एकता, समता, शुचिता का प्रतीक : गणेश उत्सव - डॉ. प्रणव पण्ड्याजी

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२९ अगस्त २०१४ गणेश चतुर्थी विशेष


बडे- बड़े मण्डपों और आकर्षक सजावट के बीच पूरे वर्ष इन्तजार के बाद आता है गणेश उत्सव। पौराणिक मान्यता है कि भाद्रपक्ष मास की शुक्ल चतुर्थी से दस दिन तक भगवान शिव और पार्वती के पुत्र गणेश पृथ्वी पर रहते हैं। गणेश चतुर्थी से अनन्त चतुर्दशी के इस दस दिवसीय पर्व को पूरे भारत में धूमधाम से मनाया जाता है। गणेश उत्सव का इतिहास बड़ा पुराना है। लेकिन इसे प्रसिद्ध, संगठित एवं सार्वजनिक करने का श्रेय स्वतन्त्र सेनानी और समाज सुधारक लोकमान्य तिलक को जाता है। अँग्रजों के खिलाफ सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन के लिए युवा वर्ग को एकत्रित करने की योजना इस पर्व से की। तब से लेकर आज तक गणेश उत्सव का सिलसिला निरन्तर जारी है।

गणेश चतुर्थी के इस पर्व का आध्यात्मिक एवं धार्मिक महत्त्व भी है। हिन्दू मान्यता के अनुसार हर अच्छी शुरूआत गणेश के नाम के साथ होती है। हर मांगलिक कार्य का शुभारम्भ गणपति के ध्यान और पूजन से किया जाता है। मान्यता है कि वे विघ्रों के नाश करने और मंगलमय वातावरण बनाने वाले हैं। गणेश शब्द का अर्थ होता है- जो समस्त जीव जाति के ‘ईश’ अर्थात् स्वामी हो- गणानां जीवजातनां यः ईशः, सः गणेशः। ।। श्री गणेश जी सर्वस्वरूप, परात्पर, पूर्ण ब्रह्म, साक्षात् परमात्मा हैं।

गणेश जी को विनायक भी कहते हैं। विनायक शब्द का अर्थ है- विशिष्ट नायक। जिसका नायक नियन्ता विगत है अथवा विशेष रूप से ले जाने वाला। वैदिक मत में सभी कार्य के आरम्भ जिस देवता का पूजन से होता है, वही विनायक है। विनायक चतुर्थी या गणेश चतुर्थी का व्रत सिंहस्थ सूर्य, भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी और हस्त नक्षत्र के योग में होता है।

गणेश जी के पूजन सामग्री में दुर्वा, शमी और मोदक को मुख्य माना जाता है, क्योंकि ये गणेश जी के प्रिय हैं। दुर्वा अर्थात् जीव। जीव सुख- दुःख को भोगने के लिए जन्म लेता है। इस सुख- दुःख रूप द्वन्द्व को दुर्वा युग्म अर्थात् दो दुर्वाओं को पूजन को समर्पित किया जाता है। शमी वृक्ष को वहि वृक्ष कहते हैं। वहि का पत्र गणेश जी को प्रिय है। वहि पत्र से गणेश जी को पूजने से जीव ब्रह्म भाव को प्राप्त करता है। जिस प्रकार जीव जन्म- जन्मान्तर में अर्जित पुण्य और पापों के फल स्वरूप बार- बार जन्म लेता है, उसी प्रकार दुर्वा अपने अनेक जड़ों से जन्म लेती है।

गणेश विवेक के देवता कहलाते हैं। गणेश जी को प्रिय दो प्रमुख वस्तुएँ हैं दुर्वा और शमी। इसके पीछे की प्रेरणा पर्यावरण संरक्षण को लेकर भी है। आज जहाँ जंगल कटते जा रहे हैं और शहरों में सीमेंट की दुर्वाएँ बिछाई जा रही हैं, ऐसे में हमें इस पर्व पर पर्यावरण संरक्षण के बारे में भी सोचना होगा।

गणेश को तीसरी प्रिय वस्तु मोदक है। मोदक आनन्द का प्रतीक है। सदैव आनन्द में निमग्न रहना और ब्रह्मानन्द में लीन हो जाना मोदक का गुण व अभिप्राय है। मोदक देखने में गोल आकार का होता है और गोल महाशून्य का प्रतीक है। यह समस्त वस्तु जगत जो दृष्टि की सीमा में है अथवा उससे परे है, शून्य से उत्पन्न होता है और उसी में विलीन हो जाता है। शून्य की यह विशालता पूर्णत्व है और प्रत्येक स्थिति में पूर्ण है। पूर्णता प्रणव मन्त्र का गुण है, अतः गणेश प्रणव के प्रतीक हैं।

अब प्रश्र उठता है कि आजादी के आन्दोलन में लोकमान्य तिलक जी द्वारा जिस उत्सव को लोकोत्सव बनाने के पीछे सामाजिक क्रान्ति का उद्देश्य था, क्या आज भी वह जीवित है? क्या गणेश उत्सव उत्सव भर रह गया है या इसको मनाने के पीछे पर्व की प्रेरणा भी है? १८९३ में तिलक ने ब्राह्मणों और गैर ब्राह्मणों की दूरी समाप्त करने के लिए यह पर्व प्रारम्भ किया था जो एकता की मिसाल साबित हुआ। आज गणेश उत्सव के पण्डाल एक दूसरे के प्रतिस्पर्धात्मक हो चले हैं, प्रेरणाएँ कोसों दूर होती जा रही हैं और एकता नाम मात्र की रह गयी है। ऐसे में इस वर्ष मनाये जाने वाले गणेश पर्व को एकता समता और प्रेम मैत्री के धागे में पिरोएँ, तभी सार्थक होगा हमारा गणेश उत्सव। आओ मिलकर करें नये युग का श्रीगणेश।

(लेखक देवसंस्कृति विश्वविद्यालय, शान्तिकुञ्ज- हरिद्वार के कुलाधिपति हैं)