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परिवार में सहयोग और सद्भावना की आवश्यकता 
(पं. श्रीराम शर्मा आचार्य) 

आमतौर से यह देखा जाता है कि आजकल परिवार के परिजन परस्पर सेवा की भावना नहीं रख पाते है। जैसे- तैसे परिवार तो दिखाई देते हैं, पर भीतर की परिवारीय भावना मर चुकी होती है। ऐसा लगता है कि सभी किसी होटल में रहते हैं जहाँ खाना व विश्राम करने को मिलता है। एक- दूसरे के दुःख- दर्द से क्या मतलब? आखिर क्या कारण है कि परिवारों में परस्पर सेवा की भावना लुप्त होती जा रही है? 
घर में कटुतापूर्ण वातावरण है। एक- दूसरे को सहयोग अपना- वीराना सोचकर दिया जाता है। बहू के प्रति सास- ननद आदि के हृदय में कोई स्थान नहीं है। बहू घर में बीमार पड़ी है। उसे दवा, चाय, भोजन, पानी आदि की समय- समय पर आवश्यकता रहती है, किन्तु इसकी कौन व्यवस्था करे? उससे तो जले- भुने हैं। इधर पति भी खुले दिल से पत्नी की सेवा नहीं कर पाता है। क्योंकि घर में परम्परागत वातावरण है। पति स्वयं अपनी पत्नी की सेवा कैसे करे? यह तो लोकविरुद्ध है। भला कहीं मर्दों को भी औरत की सेवा करनी चाहिए? पति भी थोड़ा दबे स्वभाव का है। इस कारण वह भी अपनी पत्नी की सेवा नहीं कर पाता है। इधर बेचारी पत्नी असहाय अवस्था में कराहती रहती है। किन्तु उसकी कौन सुने? थोड़ा- बहुत पति अपनी पत्नी के पास जाकर कुछ पूछताछ करता है, तो घर में व्यंग की बरसात शुरू हो जाती है कि ‘क्या जमाना आ गया है! मर्द औरतों के गुलाम हो गये हैं।’ इस तरह के व्यंग- वाण पत्नी की सेवा करने से पति को दूर किये देते हैं। वह मन ही मन परेशान हो उठता है कि क्या करें? इधर पत्नी की हालत दिनों- दिन गिरती जा रही है। घर का कोई सदस्य उसकी ठीक तरह से साज- सँभाल नहीं करता है। 
परिवार के हर सदस्य को एक- दूसरे की सेवा करने के लिए तत्पर रहना चाहिए। ये ही क्षण होते हैं, जब एक- दूसरे के प्रति व्यावहारिक प्रेम अभिव्यक्त करते हैं, अन्यथा शाब्दिक प्रेम बनाये रखने से क्या लाभ? किसी व्यक्ति के हृदय को जितना है, तो उसके कष्ट और बीमारी के क्षणों में निःस्वार्थ भाव से सेवा कर दीजिए। वह सदा के लिए अपना हो जाता है। 
सेवा के सुअवसर केवल बीमारी के समय ही नहीं रहते हैं। घर के परिजन पर किसी भी प्रकार की विपत्ति या कष्ट है, तो उस समय उसे सहायता पहुँचा देना सेवा ही है। संकट आर्थिक हो या सामाजिक अथवा राजनीतिक, संकट तो संकट है और हर समय तथा हर आदमी को सहायता एवं सहयोग की आवश्यकता रहती है। इस समय सेवा पहुँचाना परिजनों का परम कर्तव्य है। 
यदि बीमारी कष्ट, विपत्ति, संकट आदि के क्षणों में परिवार के परिजन एक- दूसरे के सहयोग, सहायता व सेवा के लिए बढ़ते रहे, तो परिवारीय वातावरण में स्नेहिलता बनी रहती है। पति- पत्नी के दाम्पत्य जीवन में सुखप्रद आकर्षण बना रहेगा। वे एक- दूसरे के लिए हर घड़ी हर काम के लिए तत्पर रहेंगे। उनकी प्रसन्नता का प्रभाव यह होगा कि घर के परिजन भी प्रसन्न बने रहेंगे तथा परिजन भी सेवा की भावना बनाये रख सकेंगे। उनमें भी प्रसन्नता बनी रहेगी। इस प्रसन्नता के वातावरण में बच्चों का विकास भली- भाँति होता रहेगा तथा सहयोग, सहायता का पाठ बच्चे प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष रूप से सीखते रहेंगे जिसका उपयोग वे अपनी जीवन में कर सकेंगे। सहयोग, सहायता और सेवा की भावना के विकास पर परिवार की प्रसन्नता और प्रगति निर्भर है। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, हरिद्वार) 


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