प्रखर साधना करें, ईश्वर को पाने की नहीं, अनुभव करने की

Published on 2017-09-23
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सुनिश्चित नीति अपनायें, त्यागपूर्वक भोग करने की

सच्चाई समझें, अपनायें
संत तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में मानव जीवन को धन धाम, मोक्षकर द्वाराज् अर्थात् अनुपम साधनों का भण्डार और मोक्ष का दरवाजा कहा है। दोनों बातें थोड़े चिन्तन से ही समझ में आने लगती हैं।

साधन धाम- यह है। मनुष्य के अतिरिक्त और कोई प्राणी चित्र- विचित्र संसाधनों का सृजन और उपयोग करने की कुशलता कहाँ विकसित कर पाता है? रहने के लिए पर्णकुटी से लेकर महल और अट्टालिकाओं की संरचना उसी ने विकसित की। शरीर की रक्षा, सुविधा और सज्जा के लिए भाँति- भाँति के वस्त्र- आभूषण उसी ने रचे। साहित्य, कला और संगीत के कौशल उनके लिए विविध उपकरण- यंत्रादि और कौन रच सका? भूचर होने के नाते धरती पर आवागमन के लिए द्रुत गति के वाहन तो उसने तैयार किये ही, आकाश में पक्षियों और पानी में जलचरों से भी अधिक गति और तमाम सुविधाओं से युक्त परिवहन व्यवस्था भी विकसित की। दूरभाष, दूरदर्शन जैसी सिद्धियों को अपने द्वारा रचे यंत्रों- संसाधनों के माध्यम से जन- जन के लिए सुलभ बना दिया। वास्तव में यह मनुष्य जीवन साधन धाम है।

मोक्ष का द्वार- भी यह है। संसाधनों के विकास की तरह मोक्ष प्राप्ति की क्षमता और कुशलता भी यही अर्जित कर पाता है। लौकिक वैभव के साथ पारलौकिक सद्गति को हस्तगत करना और किसी प्राणी के बूते कहाँ संभव है? इसीलिए इसे सुरदुर्लभ भी कहा गया है।

लेकिन यहीं विसंगतियाँ खड़ी हो जाती हैं। साधन धाम के नाते जब साधन विकसित और प्रयुक्त होने लगते हैं तो जीव ईश्वर की माया के प्रति मोहग्रस्त होकर, ईश्वर साक्षात्कार, आत्मबोध के लक्ष्यों को भूलने लगता है। ईश्वर प्रदत्त दोनों ही विशेषताओं का सम्यक उपयोग करने में ही मानव जीवन की पूर्णता मानी जा सकती है। इस सचाई को समझकर उसे जीवन में लाने की कुशलता विकसित करना जरूरी है। संभवत: इसी कुशलता को इंगित करते हुए योगीराज श्रीकृष्ण ने योग: कर्मसु कौशलम' का सूत्र प्रस्तुत किया है।

उपनिषद् का मार्गदर्शन
'ईशावास्य' उपनिषद् का पहला श्लोक जीवन के इस सत्य को समझने और कौशल को विकसित करने का व्यावहारिक मार्गदर्शन प्रदान करता है। वह है-
'ईशावास्यमिदं' सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्येक्तेन भुञ्जीथा, मा गृध: कस्य स्विद्धनम्।।

भावार्थ है :- इस संसार में छोटा- बड़ा जो कुछ भी है, उस सबमें ईश्वर का निवास है। उसके द्वारा तुम्हें जिस निमित्त जो दिया गया है, उसी का भोग करो। उससे परे (भिन्न या अधिक) की लालसा मत रखो। यह सम्पत्ति (जिसकी तुम लालसा रखते हो) है किसकी? उपनिषद् के इन सूत्रों पर क्रमश: समीक्षात्मक चिंतन किया जाय तो जीवन की उक्त दोनों विशेषताओं का सदुपयोग करने की कुशलता विकसित की जा सकती है।

ईशावास्यमिदं सर्वं- इस संसार में यत्किंचित, छोटी- बड़ी वस्तुएँ, जड़- जंगम जीव; सभी में ईश्वर का वास है। ऋषि कहते हैं कि ईश्वर को कहीं खोजना, पाना नहीं है, वह तो सभी में है ही। उसे अनुभव करने की अपनी क्षमता विकसित एवं प्रयुक्त भर करनी है। वह किस रूप में है? उसे कैसे अनुभव करें? इन प्रश्नों का समाधान भी ऋषि देते हैं। 

प्रज्ञोपनिषद में युगऋषि ने परमात्मा को श्रेष्ठ गुणों, उत्कृष्ट आदर्शों का समुच्चय कहा है। जहाँ जो विशेषता जिस भी पदार्थ या जीव में दिखे उसी को वहाँ प्रभु का स्वरूप समझना चाहिए। भगवद्गीता के विभूतिपाद में भी यही तथ्य भगवान श्रीकृष्ण ने प्रकट किया है। उसे अनुभव करने के लिए श्रद्धा (उत्कृष्टता के प्रति असीम प्रेम और आदर का भाव) विकसित करना जरूरी है। सूत्र है 'श्रद्धया सत्यमाप्यते' अर्थात् श्रद्धा से सत्य को अनुभव किया जा सकता है। परमात्मा सत्य है या सत्य ही परमात्मा है, यह उक्ति सही है। उसे श्रद्धा का स्तर परिष्कृत करने से ही अनुभव किया जा सकता है। श्रद्धा कैसे विकसित हो?

शारीरिक या मानसिक शक्ति जितनी, जिस स्तर की है, उसका सदुपयोग पूरी निष्ठा एवं तत्परता के साथ, नियमित रूप से करने से ही वह विकसित होती है। श्रद्धा के विकास का यही सूत्र है।

परमात्मा को विभूतियों के रूप में थोड़ा- बहुत अनुभव किया। अब अपने चिन्तन, चरित्र एवं व्यवहार को उसी के अनुरूप ढालने का प्रयास किया जाय। ईश्वर की किरणों के रूप में जिन श्रेष्ठ गुणों, आदर्शों से प्रेम है, उन्हें जीवन में अपनाये रखने की अदम्य भावना अविरल साधना श्रद्धा के नाते होने लगे तो श्रद्धा क्रमश: पुष्ट- समर्थ होने लगती है। प्रिय इष्ट की निकटता अनुभव करने की अदम्य भावना, कठिन तप को भी सरस बना देती है। माता पार्वती, ध्रुव, प्रह्लाद तथा मीरा बाई के जीवन में यह तथ्य दिखाई देता है कि कठोर तप भी कितना सरस लगने लगता है। 'ईशावास्यमिदं सर्वं' की यह साधना, साधक में वह गुण विकसित कर देती है कि वह साधन धाम में रहते हुए भी मोक्ष के द्वार को खुला रखने में समर्थ हो जाता है।

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा:- इस परमात्मा ने तुम्हारे लिए जितना दिया है, अर्थात् उपभोग की जितनी छूट दी है, उतना ही भोग करो। छूट कितनी है?

हमने प्रभु को प्यार किया है। उसे विशिष्ट गुणों के रूप में सबमें देखा है। उससे दूर हमें नहीं होना है। उपभोग उतना ही करना है, जितने से अपने अन्दर प्रभु के प्रकाश एवं सत्प्रवृत्तियों के विकास में रुकावट न आये। समाज और प्रकृति में भी उनका प्रभाव क्षीण न होने पाये। इस संकल्पयुक्त प्रयास के साथ ही सद्विवेक का 'प्रज्ञा' का स्तर साधक के अन्दर बढ़ने लगता है। यह प्रज्ञा साधक में वह विशेषताएँ उभार देती है, जिनके नाते जो भी प्रभु से प्राप्त है, उसी का सम्यक सदुपयोग करते हुए वह गौरव एवं संतोष का अनुभव करने लगता है।

'तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा' की उक्त साधना को राजा जनक अपने ढंग से और गाड़ीवान रैक्य अपने ढंग से करते हैं। विद्वान शंकराचार्य अपने ढंग से और निरक्षर कबीर ने इसे अपने ढंग से साधा है। सभी इसी साधना के बल से पूर्ण संतोष के साथ जीवन की श्रेष्ठता, सार्थकता का श्रेष्ठतम लाभ उठाते हैं।

'कस्यस्विद्धनम' यह सम्पदा किसकी है। समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन- वैभव रूपी सम्पदा हर एक के पास कम या अधिक है। प्रभुकृपा से जितनी जिसे प्राप्त है, उसके उपयोग की उसे छूट है। परन्तु वह है किसकी? है तो प्रभु की। लेकिन हम उसका लाभ उठा सकते हैं तो इस नाते वह हमारी भी है।

उसका लाभ कैसे मिले? उसे प्रभु का दिया अनुदान मानें। 'मेरेपन' का अहंकार न उभरने दें। प्रभु अनुशासन में उसका उपयोग करें। इस अनुशासन में उसका जितना उपयोग किया जायेगा, उतना लाभ मिलेगा। तो यह सम्पदा किसकी? जो उसका जितना सदुपयोग कर ले उतनी उसकी। प्रभु की सम्पदा, प्रभु के अनुशासन में प्रयुक्त करने से ही सम्पदा के होने का लाभ देती है। अन्यथा वही विपदा बन जाती है। सत्पुरुषों के लिए वही सम्पदा सुख और प्रगति का आधार बनती है और दुष्टों- राक्षसों के लिए वही विपत्ति का, पतन का कारण बन जाती है।

प्रभु द्वारा प्रदत्त लौकिक या दिव्य सम्पदा को विपदा न बनने दें, सम्पदा के रूप में उसका समुचित लाभ उठा सकें। 'साधन धाम' का लाभ उठाते हुए 'मोक्ष' का मार्ग भी रुकने न दें। इसके लिए 'ईशावास्यमिदं सर्वं' की भाव साधना 'कस्य स्विद्धनम' की ज्ञान साधना और 'तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा' की कर्म साधना करें। जीवन की धाराओं को सफल, सार्थक बनायें।

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