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रूढ़ियों में न भटकें, विवेक मार्ग अपनायें

[Shantikunj], Oct 27, 2017
समय- शक्ति को व्यसन से बचायें, सृजन में लगायें

सनातन दर्शन
भारतीय संस्कृति को 'सनातन' कहा गया है। सनातन का अर्थ होता है जिसका अस्तित्व अनादिकाल से बना रहा है और अनन्त काल तक बना रहेगा। जो सनातन है, वही सत्य है, वही अनश्वर है। परम पिता परमात्मा या माँ आदिशक्ति- चित्शक्ति सत्य- सनातन है। उसकी रची हुई माया परिवर्तनशील है, नश्वर है, उसके रूप बदलते रहते हैं। सभी वस्तुओं और प्राणियों के रूप प्रकाश के कारण ही भासित होते हैं। रूप बदलते रहते हैं, किन्तु प्रकाश तो वही रहता है। इसीलिए मूल प्रकाश तो अनश्वर- सनातन है उसके द्वारा भासित होने वाले रूप परिवर्तनशील, नश्वर हैं।

परमात्मा का एक अंश, दिव्य प्रकाश (डिवाइन लाइट) एक किरण के रूप में आत्मा को भी परमात्मा का अंश कहा गया है। इसी नाते संत कवि तुलसीदास जी ने लिखा है:-

ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन अमल सहज सुखराशी।

आत्मा के रूप में यह सनातन, चेतन हर मनुष्य के अन्दर है। सनातन दर्शन को समझने वाले व्यक्ति इसी सनातन सत्य को समझते हुए उसी के अनुसार अपने जीवन क्रम को चलाते रहते हैं। वे परिवर्तनशील, अनश्वर तत्त्वों का उपयोग सामयिक आवश्यकतानुसार करते हुए, उनका लाभ उठाते हुए भी अपना लक्ष्य उन्हें नहीं बनाते, इसीलिए वे अमल (मल- दोष रहित) रहते हुए सहज सुखराशी होने का लाभ उठाते रहते हैं। इसी नाते उनके अन्दर दिव्यता उभरती रहती है और महानता विकसित होती रहती है।

पश्चिमी विद्वानों का भी कहना है "ऐव्री इण्डिविजुअल इस पोटेंशली डिवाइन"। अर्थात हर व्यक्ति के अन्दर सुप्त अवस्था में दिव्यता विद्यमान है। उसे कहीं से लाना नहीं है, केवल साधना द्वारा उसे जगाना भर है। हर हाथ में कला- कौशल और हर गले में संगीत होता है, उसे जगाना भर पड़ता है। सनातन दर्शन इसी दिव्यता को जगाने की प्रेरणा देता और कौशल विकसित करता है।

देवत्व जागरण, देवोत्थान
देवोत्थान एकादशी अभी (३१ अक्टूबर) को मनायी जायेगी। लोकोक्ति यह प्रचलित है कि अब तक देव सोये हुए थे, अब जाग गये हैं। इसलिए विवाह, यज्ञादि जैसे शुभ प्रयोग अब सफल होने लगेंगे। लौकिक दृष्टि से यह उक्ति संदेहास्पद ही लगती है। यदि यह बात मान ली जाय तो अनेक प्रश्न उभरने लगते हैं।

  • यदि देव सो गये थे तो प्रकृति के सारे कार्य व्यवस्थित कैसे चल रहे थे? वर्षा के द्वारा प्रकृति में उर्वरता बढ़ाने के दिव्य प्रयोग कैसे हो गये?
  • यदि देव सोये होने से शुभ प्रयोग सफल नहीं होते तो देवशयनी एकादशी (आषाढ़ शुक्ल ११) से देवोत्थान एकादशी (कार्तिक शुक्ल ११) तक कोई भी पर्व निर्धारित क्यों किये गये? क्या गुरुपूर्णिमा से लेकर दीपावली तक के सारे पर्वों पर की गयी पूजा- साधना निष्फल जाती है?
स्पष्ट है कि ऐसा नहीं है। दार्शनिक दृष्टि से इसके समाधान मिल सकते हैं। पूर्वकाल में श्रावण मध्य से लेकर कार्तिक मध्य तक वर्षा के कारण आवागमन में रुकावट आने से यात्राओं को रोककर यती भी चातुर्मास साधना करने लगते थे। यज्ञ, विवाह आदि सामूहिक आयोजनों को खुले में ही करना संभव नहीं होता, इसलिए यह लोकोक्ति प्रचलित की गयी। अब परिस्थितियाँ बदल गयी हैं, सुविधायें बढ़ गयी हैं, इसलिए वह लाचारी नहीं रही। अस्तु विवेकपूर्वक प्रचलन बदले जा सकते हैं। देशकाल की परिस्थितियाँ देखकर युग निर्माण परिवार इसीलिए सभी महीनों में लोकहितार्थ विभिन्न यज्ञ, संस्कार आदि के प्रयोग करता रहता है।

वर्षाऋतु में उर्वरता बढ़ जाती है और वृक्षों, वनस्पतियों की वृद्धि तेजी से होती है। उनके बाहरी आकार तो तेजी से बढ़ जाते हैं, उनके अन्दर के रसों की गुणवत्ता उस तेजी से नहीं बढ़ पाती। देवोत्थान एकादशी तक प्रकृति में वृद्धि के साथ गुणों के विकास और पोषण का क्रम चल पड़ता है। उनकी दिव्य क्षमता विकसित होने लगती है। इसलिए इस प्रक्रिया को 'देवोत्थान' माना जाना उचित है।

एक पक्ष और है। वर्षाकाल में उर्वरता बढ़ने से उत्पादन बढ़ता है। उन उत्पादों का उपयोग यदि अनगढ़ता से किया जाय तो सत्परिणाम नहीं निकल पाते, सुगढ़ता से करने पर श्रेष्ठ परिणाम मिलते हैं। सुगढ़ता देवत्व की परिचायक है। इसलिए मनुष्य को अपने अन्दर देवत्व जगाने की साधना अनिवार्य रूप से करने की जरूरत पड़ती है। देवोत्थान एकादशी कृषि और वन उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ने की सूचना के साथ मनुष्य में देवत्व के जागरण की अनिवार्यता का संदेश एवं शक्ति प्रवाह भी लेकर आती है। यह ऐसा समय है जब हर व्यक्ति को अपने अन्दर सुगढ़ता- देवत्व का स्तर बढ़ाने की संकल्पबद्ध साधना करनी चाहिए।

ध्यान रहे मनुष्य के समय, पुरुषार्थ एवं साधनों को निरर्थक और हानिकारक बनाने वाले व्यसनों, कुरीतियों की जनक मनुष्य की यह अनगढ़ता ही होती है। अपने व्यक्तित्व में देवत्व के विकास से ही उक्त घातक प्रवृत्त्यिों से बचाकर जीवन की शक्तियों को सार्थक कल्याणकारी प्रवृत्तियों में लगाया जा सकता है।
देवत्व की सही अवधारणा

व्यक्ति में देवत्व के विकास में एक बड़ी बाधा यह है कि मनुष्य देवताओं को कोई शरीरधारी व्यक्ति मानकर, उन्हें उनकी मन पसंद सामग्री भेंट करके अपनी मनोकामनाएँ पूरी कराने की बात भर सोचता रहता है। देव सान्निध्य से अपने अन्दर देवत्व के विकास का सिद्धांत वह अपना ही नहीं पाता।

वेद के अनुसार देवशक्ति परमात्मा की विशिष्ट धाराएँ हैं। उन्हें श्रद्वा एवं पूजा उपचार के माध्यम से अपनाने, विकसित करने के लिए जो व्यक्ति साधना करते हैं, यह चैतन्य धाराएँ उन पर अनुग्रह करके उन्हें धन्य बना देती हैं। युगऋषि पू. गुरुदेव ने इस तथ्य को बहुत सहज भाषा में समझाया है।

"ईश्वर एक व्यक्ति है और वह कुछ पदार्थ अथवा प्रशंसा का भूखा है, उसे रिश्वत या खुशामद का प्रलोभन देकर उल्लू बनाया जा सकता है और मनोकामना तथा स्वर्ग- मुक्ति की आकांक्षाएँ पूरी करने के लिए लुभाया जा सकता है।" इस अज्ञान में भटकता हुआ जन- समाज अपनी बहुमूल्य शक्तियों को निरर्थक विडंबनाओं में बरबाद करता रहता है। वस्तुत: ईश्वर एक शक्ति है जो अंत:चेतना के रूप में, सद्गुणों और सत्प्रवृत्तियों के रूप में हमारे अंतरंग में विकसित होती है। ईश्वर- भक्ति का रूप पूजा- पत्री की टंट- घंट नहीं, विश्व- मानव को भावनात्मक दृष्टि से समुन्नत बनाने का प्रबल पुरुषार्थ ही हो सकता है।

देवताओं की प्रतिमाएँ तो ध्यान में मनोवैज्ञानिक व्यायाम की आवश्यकता पूरी करने की धारणा मात्र हैं। वस्तुत: जैसे देवी- देवता मूर्तियों और चित्रों में अंकित किए गए हैं, उनका अस्तित्व कहीं भी नहीं है। उच्च भावनाओं का अलंकारिक रूप ही ईश्वर के प्रतीक रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। जैसे- ऋतंभरा प्रज्ञा को ही सरस्वती कहते हैं। मन को साधने के लिए ही उनकी अलंकारिक छवि विनिर्मित की गई है। वस्तुत: अंतरंग में समुन्नत सद्ज्ञान ही सरस्वती है।

इसी प्रकार अन्य देवशक्तियों को भी प्राण की विशिष्ट धाराओं, सत्प्रवृत्तियों के रूप में समझकर उन्हें साधना पुरुषार्थ के माध्यम से जीवन में विकसित करने के संकल्प और प्रयास होने चाहिए। इनके बिना प्राप्त शक्तियों और विभूतियों को नश्वर प्रयोजनों से बचाकर शाश्वत प्रयोजनों में लगाना संभव नहीं होता।

लाचारी से उबरें
जब किसी श्रेष्ठ प्रवृत्ति का अपनाने या उत्तम पुण्यदायी, कल्याणकारी कार्य को करने की बात उठती है तो अधिकतर लोग कहते हैं, "हम यह समझते भी है और चाहते भी हैं, लेकिन हमसे हो नहीं पाता।" कहने के लिए तो समय और साधनों की कमी का बहाना बनता है, लेकिन वास्तव में यह लाचारी अपने अन्दर देववृत्तियों के अभाव के कारण ही उभरती है। हमारे समय, पुरुषार्थ और साधन व्यसनों और कुरीतियों की भेंट चढ़ते रहते हैं तो सत्प्रयोजनों में कहाँ से लगें?

व्यसन क्या है? ऐसे कार्यों में रस लेना जिनके परिणाम अच्छे नहीं हैं, हमारे हित में नहीं हैं। परिणामों पर विचार किए बिना, देखादेखी क्षणिक सुख के आकर्षण में रस लेना शुरू कर दिया। यह अनगढ़ता साधनों को व्यसन बना देती है।

नशे में प्रयुक्त होने वाले पदार्थ अल्कोहल (शराब), अफीम, गाँजा में औषधियों के गुण हैं। सुगढ़ उपयोग से रोगनाशक औषधि और अनगढ़ उपयोग से जानलेवा व्यसन बन जाते हैं।

धन सदुपयोग करने पर जीवन निर्वाह, जनकल्याण का साधन बन जाता है, वही अनगढ़, दुरुपयोग के कारण शोषण एवं अकल्याण का माध्यम, व्यसन बन जाता है।

यश सदुपयोग से लोगों को दिशा देने का कल्याणकारी साधन बन जाता है और अनगढ़ कामनाओं से जुड़कर लोगों को चकमा देने, बहकाने, बरगलाने वाला अकल्याणकारी माध्यम बन जाता है।

कुरीतियाँ भी इसी प्रकार अनगढ़ विचारों और आदतो के संयोग से पनपती हैं। छुआछूत, दहेज, मृतकभोज, गन्दगी, प्रदूषण आदि फैलाने वाली कुरीतियाँ किसी न किसी अनगढ़ विचार या आदतों के कारण पनपी हैं। इनमें ही अपनी क्षमताएँ नष्ट हो जाती हैं तो आत्मीयता, सहृदयता, स्वच्छता, सहकार, संवेदना जैसी सत्प्रवृत्तियाँ विकसित करने के प्रयास अधूरे ही रह जाते हैं। इसलिए व्यक्ति, परिवार एवं समाज के हितसाधन में बाधक लाचारी से बचने के लिए चिन्तन, व्यवहार में सुगढ़ता, आदर्शवादिता की देववृत्तियों को विकसित करना होगा। संकल्प करें कि व्यसनों से, बचायेंगे, सृजन में लगायेंगे।

युग निर्माण परिवार के पुरुषार्थी सृजन सैनिक इन दिनों अनेक प्रान्तों को नशामुक्त बनाने के प्रखर अभियान चला रहे हैं। इन्हें और अधिक तेजस्वी बनाया जाय। नशा के अलावा अन्य व्यसनों से भी समय, साधन बचाये जायें। उस बचत का एक, आधा, चौथाई हिस्सा भी यदि सृजन कार्यों में नियोजित किया जा सके तो मनुष्यता धन्य हो जाये।

भटकें नहीं, विवेक अपनायें
कहा जा चुका है, मनुष्य के अन्दर चेतन, अमल, सहज सुखकारी, अविनाशी ईश्वर- अंश विद्यमान है। वह भ्रमवश जड़ पदार्थों, मनोविकारों, नश्वर पदार्थों में रस खोजने लगता है तो भटक जाता है। आत्म- चैतन्य निर्मल मन और अनश्वर प्रभु में रस लेने लगे तो धन्य हो जाये।

परमात्मा श्रेष्ठ आदर्शों का समुच्चय है। आदर्शों की ओर बढ़ना, ईश्वर की ओर बढ़ना है। आदर्शों को अपनाना ही महानता को, ईश्वर को अपनाना है। नश्वर पदार्थों में रस लेने वाले, कथित बड़े आदमी बनने के इच्छुक व्यक्ति भटक जाते हैं। हमें न भटकना है, न अपने प्रभाव क्षेत्र वालों को भटकने देना है। अपने जीवन को सार्थक बनाते हुए अपने प्रभाव क्षेत्र वालों को भी उसी दिशा में बढ़ाना है। युगऋषि का स्पष्ट निर्देश है-
बड़े आदमी नहीं, महान बनें :- बड़े आदमी बनने की हविश और ललक स्वभावत: हर मनुष्य में भरी पड़ी है। धन, पद, इन्द्रिय सुख, प्रशंसा, स्वास्थ्य आदि कौन नहीं चाहता? वासना और तृष्णा की पूर्ति में कौन व्याकुल नहीं है? लेकिन अपने परिवार को हमने बड़े आदमियों का समूह बनाने की बात कभी नहीं सोची। उसे महापुरुषों का देव समाज देखने की ही अभिलाषा सदा से रही है।

महामानव बनना ही व्यक्तिगत जीवन का साफल्य और समाज का सौभाग्य माना जा सकता है। मनुष्य जीवन की सार्थकता महामानव बनने में है। इसके अतिरिक्त आज की परिस्थितियाँ महामानवों की इतनी आवश्यकता अनुभव करती हैं कि उन्हीं के लिए सर्वत्र त्राहि- त्राहि मची हुई है। हर क्षेत्र उन्हीं के अभाव में वीरान और विकृत हो रहा है। ओछे स्तर के, बड़प्पन के भूखे लोग बरसाती उद्भिजों की तरह अहिर्निश बढ़ते चले जा रहे हैं, पर महामानवों की उद्भवस्थली सूनी पड़ी है। गीदड़ों के झुंड बढ़ चले, पर सिंहों की गुफाएँ सुनसान होती चली जा रही हैं।

इस युग की सबसे बड़ी आवश्यकता महामानवों का उद्भव होना ही है। वे बढ़ेंगे, तो ही विश्व के हर क्षेत्र में संव्याप्त उलझनों और शोक- संतापों का समाधान होगा। अपने परिवार का गठन हमने इसी प्रयोजन के लिए किया था कि इस खान से नररत्न निकलें और विश्व इतिहास का एक नया अध्याय आरंभ करें।

हमारे अनुयायी बड़प्पन की आकांक्षा को बदल कर महानता की आराधना शुरु कर दें। 'हम बदलेंगे- युग बदलेगा' का नारा हमें अपने व्यक्तिगत जीवन की विचार पद्धति और कार्य प्रणाली में आमूल- चूल परिवर्तन करके सार्थक बनाना चाहिए। निस्संदेह अपने परिवार में इस प्रकार का बदलाव आ जाए तो फिर कोई शक्ति युग परिवर्तन एवं नवनिर्माण को सफल बनाने में बाधक न हो सकेगी।

सभी सृजनशिल्पी अपने अन्दर देवत्व का विकास करें, ताकि दुष्प्रवृत्तियों में नष्ट होने वाले समय एवं साधनों के सुनियोजन से नवसृजन, धरती पर स्वर्ग के अवतरण का अभियान गगनचुंबी बन जाये।






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Gajendra kumar
2017-11-04 14:38:11
Baki jivan shanti se gujre
Gajendra kumar
2017-11-04 14:35:31
Ashram job
Gajendra kumar
2017-11-04 14:33:16
Ashram job
Gajendra kumar
2017-11-04 14:30:44
Man ki shanti chahiye