Published on 2017-06-22
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इन दिनों मनुष्य का भाग्य और भविष्य नये सिरे से लिखा और गढ़ा जा रहा है। ऐसा विलक्षण समय कभी हजारों- लाखों वर्षों बाद आता है। इसे चूक जाने वाले सदा पछताते ही रहते हैं और जो उसका सदुपयोग कर लेते हैं, वे अपने आपको सदा सर्वदा के लिए अजर- अमर बना लेते हैं।

आमतौर पर भक्तजन भगवान को पुकारते और उनकी सहायता के लिए विनयपूर्वक गिड़गिड़ाते रहते हैं, पर कभी- कभी ऐसे समय भी आते हैं, जब भगवान उन भक्तजनों से आवश्यक याचना करते हैं और बदले में उन्हें इतना महत्त्व देना पड़ता है, जो उनकी अपनी महत्ता से भी बढ़- चढ़ कर होता है।

हनुमान की वरिष्ठता के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने पर राम- लक्ष्मण उन्हें खोजने ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचे थे और येन- केन प्रकारेण उन्हें सीता की खोज में सहायता करने के लिए सहमत किया था। गंगाघाट पार करने के लिए केवट की सहायता आवश्यक हो गई थी, इसलिए केवट को उन्होंने आग्रहपूर्वक सहायता करने के लिए किसी प्रकार मनाया। आड़े समय में काम आने वाले जटायु को छाती से लगाकर कृतज्ञता व्यक्त की, उसकी अनुभूति हर सुनने वाले को भाव- विभोर कर देती है। समुद्र पर पुल बाँधने में जिन निहत्थे रीछ- वानरों ने सहायता की, उनकी उदार चेतना को हजारों- लाखों वर्ष बीत जाने पर भी कथाकारों ने भुलाया नहीं है।

महाभारत अभीष्ट था। उसकी बागडोर सँभालने के लिए अर्जुन जैसे मनस्वी की आवश्यकता थी। अर्जुन से पूछा गया तो वह अचकचाने लगा। कभी भीख माँग कर खा लेने की बात, तो कभी कुटुम्बियों पर हथियार न उठाने का सिद्धान्तवाद तर्क रूप में प्रस्तुत करने लगा। भगवान ने उसके मन की कमजोरी पढ़ी और भर्त्सनापूर्वक कटु शब्दों में दबाव डाला कि उसे कठोर कार्य में उद्यत होना ही चाहिए। यों भगवान सर्वशक्तिमान होने से महाभारत को अकेले भी जीत सकते थे, पर अर्जुन को श्रेय देना था, जो सच्ची मित्रता का तकाज़ा था। इसलिए संग्राम के मध्य खड़े होकर अर्जुन को सुविस्तृत दर्शनशास्त्र समझाते हुए अपने प्रयोजन में भागीदार बनने के लिए सहमत करना ही पड़ा। अर्जुन घाटे में नहीं, नफ़े में ही रहा।

अंत:करण की आवाज अनसुनी न करें
यह महान् परिवर्तन की, महाक्रांति की वेला है। इसमें कायर, लोभी, डरपोक और भाँड़ आदि जहाँ- तहाँ छिपे हों तो उनकी ओर घृणा, तिरस्कार की दृष्टि डालते हुए उन्हें अनदेखा भी किया जा सकता है। यहाँ तो प्रसंग हथियारों से सुसज्जित सेना का चल रहा है। वे ही यदि समय की महती आवश्यकता को न समझते हुए जहाँ- तहाँ मटरगश्ती करते फिरें और समय पर हथियार न उठा पाने के कारण समूची सेना को परास्त होना पड़े, तो ऐसे व्यक्तित्वों पर तो हर किसी का रोष ही बरसेगा, जिन्होंने आपात स्थिति में भी प्रमाद बरता और अपना तथा अपने देश के गौरव को मटियामेट करके रख दिया।

जीवन्तों, जाग्रतों और प्राणवानों में से प्रत्येक को अनुभव करना चाहिए कि यह ऐसा विशेष समय है जैसा कि हजारों- लाखों वर्षों बाद कभी एक बार आता है। युग परिवर्तन की वेला वह ऐतिहासिक, असाधारण अवधि है। इसमें जिनका जितना पुरुषार्थ होगा, वह उतना ही उच्चकोटि का शौर्य पदक पा सकेगा। समय निकल जाने पर, साँप निकल जाने पर लकीर को लाठियों से पीटना भर ही शेष रह जाता है।

भाग्योदय का ब्रह्ममुहूर्त
इन दिनों मनुष्य का भाग्य और भविष्य नये सिरे से लिखा और गढ़ा जा रहा है। ऐसा विलक्षण समय कभी हजारों- लाखों वर्षों बाद आता है। इसे चूक जाने वाले सदा पछताते ही रहते हैं और जो उसका सदुपयोग कर लेते हैं, वे अपने आपको सदा सर्वदा के लिए अजर- अमर बना लेते हैं।

गोवर्धन एक बार ही उठाया गया था। समुद्र पर सेतु भी एक ही बार बना था। कोई यह सोचता रहे कि ऐसे ही अवसर बार- बार आते ही रहेंगे और हमारा जब भी मन करेगा, तभी उसका लाभ ले लेंगे, तो ऐसा समझने वाले भूल ही कर रहे होंगे। इस भूल का परिमार्जन फिर कदाचित ही हो सके।

लोग अपने पुरुषार्थ से तो अपने अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न करते ही रहते हैं, पर भगवान के उपायों का श्रेय मनुष्य को अनायास ही मिल जाय, ऐसा कदाचित ही कभी होता है। अर्जुन का रथ एक बार कृष्ण ने चलाया था। वे उसके केवल मात्र सारथी नहीं थे कि जब हुकुम चलाया, तभी उनसे वह काम करा लिया। भगवान राम और लक्ष्मण को कंधों पर उठाये फिरने का श्रेय हनुमान को एक ही बार मिला था। ऐसे अवसर चाहे किसी को भी कभी भी मिल जाते रहेंगे, वे हठी बनकर राम- लक्ष्मण को कंधों पर सैर कराते रहेंगे, ऐसी आशा किसी को भी नहीं करनी चाहिए।

अवांछनीयता के पलायन का, औचित्य की संस्थापना का ब्रह्ममुहूर्त यह एक बार ही आया है। फिर कभी हम लोग इसी मनुष्य जन्म में ऐसा देख सकेंगे, इसकी आशा करना एक प्रकार से अवांछनीय ही होगा। अच्छा यही हो कि ऐसी पुण्य वेला का लाभ उठाने में आज के विचारशील तो चूक करें ही नहीं।


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