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भूजल संरक्षण- संचयन के कुछ जनसुलभ उपचार

पूर्व प्रसंगपाक्षिक के गत (१ जून) अंक में आज की एक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता के रूप में जल संरक्षण के लिए विविध प्रयास जन स्तर पर भी किए जाने की अपील की गयी। क्षेत्रों के कई कर्मठ परिजनों ने भूजल संरक्षण- संचयन के कुछ जनसुलभ उपायों पर प्रकाश डालने का आग्रह किया है। उसी के अनुसार इस आलेख में कुछ सफल व्यावहारिक प्रयोगों का उल्लेख किया जा रहा है।पहले उल्लेख किया जा चुका है कि भूमि पर उपलब्ध जल का अधिकांश भाग तो समुद्र में खारे पानी के रूप में विद्यमान है। उसे पीने योग्य बनाने के जनसुलभ शोध प्रयोग जब सफल होंगे, तब होंगे। अभी तो शेष उपयोगी जल को ही समझदारी से सँजोने और प्रयोग में लाने की जरूरत है। उस उपयोगी जल का ७७% जो अंश बर्फ के रूप में विद्यमान है, उसके लिए भी मनुष्य सीधे- सीधे कुछ नहीं कर सकता ।। पर्यावरण संतुलन से ही उसके संरक्षण में कुछ मदद हो सकती है। वह भी पिघलकर झरनों- नदियों आदि के माध्यम से उपलब्ध होता है।उपयोगी जल का २२% भाग भूजल के रूप में स्थित रहता है। मनुष्य के द्वारा भूजल का दोहन इस हद तक किया जा रहा है कि उसकी उपलब्धता दुरूह होती जा रही है। महर्षि कश्यप ने जल संरक्षण के लिए जो सूत्र सुझाये थे, उनमें से चार जनसामान्य द्वारा भी अपनाये जा सकते हैं।महर्षि कश्यप के सूत्र१. पानी के प्रवाहित स्रोतों को शुद्ध रखा जाय तथा उनके प्रवाह में कम से कम रुकावट आने दी जाय। यदि जन जागरूकता लायी जा सके तो जल स्रोतों को प्रदूषित होने से बहुत अंशों तक बचाया जा सकता है। गन्दे नाले या तो औद्योगिक इकाइयों द्वारा पनपते हैं अथवा मनुष्यों के निस्तार से। जो लोग पानी का लाभ उठा रहे हैं वे उसे शुद्ध रखने की जिम्मेदारी निभायें, तो उपचार कठिन नहीं है।२. जल प्रवाहों, स्रोतों के आसपास के इलाके में सघन वृक्षारोपण किया जाय। पेड़ों की जड़ों के सहारे पानी जमीन के अन्दर गहराई तक उतरता है। जल प्रवाह के साथ मिट्टी के कटान को भी वृक्षों- वनस्पतियों की जड़ें रोकती हैं। अस्तु तालाबों, नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों में खूब वृक्ष लगाये जायें। यह कार्य जन सहयोग से बखूबी किया जा सकता है।३. पानी के उपयोग में समझदारी और किफ़ायतसारी बरती जाय। जल प्रवाह, झरने, नदी, नल आदि से पानी किसी पात्र में लेकर उसका उपयोग मितव्ययिता से किया जाय। झरने, नदी, तालाब आदि के पानी से सीधे सफाई करने से उसमें प्रदूषण बढ़ता है। किसी पात्र से लेकर उससे सफाई करने से पानी कम भी खर्च होता है तथा भूमि में बहकर आंशिक रूप से शोधित होकर फिर जल स्रोतों तक पहुँचता है।नल खोलकर हाथ- मुँह धोने, कुल्ला आदि करने से अधिक पानी बेकार बह जाता है। किसी पात्र में लेकर वही कार्य करने से बहुत कम पानी से कार्य चल जाता है। मोटर आदि वाहनों की सफाई यदि पाइप से पानी डालकर की जाती है तो अधिक पानी व्यय होता है। बाल्टी में मग्गे के द्वारा पानी डालकर कपड़े या ब्रश से साफ किया जाय तो बहुत कम पानी से काम चल जाता है। यह आदतें थोड़े से अभ्यास से ठीक की जा सकती हैं और पर्याप्त पानी निरर्थक बहने से बचाया जा सकता है।४. जो कोई भी व्यक्ति पानी का उपयोग करते हैं, उन सभी को जल संरक्षण संचयन के लिए उचित प्रयास करने चाहिए। इस सूत्र के आधार पर हर घर में वर्षा के समय छत के पानी को एकत्रित करने के हौद (टैंक) बनाये जा सकते हैं। उसे सोकपिटों, रीचार्ज सिस्टमों के द्वारा भूजल के रूप में संग्रहीत किया जा सकता है। कुछ सफल सहज उपचार यहाँ दिये जा रहे हैं।सोक पिट : जिस मार्ग से पानी बहकर निकल जाता है, उस मार्ग में थोड़ी- थोड़ी दूरी पर यह बनाये जा सकते हैं। इन्हें स्थानीय आवश्यकता के अनुसार गोल या चौकोर बनाया जा सकता है। इनकी लम्बाई, चौड़ाई एवं गहराई लगभग तीन- तीन मीटर रखी जाती है। इनमें नीचे एक मीटर तक बड़े पत्थर (बोल्डर), उसके ऊपर एक मीटर तक गिट्टी- रोड़ी भर दी जाती है। सबसे ऊपर आधा मीटर रेत भर दी जाती है। इसके माध्यम से सतह पर बह जाने वाला पानी भूजल के रूप में धरती के अन्दर समा जाता है। कुओं को रीचार्ज करने के लिए भी इनका उपयोग किया जा सकता है।पर्कोलेशन टैंक : यह छोटे या कच्चे तालाबों, पोखरों की तरह होते हैं। जल बहाव की दिशा में कहीं- कहीं ऐसे स्थान मिलते हैं, जहाँ पानी के लिए अवरोध बना देने से पानी रुक जाता है और धीरे- धीरे धरती के अन्दर समाता रहता है। इसके लिए कई उपचार किए जा सकते हैं।जल अवरोध : बड़े- बड़े पत्थरों के अवरोध बना देने से पानी में रुकावट आती है। इन्हीं पत्थरों को यदि तार के जाल में भर दिया जाय तो यह अधिक टिकाऊ होते हैं। इसी प्रकार जूट या प्लास्टिक की बोरियों में मिट्टी भरकर बोरी बाँध भी बनाया जा सकता है। प्राकृतिक नालों पर यदि छोटे- छोटे पक्के बाँध बना दिए जायें तो और भी अच्छे परिणाम पाये जा सकते हैं।कन्टूर ट्रैन्च : पहाड़ियों पर, तीव्र ढलानों पर इस विधि का प्रयोग किया जा सकता है। पानी के बहाव की दिशा में लगभग ६० से.मी. चौड़ी और लगभग ४५ से.मी. गहरी खाइयाँ खोद दी जाती हैं। इन्हें लगातार- सम्बद्ध या क्रमबार- असम्बद्ध ढंग से खोदा जा सकता है।रीचार्ज भाफ्ट : अच्छे तालाबों में एक सीमा तक पानी भर जाने पर अतिरिक्त पानी को वेस्ट वियर (फालतू निकास) के द्वारा निकाल दिया जाता है। वर्षा का बहुत- सा पानी बहकर क्षेत्र के बाहर चला जाता है। इसे भी भूमिजल के रूप में भूगर्भ में डाला जा सकता है।इस प्रयोग में तालाब के बीच में एक गहरा बोर कर दिया जाता है। उसके अन्दर नीचे बड़े बोल्डर, फिर गिट्टी और फिर रेत भर देते हैं। बोरिंग के पाइप की ऊँचाई वेस्ट वियर की सतह से कुछ नीची रखी जाती है। वर्षा का अतिरिक्त जल वेस्ट वियर से निकलने की जगह इस संरचना के द्वारा धरती के अन्दर भूजल के रूप में फैल जाता है, जो भूजल का स्तर बढ़ा देता है।खेतों की नाली : खेतों के आसपास मेड़ों से लगी गहरी नालियाँ, छोटी खाइयाँ बना दी जाती हैं। इनके माध्यम से वर्षा का पानी पर्याप्त मात्रा में भूमि में समा जाता है।यह सभी उपचार ऐसे हैं, जिन्हें हर क्षेत्र में सहजता से व्यक्तिगत प्रयासों से, जन सहयोग से, ग्राम पंचायतों, नगर पालिकाओं, समझदार उद्योगपतियों, उदार सम्पन्नों के सहयोग से कहीं भी सफल बनाया जा सकता है। इससे खेत का पानी खेत में, गाँव का पानी गाँव में, क्षेत्र का पानी क्षेत्र में भूजल के रूप में संग्रहीत होकर धरती और वृक्ष- वनस्पतियों सहित विभिन्न जीवों के लिए वरदान बन सकता है।

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गायत्री को युगशक्ति के स्तर पर स्थापित करने योग्य विवेक और कौशल जुटायें

समय की माँगयुगऋषि नवयुग अवतरण की दैवी योजना को भूमण्डल पर क्रियान्वित करने के संकल्प के साथ आये। उन्होंने महामाया, आदिशक्ति को इस पुण्य प्रयोजन के लिए वेदमाता एवं देवमाता के साथ ही विश्वमाता की भूमिका निभाने के लिए सहमत किया। उनकी सहमति प्राप्त होते ही स्थूल- सूक्ष्म प्रकृति उस दिशा में सक्रिय हो उठी। जनमन में उस दिशा में जिज्ञासाएँ जागने लगीं, प्रकृति के स्थूल एवं सूक्ष्म प्रवाहों से तद्नुकूल परिस्थितियाँ भी बनने लगीं। युगऋषि ने गायत्री महाविद्या का स्वरूप गायत्री महाविज्ञान में खोला तथा छोटी- छोटी पुस्तिकाओं के माध्यम से जन- जन तक उसे सहज सुलभ रूप में पहुँचाया। उक्त सभी दिव्य और मानवी सत्पुरुषार्थों के परिणाम स्वरूप हजारों वर्षों से प्रतिबंधित मानी जाने वाली गायत्री साधना विश्वव्यापी स्तर पर प्रचारित हो गयी।किसी कला या विद्या को प्रारम्भ कर देना आसान होता है। उसे प्रभावी स्तर तक ले जाने, विशिष्टता का दर्जा देने के लिए लम्बे समय तक अनवरत कठोर तप साधना करनी पड़ती है। कोई भी खेल सीमित साधनों से गलियों में भी खेलकर किसी हद तक मनोरंजन एवं स्वास्थ्य के लाभ उठाये जा सकते हैं। लेकिन उसी खेल में राष्ट्रीय- अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पहुँचने के लिए पर्याप्त संसाधन और अभ्यास की व्यवस्था जुटानी पड़ती है। संगीत गुनगुनाकर कोई भी व्यक्ति थोड़ी शान्ति का, उल्लास का बोध कर सकता है, किन्तु संगीत का प्रखर प्रभावी माहौल बनाने वालों को तो लम्बे समय तक कठोर साधना का क्रम बनाना ही पड़ता है।जनमानस के शोधन- उन्नयन के लिए तथा रूठी हुई प्रकृति के अनुकूलन के लिए गायत्री उपासना- साधना के प्राथमिक प्रयास भली प्रकार फलित हो उठे हैं। उससे जुड़ने वाले लगभग सभी साधक अपने अन्दर दिव्यता के उभार होने और दिव्य सहयोग मिलने का अनुभव कर रहे हैं। किन्तु अभी समय की विसंगतियों, व्यक्ति- परिवार और समाज के विकृत रूढ़िवादी दृष्टिकोणों को निरस्त करके उन्हें सद्विवेकयुक्त दृष्टिकोण अपनाकर उनके पुरुषार्थ को त्रिविध क्रान्तियों को गति देने में लगा देने के लिए बहुत कुछ किया जाना है। जो हो सका है उससे संतुष्ट तो हुआ जा सकता है, किन्तु जो किया जाना है उसे संकल्पपूर्वक पूरा करने के लिए बलिदानी वारों की तरह सर्वस्व झोंककर जूझ जाने से कम में समय की माँग पूरी नहीं हो सकती। इससे कम में ऋषिसत्ता के विशिष्ट अनुग्रह और आत्मसंतोष पाना संभव नहीं है।युगऋषि ने विराट प्रकृति के 'सूक्ष्म एवं कारण' स्तरों पर युगशक्ति के प्रवाह को सक्रिय कर दिया है। उसे स्थूल धरातल पर अवतरित करने के लिए युग साधकों को, युग सैनिकों को माध्यम बनाना है। युगऋषि ने इसी उद्देश्य के लिए युगसाधकों को जगाया और प्रज्ञा संस्थानों, प्रज्ञापीठों, शक्तिपीठों की स्थापना की है। गायत्री जयंती, गुरुपूर्णिमा जैसे पर्वों को समारोहपूर्वक मनाने की परम्परा भी इसीलिए चलाई है। इन पर्वों पर पुराने साधक अपने व्यक्तित्व परिष्कार और पात्रता विकास के लिए संकल्पित साधना करें तथा नये- नये संस्कारवान व्यक्तियों को खोज- खरादकर इस प्रक्रिया के साथ जोड़ें, यही उद्देश्य गुरुवर का रहा है।ढर्रे की बात नहीं, संकल्पित साधनागायत्री जयंती पर ढर्रे के कार्यक्रम पूरे करके अपने कर्त्तव्य की इतिश्री नहीं मान लेना है। गायत्री महाविद्या को युगशक्ति के स्तर पर स्थापित करने के लिए समयबद्ध योजना बनाकर संकल्पपूर्वक निर्धारित लक्ष्यों तक पहुँचने के लिए प्रखर साधना तंत्र स्थापित करना है। समय की परिस्थितियों को देखते हुए उसके लिए सूत्र इस प्रकार निर्धारित किए जा सकते हैं।पूर्व परिजनों में हंसवृत्ति विकसित होगायत्री का वाहन हंस कहा गया है। हंसवृत्ति जिनमें जिस स्तर तक विकसित होती है, वे उसी अनुसार युगशक्ति के संवाहक माध्यम बन पाते हैं। हंस के तीन विशेष गुण सर्वमान्य हैं।(क) शुभ्र बेदाग काया : बाह्य जीवन अनुशासनबद्ध रहे। उस पर शक, कुशंका, छल, अविश्वास रूपी दाग न लगने देने के जीवन्त प्रयास हों।(ख) नीर- क्षीर विवेक : विवेकी, प्रज्ञावान हों। तमाम विसंगतियों के बीच भी अपने कर्त्तव्यों, अकर्त्तव्यों का ठीक- ठीक विवेचन करके एकनिष्ठ होकर कर्त्तव्यरत रह सकें। इसे विचार क्रान्ति की क्षमता कह सकते हैं।(ग) मुक्ता चयन : हंस मोती चुगते हैं, अर्थात् अपने निर्वाह के लिए उच्च आदर्शयुक्त माध्यमों- संसाधनों का ही उपयोग करते हैं। गन्दे, हीन, अभक्ष्य का सेवन कभी नहीं करते। यह प्रवृत्ति नैतिक क्रान्ति सम्मत न्याययुक्त संसाधनों- माध्यमों का ही उपयोग करने की प्रतिबद्धता की परिचायक है। पहले से जुड़े हुए साधक प्रतिवर्ष अपने अन्दर हंस वृत्तियों को क्रमश: विकसित करते रहने की संकल्पित साधना करें।क्षेत्र विस्तार हो, साधकों की संख्या बढ़े :युगशक्ति के अवतरण का उद्देश्य युग निर्माण है, मनुष्य मात्र के लिए उज्ज्वल भविष्य का सृजन है। इसके लिए विश्व के हर क्षेत्र में, हर सम्प्रदाय में, हर वर्ग में युग साधकों की संख्या बढ़ाना जरूरी है। ऋषिसत्ता ने हर क्षेत्र में, हर वर्ग में श्रेष्ठ आत्माओं को भेजा है। उन तक युग संदेश पहुँचाना, उनके अन्दर इसके लिए सहमति और उमंग जगाना पुराने साधकों का कार्य है। इसके लिए हर प्राणवान परिजन और जीवन्त, संगठित इकाई को अपने- अपने समयबद्ध लक्ष्य निश्चित कर लेने चाहिए। अपनी रुचि और सामर्थ्य के अनुसार किस क्षेत्र एवं किस वर्ग में नये सृजन साधक बनाने हैं, यह निर्धारित करके योजनाबद्ध ढंग से जुट जाना चाहिए।गायत्री जयंती पर प्रात:कालीन कार्यक्रम पूर्व परिजनों के स्तर को बढ़ाने की दृष्टि से किये- कराये जाने चाहिए। सायंकालीन कार्यक्रमों में नये वर्ग के भावनाशीलों, विचारशीलों को युगसृजन अभियान से परिचित कराने और नये सृजन साधकों के रूप में विकसित करने की दृष्टि से किए जाने चाहिए। उसमें पूर्व पूजन, प्रवचन, सांस्कृतिक कार्यक्रम- संगीत आदि का विवेकयुक्त समावेश किया जा सकता है।गायत्री मंत्र यों तो सार्वभौम है। इसमें परमात्मा का कोई नाम नहीं है। उसे सर्वव्यापी, कल्याणकारी सत्ता के रूप में मानने का भर आग्रह है। उसी का वरण करने, उसी को धारण करने के संकल्प के साथ उसी से सन्मार्ग पर प्रेरित करने की प्रार्थना करना है। यदि किन्हीं को संकोच या एतराज हो तो वे अपनी भाषा में परमात्मा से सबके लिए सद्बुद्धि देने और उज्ज्वल भविष्य लाने की प्रार्थना कर सकते हैं। इस्लाम में इसी आशय की पूर्ति 'सूरह फातिहा' नामक आयात से होती है। पाक्षिक के १६ मई २०१८ अंक में उसके जप एवं लेखन करने योग्य अंश भी प्रस्तावित किए गये हैं। पुराने साधकों को अपने व्यक्तित्व इस स्तर पर विकसित करने चाहिए कि वे किसी क्षेत्र या सम्प्रदाय विशेष को उनके विश्वासों की रक्षा करते हुए युग साधना से जोड़ सकें।सृजन प्रशिक्षण केन्द्र सक्रिय- विकसित होंजब किसी जन आन्दोलन को विस्तार दिया जाता है तो उसके लिए समर्थ प्रेरणा- प्रशिक्षण केन्द्रों की अनिवार्य आवश्यकता पड़ती है। युगऋषि ने शक्तिपीठों, प्रज्ञापीठों, प्रज्ञा केन्द्रों की स्थापना इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए की थी। उन्हें युगऋषि के संकल्प के अनुरूप समर्थ सृजन, प्रशिक्षण केन्द्रों के रूप में विकसित करने- कराने की जिम्मेदारी भी प्राणवान परिजनों को सँभालनी है।हर क्षेत्र के नये- पुराने प्राणवान परिजन गायत्री जयंती के पूर्व ही विचार गोष्ठी करके ऊपर दर्शाये गए सूत्रों के अनुसार गायत्री जयंती पर्व को अधिक प्रभावी ढंग से मनाने की योजना बनायें और तद्नुसार प्रयास- पुरुषार्थ करें।

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जल संरक्षण करें, जीवन रक्षा और पर्यावरण संतुलन के पुण्य कमायें

पानी का महत्व समझें- स्वीकारेंपरमात्म सत्ता ने पृथ्वी पर जीव जगत बनाया- बसाया है तो उनके जीवन निर्वाह के संसाधन भी उदारतापूर्वक प्रदान किये हैं। जीवन बनाये रखने के लिए आहार की जरूरत होती है तो उसने धरती को उर्वरता प्रदान की, अनेक प्रकार के पोषक आहार धरती की ऊर्वरता के नाते उगाये- खाये जा सकते हैं। उसके लिए अनुकूल ऋतुचक्र की भी रचना की। जो व्यक्ति प्रकृति के नियमों को समझें और अपनाएँ वे हर ऋतु में पर्याप्त मात्रा में पोषक आहार प्राप्त कर सकते हैं।जीवन के लिए ठोस आहार से भी अधिक आवश्यकता पानी की होती है। उसे प्रकृति ने और भी अधिक मात्रा में और अधिक सहजता से उपलब्ध कराया है। धरती पर लगभग ४०% क्षेत्र में भूमि है, शेष ६०% में जल है। समुद्र में, ध्रुवों और पर्वतों पर हिम के रूप में, वर्षा जल के रूप में, नदियों, झीलों, तालाबों में वही जल उपलब्ध रहता है। भूमिगत जल भी बड़ी मात्रा में उपलब्ध है जिसे कुओं, बावड़ियों एवं नलकूपों के माध्यम से प्राप्त किया जाता है। सब्जी, वनस्पतियाँ, फल और उपयोगी लकड़ी देने वाले, वायु शोधन करने वाले वृक्षादि सभी के उत्पादन- संरक्षण के लिए पानी की जरूरत पड़ती है।पानी का महत्त्व निर्विवाद रूप से स्वीकार्य है, लेकिन विडम्बना यह है कि सैद्धांतिक रूप में 'जल ही जीवन है' यह तथ्य स्वीकार करने पर भी जीवन रक्षक जल के स्रोतों को शुद्ध, सुरक्षित रखने और प्रचुर मात्रा में जल संरक्षण के उपाय करने के आम दायित्व को इन दिनों स्वीकार नहीं किया जा रहा है। ऋतु के अनुसार खाद्य पदार्थों का उत्पादन, संरक्षण करते रहने की जिम्मेदारी मनुष्य उठा रहे हैं, इसलिए हर ऋतु में खाद्य पदार्थ उपलब्ध होते रहते हैं। पानी के सम्बन्ध में भी इस प्रकार की जिम्मेदारियाँ अनुभव करने और उन्हें तत्परतापूर्वक निभाने के प्रयास मानव समाज द्वारा किये जाने जरूरी हैं। अन्यथा जल की कमी की समस्या चर- अचर जीवों के अस्तित्व पर ही प्रश्न वाचक चिह्न लगा देगी।थोड़ा- सा पानीजी हाँ! भले ही धरती के ६०% क्षेत्र पर जल विद्यमान है, लेकिन मनुष्य के प्रत्यक्ष उपयोग में आने वाला पानी बहुत थोड़ा- सा ही है। उसका समुचित प्रबंधन बहुत जरूरी है। विशेषज्ञों- वैज्ञानिकों के अनुसार धरती पर उपलब्ध जल का लगभग ९७% पानी तो समुद्र में संग्रहीत है। यह जल वर्षा का और परिवहन के माध्यम के साथ अप्रत्यक्ष रूप से पर्यावरण संतुलन की भूमिका भले ही निभाता हो, किन्तु धरती पर रहने वाले प्राणियों के लिए पीने या सिंचाई के योग्य नहीं है। शेष ३% पानी ही विभिन्न रूप में प्रयोग के योग्य है।इस शेष उपयोगी (३%) जल का लगभग ७७% अंश तो ध्रुवों, पहाड़ों पर हिम शिलाखण्डों के रूप में जमा है। लगभग २२% अंश भूजल (भूमि की सतज और भूगर्भ में संचित) है। शेष ०१% जल के रूप में (नदियों, झरनों) के रूप में उपलब्ध है।प्रत्यक्ष उपयोगी जल प्रवाहित जल एवं भूजल के स्रोतों से ही प्राप्त होता है। मनुष्य द्वारा उपयोग किये जाने वाले कुल जल का लगभग ७३% पानी सिंचाई के काम आता है। औद्योगिक इकाइयाँ २१% जल का उपयोग कर लेती हैं। घरेलू उपयोग में ६% जल ही आता है। इस जल की उपलब्धि भूजल एवं प्रवाहित जल स्रोतों से ही होती है। इसका मूल आधार वर्षा जल ही है। हमें उसी के संचय, संवर्धन एवं संरक्षण की रीति- नीति अपनाने की जरूरत है।मनुष्य की गलतियों के कारण हिमखंडों के रूप में संचित जल घट रहा है। भूजल के अत्यधिक दोहन, दुरुपयोग करने तथा जल संरक्षण की अपनी जिम्मेदारी न समझने के कारण भूजल भी घटता जा रहा है। प्रवाहित जल का हिसाब लगायें तो वर्ष के चार महीनों में ८०% जल बह जाता है। शेष २०% से ८ महीने काम चलाना पड़ता है।समझदार बनें, जिम्मेदारी निबाहेंसमझदारी का तकाजा है कि पानी का उपयोग करने वाले हर व्यक्ति, परिवार एवं संस्थान को पानी के स्रोतों को शुद्ध बनाये रखने तथा पानी के संचयन एवं सदुपयोग के लिए कोई सुनिश्चित जिम्मेदारी उठानी चाहिए। प्राचीन काल में राज्य सरकारें, ग्राम पंचायते तथा सम्पन्न वर्ग के लोग जल संचयन- संरक्षण को पर्याप्त महत्त्व देते थे। हर गाँव में एक पोखर (छोटा कच्चा तालाब) जनसहयोग से बनाया जाता था। राजा एवं धन सम्पन्न लोग बड़े और पक्के तालाब बनवाते थे। वर्षा में बेकार बह जाने वाला पानी उनमें संग्रहीत हो जाता था। उसके कारण उस क्षेत्र के भूजल का स्तर बना रहता था। इस कारण कुओं, बावड़ियों आदि में हर मौसम में पर्याप्त जल मिलता रहता था।जब इन छोटे- बड़े तालाबों का पानी घट जाता था तो लोग खाली क्षेत्र की मिट्टी विभिन्न कामों (र्इंट बनाने, कच्चे मकान मरम्मत करने, खेतों में ऊर्वर मिट्टी डालने आदि) के लिए निकलवा लेते थे। इससे तालाबों की जल संरक्षण की क्षमता घटने नहीं पाती थी।पुराने जमाने में संसाधन कम थे, जनसंख्या भी कम थी, फिर भी हर क्षेत्र में सैकड़ों तालाब बनाये गये थे। बढ़ते संसाधनों और बढ़ती जनसंख्या को देखते हुए उनकी संख्या बढ़नी चाहिए थी, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। उल्टे उनकी देखरेख के अभाव में और जल क्षेत्र की सूखी जमीन पर अतिक्रमण पूर्वक अधिकार कर लेने की दुष्प्रवृत्ति बढ़ने के कारण उनकी संख्या और जल संचयन क्षमता घटती जा रही है। इसी कारण वर्षाकाल द्वारा दिये गये जल अनुदान का अधिकांश भाग बहकर खारे समुद्र में चला जाता है। जमीन के चर- अचर जीव आठ महीने पानी का अभाव झेलते रहते हैं।अब तो विज्ञान और टेक्नोलॉजी ने काफी प्रगति कर ली है। राज्यों की सम्पदा और धन सम्पन्न व्यक्तियों में भी काफी वृद्धि हुई है। यदि उनकी सम्पदा और जन- जन के श्रम- सहयोग का एक सुनिश्चित अंश भी जल स्रोतों की शुद्धता बनाये रखने तथा जल संचयन के उपक्रम बनाने में लग सके तो बात बन जाये।उपचार कठिन नहींयदि मनुष्य समझदारी अपनाए, जिम्मेदारी निभाने का मन बनाये तो जल की कमी दूर करने के लिए अनेक कारगर उपचार थोड़े श्रम, सहयोग एवं साधनों से किए जा सकते हैं। जैसे-पुराने तालाबों- पोखरों का जीर्णोद्धार, पुनर्विकास। यह कार्य ग्राम पंचायतें, नगर पालिकाएँ, राज्य सरकारें तथा  सम्पन्न औद्योगिक इकाइयाँ अपने निश्चित बजट इस हेतु खर्च करके, जनसहयोग जाग्रत करके आसानी से कर सकती हैं। तालाबों की भूमि पर अतिक्रमण न होने दिया जाय। गर्मियों में पानी घट जाने या सूख जाने पर जेसीबी मशीनें लगाकर तालाबों की मिट्टी निकाली जाय। वह मिट्टी बहुत उपजाऊ होती है। किसान ट्रैक्टर ट्रॉलियों में भरकर उन्हें खेतों में बिखेर दें।जहाँ भी ढलानें हैं, वहाँ बहने वाले पानी के रास्ते में जगह- जगह छोटी- छोटी खाइयाँ खोद दी जायें, स्वाभाविक रूप से बन गई पानी की गलियों के मार्ग में पत्थरों के छोटे- छोटै अवरोध बना दिए जायें, वनस्पतियाँ उगा दी जायें तो बहने वाला पानी का बड़ा अंश जमीन के अन्दर उतर कर भूजल को बढ़ा देता है।सम्पन्न किसान अपनी जमीन के १०% भूखण्ड में तालाब बना लें। इससे उनकी शेष जमीन और आसपास की जमीन के लिए सिंचाई की व्यवस्था भी बन सकती है और भूजल के स्तर में वृद्धि भी हो सकती है।नये छोटे तालाबों का निर्माण सरकारी मनरेगा के अन्तर्गत भी किया जा सकता है। विधायक और सांसद निधि को भी इस उद्देश्य में खर्च किया जा सकता है। बड़े औद्योगिक संस्थानों के पास जनहित (वैलफेअर) कार्यों के लिए काफी बजट होता है।भूजल का स्तर बढ़ाने के छोटे- छोटे सफल प्रयोग अनेक हैं। जो प्राणवान परिजन इस दिशा में काम करना चाहें, आदर्श ग्राम योजना में जल संरक्षण को भी शामिल करना चाहें, वे शांतिकुंज युवा प्रकोष्ठ से सम्पर्क साधकर जानकारियाँ प्राप्त कर सकते हैं एवं मार्गदर्शन ले सकते हैं।

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भाव संवेदना की चमत्कारी शक्ति

अध्यात्मवेत्ताओं ने चेतना की उच्चस्तरीय विभूतियों में से मस्तिष्क को बुद्धि का और हृदय को भावना का केन्द्र माना है। जड़ शरीर के साथ चेतना का समीकरण करने वाले इन दो अवयवों का अपना विशेष स्थान है। इतने पर भी सूक्ष्म संस्थानों में हृदय का महत्त्व सर्वोपरि है। सामान्य वैज्ञानिक विश्लेषण करने पर तो यह आकुंचन- प्रकुंचन या 'लप- डप' करती रक्त से भरी थैली मात्र जान पड़ता है। यह शरीर के विभिन्न अंगों को रक्त भेजता, अशुद्ध रक्त को एकत्रित एवं परिशोधित करता मात्र प्रतीत होता है। पर यह तो इसका स्थूल पक्ष है। आध्यात्मिक प्रतिपादनों में इस संस्थान को सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है। योगियों ने इस अंग को चेतना का केन्द्र माना है। गीताकार ने इसे ही आत्मा का निवास स्थल बताया है। तीन शरीरों से बनी मानवी काया में सबसे महत्त्वपूर्ण शरीर 'कारण शरीर' का स्थान हृदय को ही बताया गया है। इसे जाग्रत एवं विकसित कर लेने पर मनुष्य ऋद्धि- सिद्धियों का स्वामी बन जाता है। अध्यात्मवेत्ताओं द्वारा इस क्षेत्र को विकसित करने के लिए अत्यधिक जोर दिया गया है जो अकारण नहीं है। इस आग्रह के पीछे ठोस वैज्ञानिक आधार हैं जिन्हें समझा जा सके तो मनुष्य का व्यक्तित्व एवं उसकी सामर्थ्य कई गुना अधिक प्रखर हो सकती है। हृदय में धड़कती संवेदना धड़कते हृदय एवं उससे निकलने वाली ध्वनि तरंगों में भाव सम्वेदनाओं की आत्मीयता की सघनता हो तो उसका चमत्कारी प्रभाव- परिणाम दिखायी पड़ता है। दूसरों को प्रभावित करने, अनुकूल बनाने तथा श्रेष्ठ मार्ग पर बढ़ने के लिए प्रेरित करने में भाव सम्वेदनाओं की ही प्रमुख भूमिका होती है। ऋषि- मनीषियों, संत- महात्माओं, महापुरुषों में यह विशेषता देखने को मिलती है कि वे अन्त:करण की महानता द्वारा ही दूसरों को अनुवर्ती बनाते हैं। अन्यों को श्रेष्ठ जीवन जीने, परमार्थ प्रयोजनों में जुटने को बाध्य करते हैं। आध्यात्मिक क्षेत्र में हृदय की महत्ता, उसमें उठने वाली भाव सम्वेदनाओं की उपयोगिता को बहुत पहले से ही स्वीकार किया जाता है। इस तथ्य को अब वैज्ञानिक परीक्षणों द्वारा भी मान्यता मिल रही है। सामान्यतया माताएँ नवजात शिशुओं को अपने बायें वक्षस्थल से चिपकाये रहती हैं। सर्वेक्षणकर्ता वैज्ञानिकों का कहना है कि इसका कारण दाहिने हाथ का कामों में व्यस्त रहना नहीं है। बायें हाथ से काम करने वाली महिलाएँ भी अपने शिशुओं को बायीं गोद में ही लिये रहती हैं। पुरातत्व संग्रहालयों में संकलित मूर्तियों, प्राचीन तैल चित्रों, कलाकृतियों का अध्ययन किया गया तो निष्कर्षों में पाया गया कि अस्सी प्रतिशत महिलाएँ अपने शिशुओं को बायें सीने से चिपकाये हुए हैं। इसे चित्रकारी की परम्परागत विशेषता कहकर नहीं टाला जा सकता। वैज्ञानिक परीक्षणों के निष्कर्ष इस सन्दर्भ में सुप्रसिद्ध मानवशास्त्री डॉ. ली. साल्क ने अपने अनुसंधान निष्कर्ष में बताया है कि बायीं ओर हृदय का अवस्थित होना माताओं द्वारा अपने शिशुओं को बायीं ओर चिपकाये रहने का विशेष कारण हैं। जाने- अनजाने माँ अपने बच्चे को उसका अधिक से अधिक सामीप्य देना चाहती है। मातृ- हृदय की धड़कन के साथ भाव- संवेदनाएँ भी तरंगित होतीं और उभरती रहती हैं। उनके आदान- प्रदान से माताएँ स्वयं तो संतोष की अनुभूति करती ही हैं, बच्चे के ऊपर भी अनुकूल प्रभाव पड़ता है। हृदय की ध्वनि तरंगों को सुनकर बच्चा एक अनिर्वचनीय आनन्द में डूबा रहता है। इस सम्बन्ध में डॉ. डिस्पाण्ड मॉरिस ने भी महत्त्वपूर्ण खोजें की हैं। अपनी एक अनुसंधानपूर्ण कृति में कहा है कि हृदय की ध्वनि ही एकमात्र वह शाश्वत ध्वनि है जिसे शिशु गर्भावस्था में सुनता है। माँ के गर्भ से बाह्य संसार में आने पर वह विभिन्न प्रकार की ध्वनियाँ सुनकर परेशान रहता है। माँ जब उसे गोदी में लेती है तो उसे सुखद अनुभूति होती है। देखा गया है कि रोते हुए बच्चों को सीने से चिपकाते ही वे चुप हो जाते हैं। माँ के धड़कते हुए संवेदनशील हृदय की ही यह प्रतिक्रिया है, जिसकी सुखद ध्वनि तरंगों को सुनते ही बच्चे रोना बन्द कर देते हैं। इस तथ्य को परीक्षण की कसौटी पर कसने के लिए अमेरिकी वैज्ञानिक डॉ. ली साल्क ने जब मातृ हृदय की धड़कन की ध्वनि को टेप करके रोते हुए नवजात शिशुओं को सुनाया तो उन्होंने रोना बन्द कर दिया। उनके मुखमण्डल पर शान्ति एवं प्रसन्नता के भाव उभरने लगे। इससे निष्कर्ष निकाला गया कि माताओं के धड़कते हृदय के साथ उनकी सुकोमल वात्सल्य भावनाएँ भी जुड़ी रहती हैं, जिनसे पूर्व परिचित होने के कारण शिशु सहज ही आकर्षित हो जाते हैं। ध्वनि तरंगों में घुली भाव- संवेदनाएँ बच्चे के हृदय को उद्वेलित करतीं हैं और सुखद प्रभाव डालती है। पशु, पक्षी, वनस्पति पर प्रभाव यह तो प्रकृति प्रदत्त मातृ हृदय के साथ जुड़ी भाव संवेदना का सामान्य पक्ष रहा, जिसका लाभ बच्चे सहज ही उठाते रहते हैं। असामान्य पक्ष की सामर्थ्य एवं संभावनाओं को, आत्मीयता को उभारा- उछाला जा सके तो उससे न केवल मनुष्य जाति को एकता, स्नेह, सौहार्द्र के सूत्र में बाँधा जा सकता है, वरन् जीव- जन्तुओं, पशु- पक्षियों एवं पेड़- पौधों को भी वांछित दिशा में मोड़ा- मरोड़ा तथा वशवर्ती बनाया जा सकता है। कैलीफोर्निया के विलक्षण संत लूथर बरबैक अपनी भाव साधना में इतने सिद्ध- हस्त हो गये थे कि प्रकृति के कण- कण से वे प्यार करने लगे और प्यार बाँटने लगे। उनकी सहृदयता से प्रभावित होकर वनस्पतियों को भी अपने गुण, कर्म, स्वभाव में परिवर्तन लाने को मजबूर होना पड़ा। उनके बगीचे में जो भी वृक्ष- वनस्पति हैं, उनसे वे पुत्रवत् आत्मीयता रखते हैं। इससे उनके बगीचे में काँटे रहित गुलाब उगते हैं और दिन में कुमुदिनी खिलती है। अखरोट के वृक्ष जो ३२ वर्ष में फल देने योग्य होते हैं, १७ वर्ष में ही फलने- फूलने लगते हैं। यह सब भावनाओं का, आत्मीयता का ही चमत्कार है। इस दृष्टि से शरीर के अन्य अंगों की तुलना में हृदय का महत्त्व कहीं अधिक है। सामान्य बोलचाल के प्रसंगों में सबसे प्रिय वस्तु का सम्बन्ध हृदय से जोड़ने के पीछे यही कारण है। प्रार्थना, उपासना, साधना में भावनाओं का महत्त्व प्रतिपादित करने, उन्हें विकसित करने पर जोर देने के पीछे यही मनोवैज्ञानिक आधार है कि परमात्मा द्वारा दिये गये भावसूत्रों में ही मनुष्य को बाँधा जा सकता है। भाव- संवेदनाओं से भरपूर व्यक्ति असंख्य को अपना बना लेते और सहयोग करने के लिए विवश कर देते हैं। वस्तुत: यह भावनाओं का ही खेल है। मनुष्य को एकता के सूत्र में बाँधने के अन्य प्रयत्नों की सफलता तब तक संदिग्ध ही बनी रहेगी जब तक कि भाव- संवेदनाओं की सहृदयता को विकसित करने की उपेक्षा होती रहेगी। मनुष्य जीवन का सौभाग्य और आनन्द सहृदयता- आत्मीयता के सहारे ही उपलब्ध होता है।