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भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा का रजत जयंती वर्ष

नई पीढ़ी को संस्कृतिनिष्ठ-व्यसनमुक्त बनाने हेतु ठोस प्रयास होंसोद्देश्य प्रारंभ और प्रगतिभारतीय संस्कृति को दुनियाँ भर के श्रेष्ठ विचारकों ने अति पुरातन और महान माना है। ऋषियों की दृष्टि हमेशा से विश्व बंधुत्व की रही है। इसी लिए इस संस्कृति में वे सारे तत्त्व शामिल किए गए हैं, जो मनुष्य मात्र को सह अस्तित्व के साथ प्रगतिशीलता की प्रेरणा दें और क्रमश: आदर्श जीवन लक्ष्य तक पहुँचा सकें। वर्तमान समय में जब विज्ञान और तकनीकी प्रगति ने वैश्विक सम्पर्क और सहयोग के अनेक रास्ते खोल दिए हैं, तब सांस्कृतिक सौमनस्य की स्थापना भी बहुत आवश्यक हो गई है। वाञ्छित सांस्कृतिक सौमनस्य की स्थापना में भारतीय संस्कृति अति महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। राष्ट्रीय गौरव की अनुभूति और राष्ट्रीय वर्चस्व की स्थापना के लिए भी यह आवश्यक हो गया है कि नई पीढ़ी अपने सांस्कृतिक वैभव का महत्त्व समझे और जीवन को संस्कृतिनिष्ठ बनाये। इस तथ्य पर छात्रों और शिक्षातंत्र से जुड़े व्यक्तियों का ध्यान आकर्षित करने और उस दिशा में प्रेरक पहल करने के उद्देश्य से भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा का शुभारंभ किया गया था। यह प्रसन्नता और संतोष का विषय है कि लोगों ने इसका महत्त्व समझा और भरपूर सहयोग देकर इसे बुलन्दियों तक पहुँचाया। इसी वजह से इस परीक्षा ने तमाम नए कीर्तिमान भी स्थापित किए। इस नाते इसमें सहयोग देने, समय, साधन, प्रतिभा एवं श्रम आदि लगाने वाले सभी भावनाशील और विचारशील भाई-बहिन साधुवाद के पात्र हैं। अब अगले चरण बढ़ेंइस अभियान ने सफलतापूर्वक २५ वर्ष पूरे कर लिए हैं। बड़ी संख्या में विद्यालयों के व्यवस्था मण्डल व शिक्षकों, छात्रों और उनके अभिभावकों के साथ अच्छे सम्बन्ध बन गए हैं। अस्तु अब नई पीढ़ी को संस्कृतिनिष्ठ, संतुलित, प्रगतिशील जीवन शैली अपनाने की दिशा में प्रेरित करने के अगले चरण बढ़ा ही दिए जाने चाहिए। जिन विद्यालयों में यह परीक्षा आयोजित होने लगी है, उनमें छात्र-छात्राओं एवं अध्यापक-अध्यापिकाओं के सुसंयोग से संस्कृति मण्डलों की स्थापना के प्रयास तीव्रतर किए जायें। मण्डल सदस्यों को स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन एवं सभ्य समाज निर्माण के सूत्रों को समझाने और अपनाने-अभ्यास में लाने के लिए प्रेरित-प्रोत्साहित किया ही जाय। अन्य विद्यालयों में इसके लिए व्याख्यानमालाएँ-कार्यशालाएँ भी चलायी जायें। एक सुसंयोग यह भी बन पड़ा है कि केन्द्रीय और प्रान्तीय सरकारों ने सभी शिक्षण संस्थाओं में नैतिक शिक्षा की कक्षाएँ चलाने का नियम बना दिया है। इसके लिए शिक्षा विभाग को लोकसेवी, स्वैच्छिक संगठनों का सहयोग लेने की छूट भी दी है। इसका लाभ उठाते हुए प्राणवान परिजन प्रबुद्ध वक्ताओं और अनुभवी लोकसेवियों के सहयोग से इस दिशा में प्रभावशाली एवं ठोस प्रयास कर सकते हैं। नयी पीढ़ी को श्रेष्ठ राष्ट्र निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान देने की प्रेरणा दे सकते हैं। उन्हें जीवन साधना, सत्साहित्य का स्वाध्याय, संयमशीलता (इंद्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम और विचार संयम) का अभ्यास करने तथा इस प्रकार विकसित हुई ऊर्जा और कुशलता को राष्ट्रसेवा में, लोक आराधना में लगाने के लिए प्रशिक्षित-प्रोत्साहित कर सकते हैं। उक्त योजना के अन्तर्गत विद्यालयों में कक्षाएँ कोई भी ऐसे परिजन ले सकते हैं, जो थोड़ा-बहुत भी भाषण दे लेते हैं। मिशन से प्रकाशित नैतिक शिक्षा भाग-एक और दो के आधार पर भाषण के विषय तैयार किए जा सकते हैं। उनमें हर विषय के साथ उनके साथ जोड़े जा सकने वाले दृष्टांत और पूछे जा सकने वाले प्रश्न भी दिए गए हैं। उनके माध्यम से प्रसंगों को अधिक रोचक और प्रभावशाली बनाया जा सकता है। केन्द्र की पहलइस दिशा में शांतिकुंज ने युवा क्रान्ति वर्ष की तरह चार रथों को शिक्षण संस्थानों एवं प्रभावशाली संगठनों के माध्यम से नई पीढ़ी से सम्पर्क साधने, उन्हें संस्कृतिनिष्ठ-व्यसनमुक्त बनने की प्रेरणा-कार्ययोजना देने के लिए शृंखलाबद्ध कार्यक्रम देकर भेजा है। इन रथों को २८ सितम्बर को सजल श्रद्धा-प्रखर प्रज्ञा के समीप समारोहपूर्वक विदा किया गया। (समाचार इसी अंक में पृष्ठ ३ पर हैं।) रथों की इस यात्रा को च्व्यसनमुक्त भारत यात्राज् नाम दिया गया है। यह रथ छएऊ स्क्रीन एवं प्रोजेक्टर, जैनरेटर सहित विविध प्रचार सामग्री से लैस हैं। इनमें भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा, नशामुक्ति एवं शान्तिकुंज के परिचय सम्बन्धी फिल्म प्रदर्शन भी किए जा सकेंगे। इनके साथ आवश्यक साहित्य एवं संकल्प पत्रादि भी हैं। वे स्थानीय परिजनों के सहयोग से हर जगह उपयुक्त स्थलों को केन्द्र बनाकर कार्य करेंगे। जैसे :- • भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा से जुड़े विद्यालय-महाविद्यालय • गायत्री शक्तिपीठ-प्रज्ञापीठ • शहरों और कस्बों के प्रमुख स्थल • स्थानीय प्रभावपूर्ण संगठन आदि। सम्बद्ध प्रान्त : यह चार रथ २ अक्टृूबर-गाँधी जयंती से लेकर ३१ जनवरी तक क्षेत्रों में सक्रिय रहेंगे। प्रत्येक रथ इस अवधि में ७०-७५ जिलों में सम्पर्क यात्रा क्नरेगा वे क्रमश: (१) उत्तर प्रदेश, (२) हरियाणा, हिमाचल प्रदेश तथा दिल्ली (३) महाराष्ट्र, ओडिशा तथा (४) बिहार एवं झारखंड के जिलों में कार्य करेंगे। इस प्रकार यह रथ ३०० से अधिक जिलों में निर्धारित लगभग ६०० कार्यक्रम करेंगे। तीन प्रान्तों-मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ एवं राजस्थान में इसी बीच प्रान्तीय चुनाव होने हैं, इसलिए उन्हें अगले चरण के लिए छोड़ दिया गया है। गुजरात प्रान्त के परिजन इन्हीं दिनों वहाँ हुए अश्वमेधों के रजत जयंती कार्यक्रमों में व्यस्त रहेंगे, इसलिए उसे भी अगले चरण में शामिल किया जायेगा। पूर्व एवं पूर्वोत्तर के तथा दक्षिण के प्रान्तों में भाषा की समस्या होने से वहाँ भिन्न ढंग से इस अभियान को गति देने की योजना बन रही है। विश्वास है कि इस रथयात्रा से भी युवा क्रान्ति वर्ष की रथयात्रा की तरह ही शानदार परिणाम निकलेंगे। अन्य प्रयासकई प्रान्तों में उसी क्षेत्र के प्राणवान परिजनों ने अच्छे वक्ताओं की एक टीम बनायी है। वे प्रवचनों, पावर पॉइण्ट प्रेज़ेण्टेशनों, कार्यशालाओं आदि के माध्यम से विभिन्न शिक्षण संस्थानों और विभिन्न संगठनों के माध्यम से भी नई पीढ़ी को श्रेष्ठ राष्ट्र के श्रेष्ठ नागरिक बनने के लिए प्रेरित करने का क्रम चलाते रहेंगे। प्रभावित युवाओं-युवतियों को छोटे-छोटे प्रशिक्षण शिविरों के माध्यम से अग्रदूतों की भूमिका निभाने के लिए तैयार किया जायेगा। कन्या कौशल शिविरों और युवा जागरण शिविरों के माध्यम से तो इस दिशा में सार्थक प्रयास हो ही रहे हैं। अगले दिनों इन्हें और अधिक व्यापक और प्रभावी बनाने के प्रयास चल पड़े हैं।

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नवरात्र पर्व पर, नव दुर्गा शक्ति की नौ धाराओं का मर्म समझें, उन्हें साधें

साधना अनुष्ठान की लकीर भर न पीटें, शक्ति साधना के उच्चतर सोपान चढ़ेंपरंपरागत क्रमशारदीय नवरात्र पर्व इस वर्ष कैलेंडर के अनुसार दिनांक १० अक्टूबर से १८ अक्टूबर तक चलेगा। युग निर्माण परिवार से जुड़े अधिकांश परिजन इन दिनों गायत्री जप-तप सहित विशेष साधना-अनुष्ठान करते हैं। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी व्यक्तिगत एवं सामूहिक साधना अनुष्ठानों का क्रम चलाया जाना है। नए साधकों को भी प्रेरणा-प्रोत्साहन देकर यथाशक्ति कुछ न कुछ मंत्र जप, मंत्र लेखन, चालीसा पाठ के साथ इंद्रिय संयम के व्रत निभाने के लिए तैयार किया जाए। जहाँ-जहाँ संभव हो, शक्तिपीठों, प्रज्ञापीठों, प्रज्ञा केन्द्रों, प्रज्ञा मंडलों के स्तर पर जप-सत्संग के सामूहिक क्रम भी चलाए जाएँ।पुराने साधक नए साधकों को सुगम साधना अनुष्ठानों के लिए प्रेरित-प्रशिक्षित करने तथा उनका उत्साह बढ़ाते हुए उपयुक्त मार्गदर्शन देते रहने के क्रम को भी अपनी साधना का एक अंग मानें। साथ ही अनुष्ठानों का परंपरागत कर्मकांड भर पूरा करने की मानसिकता से ऊपर उठकर, शक्ति साधना के अपने स्तर को बढ़ाने, श्रेष्ठतर बनाने के लिए कमर कसें। आत्म कल्याण एवं लोक कल्याण के अगले चरण सफलतापूर्वक बढ़ाते रहने के लिए ऐसा करना जरूरी है। युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव भी जीवन भर इसी तथ्य की ओर परिजनों का ध्यान आकर्षित करते तथा उसके लिए समर्थ मार्गदर्शन-सहयोग करते रहे हैं।युगऋषि ने अपने प्रवचन 'साधना में प्राण आ जाए तो कमाल हो जाए' में स्पष्ट किया है कि साधना के क्रम में क्रिया (कर्मकांड), चिंतन (विचारणा) और श्रद्धा (भावना) जब एक ही दिशाधारा में सक्रिय हो उठते हैं, तो कमाल हो जाता है, सीमित कर्मकांड वाली साधना भी चमत्कारी परिणाम लाने लगती है। वे कर्मकांड को साधना की दृश्य-सूक्ष्म काया भर कहते थे। उसका एवं उसके लिए अपनाए गए प्रतीकों का अपना महत्व होता है। लेकिन स्थूल काया के साथ उसके सूक्ष्म शरीर (श्रेष्ठ विचारणा) और कारण शरीर (उत्कृष्ट भावना) का होना जरूरी है। वे इस तथ्य को स्पष्ट करने के लिए एकलव्य, मीरा, ठाकुर रामकृष्ण परमहंस के उदाहरण देते रहे हैं। उनके द्वारा अपनाए गए प्रतीक सामान्य थे, पूजा-कर्मकांड भी कुछ विशेष नहीं था, किन्तु उनके पीछे सक्रिय श्रेष्ठ विचारणा-उत्कृष्ट भावना ने उन्हें चमत्कारी बना दिया। नवरात्र साधना के साथ जुड़े प्रेरक प्रतीक को एवं कर्मकांडों को भी इसी विधा द्वारा चमत्कारी बनाया जा सकता है।शक्ति साधना के सुपरिणामसामान्य रूप से प्रचलित दोनों नवरात्रों के साथ शक्ति साधना के सत्परिणाम वाले त्यौहार जुड़े हैं। चैत्र नवरात्र के समापन पर ही श्रीराम नवमी पड़ती है। ऋषियों की तप साधना-शक्ति साधना के माध्यम से ही रामावतार का सुसंयोग बन पड़ा था। शारदीय नवरात्र समापन के अगले ही दिन विजयादशमी पड़ती है। भगवान श्रीराम की शक्ति साधना के नाते ही अत्याचारी रावण का वध संभव हुआ था। उसी नाते रामराज्य की स्थापना संभव हुई, जिसका प्रतीक पर्व दिवाली उसी शृंखला में मनाया जाता है।भगवती दुर्गा का प्राकट्य भी देवताओं की संयुक्त शक्ति से हुआ था। देवों द्वारा अपनी विशेषताओं के एकीकरण की साधना ही उनके प्राकट्य का कारण बनी। शिव और शक्ति के समन्वय से ही जीवन की पूर्णता हस्तगत होती है। महादेव शिव का अर्धनारीनटेश्वर स्वरूप इसी तथ्य का उद्घोषक है। शिव एवं सती के प्रसंग में यही तथ्य उभरकर आता है कि शक्ति यदि स्वयं को शिव से भिन्न मान लेती है तो अकल्याण का कारण बनती है। शिव शक्ति के बिना उद्विग्न या समाधिस्थ-निष्क्रिय हो जाते हैं। शिव का शिवत्व शक्ति के नाते ही स्थापित होता है और शक्ति की सार्थकता भी शिवत्व के वरण से, कल्याणकारी उद्देश्य के लिए समर्पित रहने से ही सधती है।नवरात्र साधना में नवदुर्गाओं के जो नाम और स्वरूप प्रचलित हैं वह व्यक्ति और समाज के लिए कल्याणकारी शक्ति साधना के प्रतिमान माने जा सकते हैं। नवरात्र साधना करने वाले प्रौढ़ साधकगण उनके मर्म को समझकर तदनुसार अपने लिए साधना के सोपान निश्चित कर सकें तो आत्मकल्याण और जनहित के श्रेष्ठत्तर लक्ष्यों को पाने का क्रम चलता रह सकता है। इस आलेख की आगे की पंक्तियों में उन्हीं को स्पष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है। नौ शक्ति धाराएँनवदुर्गा के रूप में माँ दुर्गा के नौ रूपों का वर्णन है, जिन्हें शक्ति साधना के क्रम में नौ शक्ति धाराओं अथवा पूर्णता के नौ सोपानों के रूप में समझा और साधा जा सकता है। वे हैं क्रमश: -१. शैलपुत्री, २. ब्रह्मचारिणी, ३. चंद्रघंटा, ४. कूष्मांडा, ५. स्कंदमाता, ६. कात्यायनी ७. कालरात्रि, ८. महागौरी, ९. सिद्धिदात्री। इन धाराओं को जीवन साधना का अंग बनाने के लिए दुर्गा सप्तशती के ही संकेतों के आधार पर यहाँ चिंतन मंथन किया जाता है। मां दुर्गा की स्तुति में लिखा है-"विद्या समस्तास्तवदेवी भेद: स्त्रिया: समस्ता सकला जगत्सु।"अर्थात हे देवी! विश्व की सारी विद्याएँ तथा समस्त स्त्रियाँ आपका ही रूप हैं। नारी को शक्तिस्वरूपा कहा गया है, अस्तु नारी की जीवन यात्रा स्वाभाविक रूप से उक्त प्रतीकात्मक शक्ति धाराओं के अनुरूप होनी चाहिए। इसी आधार पर वे परिवार और समाज में शिवत्व को, कल्याणकारी व्यवस्थाओं को लागू कर सकती हैं।विद्याएँ विकसित होती है बुद्धि के विवेकपूर्ण चयन-वरण और तदनुसार अभ्यास- तप साधना से। अस्तु बुद्धि को शिवोन्मुख, कल्याणकारी संकल्प से युक्त होना चाहिए। भगवान आदि शंकराचार्य ने शिव की वंदना में कहा है च्आत्मा त्वं गिरिजामति:ज् अर्थात् मनुष्य के अंदर शिव रूप में आत्मा और उसकी अर्धांगिनी शक्ति स्वरूपा पार्वती (गिरिजा) के रूप में बुद्धि (मति) विराजमान है। अर्थात् बुद्धि को शिव (अर्थात् कल्याणकारी) आत्मानुशासन के अनुरूप ही विकसित एवं सक्रिय होना चाहिए। नौ दुर्गा की प्रतीक शक्तियों के अनुसार नारी और सत्प्रवृतियों का विकास किया जाना चाहिए। इन्हीं दो प्रतिमानों के अनुसार नौ शक्ति धाराओं की समीक्षात्मक विवेचना क्रमश: की जा रही है।१ शैलपुत्री :- यह पहला स्वरूप है। इसका रहस्य समझने के लिए शिव-सती प्रसंग पर ध्यान देना होगा। च्सतीज् दक्ष की पुत्री है। दक्ष अर्थात् अपने कार्य में निपुण व्यक्ति। बहुधा निपुणों को अपनी विशेषज्ञता का अहंकार हो जाता है। उस स्थिति में वे जनकल्याण के शिव तत्व की उपेक्षा करके भी अपने आप को प्रतिष्ठित करना चाहते है। प्रजापति बनने पर दक्ष ने यही किया। शिव की अवमानना करने लगे।सती शिव की अर्धांगिनी है, किंतु वे स्वयं को दक्ष की- निपुण एवं अधिकार प्राप्त व्यक्ति की बेटी मानती हैं। इसी आंतरिक मान्यता के कारण वे शिव की अर्धांगिनी-पूरक होने का तथ्य भूलने लगती हैं। शिव के बार-बार सावधान करने पर भी मानती नहीं। यही मान्यता उनके दु:ख और पतन का कारण बन जाती है। शिव से विमुख होने के प्रायश्चित्त स्वरूप वे शरीर छोड़ देती हैं। अपनी भूल समझती हैं और फिर हिमाचल की पुत्री के रूप में आती हैं। हिम शांति और पर्वत स्थिरता का प्रतीक होता है। बुद्धि यदि चतुर व्यक्ति की है तो वह कुचक्रों में फँस जाती है। यदि शांत एवं दृढ़ आस्थावान की है, तो वह शिव-आत्मा के कल्याणकारी अनुशासन को ही इष्ट-लक्ष्य मानती है।हर नारी को पहले बाल्यकाल में शैलपुत्री अर्थात् शिवत्व के प्रति समर्पित भाव से विकसित होना चाहिए। बुद्धि को भी अपनी कुशलता दिखाने की अपेक्षा केवल कल्याणकारी उद्देश्यों के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए। इस मूल आस्था को दृढ़ किया जाए तो नर-नारी सभी की शक्ति शिवोन्मुख कल्याणकारी हो जाएगी। शैलपुत्री की साधना से ऐसी ही दृढ़ आस्था विकसित होनी चाहिए।२. ब्रह्मचारिणी :- पार्वती को शिव का वरण करना था तो ब्रह्मचर्य व्रत पूर्वक तप साधना करनी आवश्यक थी। इससे कम में शिव की प्राप्ति संभव नहीं। अस्तु नारी को अपनी प्रवृत्तियों को कल्याणकारी बनाने के लिए तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम का अभ्यास करना चाहिए। बुद्धि को 'ब्रह्मचर्य' ब्रह्म के अनुरूप आचरण, ब्रह्म को ही धारण करने के लिए संस्कारित होना चाहिए। इसी से बुद्धि में वह सात्विक-शक्ति जाग्रत् होती है, जिसका वरण शिव प्रसन्नता से करते हैं।३. चंद्रघंटा :- शिव का वरण करते ही शक्ति में शिवत्व झलकने लगता है। माता चंद्रघंटा के माथे पर शिवजी के प्रगतिशील विचारों का प्रतीक घंटे की आकृति वाला बालचंद्र होता है। इनके घंटे की ध्वनि भक्तों को शांति प्रदान करने वाली और दुष्टों को भयभीत करने वाली होती है। विवाहित होते ही हर नारी को इसी भूमिका में आना चाहिए। हर साधक के अंतकरण से ऐसे ही स्वर उभरने चाहिए। इनके साधक के अंदर वीरता और आत्मनिर्भरता के साथ ही सौम्यता और विनम्रता-शालीनता का विकास होना ही चाहिए।४. कूष्मांडा :- यह माँ का चौथा रूप है। यह शिव के संकल्प के अनुसार नई सृष्टि करने में समर्थ होती हैं। विवाह के बाद हर नारी को शिवत्वयुक्त नई पीढ़ी गढ़ने की भूमिका निभानी चाहिए। माँ कूष्मांडा की साधना से यह सत्सामर्थ्य प्रकट होती है। पुरुष की प्रगति एवं प्रवृत्तियों को भी शुभ सृजनशील बनाने में इस शक्ति धारा का समर्थ योगदान होता है।५. स्कंदमाता :- यह भगवती का पाँचवा स्वरुप है। ये स्कंद-स्वामी कार्तिकेय की माता है। स्वामी कार्तिकेय दानवी प्रवृतियों का दलन करने वाले, देव शक्तियों के सेनापति हैं। माँ ने उन्हें इस योग्य विकसित किया, इसीलिए वह स्कंदमाता कहलार्इं। हर नारी में अपनी संतान को समय के अनुरूप आसुरी शक्तियों को परास्त करने तथा देव शक्तियों को सुदृढ़ बनाने योग्य संस्कार देने वाली होना चाहिए। मनुष्य में इस प्रकार का सत्साहस और शौर्य प्रकट करने में मां की शक्ति धारा का सुनिश्चित आशीर्वाद पाया जा सकता है।६. कात्यायनी :- इस रूप में मां भगवती ने महिषासुर का वध किया था। महिषासुर मनुष्य होते हुए भी अपनी पशु प्रवृतियों से आतंक मचाता था। ऐसे नर पशुओं का संहार करने वाली मां की आराधना सभी के लिए आवश्यक है। हर नारी, हर माता को नर-पशुओं का दलन करने की क्षमता से युक्त होना चाहिए। हर व्यक्ति के अंदर यह शक्ति जागे तो समाज को सहज ही नर-पशुओं, नर-पिशाचों के उत्पात से मुक्त करके कल्याणकारी दिशा में आगे बढ़ाया जा सकता है।७. माँ कालरात्रि :- यह माँ का महाकाली रूप है। माँ शुभ वर्णा, गौरी हैं। किंतु रक्तबीज जैसे असुरों का उत्पादन रोकने तथा विनाश करने के लिए काली-भयंकर रूप वाली बन जाती हैं। मनुष्य का लौकिक अहंकार रक्तबीज की तरह होता है। मारे जाने पर भी उसके छोटे से अंश से पुन: वही रूप बन जाता है। माता उसे नष्ट करने के लिए रुद्ररूप बना लेती है, किंतु उसके पीछे भी उनका भाव समाज का हित साधन ही होता है। इसीलिए उन्हें शुभंकरी (शुभ करने वाली) भी कहा जाता है। प्रत्येक साधक नर-नारी को माँ की कृपा से अपने अंदर शुभंकरी उग्र शक्ति का विकास करने की साधना करनी चाहिए।८. महागौरी :- अशिव तत्त्वों, अशिव प्रवृत्तियों को नष्ट करने के बाद शक्ति पुन: अपने सौम्य 'गौरी' शिवप्रिया के रूप में आ जाती है। वे गौर वर्ण है। अनेक वस्त्र-आभूषण भी शुभ्र होते हैं। उग्र सिंह का वाहन छोड़ कर वे शिव के प्रिय वाहन वृषभ पर विराजती हैं। अर्थात् सौम्य, शिवप्रिय, शक्तिशाली साधक को अपना माध्यम बनाती हैं और सज्जनों-सत्पुरुषोंयुक्त समाज के लिए अभय मुद्रा एवं वर मुद्रा धारण किए हैं। प्रौढ़ नारी इसी स्वरूप में प्रतिष्ठित होनी चाहिए। हर साधक में सज्जनों को भय रहित करने एवं श्रेष्ठ अनुदान देने की क्षमता इनकी साधना से विकसित हो सकती है।९. सिद्धिदात्री :- माँ भगवती का यह स्वरूप शिवजी को भी सिद्धि प्रदान करने वाला कहा जाता है। साधना के इस चरण तक पहुँचते-पहुँचते शिव शक्तिमय और शक्ति शिवमय स्वरूप ले लेती हैं। हर साधक मेें अर्धनारीनटेश्वर का स्वरूप उभरने लगता है। ९ अंक को पूर्णांक कहते हैं। मां के नवम में स्वरूप में पूर्णता-पुरुष और प्रकृति, शिव और शक्ति में अभिन्नता का बोध होने लगता है। इसीलिए उन्हें मोक्षदायिनी भी कहा जाता है। जीवात्मा को अपने शुद्ध-शिव स्वरूप का बोध होने लगता है, जो भी शक्ति है वह शिवमय, कल्याणकारी हो जाती है, तो फिर उसकी स्वाभाविक गति मोक्षप्रद ही हो जाती है। नवरात्र साधना के क्रम में प्रौढ़ साधकों को नवदुर्गाओं के इन नौ रूपों का बोध करते हुए, जीवन को शिव-शक्तियुक्त बनाने के साधनात्मक प्रयास करने चाहिए।परंपरागत ढंग से नवरात्रों के दौरान जगह-जगह दुर्गा माता की प्रतिमाएँ स्थापित करके उल्लासभरे उत्सव का माहौल बनाया जाता है। उन सभी के प्रबंधक सदस्यों से सम्पर्क करके उस समारोह के साथ जोड़ने के प्राणवान प्रयास परिजनों द्वारा किये जा सकते हैं। जैसे शाम की आरती के कुछ समय पहले से सामूहिक जप-सामूहिक प्रार्थना का क्रम चलाना। छोटे-छोटे प्रवचन-कथानकों के माध्यम से श्रद्धालुओं को दिशा देने के प्रयास करना आदि।

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उत्कृष्टता का एक सशक्त आधार

धर्मतंत्र से मानव का भावनात्मक परिष्कारधर्मतंत्र की सामर्थ्यमानव जाति की भौतिक आवश्यकताएँ और समस्याएँ स्वल्प हैं। उन्हें बुद्धिमान मानव प्राणी आसानी से हल कर सकता है। जिस विभीषिका ने अगणित गुत्थियाँ उलझा रखी है, वह भावनात्मक विकृति ही है। मनुष्य का आंतरिक स्तर गिर जाने से उसने पशु एवं पिशाच वृत्ति अपना रखी है। इसी से पग- पग पर कलह और क्लेश के आडंबर खड़े दिखाई पड़ते हैं। यदि भावनात्मक उत्कृष्टता संसार में बढ़ जाए तो हर मनुष्य देवताओं जैसा महान दिखाई दे और सर्वत्र स्वर्गीय सुख- शांति का वातावरण दृष्टिगोचर होने लगे।भावनात्मक परिवर्तन धर्मतंत्र के माध्यम से ही होना संभव है। भय और आतंक के बल पर अधिनायकवाद द्वारा लोगों को किसी मार्ग पर चलने के लिए विवश किया जा सकता है, पर इस प्रकार उसकी भावना बदलना संभव नहीं। उत्पीड़न के भय से लोगों के शरीर ही मर्यादित काम करने लगते हैं, मन नहीं बदलता। भीतर छिपा हुआ चोर अवसर पाते ही उभर आता है और अधिक ज़हरीला डंक मारता है। अच्छा तरीका यही है कि आदर्शवाद की उत्कृष्टता से श्रद्धा, धर्म और ईश्वर में सच्ची आस्था उत्पन्न कर जनसाधारण को कर्त्तव्यनिष्ठ, धर्मनिष्ठ, समाजनिष्ठ बनाया जाए।भावनाशीलों की भूमिकायह कार्य राजनीतिक लोगों का नहीं। उन्हें पग- पग पर कूटनीति अपनानी पड़ती है। फलस्वरूप लोग उन्हें प्रतिभावान तो मानते हैं, लेकिन आदर्शवान नहीं। राजनीति में गाँधी जैसे संत कोई विरले ही होते हैं। शेष तो दिन- रात हेरफेर चलाने वाले होते हैं। इसलिए वे न लोगों में आदर्शवादी उत्साह उत्पन्न कर सकते हैं और न आस्थाएँ विनिर्मित करने में सफल हो पाते हैं। यह कार्य धर्मक्षेत्र में कार्य करने वाले, उत्कृष्ट चरित्र एवं आशावान व्यक्ति ही अपने चरित्र एवं उदाहरण से जनसाधारण को भावनात्मक प्रगति के लिए प्रेरणा देकर कर सकते हैं। उन्हीं के उपदेशों का प्रभाव पड़ सकता है।आज की राष्ट्रीय विपन्न परिस्थितियों में हमें यही करना होगा। भावनात्मक उत्कृष्टता की अभिवृद्धि के लिए धर्मतंत्र का सहारा लेना होगा, ताकि जनमानस के गहन अंतराल का कोमल स्पर्श करके उसके प्रसुप्त देवत्व को जाग्रत् किया जा सके। इसी प्रकार से हमारी अगणित कठिनाइयों की अँधियारी दूर हो सकेगी। मनुष्य भीतर से महान बनेगा तो बाहर से भी उसकी समृद्धि एवं शक्ति असीम होकर रहेगी।वास्तविक स्वरूप उभरेधर्मतंत्र को सशक्त बनाना संसार की सबसे बड़ी सेवा है, विश्व की सबसे बड़ी पूजा है। आज पूजा- पाठ, तिलक, छापा, जटा, कमंडल, स्नान, मंदिर दर्शन या थोड़ा- सा दानपुण्य कर लेना मात्र धर्म का स्वरूप मान लिया गया है। इतना कुछ कर लेने वाले अपने को धर्मात्मा समझने लगते हैं। हमें समझना और समझाना होगा कि यह धर्म का एक नगण्य अंश है। समग्र धर्म की धारणा आत्मसंयम, उज्जवल चरित्र, उदारता, ज्वलंत देशभक्ति एवं लोकसेवा की तत्परता में ही संभव है।धर्मात्मा के लिए दयालु- क्षमाशील बनना ही पर्याप्त नहीं, वरन् उसके लिए सद्गुणी, शिष्ट, ईमानदार, कर्त्तव्यपरायण, साहसी, विवेकशील होना, अनीति के विरुद्ध लोहा लेने का शौर्य एवं कठोर श्रम करने के उत्साह से सम्पन्न होना भी अनिवार्य अंग है। जब तक इन गुणों का विकास न हो जाय, तब तक कोई व्यक्ति सच्चे अर्थों में कदापि धर्मात्मा कहलाने का अधिकारी नहीं बन सकता।हमें जनसाधारण को धर्म का वास्तविक स्वरूप समझाना पड़ेगा और बताना पड़ेगा कि सुख- शांति का एकमात्र अवलंबन धर्म ही है। जो धर्म की रक्षा करता है, उसकी रक्षा होती है और जो धर्म को मारता है, धर्म उसे भी मार ही डालता है। अधर्म के मार्ग पर न कोई अब तक फला- फूला है और न सुख- शांति से रहा है। यह आस्था जब तक जनमानस में गहराई तक प्रवेश न करेगी, तब तक मानव जाति की समस्याओं एवं कठिनाइयों का हल न हो सकेगा। हमें अच्छा मनुष्य बनना चाहिए। नेक मनुष्य बनना चाहिए और सशक्त मनुष्य बनना चाहिए। शक्ति, नेकी और व्यवस्था यह तीनों ही धर्म के गुण हैं। व्यक्तित्व का समग्र विकास ही धर्म का उद्देश्य है।मानव जाति को असीम पीड़ाओं से उन्मुक्त करने का श्रेय इसी मोर्चे पर लड़ने वालों को मिलेगा। इसलिए युग पुकारता है कि प्रत्येक पवित्र आत्मा आगे बढ़े, धर्म के वर्तमान स्वरूप को परिष्कृत करे, उस पर अनुपयोगिता की मलीनता को हटाकर स्वच्छता का वातावरण उत्पन्न करे। इसी शस्त्र से प्रस्तुत विभीषिकाओं का अंत किया जाना संभव है, इसीलिए उसे चमचमाती धार वाला तीक्ष्ण भी रखना ही पड़ेगा। जंग लगे व मोथरे हथियार अपना वास्तविक प्रयोजन हल कहाँ कर पाते हैं? धर्मतंत्र का आज जो स्वरूप है, उससे किसी को कोई आशा नहीं हो सकती है, इसे तो बदलना, पलटना एवं सुधारना अनिवार्य ही होगा।

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पित्रपक्ष पूर्व पुुरुषों एवं प्रकृतिगत चेतन धाराओं के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन पर्व है

इसका मनोवैज्ञानिक, आत्मिक महत्त्व समझें, श्राद्ध करें, लाभ पायेंआत्मवादी जीवन दर्शनआत्मवादी जीवन दर्शन भारतीय संस्कृति की महत्त्वपूर्ण विशेषता है। भारतीय ऋषियों- मनीषियों ने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से जीवन की गहराइयों को समझा। सतत परिवर्तनशील काया के पीछे जीवन प्रवाह की निरन्तरता अनुभव की। नश्वर प्राणियों के अन्दर अनश्वर आत्म चेतना को पहचाना। उसी आधार पर रंग- रूप, रुचि- स्वभाव, आहार- विहार आदि की भिन्नताओं को देखा, विशेषताओं का मूल्यांकन भी किया। साथ ही परस्पर के संवेदनात्मक जुड़ाव का मर्म भी जाना। इसीलिए उन्हें प्रकृति के विभिन्न घटक परस्पर एक- दूसरे के पूरक दिखने लगे। इसी अनुभूति ने 'वसुधैव कुटुम्बकम' तथा 'आत्मवत् सर्वभूतेषु' के तथ्यों का उद्घोष किया। इसी आधार पर भारतीय संस्कृति विश्व संस्कृति का सम्मान पाती रही।उक्त जीवन दर्शन ने मनुष्य को अपने सर्वश्रेष्ठ होने के घातक अहंकार से बचाया। अपनी विकसित चेतना के नाते अविकसितों को विकसित करने तथा उनके विकसित होने के अनुपम लाभ उठाने का (परस्परं भावयन्तां) का क्रम हजारों वर्ष चलता रहा। जहाँ एक- दूसरे का सम्मान हो, एक- दूसरे के प्रति कृतज्ञता का भाव हो, वहाँ न कोई शोषक बनने की अहंता का शिकार होता है और न कोई शोषित होने की दीनता- हीनता से पीड़ित होता है। सभी सभी के साथ संवेदनात्मक स्तर पर जुड़कर सुख बाँट देने और दु:ख बँटा लेने के लिए तत्पर हो जाते हैं। स्वर्ग या सतयुगी वातावरण इसी आधार पर बनता और विकसित होता रहता है। पूर्वकाल में भी ऐसा हुआ है और भविष्य में भी ऐसा संभव है।परमात्मा ने इस सृष्टि को जड़- चेतन एवं गुण- दोष के समन्वय से रचा है। मनुष्य के अन्दर बीज रूप में सत्प्रवृत्तियाँ- दुष्प्रवृत्तियाँ रहती हैं। वे किसी विशेष अनुशासन, वातावरण में पनपती- पुष्ट होती हैं। ऋषियों- मनीषियों ने इसीलिए विभिन्न सत्प्रवृत्तियों को विकसित- पोषित करने योग्य वातावरण तैयार करने के लिए पर्वों की परम्परा बनायी। आज भी विभिन्न सद्विचारों, सत्प्रवृत्तियों के विकास का महत्व समझाने और वातावरण बनाने के लिए राष्ट्रीय- अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न दिवस मनाये जाते हैं।कृतज्ञता ज्ञापन पर्वविभिन्न सत्प्रवृत्तियों को उभारने के लिए अधिकतर एक दिवसीय पर्व होते हैं। कुछ २- ३ दिवसीय भी होते हैं। आत्मशक्ति विकसित करने के लिए नवरात्र पर्व ९ दिन के होते हैं। इसी क्रम में 'कृतज्ञता' का भाव जगाने, पुष्ट बनाने, उसका वातावरण बनाने के लिए १५ दिवसीय पर्व मनाने का विधान बनाया गया है, जिसे 'पित्रपक्ष' कहते हैं।पित्रपक्ष :- यह पर्व हर वर्ष भारतीय पंचांग के अनुसार भाद्रपद (भादों) माह की पूर्णिमा से आश्विन (क्वार) माह की अमावस्या तक मनाया जाता है। इस साल यह २४ सितम्बर से ८ अक्टूबर तक पड़ रहा है। सामान्य मान्यता यह है कि इस अवधि में अपने पूर्वजों- पितरों को तृप्त- तुष्ट करने, उन्हें सद्गति दिलाने के लिए किए गए प्रयोग विशेष रूप से फलित होते हैं। जिस तिथि को जिस पूर्वज ने देह त्यागी, उसी तिथि को उनके निमित्त तर्पण, पिण्डदान, अन्नदान, वस्तुदान आदि पुण्य कर्म किए जाते हैं। मान्यता यह है कि ऐसा करने से पितरों की सद्गति के द्वार तो खुलते ही हैं, तृप्त- तुष्ट होकर वे श्राद्ध करने वालों को विशेष आशीर्वाद- अनुदान भी देते हैं।इस प्रकरण में व्यक्तियों में दो तरह के भिन्न- भिन्न विचार पाये जाते हैं। बड़ी संख्या में कथित श्रद्धालु परम्परागत कर्मकाण्ड किसी प्रकार पूरा कर लेने भर से पितरों की सद्गति और अपने सौभाग्य का मार्ग प्रशस्त होने का विचार रखते हैं। अपनी परिस्थिति और मन:स्थिति के अनुरूप श्राद्धकर्म करने के प्रयास करते हैं। दूसरा वर्ग इसे कर्मकाण्ड तक सीमित अन्धविश्वासपूर्ण ढकोसला कहकर उसके प्रति उपेक्षा- उपहास के भाव प्रकट करता है। दोनों ही वर्ग के व्यक्तियों को ऋषियों द्वारा स्थापित इस पर्व के गहन मनोविज्ञान एवं आत्म विज्ञान का बोध होना चाहिए। तभी वे इस महत्त्वपूर्ण पर्व का लाभ उठाने की स्थिति में पहुँच सकते हैं।मनोविज्ञान की दृष्टि से यह एक श्रेष्ठ प्रयोग है। कृतज्ञता का भाव मनुष्य और मनुष्य के बीच, मनुष्य और प्रकृति के विभिन्न घटकों के बीच संवेदनात्मक, मित्रतापूर्ण सम्बन्ध विकसित करता है। इसी के अभाव में संतानें अपने माता- पिता, बुजुर्गों के प्रति उदासीन, संवेदनहीन व्यवहार करने लगती हैं। समाज के विभिन्न वर्ग इसके अभाव में घातक अहंकार के शिकार हो जाते हैं। उनके क्रियाकलाप एक- दूसरे के लिए कष्टकारक बन जाते हैं। सामाजिक सन्तुलन बिगड़ने लगता है। इसी के अभाव में मनुष्य अन्य प्राणियों, जीव- जन्तुओं, प्रकृति के विभिन्न घटकों को अपने उपभोग की सामग्री मानकर उनका अन्धाधुन्ध दोहन- शोषण करने लगता है। प्रकृति का सन्तुलन (इकोलॉजिकल बैलेन्स) बिगड़ने लगता है। यह भाव विकसित होते ही सब एक- दूसरे के प्रति संवेदनशील, पूरक बनकर अपनी- अपनी मर्यादा में रहकर सहयोगपूर्वक सुख- संतोषप्रद जीवन जीने लगते हैं।पित्रपक्ष में के कर्मकाण्ड को ध्यान से देखें तो उसमें अपने पितरों के अलावा देवशक्तियों, ऋषियों, आदि पितरों, जीव- जन्तुओं, वृक्ष- वनस्पतियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करते हुए उनको तुष्ट- संतुष्ट करने के क्रम समाहित रहते हैं। अस्तु निर्धारित कर्मकाण्डों को यंत्रवत् पूरा न करके उन सभी के सहयोग से जीवन क्रम आगे बढ़ने के तथ्य को समझते हुए उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए विराट प्रकृति के प्रति अपने कर्त्तव्यों को पूरा करते रहने के विचारों के साथ उन्हें सम्पन्न किया जाना चाहिए।क्रिया से भावना एवं भावना से क्रिया के पोषण का मनोवैज्ञानिक तथ्य भली प्रकार समझना और स्वीकारना चाहिए। सम्मान के भाव होने पर अभिवादन करने का मन होता ही है और नियमित अभिवादन करने से स्नेह- सम्मान के भाव पुष्ट होते हैं। राष्ट्रीय भावना से राष्ट्रीय ध्वज को फहराने और उसके प्रति सम्मान व्यक्त करने में रस आता है तो इस प्रक्रिया से जो वातावरण बनता है, उससे लोगों में राष्ट्रीय भावना विकसित- पुष्ट होती है। यह विकसित भावना अनेक सत्कर्मों- सत्प्रवृत्तियों को बढ़ावा देती है। इस संदर्भ में युगऋषि ने लिखा है दिवंगतों के प्रति श्रद्धा- सद्भाव व्यक्त करने का उपचार श्राद्ध- तर्पण है। माना गया है कि इस आधार पर स्वर्गीय स्वजनों की श्रद्धायुक्त सहायता की जा सकती है। यह मान्यता कृतज्ञता की दृढ़ पोषक है। यह पूर्वजों के उपकारों का प्रत्युत्तर देने के लिए अवसर प्रदान करती है, साथ ही इस आधार पर जाग्रत् हुई सद्भावना का उपयोग लोकमंगल के प्रयोजनों में भी बन पड़ता है। (प्रज्ञोपनिषद ४/५/४३- ४६)इसी दृष्टि से श्राद्ध कर्म के साथ सत्प्रयोजनों के लिए धनदान, अन्नदान, वस्तुदान की परम्परा भी है। आजकल लोग उसके मर्म को न समझकर केवल रूढिवादी क्रम ही अपनाते हैं। श्राद्धकर्मियों को दान के सही विधान को समझाना और अपनाना भी चाहिए।दान का विज्ञान- विधान समझेंदान के सम्बन्ध में यक्ष एवं धर्मराज के बीच हुई वार्ता में एक बड़ा महत्त्वपूर्ण सूत्र दिया गया है। यज्ञ ने पूछा, "सर्वश्रेष्ठ दान क्या है? (दानं परं किं?)" युधिष्ठिर का उत्तर है- "सुपात्रदत्तं। अर्थात् सुपात्र को दिया गया दान ही सर्वश्रेष्ठ है।" उन्होंने किसी वस्तु विशेष का नाम न लेकर उसे प्रयोग विशेष से ही जोड़ा। इसी भाव को स्पष्ट करते हुए युगऋषि ने लिखा है -दान सदुद्देश्यों की पूर्ति के लिए दिया जाता है। उसकी सार्थकता सत्प्रवृत्ति संवर्धन में मानी गयी है। अस्तु श्राद्धकर्म में दान की प्रक्रिया किसी वंश या वेष विशेष के मनुष्यों को व्यर्थ ही भोजन कराने, पैसा देने से सम्पन्न नहीं हो सकती। वे ही दान के अधिकारी हैं जो सच्चरित्र, विशाल हृदय हों, अथवा विपत्ति में फँसे हों और अपने पैरों पर खड़े हो सकने में असमर्थ हों। अथवा उन्हें दान लेने का अधिकार है जो सर्वतोभावेन समाज सेवा के लिए समर्पित हों। (प्रज्ञोपनिषद ४/५/५०- ५४)पहले सर्वतोभावेन समाज को समर्पित लोकहित में रत साधकों को ब्राह्मण एवं साधु कहा जाता था। वे व्यक्ति नहीं, एक मिशन के रूप में सक्रिय रहते थे। इसलिए श्राद्धकर्म में उन्हें भोजन कराने एवं वस्तुदान, धनदान देने की परम्परा डाली गई थी। अब वैसे व्यक्ति मुश्किल से ही मिलते हैं। लेकिन अधिकतर कथित श्रद्धालु उन्हीं वेशधारियों को ही दान देते हैं। वे उसका चाहे जैसा प्रयोग- उपयोग करें। ध्यान रहे दान का पुण्य दान देने भर से नहीं, उसके सही नियोजन के आधार पर मिलता है। इस संदर्भ में युगऋषि ने लिखा है-वस्तुत: दान तो सत्प्रयोजनों के लिए प्रामाणिक हाथों में ही सौंपा जाना चाहिए। अन्यथा श्राद्ध पितरों के लिए उलटा हानिकारक सिद्ध हो सकता है। उनके निमित्त किया हुआ शुभ कर्म यदि कुपात्र के हाथों या अवाञ्छनीय कृत्यों में नियोजित हो तो उन पितरों को दु:ख होना स्वाभाविक है, जिनके लिए वह किया गया। (प्रज्ञोपनिषद ४/५/५६- ५८)उक्त सिद्धांत को समझकर दान की रूढ़िवादी लकीर पीटने से बचा जाय और उसके सदुद्देश्यों में लगाने के विवेकपूर्ण क्रम अपनाये जायें, जिससे पितरों को भी प्रसन्नता हो और अपना भी कल्याण हो।ऋणमुक्त हों, पुण्य कमायेंयदि बड़ों के प्रति वास्तव में कृतज्ञता का भाव हो तो उन्हें तृप्त करने के लिए उनके जीवित रहते ही प्रभावी प्रयास किए जाने चाहिए। जीवित बुजुर्गों की आवश्यकताओं और भावनाओं की तो उपेक्षा करना और उनके मरने पर श्राद्धकर्म की लकीर पीटकर उन्हें संतुष्ट करने और अपने लिए पुण्य अर्जित करने की बात सोचना हास्यास्पद है। उन्हें तृप्त- तुष्ट करने के प्रयास उनका शरीर रहते भी करने चाहिए और मरणोपरान्त भी।भारतीय संस्कृति के अनुसार संतानों को स्वयं समर्थ बनने तक ही अभिभावकों की सम्पदा का उपयोग करना चाहिए। उसके बाद पितरों की शेष सम्पदा उन्हीं के निमित्त सत्कार्यों में लगा देनी चाहिए। स्वयं अपना निर्वाह अपनी मेहनत और कौशल की कमाई से करना चाहिए। इस संदर्भ में युगऋषि ने लिखा है-संतानों को अभिभावकों के अनुदान तभी तक लेने चाहिए जब तक स्वयं समर्थ न हों। समर्थ होने पर संतानों को चाहिए कि पूर्वजों का उपार्जित धन उन्हीं की पुण्य सम्पदा बढ़ाने के लिए लौटा दें। प्रत्युपकार की यह शालीन परम्परा है। इसी से आत्मा प्रसन्नता और तृप्ति प्राप्त करती है। जीवित पूर्वजों को उनके द्वारा किए गये सहयोग और दिये गये अनुदानों को वापिस किया जाना चाहिए। सुपात्र संतानें अपने वयोवृद्ध अभिभावकों की सेवा- सहायता करके उऋण होने का प्रयास करती हैं। उनका स्वर्गवास हो जाने पर उनके निमित्त पुण्य कार्य करके भी ऋणमुक्त होने का अवसर मिलता है। न लौटाने पर वह ऋण अगले जन्मों में भार ढो- ढोकर चुकाना पड़ता है। (प्रज्ञोपनिषद ४/५/५९- ६५)भारतीय संस्कृति के उक्त मूल्यवान सूत्रों को समझकर- अपनाकर विवेकपूर्वक पित्रऋण चुकाना चाहिए। लेकिन अपने प्रयास यहीं तक सीमित नहीं रहने देने चाहिए, अपनी पुण्य सम्पदा, दैवी सम्पदा बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए। देवशक्तियों एवं प्रकृति के विभिन्न घटकों का उपकार समझते हुए उनके प्रत्युपकार के रूप में संकल्पपूर्वक अपने तन- मन का कुछ अंश श्रेष्ठ प्रयोजनों में लगाना चाहिए। इस संदर्भ में युगऋषि का स्पष्ट कथन है-अपने श्रद्धा- सद्भाव के नाते पूर्वजों का ऋण चुकाने के अतिरिक्त भी लोकमंगल के लिए जितना बन पड़े शुभ कृत्य करते रहना चाहिए। इसके लिए न केवल साधनों का दान किया जाय, वरन् श्रमदान भी नियोजित किया जाय। तर्पण, श्रमदान- स्वेदबिन्दुओं का भी प्रतीक है। वृक्षारोपण, शिक्षा संवर्धन, स्वच्छता- सुव्यवस्था जैसे कृत्यों में किया हुआ श्रम भी तर्पण होता है। लोकमानस के परिष्कार में लगाया गया धन- श्रम भी श्राद्ध ही होता है। (प्रज्ञो. ४/५/६८- ७१)यह जरूरी नहीं कि श्राद्ध कर्म को पित्रपक्ष तक ही सीमित रखा जाय। उक्त उद्धरण में ऋषि स्पष्ट करते हैं कि सभी सत्कर्म श्राद्धभाव से, कृतज्ञता के भाव से किए जायें तो वे भी पूर्वजों और प्रकृति की चेतन धाराओं को तृप्त करने वाले होते हैं। उन्हें करने वालों को दोहरा लाभ मिलता है।इसी क्रम में प्रज्ञोपनिषद ४/५/७९- ८० में युगऋषि ने श्राद्धकर्म करने के अधिकार की व्यापकता पर प्रकाश डाला है। उनके अनुसार पुत्रों की तरह पुत्रियाँ भी श्राद्ध कर सकती हैं। छोटों द्वारा बड़ों के लिए, बड़ों द्वारा छोटों के, मित्रों, शुभचिंतकों, महामानवों सभी के निमित्त श्राद्ध किए जा सकते हैं। इसकी फलश्रुति बतलाते हुए युगऋषि ने लिखा है-इससे आत्मा की अमरता के भाव को बल मिलता है। लोक- परलोक के बीच सघन सम्बन्ध बना रहने से परिवार की विशालता अक्षुण्ण बनी रहती है तथा समस्त ब्रह्माण्ड एक परिवार बन जाता है।अस्तु श्राद्धकर्म से कृतज्ञता का भाव बढ़ने से होने वाले अनेक हितों को दृष्टिगत रखकर इस पर्व का भरपूर लाभ उठाना चाहिए।