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महालक्ष्मी को प्रसन्न करके उनकी विशेष अनुकम्पा प्राप्त करने का दीपावली पर्व

[Shantikunj], Oct 09, 2017
माता महालक्ष्मी का अनुग्रह पाने के लिए दीपावली श्रद्धापूर्वक मनायें
किन्तु, अन्ध परम्पराओं के मोह में माँ की प्रतिष्ठा न गिरायें, उनका मन न दुखायें

पर्वों का प्रयोजन
भारत के ऋषि- मनीषियों ने मानव जीवन की हर धारा को दिव्य अनुशासनों, उच्च आदर्शों, लोकमंगल की प्रवृत्तियों से जोड़ने के लिए अनोखे और सफल प्रयोग किए हैं। मनुष्य अपने आप में अद्भुत क्षमताओं से सम्पन्न है, किन्तु उसके विकास में परिवार एवं समाज की भूमिकाएँ भी बहुत महत्त्वपूर्ण होती हैं। ऋषियों ने व्यक्ति, परिवार एवं समाज इन तीनां को सन्मार्गगामी, आदर्शोन्मुख एवं समर्थ बनाने के लिए श्रेष्ठ दर्शन और सत्परम्पराओं का तानाबाना बुना है।

व्यक्ति अपने आपमें अनन्त संभावनायें लेकर जन्मता है। उसका संकल्प बल इतना ज़बरदस्त है कि उसके आधार पर वह अनोखे करतब कर सकता है। संकल्प यदि गलत दिशा में लग जाये तो मनुष्य परमात्मा की श्रेष्ठ, सुंदर सृष्टि को भी बर्बाद करने में समर्थ सिद्ध हो जाता है। उसकी मूर्खता और दुष्टता पशुओं और पिशाचों को भी लज्जित कर सकती है। वही यदि सही दिशा में लग जाये तो मानव, महामानव, देवमानव की श्रेणियाँ लाँघता हुआ ईश्वरत्व तक को हस्तगत कर सकता है। इसलिए ऋषियों ने ऐसी व्यवस्थाएँ बनायीं कि मनुष्य गुरु एवं ईश्वर की साक्षी में छोटे- छोटे श्रेष्ठ संकल्प लेकर अपनी संकल्पशक्ति को समर्थ और सन्मार्गगामी बनाने का अभ्यास निरन्तर करता रहे। व्रतशीलता अपनाकर साधना, स्वाध्याय, संयम आदि की दिशा में बढ़ते रहने के क्रम इसीलिए बनाये।

परिवार के माहौल में ही व्यक्ति जन्मता और पनपता है। प्रारम्भ से उसके शरीर, मन, बुद्धि, चित्त आदि को स्वस्थ एवं समर्थ बनाने के लिए पारिवारिक अनुशासनों, संस्कारों आदि की मनोविज्ञान, चेतना विज्ञान सम्मत परिपाटियाँ चालू की गयीं।

सामाजिक प्राणी होने के नाते मनुष्य को श्रेष्ठ सामाजिक प्रवृत्तियों की जरूरत भी पड़ती है। सामूहिकता के प्रवाह में अक्सर मनुष्य अपने विवेक और अभ्यास से हटकर भी कुछ का कुछ कर डालता है। पश्चिमी मनोवैज्ञानिक इसे 'मौब सजेशन' कहते हैं। कुछ व्यक्तियों का समूह यदि जोश के साथ किसी काम को शुरू कर देता है तो उनके साथ अनायास ही भीड़ जुटने लगती है। अच्छे- बुरे आन्दोलन मनुष्य की इस प्रवृत्ति के कारण गति पकड़ते देखे जाते हैं। जिस प्रकार व्यक्तिगत संकल्पों को सही दिशा देने के लिए तानाबाना बुनना पड़ता है, वैसे ही सामूहिक संकल्पों, सामूहिक उल्लास को भी आदर्शनिष्ठ, सन्मार्गगामी बनाये रखने के लिए भी सामूहिक तंत्र विकसित करना पड़ता है। पर्व परम्परा इसी महत्त्वपूर्ण उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्रतिष्ठित की गयी है। पर्वों में सामूहिक उल्लास तो सहज ही उभरता है, लेकिन उसे सत्प्रयोजनों में लगाये रखने का कार्य उच्चस्तरीय विवेक और पुरुषार्थ से ही सध पाता है।

दीपावली पर्व
दीपावली पर्व के साथ पौराणिक प्रसंग तो अनेक जुड़े हैं, लेकिन जनमानस में जो बात गहरायी से जमी है, वह है माता महालक्ष्मी को प्रसन्न करके उनकी विशेष अनुकम्पा प्राप्त करना। यदि यह उद्देश्य वास्तव में पूरा करना है तो माता महालक्ष्मी के चेतन स्वरूप और उनकी पसंद को ध्यान में रखते हुए ही पर्व आयोजन के विभिन्न प्रसंगों की रूपरेखा बनानी और निभानी होगी।

पौराणिक कथा के अनुसार माता महालक्ष्मी समुद्र मंथन के क्रम में अवतरित हुर्इं। उनका स्वरूप और वैभव देखकर देव और दानव दोनों ही उन्हें पाने के लिए लालायित हो उठे। माँ ने कहा, "आप सब अपने- अपने कार्य करते रहें, मैं अपनी इच्छा से अपने लिए स्थान का वरण करूँगी।" माँ ने चुपचाप निरीक्षण किया। देखा अधिकांश देव- दानव उनकी ओर ललचाई दृष्टि से देख रहे हैं तथा अपने- अपने व्यक्तिगत सुख एवं स्वार्थ की सिद्धि के तानेबाने मन ही मन बुन रहे हैं। उसी बीच उन्होंने देखा कि भगवान विष्णु सारी उथल- पुथल से अप्रभावित निर्विकार भाव से सभी प्राणियों को समुचित पोषण देने के अपने कर्त्तव्य में लगे हुए हैं। उन्हें प्रभु विष्णु का यह भाव एवं कार्य रुचा और वे उन्हीं के सहयोग के लिए उनकी सहधर्मिणी बनकर बैठ गयीं।

आदि शंकराचार्य जी का सूत्र है- 'विधा स्तुत्यर्थं आख्यायिका' अर्थात् कथानक किसी विधा- सत्प्रयोजन का महत्त्व दर्शाने के लिए होते हैं। उक्त कथानक में यह तथ्य उभरकर सामने आता है कि माता महालक्ष्मी उनसे प्रसन्न नहीं होती जो अपने ही सुख और स्वार्थ की पूर्ति के लिए लालायित रहते हैं। इसके विपरीत जो व्यक्ति सहज भाव से अपने सत्कर्तव्यों की पूर्ति में लगे रहते हैं, उन्हें वे सहजभाव से अपना सहयोग, योगदान, अनुदान देने लगती हैं। जगत के पोषणकर्त्ता भगवान विष्णु की वे सहधर्मिणी हैं। प्राणिमात्र को पोषण देने में उनकी रुचि है। उनकी प्रसन्नता पाने के लिए लोकहित, जनपोषण की प्रवृत्तियाँ अपनाना जरूरी है। इसके विपरीत जो कार्य पोषण की प्रक्रिया के अनुकूल नहीं है, उन्हें करने वालों पर माता अपना कोप प्रकट करे या न करे, किन्तु ऐसे व्यक्तियों को उनकी प्रसन्नता, अनुकूलता का लाभ तो नहीं ही मिल सकता।

दीपावली पर्व से जुड़े पूजापाठ से लेकर प्रसन्नता- उल्लास व्यक्त करने वाले तमाम प्रसंगों का मूल्यांकन माँ की प्रसन्नता पाने के लिए उक्त तथ्यों के आधार पर ही किया जाना चाहिए। जो प्रवृत्तियाँ और कार्य माँ को प्रसन्न करने वाले हों, उन्हीं को अपनाना चाहिए। इसके विपरीत जो भी परम्पराएँ प्रचलन में आ गयी हैं, उनको मोहवश छाती से नहीं लगाये रखना चाहिए, बल्कि विवेकपूर्वक उनके स्वरूप में संशोधन- परिवर्तन कर लेना चाहिए। यही समय की माँग है और यही हम सबके हितसाधन के लिए भी जरूरी है।

आइये समीक्षा करें

पूजापाठ : माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए दीपावली की रात्रि में उनका पूजन किया जाता है। यहाँ यह बात ध्यान में रखी जानी चाहिए कि वे पूजा उपचार में चढ़ाये गये पदार्थों और की जाने वाली स्तुतियों से प्रभावित नहीं होतीं। ऐसा होता तो देव- दानवों के बीच उन्हें रिझाने के लिए इसी प्रकार के उपचारों की होड़ लग जाती। जो जीतता उसी को उनकी अनुकम्पा मिलती। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। वे तो उनसे प्रसन्न होती हैं जो पोषण जैसे सद्प्रयासों में अपना मनोयोग और पुरुषार्थ लगाते रहते हैं। वे पदार्थों के चढ़ावे और स्तोत्रों में प्रयुक्त शब्दों से नहीं, उनके पीछे सन्निहित श्रेष्ठ भावों से ही प्रभावित होती हैं।

प्रश्न यह उठता है कि पूजापाठ के विभिन्न उपक्रम करते हुए साधक के भाव क्या हैं? माता की अनुकम्पा मिले तो उसे किन प्रयोजनों में लगाया जायेगा? यह भाव पढ़- समझकर ही माता उसके अनुरूप अनुकम्पा प्रदान करती हैं। अर्थात् माता लक्ष्मी के विशिष्ट अनुदान मिलने पर उनका नियोजन सद्विवेकपूर्वक सद्कार्यो में करने का भाव हो तो ही माता प्रसन्न होती हैं। इसीलिए पूजन के समय माता लक्ष्मी के साथ गणेश जी की स्थापना की जाती है। यदि 'लक्ष्मी' संसाधनों का उपयोग 'गणेश' विवेक के देवता के अनुरूप नहीं होगा तो पूजन का उद्देश्य सधनेवाला नहीं है।

इसी भाव को स्पष्ट करने के लिए एक और परम्परा जोड़ी गयी थी। लक्ष्मी पूजन के पूर्व पुरोहित यजमान के यहाँ स्थान- स्थान पर 'शुभ लाभ' लिखते थे। इसका उद्देश्य ही रहा है कि 'शुभ' की मर्यादा में ही 'लाभ' के प्रयास रहें। केवल लाभ पर ही दृष्टि रही तो व्यक्ति शुभ छोड़कर अशुभ मार्ग भी अपनाने लगता है। ऐसे व्यक्ति तीन- तिकड़म करके कुछ आर्थिक लाभ भले जुटा लें, लेकिन वे माता महालक्ष्मी की कृपा- अनुकम्पा पाने में सफल नहीं होते। माता लक्ष्मी तो ऐसे धन से हट जाती है, केवल माया भर रह जाती है। लक्ष्मी के अभाव में उन्हें तृप्ति, संतोष, आत्मीयता जैसे सुख नहीं मिल पाते। वे मायावश जीवनभर अतृप्ति, असंतोष, क्लेश, तनाव आदि की पीड़ा झेलते रहते हैं।

लक्ष्मी- पूजा, उपचार आदि उन्हीं के सफल हो सकते हैं जो सम्पत्ति की प्राप्ति की कामना के साथ उसके विवेकपूर्ण, शुभलाभ और सदुपयोग के श्रेष्ठ भाव अंत:करण में रखते हैं। प्रयास यही किये जाने चाहिए कि हम स्वयं इस मर्म को समझें, अपनायें और अपने प्रभावक्षेत्र के व्यक्तियों को भी इसके लिए प्रेरित करें।

हर्षोल्लास :
दीपावली के पर्व पर हर्षोल्लास का वातावरण बन जाता है। उनके पीछे शुभाशुभ उद्देश्यों की भी समीक्षा की जानी उचित है। जैसे-

स्वच्छता- सज्जा : पर्व के पहले घरों की, संस्थानों की सफाई, पुताई, सज्जा आदि के लिए प्रयास किए जाते हैं। इनके पीछे अपने धन का अहंकार प्रदर्शित करने का भाव नहीं होना चाहिए। स्वच्छता स्वास्थ्य के लिए भी आवश्यक है तथा देव शक्तियों को भी पसंद है। स्वच्छता को सभ्यता की पहली शर्त भी कहा जाता है। इसलिए स्वास्थ्य, सभ्यता और देव शक्तियों की अनुकम्पा की कामना करने वालों को स्वच्छता को अपने स्वभाव का सहज अंग बना लेना चाहिए। जो लोग किन्हीं पर्व विशेषों पर स्वच्छता अपनाते हैं, शेष समय गन्दगी फैलाने में संकोच नहीं करते, वे लोग स्वास्थ्य, सभ्यता तथा देव अनुग्रह के स्थायी अधिकारी नहीं बन सकते।

सज्जा में सुरुचि का ध्यान रखना चाहिए। वह खर्चीली भी हो सकती है और सादगीपूर्ण भी। उसमें अपनी स्थिति और आसपास की परिस्थितियों के अनुरूप सुरुचि का समावेश सहज ही किया जा सकता है। सुरुचि की उपेक्षा या उसके अहंकारपूर्ण प्रदर्शन से बचना चाहिए।

दीपोत्सव : दीपावली पर दीपोत्सव की परम्परा रही है। पहले सम्पन्न लोग श्रद्धापूर्वक, सामर्थ्य के अनुसार शुद्ध घी या शुद्ध तेल के दीपक प्रज्वलित करते थे। उससे वातावरण को शुद्ध, स्वास्थ्यप्रद बनाने के लिए किए गये यज्ञ जैसा ही लाभ मिलता था। प्रकाश सद्ज्ञान, सद्भाव का भी प्रतीक है। इसलिए दीप पर्व पर हर अंधेरे कोने तक, देवालय से लेकर पनघट और घूरे आदि तक सभी जगह दीपक रखे जाते थे। अन्त:करण के हर कोने तक, समाज के हर वर्ग तक ज्ञान का प्रकाश पहुँचाने के भाव से किया गया दीपदान एक श्रेष्ठ यज्ञ बन जाता है।

अब उस यज्ञीय भाव की उपेक्षा करके चकाचौंध उत्पन्न करने वाली बिजली के उपकरणों की सज्जा को महत्व दिया जाने लगा है। इसके पीछे लक्ष्मी को प्रसन्न करने वाला 'शुभ' भाव कम और अहं प्रदर्शन, स्वार्थ सिद्धि या परम्परा निर्वाह का जड़ भाव ही अधिक रहता है। इसमें संशोधन किया जाना चाहिए।

आतिशबाजी : दीपावली पर माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने एवं अपना उल्लास प्रकट करने के लिए पटख़ों, आतिशबाजी का प्रयोग बहुतायत से किया जाने लगा है। जब जनसंख्या कम थी, वायुप्रदूषण नहीं के बराबर होता था, तब पूजन की उद्घोषणा करने के लिए, प्रसन्नता प्रकट करने के लिए पटाख़े, फुलझड़ी, अनारदाने जैसे अग्नि प्रयोग किसी सीमा तक उचित भी कहे जा सकते थे। लेकिन अब जब वायु प्रदूषण जानलेवा होता जा रहा है तब हवा में जहर घोलने वाली रसायनयुक्त आतिशबाजी का प्रयोग करने, कान फोड़ने वाले ध्वनि प्रदूषण पैदा करने वाले बम फोड़ने की परम्परा किसी दृष्टि से उचित नहीं है। यह स्वयं अपने लिए, सारे समाज के लिए तो 'अशुभ' हानिकारक है ही, माता लक्ष्मी को भी रुष्ट करने वाला क्रम कहा जा सकता है। विश्व के पोषण में, हित में रुचि लेने वाली माँ जानलेवा प्रदूषण फैलाने वाले इन कार्यों से प्रसन्नता नहीं अप्रसन्नता ही साझा करेगी। लक्ष्मी माता को अप्रिय और अपना अशुभ करने वाली उस परम्परा को समाप्त ही कर देना चाहिए। हर्षाभिव्यक्ति के लिए गीत, संगीत, काव्य, सौम्य समूह नृत्य जैसे प्रयोग किए जा सकते हैं।

जुआ : किसी भी प्रकार धन अर्जित करने के पक्षधर लोग दीपावली पर जुआ खेल कर लक्ष्मी की अनुकम्पा पाने के अनगढ़ कौतुक करते हैं। इस कृत्य में कुशलता प्राप्त करके माया की हेराफेरी भर की जा सकती है, कल्याणकारी माता लक्ष्मी की प्रसन्नता, अनुकम्पा पाने का उद्देश्य तो इससे कभी पूरा होने वाला नहीं है। इसे छोड़ देना ही ठीक है।

यदि मनोरंजन के लिए खेलना ही है तो एक शुभ प्रयोग किया जा सकता है। लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार जितना धन जेब से निकल जाने का खतरा उठा सकते हैं, उतना साथ लेकर चलें। तय कर लें कि खेल में कोई भी हारे, कोई भी जीते, खेल के अंत में सारा धन एकत्रित करके, जन पोषण, पर्यावरण संवर्धन, स्वच्छता, हरीतिमा संवर्धन, विद्या विस्तार जैसे शुभ प्रयोजनों में, सार्वजनिक पारदर्शिता के साथ लगा दिया जायेगा। ऐसा करने से खेलने की इच्छापूर्ति, मनोरंजन आदि प्रयोजन भी सध जायेंगे तथा यथाशक्ति शुभकार्यों में सम्पदा लगाने की सत्प्रवृत्ति भी बढ़ेगी।

इस दीपावली पर युगनिर्माण अभियान से जुड़े सभी सृजन सैनिकों, युगऋषि के प्रति श्रद्धा रखने वाले सभी सृजन साधकों को यह प्रयास करने चाहिए कि लोग दीपावली पर माता महालक्ष्मी की कृपा पाने के पात्र बनें और परम्पराओं को विवेकसम्मत रूप दें। इससे आत्मकल्याण और लोकमंगल के दोनों प्रयोजनों की पूर्ति होगी और जीवन सार्थक बनेगा।






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