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बौद्ध धर्म में मनुष्य जाति के अनेक वर्गों के लिए उनके कार्यक्षेत्र के अनुरूप पाँच- पाँच प्रमुख ‘शील’ अनुशासन बनाये गये हैं। शासन, समाज, धर्म, शिक्षा, स्वास्थ्य, उपार्जन आदि क्षेत्रों में काम करने वाले इन मर्यादाओं का पालन करें, यही उनका शील है। ये मर्यादाएँ पाँच- पाँच की संख्या में निर्धारित होने के कारण पंचशील कहलाती हैं। 
यहाँ पारिवारिक पंचशील का प्रसंग है। इन्हें (१) सुव्यवस्था (२) नियमितता, (३) सहकारिता, (४) प्रगतिशीलता और (५) शालीनता की पाँच सत्प्रवृत्तियों के रूप में समझा जा सकता है। इन्हें अपनाने से व्यक्ति, परिवार एवं समाज को उन विकृतियों से बचे रहने का लाभ मिलता है, जो समस्त समस्याओं और विपत्तियों के लिए उत्तरदायी हैं। इन्हें अपनाने में सर्वतोमुखी प्रगति का द्वार खुलता है और उज्ज्वल भविष्य के राजमार्ग पर चल पड़ने का अवसर मिलता है। 
(१) सुव्यवस्था- 
पंचशीलों में प्रथम है सुव्यवस्था। अपने आपको, अपनी मर्यादाओं को, साधनों को सुनियोजित, सुव्यवस्थित रखने का नाम सभ्यता है। असभ्य और अव्यवस्थित लोग न तो उपलब्ध साधनों का ही सदुपयोग कर पाते हैं और न कोई महत्त्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त कर सकने योग्य मनोयोग जुटा पाते हैं। साधन और अवसर अनेक को प्राप्त होते हैं। क्षमता और कुशलता भी बहुतों में होती हैं; पर वे उन्हें व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध रूप से क्रियान्वित नहीं कर पाते। फलस्वरूप उन सफलताओं से वे वंचित रह जाते हैं, जिन्हें वे नियमन एवं नियंत्रण की बुद्धि होने पर सहज ही प्राप्त कर सकते हैं। सद्गुणों में सबसे प्रमुख व्यवस्था ही है। महान् कार्यों को संपादित करने और बड़ी सफलताएँ पाने वालों में व्यवस्था- बुद्धि की विशेषता ही उन्हें श्रेयाधिकारी बनाती है। इसी के अभाव में पिछड़ापन लदा रहता है और पग- पग पर ठोकरें खानी पड़ती हैं। 
(२) नियमितता- 
श्रम और समय के समन्वय को नियमितता कहा गया है। संयम ही जीवन है। उसका एक- एक पल हीरे मोतियों में तोलने योग्य है। एक क्षण भी बेकार नहीं गँवाया जाना    चाहिए। ईश्वर प्रदत्त दिव्य सम्पदा समय ही है। उसके मूल्य पर हर स्तर की विभूतियाँ एवं सफलताएँ प्राप्त हो सकती हैं। समय गँवाना अर्थात् जीवन के ऐश्वर्य एवं आनन्द को बर्बाद करना। परिवार की परम्परा में इस आदर्श का सावधानी के साथ समावेश होना चाहिए कि कोई भी व्यर्थ समय न गँवाये। उसे श्रम के साथ जोड़े रहे। श्रम से जी चुराना, व्यर्थ के कामों में समय गुजारना, परिश्रम में असम्मान अनुभव करना ऐसे दुर्गुण हैं, जिनके रहते पिछड़ेपन से, दरिद्रता से छुटकारा नहीं पाया जा सकता है। शारीरिक आलस्य और मानसिक प्रमाद यही दो सबसे बड़े शत्रु हैं, जिन्हें प्रश्रय देने वाला दुर्भाग्यग्रस्त रहता और दुर्गति के गर्त में गिरता है। 
(३) सहकारिता- 
सहकारिता प्रगति का मूलमंत्र है। इसी विशिष्टता को अपनाकर मनुष्य ने इतनी प्रगति की है। जहाँ भी यह सत्प्रवृत्ति, जितनी मात्रा में अपनाई जायेगी, वहाँ उसी अनुपात में सद्भावना की वृद्धि होगी, घनिष्ठता बढ़ेगी। मिल- जुलकर काम करने में आनन्द भी बढ़ता है और स्तर भी। अधिक सुयोग्यों से सीखने और कम योग्यों को सिखाने का अवसर तभी मिलता है, जब साथ- साथ काम करने की आदत डाली जाय। 
स्वच्छता अभियान में मिल- जुलकर घर के काम करने की बात कही गयी है। उस आधार पर सहकारिता भी पनपती है। भोजन खाने में ही नहीं, पकाने में भी यदि सहकार प्रयत्न चल सके, तो उसमें अच्छा खासा मनोरंजन भी रहेगा और अभ्यास भी बढ़ेगा। कपड़े धोने में, टूट- फूट की मरम्मत में, पुताई- रंगाई में सहकारी प्रयत्न घर को स्वच्छ और सुव्यवस्थित ही नहीं रखते, सहकारिता की सत्प्रवृत्ति को भी बढ़ाते हैं। 
अधिक योग्यों को कम योग्यों की ज्ञानवृद्धि एवं प्रगति में स्थिति के अनुरूप सहायता करने का ध्यान रखना चाहिए। अधिक पढ़े, कम पढ़ों को पढ़ाया करें। छोटी आयु वाले बड़ों के कामों में हाथ बँटाया करें। एकाकीपन दूर किया जाय। ‘रिजर्व नेचर’ के आने तक सीमित रहने वाले व्यक्ति या तो स्वार्थी बन जाते हैं या आत्महीनता की ग्रंथि से ग्रसित होकर अनगढ़, असामाजिक रह जाते हैं। अस्तु, परिवार व्यवस्था के हर कार्य में सहकारी प्रयत्नों को यथासंभव अधिकाधिक स्थान दिया जाना चाहिए। 
(४) प्रगतिशीलता- 
भौतिक दृष्टि से आगे बढ़ने और आत्मिक दृष्टि से ऊँचे उठने की प्रक्रिया को प्रगतिशीलता कहते हैं। मात्र महत्त्वाकाँक्षाएँ बढ़ते रहने से कोई काम नहीं बनता। परिस्थितियों को ध्यान में न रखकर ऊँची उड़ानें उड़ते रहने वाले, योग्यता एवं साधनों के अभाव में कुछ कर नहीं पाते। अतृप्त महत्त्वाकाँक्षाएँ खीज और निराशा ही पैदा करती हैं। अस्तु, हवाई उड़ानें उड़ने से रोकना और प्रगति के लिए आवश्यक योग्यता बढ़ाने में ही हर परिजन को मनःस्थिति नियोजित करनी चाहिए। सफलताओं की लालसा तभी सार्थक है, जब उनके उपयुक्त परिस्थिति उत्पन्न करने के लिए प्रबल प्रयास किया जाय। इसके लिए योग्यता बढ़ाना भी आवश्यक है, अन्यथा अक्षमता के रहते, मात्र परिश्रम से भी कुछ बड़ा प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। 
इस संदर्भ में परिवार के सदस्यों को सुशिक्षित बनाने के लिए अध्ययन का, बलिष्ठ बनाने के लिए व्यायाम का, कुछ करने के लिए गृह उद्योगों का, शिल्प कौशलों का, गायन- वादन का चस्का लगाया जाय और उसके लिए साधन जुटाये जायें। वर्तमान स्थिति में अगले दिनों अधिक सुयोग्य बनाने के लिए अवसर मिल सके, इसके लिए जो भी संभव हो, किया जाना चाहिए। संपदा की ललक कभी- कभी इतनी आतुर हो जाती है कि वह योग्यता बढ़ाने और पुरुषार्थ करने की अपेक्षा अनीतिपूर्वक संपदा, सफलता पाने के लिए मचलने लगती है। अस्तु, महत्त्वाकाँक्षाओं को योग्यता एवं सक्रियता बढ़ाने में नियोजित करने के लिए हर परिवार में कुछ न कुछ प्रयत्न चलना चाहिए। ऊँचे उठने और आगे बढ़ने के लिए कहाँ, किस प्रकार, क्या हो सकता है, इसको खोजने से उपयुक्त मार्ग निश्चित रूप से मिल जाते हैं। 
(५) शालीनता- 
शिष्टता, सज्जनता, मधुरता, नम्रता आदि सद्गुणों के समुच्चय को शालीनता कहते हैं। ईमानदारी, प्रामाणिकता, नागरिकता, सामाजिकता की मर्यादाओं को निष्ठापूर्वक अपनाना शालीनता का चिह्न है। सामान्य शिष्टाचार की भी अपनी महत्ता है। दूसरों का सम्मान करने और अपने को विनम्र सिद्ध करने के लिए वाणी में मिठास और व्यवहार में शिष्टता का समावेश रहना चाहिए। उदारता, सेवा, सहायता की सत्प्रवृत्ति अपनाने से ही दूसरों का स्नेह, सम्मान एवं सहयोग मिलता है। परायों को अपना बनाने की जितनी शक्ति शालीनता में है, उतनी प्रलोभन देकर फुसलाने तथा दबाव देकर विवश करने में भी नहीं है। शालीनता जन- जन के मन पर आधिपत्य जमाने की असाधारण विशेषता है। इससे घर के हर सदस्य को परिचित एवं अभ्यस्त कराया जाना चाहिए। 
उपरोक्त पारिवारिक पंचशीलों का अभ्यास किस घर में, किस प्रकार किया जाय, इसका एक नियम नहीं बन सकता। हर घर- परिवार के सदस्यों की स्थिति अलग होती है। अस्तु, निर्धारण एवं क्रियान्वयन अवसर के अनुरूप ही किया जा सकता है। इन पाँचों विभूतियों से घर के हर सदस्य को अलंकृत करने का प्रयास चलता रहे, तो समय- समय पर वह उपाय भी सामने आते रहेंगे कि किस में, क्या कमी है और उसे किस प्रकार पूरा किया जा सकता है। पंचशीलों से परिवार को भरने का प्रयत्न ऐसा ही है, जैसा पाँच रत्नों के भण्डार से घर को भरना और कुबेर से अधिक वैभववान बनना। 

शान्तिकुञ्ज, फीचर्स हरिद्वार (उत्तराँचल) 


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