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शिक्षक न केवल विद्यार्थी के व्यक्तित्व का निर्माता, बल्कि राष्ट्र का निर्माता भी होता है। राष्ट्र का मूर्त रूप वहाँ के नागरिक होते हैं। किसी राष्ट्र के भावी नागरिकों को गढ़ने वाले शिक्षकों की भूमिका अति महत्त्वपूर्ण है। वैसे तो शिक्षक का महत्त्व हमारे यहां अनादिकाल से रहा है। जहाँ से ज्ञान का प्रकाश मिले, वह स्रोत कम महत्त्वपूर्ण हो भी नहीं सकता। राष्ट्र को जगद्गुरु बनने का सौभाग्य भी ज्ञान के बल पर ही मिला होगा, जिसका महत्त्वपूर्ण आधार वहाँ के आदर्श शिक्षक या गुरु ही रहे होंगे। 
      शिक्षक पद की इस गरिमा को हमारे देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन ने भी समझा था और यह भी कहा कि आलीशान भवन और साजसज्जा कोई भी महान् शिक्षक का स्थान नहीं ले सकता है। असामान्य प्रतिभा के धनी महान् साहित्यकार, दार्शनिक विचारक इस विभूति ने अपना जन्मदिन भी शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। डॉ० राधाकृष्णन का जीवन आदि से लेकर अंत तक भारतीय संस्कृति के सूत्र में ऐसे पिरोया हुआ था कि मात्र एक राजनेता के रूप में ही उन्होंने राष्ट्र की सेवा नहीं की, वरन् भारतीय ज्ञान के तत्त्वदर्शन को जन- जन व देश- विदेश तक पहुँचाने वाला उनका एक महान् विचारक और साहित्यकार वाला रूप और भी महत्त्वपूर्ण रहा। देश को गौरवान्वित करने वाली इस महान् आत्मा ने जीवन की महान् गरिमा के प्रति आकर्षित होकर अपना जन्म दिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की घोषणा करके शिक्षा की महत्ता व शिक्षक की गरिमा में एक और नया अध्याय जोड़ दिया। 
      शिक्षकों का चिंतन, चरित्र और व्यवहार विद्यार्थियों को काफी हद तक प्रभावित करता है। उनका आचरण और रहन- सहन आदर्शयुक्त हो और वे अपने कर्त्तव्य तथा दायित्व के प्रति सचेत हों, तो राष्ट्र के भावी कर्णधारों को सही दिशा देकर देश व समाज को श्रेष्ठ नर रत्न देने की महती भूमिका निबाह सकते हैं। शिक्षा तो एक प्रतिपादन है, शिक्षक उसका मूर्तरूप कहा जा सकता है। शिक्षक दूसरे अर्थों में गुरु भी है, अतः उस गुरु तत्त्व की गरिमा समझते हुए अपनी महत्ता को लघु नहीं करना चाहिए। 
      आज देश की दशा देखकर यह लगता है, काश! हमारे यहाँ फिर से शिवाजी और चन्द्रगुप्त जैसे नर रत्न गढ़े जाते। लेकिन आज तो दूर- दूर तक इसकी कोई संभावना नजर नहीं आती। वस्तुतः आखिर विद्यमान परिस्थितियों के लिए कौन उत्तरदायी है? किसे दोष दिया जाय? शिक्षक को अथवा शिक्षा तंत्र को? अब चूँकि शिक्षा तंत्र का कोई प्रत्यक्ष स्वरूप नहीं है। इसलिए संपूर्ण रोष उससे सम्बद्ध शिक्षकों व संचालकों के प्रति होता है, यह कुछ हद तक भले सही हो, लेकिन यह सत्य है कि वर्तमान परिस्थितियों के लिए शिक्षा तंत्र का विद्यमान विकृत स्वरूप जिम्मेदार नहीं है, जिसमें व्यक्ति, चरित्र निर्माण वाला पक्ष पूर्णतया तिरोहित हो गया। वर्तमान शिक्षा प्रणाली के फलस्वरूप डाक्टर्स, इंजीनियर्स, वैज्ञानिक, वास्तुकारों आदि की भीड़ भले ही जमा हो जाए, लेकिन मानवीय मूल्यों के अभाव में न श्रेष्ठ नागरिक की कल्पना की जा सकती है, और न ही सुन्दर राष्ट्र की। 
      शिक्षा का वर्तमान क्षेत्र और उद्देश्य लगभग रोजगार से संबंधित हो गये हैं, यही बड़ी परेशानी का विषय है। जो लोग यह कहते हैं कि यहां के प्रत्येक व्यक्ति को दो जून रोटी, पीने को शुद्ध जल मिल जाए और तन ढकने को कपड़ा हो, रहने को छाया हो, तब आगे राष्ट्र निर्माण और व्यक्ति निर्माण की बात सोचनी चाहिए। वे लोग यह क्यों भूल जाते हैं कि हमें अपनी नीतियाँ लागू किए अपना तंत्र विकसित किये आधी शताब्दी से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन हम अभी तक कितनों के लिए रोजी, रोटी पानी, कपड़ा, आवास आदि की व्यवस्था कर सके। यदि शिक्षा के साथ चरित्र और स्वावलम्बी बनने का शिक्षण जुड़ा होता, तो संभवतः व्यक्तिगत और राष्ट्रीय जीवन कम तबाह होते। वर्तमान समय में व्यक्तिगत जीवन अभाव ग्रस्तता से तो राष्ट्रीय जीवन भ्रष्टाचारियों और देशद्रोही से पीड़ित है। 
      जो विद्या अमृत देने वाली थी जिनके बारे में महानता के बारे में कहा गया ‘सा विद्या या विमुक्तये’ वह विद्या आज अपने मूल स्वभाव से हटकर बंधन में जकड़ने वाले स्वरूप में कैसे पहुँच गई? आज शिक्षा पाकर भी मनुष्य मनुष्यता को क्यों नहीं प्राप्त कर रहा? इस ओर देश के शिक्षाविदों का ध्यान क्यों नहीं जाता? 
      यदि समय रहते इन मूल प्रश्रों पर विचार नहीं किया गया और शिक्षा प्रणाली में आवश्यक सुधार नहीं हुआ, तो हालात और विषाक्त हो सकते हैं। सुसंस्कारिता व स्वावलम्बन जैसे तथ्य शिक्षा से अनिवार्य रूप से जुड़ने चाहिए। शिक्षा के साथ ही शिक्षक भी अपने दायित्व को गरिमापूर्ण ढंग से निबाहेंगे, तभी वांछित सफलता प्राप्त की जा सकती है। कभी कहीं वेतनमान, सुविधाओं संबंधी बात भले आये या कमी पड़े, लेकिन गुरु गरिमा को विस्मृत किये बिना, अपने गौरव का महत्त्व अनुभव करते हुए आगे बढ़ते चलें, क्योंकि प्रश्र मानवीय मूल्यों के संरक्षण और अभिवर्धन का है। 
       यह हमारे देश की विडम्बना है कि मनुष्य को गढ़ने वाले पेशे और पद का आकलन उस ढंग से नहीं किया जाता, जितना पदार्थों को आकृति देने वाले पेशों को। आज शिक्षक दिवस पर स्वीकारने योग्य तथ्य यही है कि शिक्षक संस्कृति के उस तंतु को जोड़े रखने के लिए आगे आयें, जिसके बल पर राष्ट्र को चरित्रवान् व्यक्तित्व दिये जा सके। स्वयं को मात्र ट्यूटर और टीचर की भूमिका में ही कैद न करें, तो अच्छा होगा और उस महान् आत्मा के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि भी यही होगी कि उनके विचारों को आत्मसात् करते हुए शिक्षक राष्ट्र की महत्ता समझें, जिसमें उन्होंने कहा था ‘अध्यापन वृत्ति को व्यापार ने निम्न स्तर पर नहीं उतारना चाहिए। यह तो एक मिशन है। अध्यापकों का कर्त्तव्य है कि वे अपने शिष्यों को लोकतंत्र के सच्चे नागरिक बनायें।’ 


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