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होली पर्व के क्रम में नवजागरण के कुछ प्रेरक प्रयोग करें

सहज क्रम होली एक ऐसा पर्व है, जिसमें वसन्त की पावन मस्ती मानो जन-जन के अन्दर भर जाती है। उसका ऐसा प्रवाह उमड़ता है जिसमें छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, अवर्ण-सवर्ण सभी भेद बह जाते हैं। मैत्री भाव का, समता का सुन्दर माहौल बन जाता है। युग निर्माण अभियान से जुड़े सभी व्यक्तियों और संगठित इकाइयों को ऐसे प्रयास करने चाहिए कि इस पुण्य पर्व की सर्वहितकारी प्रेरणाएँ जन-जन तक पहुँचाई जा सकें। उसका प्रभाव समाज के स्थाई चरित्र पर भी पड़े। इसी के साथ गिनेचुने व्यक्तियों द्वारा स्वार्थ या अहंकार भरी मस्ती में किए जाने वाले अभद्र अरुचिकर प्रसंगों को न उभरने देने की सावधानी भी बरती जाए। इस सुन्दर माहौल में, खीर में कंकड़ पड़ने जैसी विसंगतियों से बचा जा सके। जन प्रचलन में होलिका दहन तथा उसके अगले दिन रंग गुलालयुक्त हर्षोत्सव ही प्रधान होते हैं। लेकिन उनकी तैयारी कई दिन पहले से योजनाबद्ध ढंग से की जाती है, तब पर्व का वातावरण बनता है। इस पर्व के साथ ऋषि प्रणीत प्रेरणाओं और परम्पराओं को शामिल करने के लिए भी कई दिन पूर्व से तैयारी की जाये तो उसके साथ नए सर्वहितकारी अध्याय जुड़ सकते हैं। विषेष प्रयोग : इस होली पर्व में उक्त प्रेरक प्रभाव पैदा करने के लिए अपने परिजन होलिका दहन के लगभग एक सप्ताह पूर्व से सक्रिय हों। • नगरों और गाँवों के हर मोहल्ले में भी होलियाँ जलाई जाती हैं। उनकी कुछ घोषित-अघोषित कमेटियाँ भी होती हैं। उन कमेटियों के समझदार, ज़िम्मेदार व्यक्तियों से अपने सधे हुए परिजन सम्पर्क करें। उन्हें निम्न लिखित बिन्दुओं पर सहमत करने का प्रयास करें। • होली में उसके परम्परागत उल्लास के साथ उसकी सांस्कृतिक गरिमा को भी जगाने, जोड़ने के प्रयास हों। - होली को अश्लील चित्रों की होली जलाने और परस्पर के द्वेष को त्यागकर मैत्री भाव जगाने के प्रयोग जोड़े जायें। इनमें नशा-व्यसन निवारण को प्राथमिकता दी जाय। जो सहमत हो जायें उनसे यह आग्रह किए जायें• वे अपने क्षेत्र में होलिका दहन के दिन, सवेरे एक रैली निकालें। उसमें घरों में रखे अश्लील चित्रों और साहित्य को इकट्ठा किया जाय। उन्हें होलिका दहन के समय बहिनोंभाइयों द्वारा अग्नि में झौंका जाय। पुन: उन्हें घर में न लाने के संकल्प भी कराए जायें। • जनसंपर्क द्वारा लोगों से नशा-व्यसन छोड़ने के संकल्प कराए जायें। उनके व्यसनों को कागज़ पर लिखकर उन्हें भी संकल्पकर्त्ताओं के नाम की घोषणा केसाथ होली में झोंका जाय। • होली खेलने के दिन बरते जाने वाले अनुशासनों को तय करके बड़ों और बच्चों से उसे अपनाने की अपील की जाय। जैसे ज़हरीले रंगों, कालिख, वार्निशपेंट जैसे रंगों का प्रयोग न करना। अमर्यादित-अभद्र व्यवहार न करना आदि। यह सावधानियाँ बरतने से तमाम हानियों से बचा जा सकता है। कई जगह प्रभावशाली व्यक्तियों के सहयोग से ऐसे प्रयोग बहुत सफल और सराहनीय सिद्ध हुए हैं। • सामाजिक सामंजस्य बढ़ाने के लिए कुुछ सधे हुए युवा और  प्रौढ़ों की टोली उपेक्षित बस्तियों में जाकर वहाँ के व्यक्तियों से स्नेह मिलन का क्रम भी बना सकते हैं। • हो सके तो होली खेलने के दूसरे दिन गाँव-मोहल्लों में सामूहिक स्वच्छता-श्रमदान किया जाय। • अपनी पीठों पर, मण्डलों के केन्द्रों पर होलिका दहन के दिन शाम को एक होलिका पर्व पूजन रखा जाय। जनसंपर्क में सहमत व्यक्तियों को उसमें सादर आमंत्रित किया जाय। कर्मकाण्ड भास्कर के अनुसार एक-डेढ़ घंटे में पर्व की प्रेरणाएँ पूजन क्रम के माध्यम से लोगों को हृदयंगम कराई जायें। अंत में सीमित संख्या में दीपक प्रज्वलित करके आहुतियाँ कराई जायें। ध्यान रहे यह क्रम होलिका दहन के समय के कम से कम डेढ़ घंटे पहले पूरा कर लिया जाय। पधारे प्रतिनिधियों को अपनेअपने क्षेत्र की होलियों में कुछ नए प्रयोग जोड़ने के लिए प्रेरित किया जाय।

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वसन्त काल में सामूहिक साधना से उभरे एक तेजस्वी सृजनशील प्रवाह

उसे उभारने और सुनियोजित करने के लिए की जाय प्रचण्ड जीवन साधना मन्थन- चिन्तन पाक्षिक (दिनांक 1 जनवरी 2020) के अंक में वासन्ती प्रवाह के परिपाक की 40 दिन की अवधि में सवा लाख गायत्री जप सहित सामूहिक साधना अनुष्ठान की अपील को परिजनों ने बड़े उत्साह के साथ स्वीकार किया है। सभी क्षेत्रों से व्यक्तिगत एवं सामूहिक पंजीयन का क्रम चल रहा है। आशा की जाती है कि साधकों की संख्या निर्धारित लक्ष्य से कुछ अधिक ही हो जायेगी। परिजन अपनी मन:स्थिति तथा परिस्थितियों के बीच सन्तुलन बनाने के लिए जिज्ञासाएँ भी व्यक्त कर रहे हैं, जिनके उत्तर यथाशीघ्र उन तक पहुँचाये भी जा रहे हैं। जैसे :प्रश्न :- जो व्यक्ति अधिक कार्यव्यस्त हैं, वे क्या मिलजुल कर जप साधना पूरी कर सकते हैं? उत्तर :- हाँ, ऐसा किया जा सकता है। परिवार के सदस्य या मित्रगण, नर- नारी मिलकर जप पूरा कर सकते हैं। लेकिन उन सबको मिलाकर अनुष्ठान की एक इकाई ही माना जाएगा। साथ ही जप के साथ ‘तप’ के नियम उन सभी को विवेकपूर्वक अपनाने होंगे। प्रश्न :- अनष्ुठान के दौरान आवश्यक यात्रा या कोई और अड़चन आन पर क्या किया जाय? महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान क्या करना चाहिए? उत्तर :- कोई व्यवधान आने पर नियमित जप न हो पाने पर भी मानसिक जप करने का क्रम बनाये रखें। उस मानसिक जप से अन्त:करण की वृत्तियों का बिखराव नहीं होगा, उनके शोधन का क्रम अवचेतन मन में चलता रहेगा। नियमित जप जो छूटा है, उसकी पूर्ति उस व्यवधान के पहले या बाद में जप संख्या बढ़ाकर कर लेनी चाहिए। प्रश्न :- यदि पूर्णाहुति के समय तक जप पूरा न हो सके तो क्या करें? उत्तर :- ऐसी स्थिति में दो विकल्प बनते हैं। एक यह कि अपनी पूर्णाहुति कुछ दिन आगे बढ़ा दी जाय। पूर्णाहुति तक तप के नियम निभाते रहें। दूसरा यह कि गुरुसत्ता के भण्डार से शेष जप उधार लेकर पूर्णाहुति सबके साथ ही कर ली जाय। पूर्णाहुति के समय ही यह संकल्प ले लिया जाय कि उधार लिये गये जप को निर्धारित अवधि में वापस कर दिया जाएगा। प्रायश्चित्त स्वरूप 10% जप अधिक किया जाय। जैसे 100 माला जप उधार लिया है तो निर्धारित अवधि में 110 माला जप पूरा करके गुरु कोष में जमा करने का संकल्प करें। ध्यान रहे :- अनुष्ठान में जप साधना भी जरूरी है, लेकिन उसके साथ तप साधना होना और भी अधिक जरूरी है। यन्त्रवत जप पूरा कर देने से कोई विशेष लाभ नहीं मिलता। उसके साथ आत्मपरिष्कर और आत्मनिर्माण, आत्मविकास की समुचित तप साधनाएँ भी प्रभावी ढंग से चलाई जानी चाहिए। पू. गुरुदेव ने अपनी जीवनी ‘हमारी वसीयत और विरासत’ में स्पष्ट लिखा है कि उनके अनुष्ठान की सफलता में प्रत्यक्ष जप के साथ अदृष्य रूप से चलने वाली प्रखर जीवन साधना का विशेष महत्त्व रहा है। आत्मोन्नयन की जीवन साधना का समावेश न किया जाय तो कर्मकाण्ड का महत्त्व निष्प्राण कलेवर जैसा ही रह जाता है। यदि कोई चित्र बनाने के लिए कागज, तूलिका, रंग आदि तो बहुत अच्छे हों, किन्तु बनाने वाले का न तो हाथ सधा हो और न श्रेष्ठ कल्पना शक्ति हो तो चित्रों में प्रभाव कैसे आएगा? इसीलिए जप साधना के साथ अनुष्ठान के उद्देश्य के अनुरूप अपनी शक्ति और कुशलता विकसित करने वाली जीवन साधना भी अनिवार्य रूप से की जानी चाहिए। विवेकपूर्वक कदम बढ़ें इस सामूहिक अनुष्ठान के जो उद्देश्य निर्धारित हैं, उन्हें केवल कर्मकाण्ड वाले संकल्प में दुहरा देने से बात नहीं बनेगी। उन्हें आन्तरिक संकल्प, अर्थात् उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपनी पूरी सामर्थ्य झोंक देने के जज़्बे का रूप देना जरूरी होता है। इस दृष्टि से निर्धारित (1 जनवरी के अंक में घोषित) उद्देश्यों पर एक समीक्षात्मक दृष्टि डालते हैं :युग परिवर्तन चक्र को अधिक प्रभावी बनाना :- इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए युग परिवर्तन के मार्ग में बाधक प्रवृत्तियों एवं परम्पराओं को दूर करना और उसमें सहयोगी सत्प्रवृत्तियों, सत्परम्पराओं की स्थापना करना बहुत जरूरी है। केवल सदेच्छा करने भर से बात सधती नहीं है। उन्हें सुनिश्चित संकल्प का रूप देना जरूरी होता है। अर्थात् इतने समय में, इतने क्षेत्र में इतना प्रभाव तो पैदा करना ही है। प्रारम्भ अपने प्रभाव क्षेत्र से करें। अपने अन्दर जिन- जिन हीन प्रवृत्तियों को दूर करना जरूरी है, उनमें से एक- दो को पूर्ण रूप से हटाने या आंशिक रूप से कम करने के संकल्प को चरितार्थ करने की तप साधना तो की ही जा सकती है। अपने अन्दर जिन शुभ प्रवृत्तियों और आदतों को विकसित करना है, उनमें से कुछ को तप साधना का अंग बनाया जा सकता है। जब अपने प्रभाव क्षेत्र में ही सफलता नहीं मिलेगी तो व्यापक क्षेत्र में सफलता की आशा कैसे की जा सकती है? लेकिन यदि हजारों व्यक्ति अपने प्रभाव क्षेत्र में परिवर्तन चक्र तीव्रतर कर सकते हैं तो उसका व्यापक प्रभाव जरूर दिखने लगेगा। उससे खरबूजे को देखकर खरबूजे का रंग बदलने वाली कहावत चरितार्थ होने लगेगी। इसलिए इस सामूहिक अनुष्ठान के भागीदार प्रत्येक साधक को युग परिवर्तन चक्र को तीव्रतर करने की तप साधना अवश्य करनी चाहिए। युगशिल्पियों को अधिक प्रामाणिक बनाना :- समाज में सभी समझदार व्यक्ति वाञ्छित परिवर्तन चाहते हैं, उसमें स्वयं भी शामिल होना चाहते हैं। लेकिन किसी का अन्धानुकरण करके ठगे जाना पसन्द नहीं करते। सही परिवर्तन की वकालत करने वाले उपदेश विभिन्न रूपों में खूब मिलते हैं। लेकिन जब उनके आचरण को उनके उपदेशों- सुझावों की कसौटी पर कसा जाता है तो निराशा ही हाथ लगती है। स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न मन में उभरता है कि यदि ये सिद्धान्त इतने लाभकारी हैं तो ये स्वयं उनका लाभ क्यों नहीं उठाते? पूज्य गुरुदेव इस सन्दर्भ में एक उदाहरण दिया करते थे। कहते थे कि मान लो किसी ने शुद्ध देशी घी की दुकान खोल दी। विज्ञापनों में देशी घी के खूब फायदे गिनाये गये। लोग उनसे प्रभावित होकर घी खरीदने भी लगे। लेकिन जब उनकी स्वयं की रसोई का जायजा लिया गया तो पता चला कि वहाँ उनकी दुकान का घी इस्तेमाल नहीं होता। वे अपने लिए कहीं और से घी लाते हैं। तब विज्ञापन के हजार वायदों के ऊपर यह तथ्य भारी पड़ जाएगा कि वे स्वयं उसे क्यों नहीं वापरते? कोई न कोई हेराफेरी जरूर है। युगशिल्पियों के सामने भी यही चुनौती खड़ी है। वे लोकमंगल के लिए जिस जीवन शैली को जरूरी मानते हैं, वह उनके जीवन में भी होनी चाहिए। दूध का जला छाछ भी फूँकना चाहता है। लोग स्वयं उनके जीवन में सादा जीवन, उच्च विचार, श्रेष्ठ आचार के प्रमाण जाँचना चाहेंगे। इस दृष्टि से हमारे अपने और अपने प्रभाव क्षेत्र के व्यक्तियों की प्रामाणिकता इस अनुष्ठान काल में बढ़े तो ‘हम बदलेंगे, युग बदलेगा’ का नारा जीवन्त होने लगेगा। आसुरी आतंकवादी शक्तियों को निरस्त करना :- आसुरी शक्तियाँ विवेकपूर्ण परामर्श या अनुनय- विनय से प्रभावित नहीं होतीं। मच्छर, खटमल आदि उपदेश देने से लोगों का रक्त चूसना नहीं छोड़ते। उनके लिए तो विवेकपूर्वक साहसिक प्रतिरोध ही करने पड़ते हैं। उसके लिए युग सैनिकों को अपने अन्दर पर्याप्त साहस, कौशल और बल जगाना होगा। इसके लिए अपने ही अन्दर छिपे आन्तरिक शत्रुओं अहंता, संकीर्णता, लोलुपता, उन्मत्तता जैसी आतंकवादी प्रवृत्तियों को पहचानने, स्वीकार करने, परास्त करने योग्य सद्विवेक एवं सत्साहस को विकसित करना पड़ेगा। फिर अपने परिवार और छोटी सामाजिक इकाईयों में घुस पड़ी अविवेकपूर्ण घातक कुरीतियों से लोहा लेने की क्षमता अर्जित करनी होगी। यह क्रम बन जाने पर हर क्षेत्र में अनीति निवारक साहसिक टोलियाँ उभर आयेंगी। उनके संयुक्त प्रभाव से आतंकवादी शक्तियाँ हतोत्साहित होने लगेंगी। इसमें कोई शक नहीं कि सामूहिक अनुष्ठान से सूक्ष्म जगत में इस प्रकार की असुरता निरोधक शक्तियाँ जागेंगी। लेकिन इन्हें प्रत्यक्ष जगत में अवतरित होने के लिए माध्यम बनने वाले जीवन्त साधक भी तो चाहिए। इसलिए जप साधना में इस प्रकार के भाव उभारने के साथ- साथ तप साधना से सद्शक्तियों के माध्यम- वाहन बनने योग्य आधार गढ़ने पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। नवसृजन की गतिविधियों को शक्ति एवं संरक्षण प्रदान करना इसके अन्तर्गत भी आसुरी प्रवृत्तियों को निरस्त करने जैसी तैयारी करनी होगी। राम एवं कृष्ण के अवतारों की तरह ही प्रज्ञावतार को भी दुष्टता के विनाश के साथ ही साधुता को शक्ति एवं संरक्षण प्रदान करने की रीति- नीति दोहरानी है। इसके लिए अपने विवेक, साहस, कौशल एवं बल को इतना समर्थ बनाना होगा कि हर शुभ कार्य को समर्थ संरक्षण, प्रोत्साहन दिया जा सके। व्यक्तिवाद एवं वर्गभेद के अहं से उपर उठकर आसपास के क्षेत्र में सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन के अनेक प्रकल्प खड़े किये जा सकें। सज्जनों के संगठन की प्रवृत्ति एवं क्षमता बढ़ाना उक्त सभी सूत्रों को व्यापक सफलता प्रदान करने के लिए सद्भाव, सद्विचार सम्पन्नों को सत्पुरूषार्थ करने के लिए संगठित करने की अनिवार्य आवश्यकता है। कलियुग में संघशक्ति को सबसे प्रभावपूर्ण माना गया है। देखा जाय तो समाज में दुष्टों की अपेक्षा भले मानस अधिक संख्या में हैं। किन्तु संगठित होने की प्रवृत्ति न होने के कारण वे दीन- हीन स्थिति में रहते तथा थोड़े से संगठित दुष्टों से परास्त होते देखे जाते हैं। भले मानसों में संगठित होने की प्रवृत्ति जागे और वे यह क्षमता विकसित कर लें तो दुष्टता के प्रयोग करने की किसी की हिम्मत ही नहीं पड़े। यदि कोई दु:साहस करे तो वे अपने को समर्थ प्रतिरोधियों से घिरा अनुभव करके उस मार्ग से विरत हो जायें। इस प्रकार अपने निर्धारित उद्देश्यों को पूरा करने के लिए भावभरी जप साधना के साथ ही विवेकपूर्ण, साहसिक तप साधना का क्रम अपनाया जाये तो यह सामूहिक अनुष्ठान युग परिवर्तन चक्र को प्रभावी बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर सिद्ध हो सकता है। साधना समग्र- समर्थ बने इस सामूहिक अनुष्ठान को समग्रता के साथ किया जाए तो उसमें सामर्थ्य निसंदेह बढ़ जायेगी। इसीलिए युगऋषि ने जप- तप साधना के साथ ही स्वाध्याय, संयम, सेवा, आराधना के सूत्र भी जोड़े हैं। सबका सम्मिलित रूप ही अनुष्ठानों को समग्रता और समर्थता प्रदान करता है। इसलिए अपने अनुष्ठान में भाव शुद्धि, स्वाध्याय, चारों संयमों के साथ सेवा- आराधना के सूत्र भी जोड़े गये हैं। ध्यान रहे :- उक्त सभी सूत्रों के सैद्धांतिक स्वरूप एक जैसे होने पर भी उनके व्यावहारिक स्वरूपों में भिन्नता रहेगी। इसके लिए हर साधकसाधिका को आत्म- समीक्षा, आत्म- शोधन, आत्मनिर्माण एवं आत्म- विकास के क्रम स्व- विवेक के साथ निर्धारित करने होंगे और उन पर पूरे मन से अमल करना होगा। प्रत्येक साधक- साधिका गुरुसत्ता एवं परमात्मसत्ता से सच्चे मन से निवेदन करे कि हे प्रभु! हम आपके हैं, हम आपके निर्देशों पर चलते हुए, आपके सच्चे अनुयायी, अंग- अवयव बनना चाहते हैं। आप हमें अपना आशीर्वाद दें कि हमें- • आत्म समीक्षा सही ढंग से करने योग्य सद्विवेक मिले। • आत्मशोधन भली प्रकार करने योग्य सत्साहस प्राप्त हो। • आत्मनिर्माण प्रामाणिक ढंग से करने योग्य सद्कौशल, सत्पुरुषार्थ हममें जागे। • आत्मविकास, आपके विराट रूप के साथ एकात्मता अनुभव करने योग्य आत्मबोध की हमारी क्षमता बढ़े। हे प्रभो! इस वसन्त काल में इस दिव्य साधना और आपके स्नेहपूर्ण अनुग्रह के नाते हमारे अन्दर ऐसी वासंती ऊर्जा प्रवाहित हो कि- हमारी संकीर्णता रूपी ठिठुरन छूटे और रूढ़िवादी मान्यताएँ पुराने पत्तों की तरह झड़ जायें। अन्दर से ऐसी सृजनशील उमंग उभरे कि सत्संकल्प और सत्पुुरुषार्थ की मनोहारी कोपलें फूट पड़ें। अन्दर का उल्लास सुरम्य पुष्पों की तरह प्रकट हो और उनकी ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया’ रूपी सद्भावना की सुगंधि वातावरण में भर जाये। यह वासंती पुरुषार्थ फलित होकर नये पुष्ट संकल्प रूपी बीजों के रूप में पक कर बिखरें और धरा पर स्वर्गीय वातावरण का निर्माण हो। इस प्रकार साधना को समग्र और समर्थ रूप देने के प्रयास निर्धारित उद्देश्यों की सिद्धि के सबल आधार तो बनेंगे ही, साथ ही साधकों की साधना का कद, स्तर बढ़ जाएगा। पूज्य गुरुदेव ने ‘अपने अंगअवयवों से’ नामक पत्रक के अन्त में यही भावना व्यक्ति की है कि हमारे कार्य का स्तर तो बढ़ता ही रहा है, उन्हें कुशलता से सम्पन्न करने के लिए युग साधकों का कद- स्तर भी बढ़ना चाहिए, ऐसी आशाअपेक्षा के साथ योजना आगे बढ़ाई जा रही है। यदि हम सब अपनी साधना का स्तर उनकी आज्ञा के अनुरूप बढ़ा लें तो आत्मकल्याण और गुरु- अनुग्रह पाने के दोनों ही उद्देश्य बेहतर ढंग से सधेंगे।

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युग निर्माण आन्दोलन की गतिशीलता ‘साधनात्मक ऊर्जा’ पर आधारित है अस्तु सामूहिक साधना के कुछ बड़े और प्रखर प्रयोग करना जरूरी है

कुछ अच्छा, कुछ टिकाऊ परिणाम लाने वाले, लोकहित साधने वाले कार्य करने की सदेच्छा बहुतों में उभरती है। वे तद्नुसार उन शुभ कार्यों का शुभारंभ कर भी देते हैं, लेकिन उनमें से बहुतेरे कार्य बीच में ही रुकते, अटकते- भटकते देखे जाते हैं। यह इसलिए नहीं होता कि इन्हें शुरू करने वालों की कामना- भावना बदल जाती है, बल्कि वे इसलिए अटक जाते हैं कि उन्हें सफल बनाने के लिए आवश्यक साधनात्मक तैयारी नहीं होती। जनमंगल के कार्य आसान नहीं होते। उन्हें लम्बे समय तक तमाम विसंगतियों, विरोधों, चुनौतियों को झेलते हुए पूरी तत्परता से करते रहना पड़ता है। उनमें बड़ी संख्या में प्रखर पुरुषार्थियों को शामिल करना पड़ता है। उनका चुनाव करने, उन्हें प्रशिक्षित और नियोजित करते रहने की जरूरत पड़ती है। समाज के भिन्न- भिन्न वर्गों और रुचियों, प्रवृत्तियों वाले उन व्यक्तियों में परस्पर तालमेल बिठाते हुए एक- दूसरे के पूरक बनकर काम करने पड़ते हैं। इसके अलावा बदलती परिस्थितियों और बढ़ती जरूरतों के अनुसार उनकी कुशलता और संख्या भी बढ़ानी पड़ती है। सफलता मिलने पर मिलने वाले यश और सम्मान को पचा पाना भी आसान नहीं होता। वे भी कार्यकर्त्ताओं को लक्ष्य भुलाकर यशकामना की अनगढ़ होड़ में ठेल दिया करते हैं। इस सब अनिवार्य शर्तों की पूर्ति करने के लिए कार्यकर्त्ताओं में उच्च स्तरीय साधनात्मक ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती ही रहती है। इसीलिए भारत के ऋषियों- मनीषियों ने ‘साधना से सिद्धि’ के सिद्धांत को बहुत अधिक महत्व दिया है। युगऋषि ने भी युग निर्माण की सशक्त पृष्ठभूमि बनाने के लिए लम्बे समय तक कठिन साधना- तपश्चर्या का क्रम अपनाए रखा। इस कार्य में लगने वाले, सहयोगी बनने वाले युगसैनिकों- युगशिल्पियों को भी अपने स्तर पर इसी रीति- नीति को अपनाए रखने की प्रेरणा दी। इसी आधार पर यह अभियान अपनी 50 वर्ष से भी अधिक की यात्रा शानदार ढंग से पूरी करते हुए आगे बढ़ रहा है। युगऋषि कहते रहे हैं कि उनके अभियान के अंतर्गत होने वाले कार्यों का स्वरूप समुद्र में तैरते हुए विशाल हिमखंड (ग्लेशियरों) जैसा होता है। उनका केवल 1/10 अंश पानी के ऊपर दिखाई देता है, 9/10 अंश पानी के अंदर छिपा रहता है। इसी प्रकार दुनिया को दिखाने वाले प्रत्यक्ष पुरुषार्थ की भूमिका 1/10 और उसके पीछे शक्ति देने वाले साधनात्मक पुरुषार्थ की भूमिका 9/10 होती है। इसीलिए इस मिशन में सक्रिय रूप से जुड़े प्रत्येक साधक- सैनिक को ईश्वर उपासना, जीवन साधना और लोक आराधना के नियम अनिवार्य रूप से अपनाने पड़ते हैं। उनको पूरा करते रहने के लिए अपने समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन का एक अंश नियमित रूप से लगाते रहना होता है। इसके अतिरिक्त भी समयसमय पर सामूहिक साधना के विशेष क्रम भी चलाए जाते रहे हैं। जैसे• सन् 1958 के सहस्त्र कुंडीय यज्ञ के संदर्भ में ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान। • चीन के आक्रमण और अष्टग्रही योग के प्रभाव को काटने के लिए विशेष सामूहिक क्रम। श्री लाल बहादुर शास्त्री के कार्यकाल में हुए भारत- पाक संघर्ष की सफलता के लिए ‘क्लीं’ बीज मंत्र सहित विशेष जप अनुष्ठान ।। • श्रीमती इंदिरा गाँधी के कार्यकाल में बंगला देश आॅपरेशन के समय विशेष सामूहिक साधना। • आपातकाल में उपजी विसंगतियों के निवारण के लिए किए गए सामूहिक साधना प्रयोग। • स्काई लैब के अनियंत्रित हो जाने पर प्रतिदिन रात्रि में 9:00 से 9:30 बजे तक चलाई गई यान सुरक्षा साधना। स्मरण रहे कि स्काई लैब वैज्ञानिकों के तमाम अनुमानों के विपरीत इसी साधना काल की अवधि में (रात्रि 9:00 से 9:30 के बीच)सुरक्षित ढंग से आॅस्ट्रेलिया के निकट समुद्र में गिर गई थी। • युगसंधि काल की अवधि में (सन् 1988 से 2000 तक) युगसंधि महापुरश्चरण साधना। इसकी पहली पूणार्हुति सन 1995 में आँवलखेड़ा में तथा महापूर्णाहुति सन् 2000 में हरिद्वार में की गई। इसके बाद समय- समय पर आश्वमेधिक अभियान, समूह साधना वर्ष जैसे प्रयोग किए जाते रहे हैं। वंदनीया माताजी की जन्मशती (सन् 2017 से 2026) तक 9 वर्षीय मातृशक्ति श्रद्धांजलि नवसृजन महापुरश्चरण साधना का क्रम चल रहा है। इसके अंतर्गत तीन- तीन वर्ष के तीन- तीन कालखंड निर्धारित किए गए हैं। प्रथम खंड (सन् 17,18,19) पूरा हो रहा है। इस अवधि में गृहे- गृहे जप- यज्ञ जैसे उल्लेखनीय क्रम चलाए गए। एक ही दिन में 2,40,000 घरों में एक साथ यज्ञ करने जैसे कीर्तिमान भी बने। श्रावण मास में एक साथ देश- विदेश के हजारों साधकों ने चान्द्रायण- अर्ध चान्द्रायण तप साधना में भागीदारी निभाई। इस प्रकार के प्रयोग आगे भी करते रहना है। समय की आवश्यकता यह समय दैवी और आसुरी शक्तियों के बीच तेज होते संघर्ष का है। युगऋषि के अनुसार आसुरी शक्तियाँ जीवन- मरण का संघर्ष कर रही हैं। दैवी शक्तियाँ वातावरण को शोधित कर आत्मीयतासृजनशीलता जैसी प्रवृत्तियों को बढ़ा रही हैं, तो आसुरी शक्तियाँ वर्गभेद, अपराध, आतंकवाद के सहारे अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए जी- तोड़ प्रयास कर रही हैं। आसुरी प्रवृत्तियों को निरस्त करने तथा दैवी शक्तियों को प्रभावशाली बनाने के लिए लौकिक प्रयास विभिन्न स्तरों पर किए जा रहे हैं। इनके प्रभाव से दोनों प्रकार की गतिविधियाँ भर प्रभावित हो पाती हैं। यह आवश्यक तो है, किंतु पर्याप्त नहीं है। गतिविधियाँ जिन आंतरिक प्रवृत्तियों के आधार पर चलती हैं, उन्हें सुधारने -संभालने के लिए तो साधनात्मक प्रयोग ही करने पड़ते हैं। वर्तमान समय में भी करने पड़ेंगे। जैसे पिछले कुछ वर्षों से श्रावण मास में सामूहिक चान्द्रायण तप साधना का क्रम चलाया गया है, उसी प्रकार इस वर्ष से सामूहिक रूप से 40 दिन में सवा लाख जप का अनुष्ठान करने की रूपरेखा तैयार की गई है। उसके कुछ बिंदु इस प्रकार हैं :उपयुक्त समय :- पूज्य गुरुदेव ने 24000 गायत्री मंत्र जप अनुष्ठान के लिए 9 दिन की अवधि निर्धारित की है। उसी प्रकार सवा लाख के जप अनुष्ठान के लिए 40 दिन का समय बतलाया है। यों आवश्यकता और परिस्थितियों के अनुसार व्यक्ति उक्त अनुष्ठान को कम या अधिक दिनों में भी संपन्न कर लेते हैं, किन्तु सहज क्रम में उन्हें निर्धारित अवधि में ही करना अधिक संगत माना जाता है। सवा लक्ष जप के इस सामूहिक अनुष्ठान प्रयोग के लिए भी 40 दिन की अवधि ही निश्चित की गई है। वसंत पंचमी (माघ शुक्ल पंचमी) से लेकर होली (फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा) तक पूरे 40 दिन का समय मिल जाता है। यह समय वसंत ऋतु के परिपक्व होने का समय भी होता है। प्रकृति का सहज प्रवाह इन दिनों वृक्ष- वनस्पतियों के जीवन रस को पुष्पित- फलित करने के लिए सक्रिय रहता है। ऐसे समय में साधकों की सदेच्छापूर्ण तपश्चर्या भी प्रकृति के सहयोग से अपेक्षाकृत सहजता से पुष्ट- प्रभावशाली बन सकती है। इसी अवधि में पुराने पत्ते झड़ते हैं, नई कोपलें फूटती हैं और प्रकृति में एक नई मनोरम सृजनशील उमंग उमड़ने लगती है। सामूहिक साधना प्रयोग के प्रभाव से जनमानस में भी अवाञ्छनीयता को निरस्त तथा सत्प्रवृत्तियों को विकसित करने की, उन्हें युगसृजन के लिए प्रयुक्त करने की ऐसी ही उमंग उठाई जा सकती हैं। इस वर्ष यह अनुष्ठान (वसंत पंचमी) दिनांक 30 जनवरी 2020 से (होली पूर्णिमा) दिनांक 10 मार्च 2020 तक चलाया जाना है। उद्देश्य :- इस सामूहिक अनुष्ठान को 9 वर्षीय मातृशक्ति श्रद्धांजलि नवसृजन महापुरश्चरण के अंतर्गत संपन्न किया जाएगा। अत: संकल्प में निम्नलिखित उद्देश्य को शामिल किया जाएगा। • युग परिवर्तन के चक्र को अधिक प्रभावी बनाना। • इस संक्रमण काल में युग शिल्पिओं को तप साधना द्वारा अधिक प्रामाणिक बनाना। • आसुरी- आतंकवादी शक्तियों को निरस्त करना। • नवसृजन की गतिविधियों को शक्ति एवं संरक्षण प्रदान करना। • सज्जनों की संगठन की प्रवृत्ति व क्षमता बढ़ाना। विविध क्रम :- प्रत्येक साधक को प्रतिदिन 33 माला गायत्री मंत्र जप उक्त संकल्पों की पूर्ति के भाव से करना चाहिए। जप के साथ अपने अभ्यास के अनुसार साकार या निराकार ध्यान किया जा सकता है। सूर्य मंडल से, इष्ट के प्रतीक से, हिमालय से दिव्य प्रकाश का प्रस्फुटन और विस्तार हो रहा है जो सारे विश्व में फैल कर उद्देश्यों की पूर्ति में समर्थ सहयोग करने में समर्थ है। तप- नियम सामान्य अनुष्ठान की तरह ही रहेंगे। जैसे ब्रह्मचर्य व्रत का पालन, हिंसा के उत्पादों का त्याग, अपने शरीर की सेवा स्वयं करना, एक समय आहार, नमक या शक्कर का त्याग करना। प्रतिदिन 2 घंटे मौन साधना करने जैसे नियम सहजता से निभाये जा सकते हैं। अर्थ संयम, इन्द्रिय संयम, समय संयम एवं विचार संयम का स्तर बढ़ाने का प्रयास करें। 40 दिन में कम से कम एक दिन मौन साधना करें। भाव शुद्धि :- अनुष्ठान काल में भावनाएँ शुद्ध रखें। सभी के हित की कामना करें, सभी को स्नेह, सद्भाव देने का अभ्यास बढ़ाएँ। हम विशेष साधना कर रहे हैं, ऐसा अहंकार न पनपने दें। यही भाव रखें कि गुरुकृपा से हमें इस कार्य में भागीदार बनने का अवसर मिला है। हम अपना पवित्र कर्त्तव्य पूरी तत्परता से निभा रहे हैं। उपयुक्त व्यक्तियों से सलाह लेने और उन्हें सम्मान देने का अभ्यास बढ़ाएँ। स्वाध्याय :- पूज्य गुरुदेव के जीवन साधनापरक साहित्य का नियमित स्वाध्याय करें। हम सब पढ़ चुके हैं, हमें बहुत कुछ आता है, इस विचार को निरस्त करते हुए हमें गुरुवर के विचारों की गहराई में पहुँचना है, उनके विशेष अनुग्रह पाने की पात्रता अर्जित करनी है, इस भाव से श्रद्धापूर्वक स्वाध्याय करें। गायत्री महाविज्ञान, हमारी वसीयत और विरासत, महाकाल की युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया, लोकसेवियों के लिए दिशा बोध, प्रज्ञा पुराण प्रथम खंड आदि को स्वाध्याय के लिए चुना जा सकता है। आराधना :- सेवा- साधना विराट प्रभु की आराधना के भाव से करें। प्रतिदिन जनसंपर्क एवं देवालय सेवा जैसे नियम पालें। जिनसे संपर्क करें उन्हें स्नेहपूर्वक सत्प्रवृत्तियों में भागीदारी के लिए प्रोत्साहित करें। कम से कम 5 व्यक्तियों से नित्य सम्पर्क का क्रम बनाएँ। देवालय सेवा के लिए शक्तिपीठ, प्रज्ञापीठ, प्रज्ञा केन्द्रों की स्वच्छता, शोभा संवर्धन के लिए कार्य करें। वे दूर हों तो किसी देवालय में यह सेवा दें। इसके लिए एक घंटा या अधिक समय निकालने का प्रयास करें। अंशदान :- सभी साधक एक कप चाय का मूल्य "5/- प्रतिदिन बचाएं। उसे पूणार्हुति के निमित्त ही खर्च करें। विश्व स्तर पर भागीदारी प्रयास यह है कि भारत के साथ विदेशों में रह रहे नैष्ठिक साधकों की भागीदारी इस अनुष्ठान में हो। कम से कम 24000 साधक इसमें शामिल हों। जोन, उप जोन, जिला संगठन तथा मंडलों के सदस्य अभी से उसके लिए साधकों को पंजीकृत करें। उसके लिए शान्तिकुञ्ज से आॅनलाइन पंजीयन की व्यवस्था बना दी गई है। सक्रिय जिले इस हेतु अपने जिले में कम से कम 240 तथा अन्य जिले अपनी सामर्थ्य के अनुसार 108, 51, 24 साधकों के पंजीयन के लिए प्रयत्न करें। सभी भागीदार प्रयास करें कि 40 दिन की अवधि में अपने घर या किसी सार्वजनिक स्थान पर प्रात: से सायं 6:00 बजे तक सामूहिक जप साधना कराएँ। इसमें पुरानों के साथ नए साधकों को भी भागीदार बनाने का प्रयास करें। जप का समापन छोटे- से दीपयज्ञ से हो। उसमें इन सामूहिक अनुष्ठान के उद्देश्य और उसकी उपयोगिता की जानकारी उपस्थित जनसमुदाय को दी जाए। इस प्रकार 40 दिन में 24000 ऐसे सामूहिक अखंड जप एवं दीपयज्ञ के कार्यक्रम भी संपन्न हो जाएंगे। पूर्णाहुति :- इस अनुष्ठान की पूणार्हुति एक साथ फाल्गुन पूर्णिमा के दिन प्रात: 9:00 से 11:00 के बीच की जानी है। साधकगण शक्तिपीठों, प्रज्ञापीठों या किन्हीं सार्वजनिक स्थानों पर इसकी व्यवस्था बना सकते हैं। कुण्डों की संख्या साधकों की संख्या के अनुसार निश्चित की जा सकती है। कम से कम 108 आहुतियों का हवन अवश्य किया जाए। प्रदर्शन के लिए निरर्थक अपव्यय न किया जाए, किंतु यज्ञ के लिए आवश्यक व्यवस्थाएँ प्रामाणिक ढंग से बनाई जाएँ। पूणार्हुति के बाद सामूहिक भोजन व्यवस्था भी अमृताशन जैसे सात्विक भोज्य पदार्थों से की जा सकती है। उसके साथ कुछ कन्याओं को भोजन कराने तथा ब्रह्मभोज साहित्य वितरित करने की व्यवस्था भी होनी चाहिए। अनुयाज के रूप में वृक्षारोपण, जल संरक्षण जैसे रचनात्मक कार्यों के लक्ष्य निर्धारित किए जा सकते हैं। विश्वास किया जाता है कि साधकों का यह 40 दिवसीय संयुक्त पुरुषार्थ नवसृजन के मार्ग के व्यवधानों को दूर करने और उसकी सहयोगी प्रवृत्तियों को बल देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकेगा।

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विश्व स्तरीय चालीस दिवसीय साधना अनुष्ठान ( वसंत पर्व से फाल्गुन पूर्णिमा 2020 तक ) तदनुसार 30 जनवरी से 10 मार्च 2020 तक

चालीस दिवसीय साधना अनुष्ठान की यह साधना साधकों को अपने घर पर रह कर ही संपन्न करनी है । इस के लिए शांतिकुंज  नहीं आना होगा । पंजीयन करने का उद्देश्य सभी साधकों की सूचना एकत्र करना एवं शांतिकुंज स्तर पर दोष परिमार्जन एवं संरक्षण एवं मार्गदर्शन की व्यवस्था करना है ।वसंत पर्व 2020 से फाल्गुन पूर्णिमा 2020 तक -  तदनुसार 30 जनवरी  2020 से 10 मार्च 2020 तकप्रखर साधना किस लिये ?? युग परिवर्तन के चक्र को तीव्र करने हेतु  संक्रमण काल में युगशिल्पियों को तपाने हेतु  आतंकवादी / आसुरी शक्तियों के निरस्तीकरण हेतु  वंदनीया माता जी को श्रद्धांजलि हेतु नव सृजन की गतिविधियों को शक्ति एवं संरक्षण प्रदान करने हेतु    आत्मीय परिजन, सन् 2026 में परम वंदनीया माताजी के जन्म, अखण्ड दीप प्रज्ज्वलन एवं श्री अरविन्द महर्षि के अति मानस अवतरण की शताब्दी मनाई जानी है। प्रखर साधना के अभाव में समस्त सामाजिक, सांस्कृतिक आंदोलन धराशायी हो गये। युग निर्माण आन्दोलन इसलिये प्रखर है क्योंकि इसमें ऋषियुग्म का तप एवं युग साधकों की प्रखर साधना है। इस विषम बेला में और अधिक प्रखरता की अपेक्षा की जा रही है। इस हेतु शांतिकुंज ने  2026 तक वार्षिक चालीस दिवसीय अनुष्ठान की योजना बनाई है। क्या करें ??  * चूँकि विश्व स्तर पर 24000 साधकों द्वारा साधना की जायेगी, इस हेतु जोन/ उप जोन / जिला समितियों को अपनी जवाबदारी सुनिश्चित करनी है। *  सक्रिय 108 जिलों में 240 साधक प्रति जिले के हिसाब से एवं अन्य जिले में 108 या 51 साधक तैयार/सहमत/संकल्पित करें। * तपोनिष्ठ पूज्यवर ने 24 लाख के 24 महापुरश्चरण किये थे तो हम छोटा- सा सवा लाख मंत्रों का चालीस दिवसीय अनुष्ठान तो करें ही। *  पूज्यवर ने 24 वर्षों तक जौ की रोटी और छाछ पर तप किया, हम यथा संभव 40 दिनों तक नमक और (या) शक्कर का त्याग करें। *  पूज्यवर ने जीवनकाल में 3200 के आसपास पुस्तकें लिखीं, हम चालीस दिनों में दो- तीन पुस्तकों का स्वाध्याय तो कर ही लें ।।  * उन्होंने करोड़ों व्यक्तियों/साधकों का निर्माण किया, हम अपने जैसे / अपने से बेहतर 24 व्यक्तियों को साधक / कार्यकर्ता बना दें तभी हम उनके पुत्र कहलायेंगे, इससे कम में बात नहीं बनेगी। *  शान्तिकुन्ज में पाँच दिवसीय मौन (अंत:ऊर्जा) शिविर चलते हैं, अपने जिले में चालीस दिनों में एक दिन, एक दिवसीय मौन शिविर इस दौरान संचालित करें।  * पूर्णाहुति, समस्त शक्तिपीठों पर एक साथ एक समय पर संपन्न हो। कैसे करें ?- अनुशासन, अणुव्रत :- 1.  उपासना :: न्यूनतम 33 मालाओं का चालीस दिनों तक जप प्रतिदिन करना है, भले ही दो या तीन चरणों में हो। जप के साथ हिमालय के सर्वोच्च शिखर पर उदीयमान भगवान सविता का ध्यान। जप से पूर्व अनुलाम- विलाम अथवा प्राणसंचार प्राणायाम करें। जप गिनती के लिये नही, अपितु उसकी गहराई को बढ़ाते हुये, भावविह्वल होकर करें। अपनी ही माला से जप करें। 2. साधना :: चालीस दिनों में ब्रह्मचर्य का पालन, हो सके तो एक समय उपवास, सात्विक, अस्वाद व्रत, न्यूनतम दो घंटे मौन, अपनी सेवा अपने हाथों से, मेरा अनुष्ठान है इस बात का सार्वजनिक प्रचार न करना, अर्थ संयम, विचार संयम के साथ समय संयम का पालन का प्रयास करना। भाव शुद्धि, चित्त शुद्धि का अधिकाधिक प्रयास। साधना का अहंकार न पालें, पूज्यवर करा रहे हैं, यही भाव प्रकट हो। मोह से पिंड छुड़ाने हेतु कभी कभी शक्तिपीठ पर विश्राम करें। लोभ निवारण हेतु अपनी प्रिय वस्तुयें बांटने का प्रयत्न करें। चालीस दिनों तक निंदा से बचना, परिजनों की प्रशंसा को लक्ष्य बनावें, गुण ग्राहक बनें। स्वास्थ्य के अनुकूल हो तो, गोझरण/गौमूत्र/तुलसी जल का सेवन करें इससे ध्यान सहज लगेगा। 3. स्वाध्याय :: स्वाध्याय से श्रद्धा संवर्धन होता है। अत: गायत्री महाविज्ञान, हमारी वसीयत विरासत, महाकाल की प्रत्यावर्तन प्रक्रिया, लोकसेवियों हेतु दिशा बोध इन पुस्तकों का अनिवार्य स्वाध्याय हो। हमको सब मालूम है इस अकड़ में न रहें, पुस्तकों का श्रद्धापूर्वक पाठ करें। 4. आराधना :: समयदान, जन संपर्क एवं देवालय सेवा का लक्ष्य रखें। परिणाम की चिंता किये बगैर 40 दिनों में न्यूनतम 10 लोगों तक साहित्य पहुँचा कर उनका हालचाल पूछें एवं अच्छे श्रोता की तरह सुनें, यथोचित समाधान दें। साप्ताहिक रूप से शक्तिपीठ / प्रज्ञापीठ / केन्द्र की स्वच्छता करना। स्नानगृह, शौचालय अनिवार्य रूप से स्वच्छ रखना। प्रज्ञा संस्थान दूर हो तो ग्राम के ही देवालय की स्वच्छता करना। समय बचाने हेतु वाटस्एप एवं अन्य सोशल मीडिया का विवेकयुक्त उपयोग करना। 5. अखण्ड जप/दीपयज्ञ :: इन चालीस दिनों में प्रत्येक साधक अपने निवास पर एक दिन का अखण्ड- जप रखे जिसका समापन दीपयज्ञ से होगा। इस तरह 24000 अखण्ड जप एवं इतने ही दीपयज्ञ भी संपन्न होंगे। 6. अंशदान :: चाय का खर्चा बचा कर 5 रु प्रतिदिन जमा कर रू 200.00 पूर्णाहुति में लगायें। यह क्रम वर्ष भर एवं निरंतर चलने दें। इसका उपयोग विद्या विस्तार में करें। 7. विशेष :: साधना के दौरान सूतक, अशौच इत्यादि की बाधा आवे तो उतने दिन आगे बढ़ा देवें परंतु इसे बहाना न बनावें। ये समस्त अनुशासन घर के लिये हैं, यात्रा, कार्यक्रम, बीमारी आदि में आपद्धर्म का पालन करें। अपनी ही माला से जप करें, हो सके तो अपना ही आसन लें। गोमुखी का प्रयोग अर्थात् माला को ढंक कर जप करें। स्वच्छ वस्त्रों में, संभव हो तो पीले में ही जप करें। अनुष्ठान के पूर्व यज्ञोपवीत को बदल लें। साप्ताहिक रूप से घर पर, संभव हो तो शक्तिपीठ पर यज्ञ में भाग लेवें। 8. चिन्तन :: साधना में हैं तो सारे काम बंद, ऐसा न करें। गुरु कार्य हेतु ही साधना कर रहे हैं, अत: गुरु कार्य ही जीवन साधना है इसका ध्यान रहे। हर सुबह नया जीवन- हर रात नई मौत का चिंतन, आत्म बोध, तत्व बोध की साधना हो। अन्य विषयों पर बेकार की चर्चा में भाग न लें, विनम्रतापूर्वक वहाँ से हट जायें। 9. मौन साधना :: चालीस दिनों में एक बार, एक दिन के मौन शिविर में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें। 10. वृक्ष गंगा अभियान :: 24000 साधक, तरुपुत्र / तरुमित्र योजना में भाग लेकर वृक्ष देव की स्थापना का संकल्प करें। वृक्ष को पितृवत्, मित्रवत् पालने, रक्षा करने एवं संवर्धन करने हेतु तत्पर हों। 11. पूर्णाहुति :: समस्त शक्तिपीठों में एक साथ एक समय पर संपन्न होगी। न्यूनतम 108 आहुतियाँ देनी ही हैं। साधकों के यज्ञ में कृपणता न हो। लोक जागरण के यज्ञ सादगी, मितव्ययिता के साथ संपन्न करावें किंतु इस पूर्णाहुति को भाव श्रद्धा से युक्त होकर करें। समस्त साधक अपने घर पर तैयार किये गये मिष्ठान्न का गायत्री माता को भोग लगायें। पूर्णाहुति पर कार्यकर्ता सम्मेलन में अनुयाज के संकल्प किये जायें। 12. ब्रह्मभोज :: अनुष्ठान के समापन पर ब्रह्मभोज हेतु सत्साहित्य का वितरण करें। 13. अनुयाज :: 24000 साधक 10 याजकों को प्रशिक्षित कर न्यूनतम दस घरों में 7 मई 2020, गुरुवार  ( वैशाख पूर्णिमा- बुद्ध पूर्णिमा ) को गृहे- गृहे यज्ञ अभियान में यज्ञ करावें तो व्यक्ति निर्माण के साथ वातावरण परिशोधन का क्रम एक साथ चल पड़ेगा एवं कार्यकर्ताओं का सुनियोजन भी होगा। 14. उपरोक्त अनुशासनों के पालन में अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान रखें, अधिक कठोर अभ्यास से स्वास्थ्य संबंधी कष्ट हो सकता है अत: तदनुसार कार्य करें।‘तुम्हारी शपथ हम, निरंतर तुम्हारे, चरण चिन्ह की राह चलते रहेंगे॥’ आईये, प्रखर साधना अभियान हेतु आपको भाव- भरा आमंत्रण ॥पंजीयन  : www.awgp.org , www.diya.net.in