श्रद्धेय डॉ. पण्ड्या द्वारा देसंविवि में गीतामृत की विशेष कक्षा

Published on 2018-09-03 HARDWAR
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भगवद्गीता मानव जीवन के लिए आवश्यक
हरिद्वार 31 अगस्त।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति श्रद्धेय डॉ. प्रणव पण्ड्या ने कहा कि मानव जीवन में विकास के लिए गीता का अध्ययन, मनन एवं तदनुसार जीवन आवश्यक है। गीता में वैयक्तिक से लेकर सामाजिक जीवन की समस्त समस्याओं का समाधान निहित है।

      वे देव संस्कृति विश्वविद्यालय के मृत्युंजय सभागार में आयोजित गीतामृत की विशेष कक्षा को सम्बोधित कर रहे थे। श्रीमद् भगवतगीता की चर्चा करते हुए कहा कि क्रोध से मूढ़भाव उत्पन्न होता है और इससे स्मृति में भ्रम होता है। स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से वह पुरुष पतन की ओर चला जाता है। उन्होंने कहा कि क्रोध से व्यक्ति का रक्त संचार अत्यधिक बढ़ता है, जो मस्तिष्क को हानि पहुँचाता है। क्रोध में व्यक्ति अपनी वासनाओं, कामनाओं और विचारों पर संयम खो देता है। क्रोध को श्रीमद् भगवद्गीता के नियमित अध्ययन, सत्संग और आत्म नियंत्रण द्वारा जड़ से मिटाया जा सकता है। क्रोध की समाप्ति ही मानव जीवन की उन्नति है।

      उन्होंने कहा कि मन को वश में करने के लिये महत्वपूर्ण है वैराग्य। जब तक व्यक्ति के अंदर आसक्ति है, तब तक वैराग्य संभव नहीं है और जब तक वैराग्य नही हैं, तब तक मन की आसक्तियां भी नहीं जाती। वैराग्य यानी रागरहित होना। मन की स्थिरता के लिये वैराग्य का होना जरूरी है। उन्होंने कहा कि नियमित अभ्यास से किसी भी कार्य को सीख जा सकता है और उसमें कुशलता प्राप्त की जा सकती है। इसी तरह वैराग्य यानी रागरहित होने का भी अभ्यास किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि मन की स्थिरता के लिए भगवत सत्ता का चिंतन, मनन व साधना आवश्यक है। मन में जब स्थिरता आती है, तभी शांति मिल सकती है और ऐसे व्यक्ति ही सच्चे अर्थों में सुखी है।

      इस अवसर पर श्रद्धेय डॉ. पण्ड्या जी ने विद्यार्थियों के विभिन्न शंकाओं का समाधान देते हुए उनके शैक्षणिक विकास के साथ आध्यात्मिक विकास के सूत्र दिये। इस अवसर पर इस अवसर कुलपति श्री शरद पारधी सहित समस्त विभागाध्यक्ष, शिक्षक-शिक्षिकाएँ, विद्यार्थी गण उपस्थित रहे।


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