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प्रेम ही परमेश्वर है।


 प्रेम की उपलब्धि परमात्मा की उपलब्धि मानी गई है। प्रेम परमात्मा का भावनात्मक स्वरूप है। जिसे अपने अंतर में सहज ही अनुभव किया जा सकता है। प्रेम प्राप्ति परमात्मा की प्राप्ति का सबसे सरल मार्ग है। परमात्मा को पाने के अन्य साधन कठिन, कठोर, दु:साध्य तथा दुरूह है। एकमात्र प्रेम ही ऐसा साधन है, जिसमें कठिनता, कठोरता अथवा दु:साध्यता के स्थान पर सरलता और सुख का समावेश होता है। प्रेम की आराधना द्वारा परमात्मा को पाकर मनुष्य परमात्मा स्वरूप ही हो जाता है।
   
यों तो कोई भी कह सकता है कि उसके हृदय में प्रेम का निवास है। ऐसा अनुभव भी हो सकता है। क्योंकि बिना प्रेम भावना के मनुष्य जीवित नहीं रह सकता।

हृदय की सरलता तथा सदाशयता प्रेम पर ही निर्भर है। इसके नष्ट हो जाने पर मनुष्य अधिकांश में आतातायी बन जाता है, फिर चाहे वह अपने प्रति अनाचारी हो अथवा औरों के प्रति। आततायित्व भी मृत्यु का ही एक लक्षण है। शरीर से जीते हुए भी ऐसे मनुष्य आत्मा से मर चुके होते हैं। जीवन अनुभूति का कोई भी आनंद उन्हें नहीं मिलता। करुणा, दया, क्षमा आदि से बहने वाली शीतल वायु का अनुभव इन्हें नहीं होता। इन दोषों के साथ चलने वाला जीवन निश्चेष्ट मृत्यु से भी बुरा होता है। अस्तु, जीवित मनुष्य में प्रेम का कुछ-न-कुछ भाव होना अनिवार्य है।

 तथापि जिसे प्रेम को, जिस आकर्षण अथवा रूचि को मनुष्य अपने अंदर अनुभव करता है, वह वास्तविक प्रेम नहीं होता। वह मात्र स्वार्थ के प्रति मोह की, अनुभूति हुआ करती है।
 
 अनेक बार लोग देश, राष्ट्र अथवा समाज के प्रति बड़ा प्रेम अनुभव करते हैं। उनका यह प्रेम बात-बात में प्रकट होता है। परमात्मा के प्रति भक्ति भाव में आँखें भर-भर लाते  हैं। कीर्तन, भजन अथवा जाप करते समय धाराओं में रो पड़ते हैं।  उनकी यह दशा देखकर कहा जा सकता है कि उन्हें समाज अथवा परमात्मा से प्रेम है। किन्तु वे ही लोग अवसर आने पर उसके लिए थोड़ा-सा भी त्याग करने के लिए तैयार नहीं होते। ऐसे प्रेमी अथवा भक्तजन प्रेम से नहीं, भावातिरेक से परिचालित होते हैं। सच्चे प्रेम का प्रमाण है- त्याग। जो अपने प्रिय के लिए सब कुछ सुखपूर्वक त्याग करता है और जो उस त्याग के बदले में रत्ती भर भी कोई वस्तु नहीं चाहता, वही सच्चा प्रमी है, भक्त है।
 
प्रेम में प्रदान के सिवाय आदान का विनिमय नहीं होता। वह विशुद्ध बलिदान, त्याग और आत्मोत्सर्ग की भावना है। सत्य प्रेमी अपने प्रियजन के हित और सुख के लिए सब कुछ दे डालता है और इस देने के भावना में दान अथवा प्राप्ति को कोई भाव नहीं रखता। किसी के लिए कुछ त्याग करते समय जब ऐसा अनुभव हो कि हम अपने लिए ही त्याग कर रहे हैं, अपने त्याग से दुसरे को मिलने वाला सुख जब अपनी आत्मा में अनुभव हो, तब समझना चाहिए कि हमारे हृदय में सच्चे प्रेम का शुभारंभ हो गया है। जिस दिन इस शुभ प्रेम का आरंभ हो जायेगा, संसार के सारे दु:ख शरीर, मन और आत्मा के तीनों ताप नष्ट होने लगेंगे। हर समय एक अनिर्वचनीय आनंद की शीतलता का अनुभव होता रहेगा।
 
पूजा, पाठ, जप, ध्यान, अनुष्ठान आदि, जो भी क्रियाएँ की जाती हैं, उनका मूल उद्देश्य परमात्मा के प्रति अपनी निष्ठा को गहरा करना होता है। ज्यों-ज्यों निष्ठा गहरी होती जाती है, त्यों-त्यों परमात्मा का प्रेम भाव धीरे-धीरे परिपक्व होकर भक्ति का रूप धारण कर लेता है।
 
परमात्मा के प्रति विकसित प्रेम जब अपनी चरमावधि में पहुँचता है, तब  केवल परमात्मा तक फै ल जाता है। सच्चे भक्त और परमात्मा के सच्चे प्रेमी की पहचान यही है कि उसका प्रेमभाव संसार के सारे जीवों के  प्रति प्रवाहित होता रहता है। कोई व्यक्ति कितनी ही पूजा और ध्यान, जप आदि क्यों न करता हो, पर उसका प्रेमभाव संकुचित हो, उसका प्रचार प्राणिमात्र तक न हुआ हो, तो उसे भक्त नहीं माना जा सकता।
 
भगवान का भक्त, परमात्मा को प्रेम करने वाला अपनी आत्मा और समाज के नैतिक नियमों को प्यार करता है। कारण यह होता है कि नैतिक  नियमों में आदर्शवाद का समन्वय होता है और आदर्शवाद का ही एक व्यवहारिक रूप अध्यात्म होता है।
 
जिसने आदर्शवाद को प्रेम करना सीख लिया उसने मानो परमात्मा को पाने का सूत्र पकड़ लिया। परमात्मा के मिलने में अपार आनंद होता है। लेकिन उसकी ओर ले जाने वाले इस क्रम मे भी कम आनंद नहीं होता है। जो आत्मा द्वारा स्वीकृत समाज के नैतिक नियमों का पालन करता रहता है, आदर्शवाद का व्यवहार करता है, वह समाज की दृष्टि में ऊँचा उठ जाता है। समाज उससे प्रेम करने लगता है। ऐसे भग्यवान व्यक्ति जहाँ रहते हैं, उसके आस-पास का वातावरण स्वर्गीय भावों से भरा रहता है। कटुता और कलुष  का उसके समीप कोई स्थान नहीं होता। जिस प्रकार का निर्विघ्न और निर्विरोध आनंद परमात्मा के मिलने से |







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