Published on 2018-03-20
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हरिद्वार २० मार्च।

देवसंस्कृति विश्वविद्यालय शांतिकुंज में नवरात्र साधना के अवसर पर युवाओं को सकारात्मक दिशा देने के उद्देश्य से कुलाधिपति श्रद्धेय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी ने विशेष कक्षा का क्रम प्रारंभ किया है। इसके तहत वे युवा मन को ऊर्ध्वगामी बनाने की दिशा में प्रेरित कर रहे हैं।

इस अवसर पर कुलाधिपति डॉ. पण्ड्याजी ने कहा कि आत्म साधना ऐसी होनी चाहिए, जिससे बड़ी से बड़ी चट्टान जैसी विपत्ति को भी ढाया जा सके। मन को शांत करने के लिए भी साधना बहुत ही उपयोगी है। उन्होंने कहा कि रामचरितमानस में भरत के प्रसंग में मानव विकास के छः गुणों का वर्णन किया गया है। इसकी प्रथम संपत्ति है शम- अर्थात मन की शांति। अगर व्यक्ति का मन शांत है, तो वह हर परिस्थिति से बिना डरे लड़ सकता है और विजय प्राप्त कर सकता है। कुलाधिपति ने कहा कि शम, काम की अग्नि को शांत करती तथा जीवन और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाती है। शम मनुष्य की कामनाओं, इच्छाओं, वासनाओं, तृष्णाओं लालसाओं आदि जो जीवन के दुःखों का कारण हैं, उन पर विजय प्राप्त करने में सहायक है। जब- जब कामनाएं मनुष्य पर आक्रमण करती हैं, तब- तब शम ही उसे कठिनाइयों से बचाता है। शम हथियार की भांति है, जो कामना रूपी शत्रु से लड़ता है। उन्होंने कहा कि शम आसानी से प्राप्त होने वाली भौतिक संपत्तियों की भांति नहीं है। जब व्यक्ति में शम अर्थात शांति का भाव होगा तभी उसकी बुद्धि भ्रमित न होकर सही मार्ग पर लगेगी।

डॉ. पण्ड्याजी ने कहा कि मनुष्य की कामनाएं कभी शांत नहीं होतीं। वह एक के बाद एक वस्तुओं पर अपना अधिकार जमा कर उन्हें एकत्रित करना चाहता है। परंतु भरत ऐसे पुरुष थे जिन पर कामनाओं ने अपना जाल बिछाया, परन्तु उनमें शम का बल होने से सारी कामनाएं उनके आगे विफल हो गयीं।

इस अवसर पर कुलपति श्री शरद पारधी, प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्याजी, कुलसचिव श्री संदीप कुमार सहित विभागाध्यक्ष, विद्यार्थीगण व शांतिकुंज, ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के अंतेवासी कार्यकर्ता, देश- विदेश से आये साधक उपस्थित रहे।


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