिसने मानवता का कष्ट दूर करने, संसार की रक्षा करने, देश और जातियों को बचाने के लिए तप किया है, संघर्ष किया है और प्राण दिया है। इतिहास के पन्नों पर आने वाले यह दोनों वर्ग निश्चित रूप से बुद्धि- बल वाले रहे हैं। अन्तर केवल यह रहा है कि श्रद्धा के अभाव में एक की बुद्धि- शक्ति अनियन्त्रित होकर केवल बर्बरता का प्रदर्शन कर सकी है और दूसरे का बुद्धि- बल श्रद्धा द्वारा नियन्त्रित होने से सज्जनता का प्रतिपादन करता रहा है।

यदि आज की चमत्कारिणी बुद्धि का ठीक दिशा में उपयोग करना है, संसार से दुःख- दर्द को मार भगाना है, अपनी धरती- माता को स्वर्ग बनाना है, मानव सभ्यता की रक्षा के साथ- साथ उसका विकास करना है तो अन्तःकरण में श्रद्धा की प्रतिस्थापना करनी होगी। श्रद्धा ही एक ऐसा प्रकाश है, जो मनुष्य को अनन्त अन्धकार में खोने से बचाये रहता है। श्रद्धावान को जहाँ अपने प्रति स्रेह रहता है, वहाँ दूसरों के प्रति भी। आज बुद्धि के अतिरेक के युग में इसी श्रद्धा नामक मानव मूल्य का अभाव हो गया है। जिस दिन मनुष्य में श्रद्धा के भाव की बहुलता हो जायेगी, बुद्धिवादिता का नियमन होगा, तब आज के ध्वंससूचक बौद्धिक चमत्कार सृजन सम्बन्धी वरदान बन जायेंगे।
वाङ्मय- २, पृष्ठ ७.९- ११ से संकलित, संपादित






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