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सामूहिक उत्कर्ष के लिए सामूहिक साधना

[Shantikunj], Nov 25, 2017
हम अकेले नहीं हैं
व्यक्ति समूह का एक अविच्छिन्न घटक है। उसकी सत्ता का वास्तविक विकास तभी संभव है, जब वह समाजनिष्ठ होकर रहे। घड़ी का एक पुर्जा अलग अपनी अहंता प्रकट करे तो वह समय की सूचना दे सकने वाले समर्थ यन्त्र का अंग नहीं बना रह सकेगा। हाथ, पाँव, आँख, नाक, हृदय, मस्तिष्क आदि अंग अपने अलग- अलग क्रियाकलापों में लगे रहने पर बल दें तो शरीर का चल पाना ही कठिन हो जाय, तब कोई महत्त्वपूर्ण कार्य कर पाना तो असम्भव ही हो जाय।

किसी भी क्षेत्र में सामूहिक विकास के लिये सामूहिक प्रयास आवश्यक होते हैं। विज्ञान हो या उद्योग, शिक्षा हो या चिकित्सा, राजनीति हो या समाजसेवा, सामूहिक गतिविधियों के तालमेल के बिना इनकी स्थिति और प्रगति सम्भव नहीं। निस्सन्देह इनमें से प्रत्येक क्षेत्र में व्यक्ति की निजी परिकल्पनाओं- विचारों की उथल- पुथल भी योग देती है, पर वह योग सामूहिक प्रयास का अंग बनकर ही दिया जा सकता है।

आइंस्टाइन की निजी परिकल्पना उस समय तक के सामूहिक वैज्ञानिक शोध प्रयासों के परिणामों का लाभ उठाये बिना सापेक्षतावाद का सिद्धान्त न बन पाती; फिर उसे सार्वभौमिक स्वीकृति तो वैज्ञानिकों के समूह द्वारा परखे जाने पर ही मिली। तभी वैज्ञानिक चिन्तन एवं शोध की दिशा में उसका उपयोग सम्भव हुआ। गाँधीजी का अहिंसा और सत्याग्रह का विचार सामाजिक साधना के बिना न तो राजनैतिक स्वाधीनता दिलाने का आधार बन सकता था, न ही सामाजिक जागरण का।

उपासना भी अकेले नहीं होती
साधना के उपासना वाले अंग के बारे में भारतीयों में यह भ्रान्त धारणा बैठ चुकी है कि वह सिर्फ अलग- थलग ही होनी चाहिये। लेकिन इसका न तो शास्त्रीय आधार है, न ही व्यावहारिक कसौटी पर वह मान्यता प्रामाणिक ठहरती है। एकांत भजन और उपासना की भी सार्थकता यही है कि वह व्यक्ति को इस यथार्थ बोध तक पहुँचा दे कि वह विराट सर्वव्यापी चेतना का ही एक अंश है, अनन्त चेतना समुद्र की असंख्य मछलियों में से एक है।

उपासना सम्बन्धी विकृतियों का बड़ा रूप उसे पूरी तरह निजी मान बैठता है। व्यक्ति की पूर्णत: निजी सत्ता जैसी कोई चीज है ही नहीं, तब पूर्णत: निजी उपासना कैसे हो सकती है? उपासना का उद्देश्य चेतना का विस्तार, आनन्द की उपलब्धि, शक्ति का अर्जन और मनोयोग को उत्कृष्टताओं से जोड़ना है। इनमें से कुछ भी अकेले- अकेले सम्भव नहीं है। चेतना का विस्तार संकीर्णता की परिधि में सिमटे रहकर कैसे हो सकता है? जब परम सत्ता का ही मन एकाकी नहीं रमा, उसने एकाकीपन से ऊबकर मनुष्य समेत यह सृष्टि रची, तब उस सृष्टि का एक अंश मनुष्य एकाकी कैसे आनन्द पा लेगा?

शक्ति का अर्जन और शक्ति की उपयोगिता दोनों ही समूह के बीच ही सार्थक हो सकते हैं। मन को उत्कृष्टताओं से जोड़ने का समाज- निरपेक्ष अर्थ कुछ हो ही नहीं सकता। जहाँ समूह नहीं, समाज नहीं, वहाँ आचरण की उत्कृष्टता या निकृष्टता का प्रश्न ही नहीं। निर्जन स्थान में, जहाँ व्यवहार के लिये और कोई है ही नहीं सिवाय ईश्वर के, वहाँ कोई भी व्यक्ति क्या आदर्श आचरण करेगा और क्या मक्कारी- बदमाशी करेगा?

एकान्त नहीं, एकाग्रता
वेदों में सामूहिक उपासना सम्बन्धी उक्तियाँ भरी पड़ी हैं। ऋग्वेद और अथर्ववेद सांमनस्य सूक्तों में सामूहिक अनुभूति और सामूहिक कामनायें ही व्यक्त हुई हैं। जैसे-

"सं गच्छध्वं, सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे, संजानाना उपासते।।"

अर्थात्- हम सब साथ- साथ चलें, साथ- साथ बातचीत, विचार- विमर्श करें और एक- से मनोभावों से युक्त रहें।

"समानी व आकूति: समाना हृदयानि व:।
समानमस्तु वो मनो, यथा व: सुसहासति।।"

अर्थात्- हमारी चित्तवृत्तियाँ समान हों, हृदय और मन समान हों, जिससे सौहार्द्र से रह सकें।

सामूहिक साधना की अनिवार्यता ही इन पंक्तियों में प्रकट हुई है। समान चित्तवृत्ति तभी होगी, जब समान साधना की जायेगी। एक- सी विचार- तरंगें एक- सी चित्तवृत्ति को जन्म देती हैं। एकाग्रता का यही अर्थ है।

उपासना के लिये आवश्यक एकाग्रता को अन्धकार और अज्ञानता के युग में बहुत गलत समझ लिया गया, एकाग्रता का अर्थ मन की पूर्ण नीरवता नहीं, मन का एक ही दिशाधारा में दौड़ना है। चारों तरफ एक साथ चित्त न दौडे। निर्दिष्ट क्षेत्र में ही उसकी सारी शक्ति लगे, यही एकाग्रता है। यों शरीर के सभी कोषाणु उस समय अपनी सामान्य गतिविधि भी चलाते रहते हैं। वे सब कहीं दूर चले जायें, तब मन चुपचाप उपासना करे, ऐसा आग्रह कोई नहीं करता। उपासना का वैसा आधार सम्भव ही नहीं होगा।

जो स्थिति शरीर में कोशाणुओं की है, वही समाज में व्यक्तियों की। सब व्यक्ति चले जायें, दूर हटें, तब मैं उपासना करूँ, यह आग्रह उतना ही गलत है, जितना यह कि सब चाहे जैसी गतिविधि करते रहें, मैं उन्हीं के बीच बैठा गोमुखी में हाथ डाले माला सरकाता जाऊँगा और मेरी उपासना हो जायेगी। दोनों ही अज्ञानताजन्य अतियाँ हैं। शरीर के भिन्न- भिन्न अवयव अलग- अलग हरकतें करते रहें तो मन एकाग्र नहीं हो सकता। इसी प्रकार उपासना की एकाग्रता अन्य व्यक्तियों के द्वारा उत्पन्न विक्षेपों के बीच नहीं सध सकती। शरीर भर में फैले हुये ज्ञान- तन्तु और संवेदन- तन्तु उपासना की प्रतिष्ठा में संलग्न हो जायें, तो सच्ची एवं प्रगाढ़ उपासना होती है। इसी प्रकार व्यक्तियों का समुदाय एक ही भावधारा को एक साथ अपनाये, तो ध्यान- धारणा प्रगाढ़ होती है, उससे एकाग्रता बलवती होती है, खण्डित नहीं।

समूह साधना पर बल दीजिए
सामूहिक साधना ही हमारी समृद्ध परम्परा का अंग है। पतन काल में व्यक्तिवादी बिखराव आ गया तो उसे उपासना का अनिवार्य अंग नहीं मान लेना चाहिये। भारतीय सामूहिक उत्कर्ष के प्रयास से जब- जब विरत हुये हैं, तब- तब व्यक्तिवाद की प्रवृत्तियाँ पनपी- बढ़ी हैं और समाज की अवनति हुई है। इस अवनति से उबरने के जितने भी प्रयास हुये हैं, उनमें सामूहिक साधना पर सदा बल दिया गया है।

समुद्र- मंथन एक साधना ही थी, जो देवों और असुरों की सम्मिलित उपासना द्वारा पूरी हो सकी तथा चौदह सिद्धियों की उपलब्धि सम्भव हुई। आध्यात्मिक दृष्टि से रावण- विजय एक साधना ही है। तुलसीदास ने इसलिये अपने ग्रन्थ को 'रामचरित मानस' नाम दिया। अध्यात्म रामायण में तो उस पूरे कथा प्रसंग का आध्यात्मिक विश्लेषण ही प्रधान है। सीता रूपी सिद्धि को पाने के लिये रीछ- वानरों समेत सामूहिक साधना आवश्यक हुई। श्रीकृष्ण द्वारा सोलह हजार गोपियों के साथ रचा गया महारास भागवत्- तत्त्व के सभी ज्ञाताओं द्वारा सामूहिक साधना ही माना जाता है। बुद्ध ने सामूहिक साधना के विशाल आयोजनों द्वारा ही लोकजागृति की। अंग्रेजों की दासता से स्वदेश को मुक्त कराने के लिये गाँधीजी ने सामूहिक प्रार्थना सभाओं को भी आवश्यक माना और उसके द्वारा सामूहिक जागृति फैला सके।

समान आकृति, यानी समान चित्तवृत्ति समान हृदय और समान मन के बिना समूह में सौहार्द्रभाव स्थायी नहीं हो सकता और वैसा हुये बिना सुमति, सौमनस्य और अन्तर्बाह्य समृद्धि सम्भव नहीं। अत: सामूहिक साधना की महत्ता समझना और उसे अपनाना आज की युगीन आवश्यकता हैै। वही प्रगति के आधार जुटा सकती है।






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