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गुरु वह तत्त्व है, जो अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश करके ज्ञान रूपी तेज का प्रकाश करता है। ‘गु’ अन्धकार का वाचक है और ‘रु’ प्रकाश का। ऐसे सद्गुरु के लिए लगन, उनको पाने के लिए गहरी चाहत, उनके चरणों में अपना सर्वस्व समर्पण करने के लिए आतुरता में ही मनुष्य जीवन की सार्थकता है। वे कृतार्थ और कृतकृत्य होते हैं, जो सद्गुरु के चरणों में भक्तिपूर्वक अपने को न्यौछावर करने की आगे बढ़ते हैं, क्योंकि गुरु चरणों की महिमा अपार है। 
गुरुचरण ही अपने तात्त्विक रूप में परब्रह्म का स्वरूप है। लेकिन इसे जाना और समझा तभी जा सकता है, जब साधक अपनी गुरुभक्ति की साधना के शिखर पर आरूढ़ हो जाता है। एक सन्त कवि ने इस तथ्य को एक पंक्ति में कहने की कोशिश की है—‘श्रीचरणों में नेह है। साधना और सिद्धि है यह अर्थात् गुुरुचरणों में अनुराग साधना भी है  और सिद्धि भी। साधना के रूप में इसका प्रारम्भ होता है, तो उसके तात्त्विक स्वरूप के दर्शन में इसकी सिद्धि की चरम परिणति होती है। गुरुचरणों के भावभरे ध्यान से इसकी शुरूआत होती है। भाव भरे ध्यान का रूप कुछ इस अटल विश्वास से है कि सद्गुरु का स्थूल रूप और कुछ नहीं, परब्रह्म का घनीभूत प्राकट्य है। बिना किसी शर्त, माँग, अधिकार के स्वयं को उनके श्रीचरणों मेेें न्यौछावर कर देना ही गुुरुचरणों की सच्ची सेवा है। इससे हमारे जन्म- जन्मान्तर के सारे पाप धुल जाते हैं और आत्मा का  विशुद्ध स्वरूप निखरने लगता है। साथ ही अन्तर्चेतना में अयमात्मा ब्रह्म की अनुभूति होने लगती है। 
साधनामय जीवन की सर्वोच्च व्याख्या का सार है- साधक का सद्गुरु में समर्पण, विसर्जन, विलय। अनन्य चिन्तन की निरन्तरता साधक के सद्गुरु में समर्पण को सुगम बनाती है। समर्पण की परमावस्था में साधक का समूचा अस्तित्व ही विलीन हो जाता है और तब आती है- विलीनता की अवस्था। इस भावदशा में शिष्य- साधक का काय- कलेवर तो यथावत बना रहता है, पर उसमें उसकी चेतना अनुपस्थित होती है। वहाँ उपस्थित होती है उसके सद्गुरु की चेतना। वह दिखते हुए भी नहीं होता, होता है केवल उसका सद्गुरु। 
जो गुरुभक्ति की डगर पर चलने का साहस करते हैं, उन्हें दो- चार कदम आगे बढ़ते ही बहुत से साधना- सत्यों का साक्षात्कार होने लगता है। वे जानते हैं कि सद्गुरु ही साधक हैं, वही साधना हैं और अन्त में वही साध्य के रूप में प्राप्त होते हैं। 
तात्पर्य यह है कि सद्गुरु की कृपाशक्ति ही साधक में साधना की शक्ति बनती है। उसी के सहारे वह अपने साधनामय जीवन की डगर पर आगे बढ़ता है। सद्गुरु की कृपा से ही उसे साधना की विभूतियाँ एवं उपलब्धियाँ मिलती हैं और अन्त में साध्य से उसका साक्षात्कार होता है। तब उसे उस सत्य का बोध होता है कि सद्गुरु ही साध्य है; क्योंकि सद्गुरु और इष्ट दो नहीं, बल्कि एक हैं। अपने गुुरु ही गोविन्द हैं। वही सदाशिव और परम शक्ति हैं। 
प्रयत्न पूर्वक सद्गुरु की आराधना के सिवाय कुछ भी करने की जरूरत नहीं। मन से सद्गुरु का चिन्तन- स्मरण, हृदय से अपने गुरु की भक्ति, वाणी से उनके पावन नाम का जप और शरीर से उनके आदर्शों का निष्ठापूर्वक पालन करने से समस्त दुर्लभ आध्यात्मिक विभूतियाँ, शक्तियाँ सिद्धियाँ अनायास ही मिल जाती हैं। गुरु ही ब्रह्म है, उनके वचनों में ही ब्रह्मविद्या समायी है। इस सत्य को जो अपने जीवन में धारण करता है, आत्मसात् करता है, अनुभव करता है, वही शिष्य है, वही साधक है। वस्तुत: गुरुतत्व  से भिन्न और अन्य कुछ भी नहीं है। 

गायत्री तीर्थ शान्तिकुञ्ज हरिद्वार 


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