The News (All World Gayatri Pariwar)
Home Editor's Desk World News Regional News Shantikunj E-Paper Upcoming Activities Articles Contact US

धर्म आदर्शवादिता और एकता का प्रतीक बने

[Shantikunj], Jul 25, 2017
पर्व आयोजनों की प्रस्तुत वेला में हर क्षेत्र, वर्ग द्वारा किये जाये ऐसे प्रयास 

अनेक सम्प्रदाय, अनेक देवता, अनेक ग्रन्थ, अनेक विधि- निषेध गढ़े गये और बिलगाव की जडें मजबूत होती चली गर्इं। इससे केवल पुरोहित वर्ग का स्वार्थ सधा। बाकी सब लोग भ्रान्तियों के जंजाल में फँसकर अपना समय, धन और विवेक गँवाकर घाटे में ही रहते रहे। 

विवेक की माँग है कि इस अनेकता को घटाया और मिटाया जाय। एक धर्म, एक ईश्वर, एक दर्शन, एक आचार, एक जाति की भावनात्मक एकता स्थापित की जाय और उसका व्यावहारिक स्वरूप एक राष्टः में, एक भाषा में विकसित किया जाय। पृथकता के लिए आग्रह बनाये रखकर हम हर दृष्टि से घाटे में रहेंगे।

सच्ची धार्मिकता बनाम धर्मान्धता 
एक पन्थ का साधु या पुरोहित दूसरे सम्प्रदाय वालों को अमान्य होता है, क्योंकि उस धार्मिकता का आधार बाह्य परिचर्या के साथ जुड़ा होता है। उनके अनुरूप वस्त्रों का रंग, वेश, तिलक, छाप और अमुक पैगम्बर अथवा पुस्तक की दुहाई देने वाले, मान्य परम्पराओं का परिपोषण करने वाले लोग ही अन्ध- श्रद्धालु जनता में मान्यता प्राप्त करते हैं। यह धर्म की अन्ध- परम्परा हुई। दुर्भाग्य से आज इसी का प्रचलन बहुत है। 

फिर भी सार्वभौम- धर्मतत्त्व को सर्वथा विस्मृत नहीं कर दिया गया है, उसकी सर्वत्र अवज्ञा, अवहेलना नहीं हुई है। विचारशील लोग सोचते हैं कि जब धरती- आसमान एक हैं, एक ही सर्दी- गर्मी सबको प्रभावित करती है, हवा और पानी का एक ही तत्त्व सबका पोषण करता है और मनु की समस्त सन्तानें एक ही मनुष्य एवं मानव नाम से पुकारी जाती हैं, तो फिर समस्त विश्व का एक ही धर्म क्यों नहीं हो सकता? जब विज्ञान  की मान्यताएँ सर्वत्र एक ही रूप में मानी जाती हैं तो ज्ञान को भी अविच्छिन्न क्यों नहीं रहना चाहिए। धर्म तत्त्व में देश और जाति के कारण अन्तर क्यों आना चाहिए? जब प्रेम, सत्य, संयम, औदार्य जैसे सद्गुण और क्रोध, छल, आलस्य, आदि दुर्गुण सर्वत्र एक ही कसौटी पर कस कर भले और बुरे घोषित किये जाते हैं, तो धर्म की अन्यान्य मान्यताएँ क्यों ऐसी नहीं होनी चाहिए जिन्हें मानवीय विवेक बिना किसी हिचकिचाहट के अंगीकार कर सके? 

विवेक की दृष्टि अपनानी होगी 
यह कैसी विडम्बना है कि मोक्ष का, उन्मुक्त अन्त:स्थिति का समर्थन करने वाले धर्म ही किस प्रकार एक सम्प्रदाय के लोगों को दूसरे सम्प्रदाय के लोगों के साथ एकता स्थापित करने में दीवारें खड़ी करते हैं। अपने और दूसरे पक्षधरों के बीच असमानता ही नहीं, अन्याय करने का भी प्रोत्साहन करते हैं। छोटी- छोटी मान्यताओं, परम्पराओं एवं क्रिया- कृत्यों के कारण मतभेदों को उभार कर वे भयंकर विग्रह उत्पन्न करते हैं और धर्मयुद्ध के, जिहाद के नाम पर उन कुकृत्यों का सृजन करते हैं, जिन्हें देखकर 'अधर्म' भी स्तब्ध रह जाय। वह धार्मिकता कैसी जो मानवीय सद्गुणों को बढ़ाने की अपनी मूल प्रकृति को छोड़कर मतान्तरवाद के सहारे अमानवीय कृत्यों और दुष्कर्मों को बढ़ावा देने लगे? 

सम्प्रदायमुक्त धर्म ही मान्य धर्म हो सकता है। सम्प्रदायों को धर्म मान बैठने से ही सारी गड़बड़ी उत्पन्न होती है। धर्म शब्द के साथ जो सहज श्रद्धा और शाश्वत समर्थन जुड़ा हुआ है, उसका शोषण सम्प्रदायवादी करते हैं और जब मतान्तरवादी  दुराग्रहों पर अंकुश किया जाता है तो ‘धर्म खतरे में है’ के नारे लगाकर भावुक जनता की भावनाएँ भड़काते हैं। 

भोजन- वस्त्र में रुचि की भिन्नता की तरह सम्प्रदायों को वैयक्तिक अभिरुचि का विषय माना जा सकता है, किन्तु धर्म के सर्वोच्च सिंहासन पर उसे नहीं बिठाया जा सकता। एकांगी दृष्टिकोण, पक्षपात का दुराग्रह धर्म कैसे हो सकता है? विवेक और औचित्य को यदि आधार माना जाय तो प्राय: सभी सम्प्रदाय वालों को अपने- अपने पंथों में से ढेरों कूड़ा- करकट बुहारना पड़ेगा। एक समय की उपयोगिता दूसरे समय में अनुपयोगिता बनती रहती है। यह दृष्टि रखकर यदि सफाई पर निकला जाय तो हर सम्प्रदाय में ऐसा बहुत कुछ है, जिसकी अब कोई ज़रूरत  नहीं रही। इसी  प्रकार यदि दोष- दर्शन हटाकर गुण- ग्राहक दृष्टि को विकसित किया जाय तो अन्य सम्प्रदायों में ऐसा बहुत कुछ मिलेगा, जिसे अपने धर्म में मिला लेने से उसकी हेटी नहीं होगी, वरन् सर्वांगपूर्णता में ही अभिवृद्धि होगी। 

व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा की विडंबना एकता को अनेकता में बिखेर कर हमने पाया कम, खोया बहुत। प्राचीनकाल में एक ईश्वर था और एक धर्म। पृथकतावादी निहित स्वार्थों ने अपना लाभ इसमें देखा कि उनका एक विशेष सम्प्रदाय बने, उसके अनुयायी अन्यान्यों से पृथक् होकर एक विशेष वर्ग बनायें और दूसरों से लड़ें। उनका व्यक्तिगत वर्चस्व इसी में बनता था। प्रतिभाशाली अग्रगामी जन- समाज को अपने पीछे घसीट ले चलने में सदा से ही बहुत कुछ सफल होते रहे है। अस्तु, पृथकतावाद पनपता गया। अनेक सम्प्रदाय, अनेक देवता, अनेक ग्रन्थ, अनेक विधि- निषेध गढ़े गये और बिलगाव की जडें मजबूत होती चली गर्इं। इससे केवल  पुरोहित वर्ग का स्वार्थ सधा। बाकी सब लोग भ्रान्तियों के जंजाल में फँसकर अपना समय, धन और विवेक गँवाकर घाटे में ही रहते रहे। 

एकता के सूत्र पुन: प्रगाढ़ हों 
विवेक की माँग है कि इस अनेकता को घटाया और मिटाया जाय। एक धर्म, एक ईश्वर, एक दर्शन, एक आचार, एक जाति की भावनात्मक एकता स्थापित की जाय और उसका व्यावहारिक स्वरूप एक राष्टः में, एक भाषा में विकसित किया जाय। पृथकता के लिए आग्रह बनाये रखकर हम हर दृष्टि से घाटे में रहेंगे। 
पूर्वकाल में राजा और धर्माचार्य की भूमिका एक ही व्यक्ति निबाहता था। धर्म- व्यवस्था और शासन का सूत्र- संचालन एक ही व्यक्ति करे, इसमें उन दिनों सुविधा समझी गई। मुस्लिम इतिहासकारों ने बादशाहों को 'जिले अल्लाह' (ईश्वर का प्रतीक) लिखा है। डेनमार्क की माताएँ अपने नवजात बच्चों का स्पर्श राजा से कराने के लिए ले जाती थीं और किसान अपना अनाज तब खाते थे जब राजा उसे छूकर च्निर्दोष' बना देता था। उनका विश्वास था कि इस प्रकार के स्पर्श से कल्याण होता है। ब्रिटेन में यह मान्यता बहुत समय तक बनी रही कि रोग- मुक्ति के लिए राजा का स्पर्श चमत्कारी उपचार है। धर्माचार्य और शासनकर्त्ता की दोनों ही भूमिकाएँ उन्होंने निभाई हैं। 

धर्म और शासन को पृथक् इसलिए होना पड़ा कि उसमें पृथकतावादी- दुराग्रहों ने अड्डा जमा लिया। यदि धर्म केवल भावनात्मक- एकता, चरित्र- निष्ठा और लोककल्याण की सत्प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करे, व्यक्ति और समाज की उत्कृष्टता बढ़ाने में सहायता करे तो कोई कारण नहीं कि उसे सर्वमान्य सम्मान पुन: प्रदान न किया जा सके। 

प्राचीनकाल में धर्म और शासन एक था। बाद में दोनों एक- दूसरे के पूरक होकर रहते रहे। यही स्थिति पुन:स्थापित करनी पड़ेगी। धर्म के हाथ में शासन रहना चाहिए और शासन को धर्म की प्रतिष्ठापना एवं सुरक्षा का उत्तरदायित्व निबाहना चाहिए। 
धर्म में मानवीय- चेतना को आस्थाओं के साथ बाँधने की क्षमता है। व्यक्ति को सुव्यवस्थित और समाज को समुन्नत बनाने की दृष्टि से यह अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। उसे यदि अपने यथार्थ स्वरूप में रहने दिया जाय और चिन्तन तथा कर्तृत्व को परिष्कृत बनाने के लिए दूरदर्शिता के साथ प्रयुक्त किया जाय तो निस्सन्देह सर्वतोमुखी प्रगति और सुख शान्ति के अभिवर्द्धन में धर्म की महती भूमिका हो सकती है। आज की विकृत दुर्दशा की कीचड़ से धर्म को निकाल कर उसे आदर्शवादी उत्कृष्टता के साथ जोड़ना मानवीय हित- साधना की दृष्टि से अतीव आवश्यक कार्य माना जाना चाहिए। 






Click for hindi Typing


Related Stories
Recent News
Most Viewed
Total Viewed 280

Comments

Post your comment