लाइफ पॉजीटिव संस्था के करीब पचास सदस्यों ने देवसंस्कृति विवि, शांतिकुंज तथा ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के विभिन्न रचनात्मक, शोधों के बारे में विस्तार जाना। ये सदस्य अपने उत्तराखण्ड दर्शन के दौरान आज देसंविवि पहुँचे थे।
    देवसंस्कृति विवि के महत्त्वाकांक्षी योजनाओं के बारे में बताते हुए प्रति कुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि देसंविवि युगऋषि पं०श्रीराम शर्मा आचार्य की दिव्य स्वप्न का मूर्तरूप है। उन्होंने अस्सी के दशक में स्वप्न देखा था कि नालंदा, तक्षशिला की तर्ज पर एक ऐसा विश्वविद्यालय हो, जहाँ विद्यार्थियों को केवल शिक्षा ही नहीं, विद्या का अध्ययन करा सकें। युवा पीढ़ी को सच्चे अर्थों में मानव से देवमानव के रूप में गढ़ा जा सके। उन्होंने कहा कि उनके इन स्वप्नों को पूरा करते हुए अपने दस वर्ष की आयु में विवि ने अनेक कीर्तिमान स्थापित किया है।
    उन्होंने कहा कि गायत्री परिवार के मुख्यालय शांतिकुंज और देसंविवि मिलकर विभिन्न रचनात्मक, सुधारात्मक कार्य कर रहा है। उन्होंने कहा कि सूनामी, बाढ़, भूकम्प आदि जैसे दुर्घटना से पीड़ितों को भी त्वरित सहयोग के लिए तत्पर रहता है। प्रति कुलपति ने मानसिक व शारीरिक समस्याओं के निदान के लिए नियमित रूप से साधना, उपासना, आराधना को जीवन में उतारने की बात कही। प्रतिभागी पर्सनालिटी डेवलमेंट, लाइफ मैनेजमेण्ट आदि से संबंधित जिज्ञासाओं का सरल व व्यवाहारिक समाधान पाकर काफी उत्सुक थे।
    लाइफ पाजीटिव संस्था के अध्यक्ष आदित्य आलूवालिया, गौरा धवललाल  ने बताया कि इस यात्रा में देश के दिल्ली, उत्तर प्रदेश, केरल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडू आदि राज्यों से एवं नार्वे, पुर्तगाल, फीजी से आये 50 सदस्य हैं। इनमें कई शिक्षा, मीडिया, इंजीनियरिंग, चिकित्सा आदि क्षेत्रों में स्थापित हस्ताक्षर भी शामिल थे। दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले ‘आज सबेरे’ की प्रस्तोता गौरा धवललाल ने बताया कि शांतिकुंज, देवसंस्कृति विवि अपने नाम अनुरूप अतुलनीय कार्य कर रहा है। यह संस्थान समाजोत्थान के लिए जो कार्य कर रहा है, वह प्रशंसनीय है। देसंविवि भ्रमण के दौरान हस्तकरघा, पुनर्प्रयुक्त कागज निर्माण, ग्राम प्रबंधन, गौशाला आदि देखकर सभी ने मुक्त कंठ से सराहना की। सभी ने शांतिकुंज में1926 से प्रज्वलित पावन अखण्ड दीपक का दर्शन कर मनोकामना की पूर्ति के लिए प्रार्थना की। तो शांतिकुंज स्थित देवात्मा हिमालय में बैhttp://news.awgp.org/var/news/94/DSC05681N.jpg" height="121" width="216">ठकर हिमालय की दिव्य चेतना की अनुभूति की। 
वहीं ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय पर चल रहे विभिन्न शोध कार्यों से अवगत हुए।


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