अंतः और बाह्य प्रकृति में उभरती उर्वरता का भरपूर लाभ उठायें

सृष्टि सृजन का दिव्य पर्व
पर्वों के प्रसंग में युगऋषि ने लिखा है कि जब परम पिता परमात्मा के अंदर ‘एकोऽहं बहुस्याम’ का संकल्प उभरा और सक्रिय हुआ, उसी दिव्य मुहूर्त का प्रतिनिधित्व करता है श्रावणी पर्व।
‘एकोऽहं बहुस्याम’ का संकल्प जागते ही ब्रह्म की मनोभूमि उर्वर हो उठी और उस उर्वर भाव से सृष्टि उपज पड़ी। चेतन और जड़, सूक्ष्म और स्थूल प्रकृति में सृष्टि चक्र चल पड़ा। निश्चित रूप से श्रावणी पर्व पर प्रकृति में वैसी ही ऊर्वर- सृजनशील हलचल पैदा होती है। स्थूल दृष्टि से देखें तो वृक्ष- वनस्पतियों से लेकर विभिन्न प्राणियों, कीट- पतंगों के विस्तार से इस ऊर्वरता का सहज बोध होता है। साधकों, योगियों के अंतःकरण में भी अपने व्यक्तित्व में कुछ नये आयाम जोड़ने की उमंग उठती है और वे कुछ समय के लिए बहिर्मुखी सेवा- साधना रोककर अंतर्मुखी आत्मशक्ति संवर्धन साधना में प्रवृत्त हो जाते हैं। अंतः- बाह्य प्रकृति में उभरती इस ऊर्वरता के सुयोग का भरपूर लाभ उठाने के लिए ही ऋषियों- मनीषियों ने श्रावणी पर्व का विधि- विधान तैयार किया है।
युगऋषि ने लिखा है- ‘‘परमात्मा के संकल्प से ज्ञान और कर्म प्रकट हुए। ज्ञान और कर्म की शृंखला से सृष्टि की बेल विकसित होती चली गयी।’’ आत्मा- परमात्मा का ही अंश है। उसके अंदर से भी ज्ञान और कर्म का प्रवाह उमड़ता है और जीवन बेल विकसित होने लगती है। परमात्मा सद् (सत्य स्वरूप, अविनाशी), चित (चेतन) एवं आनंद रूप हैं। आत्मचेतना भी अपने सहज स्वरूप के अनुरूप ज्ञान और कर्म को सद् से युक्त रखती है तो उसे सहज ही आनंद की अनुभूति होती है। जब जीवात्मा मायावश सद् की जगह असद् से प्रभावित होने लगती है, उसके ज्ञान और कर्म की दिशा बहक जाती है और वह आनंद के स्थान पर कलेश, असंतोष से ग्रस्त हो जाती है।
मायामय जगत में असावधानी के कारण विकार लिपट जाते हैं तो उन्हें सावधानी बरत कर दूर भी किया जा सकता है। इसीलिए श्रावणी पर्व पर पहले प्रायश्चित्त विधान द्वारा मानस की धुलाई और फिर विभिन्न उपचारों द्वारा रंगाई की व्यवस्था बनायी गयी है।

उपचार जड़ न रहें, चेतन बनें
पर्व के पूजा- उपचार को यंत्रवत, जड़मति से नहीं, भावभरी चेतन बुद्धि के साथ किया जाना हमारे लिए उचित एवं हितकारी होगा।
संकल्प जागे : - हम परमात्मा के चेतन अंश हैं। अंतःचेतना में जड़ पंच तत्त्वों से बनी काया को सद् के अनुशासन के अनुरूप ढालने, चलाने की क्षमता है। हमें अपने चिंतन, चरित्र एवं व्यवहार को परम पिता परमात्मा परब्रह्म के अनुरूप ब्रह्मनिष्ठ बनाना है। इंद्रियों, मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को उसी के साँचे में ढालना और उसी के रंग में रंगना है।
प्रायश्चित्त विधान :- साँचे में ढालने के लिए धातु को इतना तपाया जाता है कि उसके विकार नष्ट हो जायें तथा वह ढलने योग्य तरल अवस्था में आ जाये। वस्त्र को रंगने के पहले इतना धोना होता है कि उस पर जमा मैल निकल जाये और वह रंग को पकड़ने की स्थिति में पहुँच जाये। प्रायश्चित्त विधान ढलाई के पहले की गलाई और रंगाई के पहले की धुलाई जैसी तप साधना प्रक्रिया है। इसे कोरी औपचारिकता न रहने दिया जाय।
प्रायश्चित्त तप के तीन चरण हैं-
1. स्वीकारोक्ति, 2. शोधन और 3 . इष्टापूर्ति
1. स्वीकारोक्ति : अंतःचेतना, गुरुसत्ता के सामने खुले दिल से यह स्वीकार किया जाय कि हम जाने- अनजाने अमुक दोषों की पकड़ में आये उस अज्ञान या असावधानी के लिए मन में पश्चात्ताप किया जाय और फिर उन दोषों, भूलों को पुनः न होने देने के लिए मन को मजबूत किया जाय।
2. शोधन : जिन सुख- सुविधाओं या आकर्षण में गलत आचरण हुए, उन सुविधाओं को छोड़ने के लिए स्वयं के साथ कठोरता बरती जाय। जो दोष स्वभाव में आ गये, उनको विस्थापित करने वाले विधेयात्मक गुणों को विकसित करने के लिए कठोर व्रत किये जायें।
3. इष्टापूर्ति : अपने दोषों, भूलों से समाज को जो हानि हुई हो उसकी पूर्ति के लिए अपने समय, श्रम, साधनों को लगाकर उसकी भरपाई करने के प्रयास किये जायें।
प्रायश्चित्त संकल्प के पहले उक्त तीनों चरणों की सुनिश्चित रूपरेखा अपने मानस में तैयार कर लेनी चाहिए। संकल्प उसी रूपरेखा को क्रियान्वित करने के भाव से लिया जाना चाहिए। इस प्रक्रिया को तब तक तत्परता पूर्वक चलाना चाहिए जब तक स्वभाव में वांछित सुधार न हो जाये। इस प्रकार के प्रायश्चित्त तप से की गलाई और धुलाई जैसे महत्त्वपूर्ण उद्देश्य पूरे होते हैं। इससे सद्विचारों को जाग्रत् करने और सत्कर्मों को सफल बनाने की क्षमता विकसित होती है।
शिखा एवं यज्ञोपवीत :- सनातन धर्म में सद्विचारों को सर्वोपरि स्थान देने के भाव से प्रतीक रूप में सिर पर शिखा स्थापित की जाती है तथा स्वयं को सत्कर्म के यज्ञीय अनुशासन में बाँधने के भाव से यज्ञोपवीत धारण किया जाता है। प्रायश्चित्त विधान के बाद शिखा सिंचन तथा यज्ञोपवीत परिवर्तन इन पवित्र प्रतीकों की गरिमा के बनाये रखने के भाव से किया जाता है।
त्रिविध पूजन : श्रावणी उपाकर्म में ब्रह्मा, वेद और ऋषि पूजन का भी विधान है। जीवन को ब्राह्मी चेतना के अनुरूप नये आयाम देने की शक्ति ‘ब्रह्मा’ से ज्ञान को शुद्ध- प्रखर बनाये रखने की क्षमता ‘वेद’ से तथा अपने आचरण को श्रेष्ठतम बनाने की ऊर्जा ‘ऋषियो’ से लेने का भाव किया जाता है।
रक्षाबंधन : पुरोहित तथा यजमानों के बीच तथा भाई- बहिनों के बीच उच्च स्तरीय स्नेह के निर्वाह की भावना के साथ, सांस्कृतिक संबंधों की रक्षा के संकल्प के साथ रक्षाबंधन का क्रम चलाया जाता है। उक्त सभी विधि विधान देवत्व सम्पन्न व्यक्तियों की संख्या और गुणवत्ता बढ़ाने वाले हैं, जो मानवता को उज्ज्वल भविष्य प्रदान कर सकते हैं।
हरीतिमा संवर्धन : अंतःप्रकृति में उभरी ऊर्वरता का उपयोग अपने अंदर सद्गुणों, सत्प्रवृत्तियों को आरोपित, विकसित करने के लिए किया जाता है। इसी प्रकार बाह्य प्रकृति में उभरी ऊर्वरता का लाभ लेने के लिए पर्यावरण का संतुलन बनाये रखने में, जीवन संपदा को बढ़ाते रहने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली हरीतिमा को बढ़ाने के प्रयास किये जाते हैं। उपयोगी वृक्षों, पादपों को रोपने तथा उन्हें पुष्ट बनाने का विधान भी श्रावणी उपाकर्म में जुड़ा है। श्रावणी पर्व पर वृक्षगंगा अभियान को गति देने के लिए सार्थक संकल्प करने- कराने के क्रम भी अपनाये जाने चाहिए। किये गये संकल्पों को शारदीय नवरात्रि या दीपावली तक पूरा करने की योजना भी बनायी जानी चाहिए।





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