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इस्लाम के अनेक विद्वानों ने गायत्री महामंत्र का महत्त्व स्वीकारा और सराहा है

इस्लाम में 'सूरह फातिहा' का भाव और महत्त्व गायत्री महामंत्र जैसा ही हैरमजान का महीना (मई १५ से जून १४) एवं गायत्री जयंती (२२ जून) के संदर्भ मेंपंथ अनेक- लक्ष्य एकदुनियाँ के सभी धर्म- सम्प्रदाय, दीन- मज़हब मनुष्य को एक सनातन सत्य की ओर प्रेरित करते रहे हैं। शास्त्र वचन है 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।' अर्थ सत्य एक ही है, ज्ञानी जन उसे अनेक ढंग से समझाते रहते हैं।भगवान रामकृष्ण परमहंस ने अपने अनुभव के आधार पर इसी सत्य की घोषणा करते हुए कहा है- "जितने मत, उतने पथ।"महात्मा गाँधी कहते रहे हैं- "सभी पंथ मनुष्य को एक ही परम सत्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। जब हम एक ही लक्ष्य पर पहुँचना चाहते हैं तो किसी भी मार्ग से जाने में क्या हर्ज है?"युगऋषि पं. श्री आचार्य श्रीराम शर्मा ने कहा है- "सभी धर्म- सम्प्रदाय अपने समय और क्षेत्र की आवश्यकता के अनुसार कुछ सनातन सूत्रों और कुछ सामयिक कार्यक्रमों को मिलाकर चले हैं। सामयिक कार्यक्रमों से परे, सनातन सूत्रों पर ध्यान दिया जाय तो बाहर से दिखते भेदों से परे एकता, समता के दर्शन किए जा सकते हैं।"सभी धर्म- सम्प्रदायों के विवेकवान साधक इस तथ्य को समझते रहे हैं। इसके प्रमाण इतिहास में जगह- जगह मिलते हैं। इस्लाम में भी मलिक मोहम्मद जायसी, अब्दुल रहीम खानखाना उर्फ रहीम, रसखान आदि ने भक्ति के मूल भावों को अनुभव करते हुए जीवन जिया और उसी के अनुसार समाज को प्रेरणा देने के प्रयास किये।गायत्री महामंत्र की महत्ता भारतीय संस्कृति में निर्विवाद रही है। उसे सर्वश्रेष्ठ मंत्र, गुरुमंत्र जैसे विशेषणों से सम्बोधित किया गया। उसे आदि गुरुमंत्र कहा गया है, सभी ऋषियों, अवतारियों ने इसकी साधना की है। इस्लाम के अनेक विद्वानों ने इस तथ्य को समझा- स्वीकारा है। अपने- अपने ढंग से उसकी महिमा का गान भी किया है। कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं :-मौलवी शाह गुलहसनमौलवी साहब की उर्दू भाषा में प्रकाशित प्रसिद्ध पुस्तक 'तजकराये गौसिया' में पृष्ठ ५२ पर एक ऐसे सूफी मुस्लिम संत का जिक्र है जो हिन्दू संत- योगी के रूप में विख्यात थे। उनसे मौलवी साहब ने पूछा कि 'हिन्दुओं और मुसलमानों की फकीरी में आपने क्या फर्क देखा? तो उनका उत्तर था, "फकीरी की बात तो दोनों तरफ एक- सी है, शब्दों और पारिभाषिक शब्दावली में भर फर्क है। इसी पुस्तक के पृष्ठ क्र. ४८ पर उन्होंने अपनी गायत्री साधना के संबंध में भी उल्लेख किया है। उन्होंने अपने "जाई बाप" (जिनकी धर्मपत्नी ने उन्हें अपना दूध पिलाया था) पं. राम सनेही जी की प्रेरणा से गायत्री महामंत्र का जाप कनखल, हरिद्वार में गंगा किनारे कुंभ के दौरान किया था। उन्होंने गायत्री मंत्र का अर्थ और महात्म्य कुछ इस प्रकार लिखा है :-ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।।अनुवाद 'अल्लाहताला जो कुल मख्लूकात (सृष्टि) में जलवागर है और परस्तिश (उपासना) के काबिल है। उस पैदा कुननदा (पैदा करने वाले) का नूर (दिव्य प्रकाश) सब जनों में जलवागर है। हम फरमावरदार (आज्ञाकारी) प्रेम और श्रद्धा से यकीन करते हैं कि वो हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ दिल और अक्ल आदि को अपनी तरफ लगाएँ।स्पष्ट है कि उन्होंने गायत्री महामंत्र के महत्त्व को ठीक से समझा तो उसे इस्लाम की मूल भावना के अनुरूप ही पाया और उसकी साधना श्रद्धापूर्वक की।अल्लामा मोहम्मद इकबाल"सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा" जैसे लोकप्रिय राष्ट्रगीत के लेखक इकबाल साहब को भी गायत्री महामंत्र के भावों और विचारों ने प्रभावित किया है।अल्लामा डॉ. मोहम्मद इकबाल की ग्रंथावली (कुल्लियात इकबाल) में पृष्ठ २० पर तरजुमा गायत्री- 'आफताब' शीर्षक से किया गया है, जो इस प्रकार है-ऐ आफताब रूह खाने जहाँ है तू।शीराजा बंद दफ़तरे कौनोमकां है तू।।वाइस है तू जूदो अदम की नमूद का।है सब्ज़ तेरे दम से चमन हस्तोबूँद का।।कायम यह अन्सुरो का तामाशा तुझी से है।हर शय में जिंदगी का तकाज़ा तुझी से है।।हर शय को तेरी जलवागरी से सवात है।तेरा यह सोजो साज सरापा हयात है।।वो आफ़ताब जिससे जमाने में नूर है।दिल है, खिरद है, रूहे रवा है, शऊर है।।ए आफ़ताब, हमको ज़ियाए शऊर दे।चश्मे खिरद को अपनी तजल्ली से नूर दे।।है महफिले वजूद का सामां तराज़ तू।यजदाने साकिनाने नशेबो फराज़ तू।।तेरा कमाले हस्ती है हर जानदार में।तेरी नमूद सिलसिलाए कोहसार में।।हर चीज़ की हयात का परवरदिगार तू।जाइदगाने नूर का है ताजदार तू।।न इब्तदा कोई, न कोई इन्तहा तेरी।आज़ाद कैदे अवल्लोआखिर जिया तेरी।।अर्थात्- हे सविता (परमसत्ता) तू ही जीवन के स्पंदन का मूल है। तू ही इस संसार को संचालित करने वाला है, लोक- परलोक का विधाता, पंचतत्त्वों में प्राण डालने वाला है। हर वस्तु तेरे प्रकाश से प्रकाशित और गतिवान है, तू ही वह दैदीप्यमान सूर्य है, जिसका प्रकाश सब में व्याप्त है, चाहे बुद्धि हो या दिल हो। हे सूर्य! हमको सद्बुद्धि और अपने नूर की आभा का ज्ञान दे। तू ही सृष्टि के मूल का कारण है और यहाँ रहने वालों की स्थिति का पूर्ण ज्ञाता भी। पर्वत में, हर जानदार में, सृष्टि के कण- कण में तू ही व्याप्त है। तू सबका पालनहार है। सब तेरे ही प्रकाश से प्रकाशित हैं। तू आदि- अंत के बंधन से परे, सदा से प्रकाशित है।उन्होंने भी सविता का अर्थ सबको उत्पन्न करने वाले परमात्मा ही दिया है। परमात्मा- परवरदिगार को अपने जीवन की बागडोर सौंप देने वाली यह प्रार्थना उन्हें भी अति उत्तम, प्रभावपूर्ण लगी। वे इसकी अभिव्यक्ति के लिए अपनी कलम को रोक नहीं सके।साविर अबोहरीसाविर अबोहरी उर्दू के प्रसिद्ध लेखक हुए हैं। उर्दू पत्रिका 'हमारी जुबान' ८ मई १९९४ में पृष्ठ ६ पर वे कहते हैं कि यह मंत्र 'सूरह फातिहा' से बहुत मिलता- जुलता है। वे गायत्री मंत्र का कविता में इस प्रकार अनुवाद करते हैं।१. ए खुदाए इज्जु जल, खालिके अरजो- समां।मालिके कौनोमकां, ममवए लुत्फोकरम।वाहिदो यकता है तू, बे नजीरो बे मिसाल।।२. कादिरे मुतलक है तू, तेरी हस्ती बेकरां।इब्तदा इसकी कोई और न कोई इन्तहा।तेरे दम से है रवां, जिंदगी का कारवाँ।।३. नूर का दरया है तू, तेरे जलवे सूबसू।तेरी ज़ाते पाक पर, हम दिलोजां से फिदा।तू हमारी अक्ल को, कामिल व पुख्ता बना,नेक रास्ते पर लगा।।सूरह फातिहा'सूरह फातिहा' को इस्लाम में सर्वोपरि प्रार्थना का स्थान दिया गया है। क़ुरान शरीफ के प्रारंभ में यह प्रार्थना की गई है। संत विनोबा भावे ने अपनी पुस्तक च्रूहुल क़ुरान (क़ुरान सार) में इसे क़ुरान शरीफ का मंगलाचरण कहा है। हर नमाज में इसका पाठ जरूरी होता है। मौत के बाद मृतक की रूह (आत्मा) की शान्ति के लिए उसकी कब्र पर जाकर उसके प्रिय जन सूरह फातिहा अवश्य पढ़ते हैं। उसका मूल पाठ और भावार्थ कुछ इस प्रकार है :-'बिस्मिल्लाहर्रमानर्रहीम' यह इस्लाम का सूत्र वाक्य है जो क़ुरान शरीफ की हर आयात के पहले लिखा गया है। इसका भावार्थ है :- शुरू करें अल्लाह के नाम से जो अत्यंत दयालु और परम कृपालु है।१. अलहम्दुलिल्लाहिरविबल आलमीन यह सूरह फातिहा का प्रथम चरण है, इसलिए 'फातिहा को 'अलहम्द शरीफ' भी कहते हैं।इसका भावार्थ है- सारी स्तुतियाँ सिर्फ अल्लाह के लिए हैं, जो सारी सृष्टि का पालन- पोषण करने वाला है।२. अर्रहमानर्रहीम वह रहमतों (कृपाओं) की वर्षा करने वाला और दयालु है।३. मालिके यौमद्दीन वही अन्तिम न्याय और दीन- धर्मानुशासन को लागू करने वाला- मालिक है।४. इय्याक़ नआबुदु व इय्याक नस्तईनभावार्थ- (हे परमात्मा) हम तेरी ही भक्ति करते हैं और तुझसे ही सहायता पाना चाहते हैं।• इहदिनस्सिरात्तलमुस्तक़ीमभावार्थ- (हे प्रभु) तू हमें सीधी राह पर चला।• सिरातल्लजीन अन्ऊम्त अलैहिमभावार्थ उस राह पर चला जिस पर चलने वालों पर तू अपने अनुदानों की वर्षा करता है।• गैरिल- मगजूबिअलैहिम वलज्ज्वाल्लीनभावार्थ- उस राह पर मत चला जिस पर चलने वालों पर तेरा कोप बरसता है।सूरह फातिहा का अध्ययन करने पर स्पष्ट दिखता है कि गायत्री महामंत्र के भावों को ही समय की आवश्यकता के अनुसार कुछ विस्तार दे दिया गया है।दोनों का समीक्षात्मक अध्ययनअनेक विद्वानों ने इनकी समता के बारे में समीक्षात्मक अध्ययन किया है। यहाँ डॉ. मोहम्मद हनीफ खाँ शास्त्री के अध्ययन का सार- संक्षेप प्रस्तुत किया जा रहा है। उन्होंने कामेश्वर सिंह दरभंगा विश्वविद्यालय, दरभंगा (बिहार) से महामंत्र गायत्री एवं सूरह फातिहा विषय पर संस्कृत में पीएच.डी. किया है। उन्होंने 'महामंत्र गायत्री'और सूरह फातिहा का एकीकरण इन शब्दों में किया है-अब जहाँ सूरह फातिहा की बात है, वह गायत्री मंत्र से अलग नहीं है। यदि द्वेष रहित एवं उदारतापूर्वक इसके वाक्यांशों पर विचार किया जाए तो ऐसा प्रतीत होता है कि सूरह फातिहा- सूत्र रूप महामंत्र गायत्री की ही व्याख्या स्वरूप है। उदाहरणार्थ एक- एक करके प्रत्येक वाक्य की व्याख्या इस प्रकार देखी जा सकती है-तत्सवितुर्वरेण्यं अर्थात् वही सविता देव वरण करने योग्य है। अब प्रश्न उठता है कि कौन सविता देव है, उनका परिचय क्या है और सिर्फ वही क्यों वरण करने योग्य है? चूँकि पीछे यह सिद्ध किया जा चुका है कि ब्रह्म या अल्लाह का ही गुणवाचक नाम 'सविता' है, इसलिए उक्त प्रश्न का उत्तर सूरह फातिहा के पहले वचन से ही मिल जाता है कि सविता देव ही क्यों वरण करने योग्य है।अलहम्दुलिल्लाहिरब्बिल आलमीनअर्थात् (क्योंकि) दुनिया की सारी प्रशंसाएँ सिर्फ अल्लाह के लिए ही हैं जो (बड़ी ही उदारतापूर्वक)सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का पालन- पोषण करने वाला है।यहाँ भी साफ- साफ बता दिया जा रहा है कि वह अल्लाह ही हर प्रशंसा के लायक है। क्योंकि वही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का पालन- पोषण करने वाला- रब्बुल आलमीन है, इसलिए बस वही वरण करने योग्य है।भर्गो देवस्य धीमहि अर्थात् उसी महातेज स्वरूप देवता का ध्यान करते हैं, जो हमारे पापों को जलाकर राख कर देता है। अब प्रश्न उठता है कि बस उन्हीं तेज स्वरूप देवता का ध्यान क्यों करते हैं? उससे क्या लाभ है? इसका उत्तर सूरह फातिहा के अगले वचनों से मिलता है।अर्रहमाननिरहीम मालिकेयोमिद्दीन अर्थात् (क्योंकि) वह अपनी रहमतों की निरन्तर बारिश करने वाला, अत्यंत दयालु है, इसलिए हमारे पापों को जलाकर रख देता है यानी गुनाहों को माफ कर देता है और अन्त में सही न्याय देने वाला है। हमारी निष्ठा और मेहनत से किये गये कर्मों का सही- सही न्यायपूर्वक मजदूरी के रूप में बदला जो देता है, इसीलिए बस उसी महातेज स्वरूप देवता का ध्यान करते हैं और कहते भी हैं कि-इय्याक नअबुदु व इय्याक नस्तईन :-अर्थात् (हे महातेज स्वरूप परमात्म देव) हम तेरी ही भक्ति करते हैं और बस तुझ से ही मदद चाहते हैं। क्या मदद चाहते हैं? उत्तर में महामंत्र गायत्री के वचन बोल पड़ते हैं-धियो यो न: प्रचोदयात्।अर्थात् जो हमारी बुद्धि को प्रेरित करें।जब वह परमात्मा, परवरदिगार हमारी बुद्धि को पे्ररित करेगा तो वह भटक कर गलत रास्ते पर नहीं जा सकती। सही रास्ते पर आगे बढ़ती हुई मनुष्य के इष्ट लक्ष्य तक पहुँच ही जायेगी।प्रार्थना के इसी भाव को सूरह फातिहा में इस प्रकार व्यक्त किया गया है।इहदिनस्सियतल्मुस्तकीम अर्थात् (हे परमेश्वर) हमको सीधी राह चला।सीधी राह कैसी होनी चाहिए, इस उधेड़- बुन में प्रार्थी नहीं पड़ता। क्योंकि उसे पता नहीं है कि सीधी राह क्या है। तभी तो बुरे कर्म भी अच्छे समझ कर करता है, किन्तु समझ में तब आता है जब वह काफी भटक गया होता है। इसलिए वह सहज भाव से अबोध बालक की तरह साफ- साफ बोल देता है कि सिरातल्जीन अन् अम्ता अलैहिम अर्थात् उन लोगों की राह चला, जिस राह पर चलने वालों को तूने असीम पारितोषिकों से पुरस्कृत किया है। यहाँ कोई भेदभाव नहीं है, कोई जात- पात नहीं है, किसी प्रकार का कोई वैमनस्य नहीं। ये सीधी राह चलने वाले पुरस्कृत लोग किसी भी देश, किसी भी भाषा भाषी, किसी भी जाति, किसी भी धर्म के हों, बस उन्हीं की राह पर चलाने के लिए प्रार्थना की जा रही है। इसके विपरीत यह भी कहा जा रहा है कि ऐ अल्लाह।गैरिल- मगजूबि अलैहिम वलज्ज्वाल्लीनअर्थात् उन लोगों की राह पर मत चलाओ, जो पथ भ्रष्ट हुए और तेरे प्रकोप के भाजन हुए हैं।इस प्रकार दोनों महामंत्रों की उपर्युक्त व्याख्या से स्वत: ही ज्ञात होता है कि दोनों में आश्चर्यजनक एकीकरण है। हाँ समय के हिसाब से सूरह फातिहा द्वारा याचना में भी वृद्धि की गयी- सी लगती है और इसमें साफ- साफ स्पष्ट रूप से व्याख्या सहित याचना की गयी है, ताकि सूत्रात्मक शब्दों के अर्थों में मनगढंत कल्पना न की जा सके। इसके साथ ही एक बात और उभर कर सामने आती है कि यदि द्वेष रहित होकर सूरह फातिहा की दृष्टि से महामंत्र गायत्री को देखा जाए तो इसकी कल्याणमयी आभा और भी दैदीप्यमान होती है।समय के अनुरूप प्रयोग होंयह युग परिवर्तन का महत्त्वपूर्ण समय है। मनुष्य मात्र के लिए सतयुग जैसी परिस्थितियाँ लाने के लिए, परमात्मा के साथ साझेदारी निभाने के लिए सनातन धर्म वालों द्वारा जो किया जा रहा है, वैसे ही इस्लाम धर्म के पाबन्द विवेकवान व्यक्ति भी कर सकते हैं। वे गायत्री महामंत्र के स्थान पर सूरह फातिहा के जप और लेखन की व्यक्तिगत और सामूहिक साधनाएँ कर सकते हैं। सूरह फातिहा में समय के अनुसार कुछ व्याख्याएँ बढ़ जाने से वह लम्बा हो गया है, इसलिए उसके जप- लेखन में कठिनाई आ सकती है। उसका समाधान यह है कि व्याख्या वाले अंश कम करके मूलभाव वाले चरण भर चुनकर उनके जप और लेखन का अभियान चलाया जाय। जैसे-ॐ भूर्भुव: स्व: के तत्सम अर्रहमानर्रहीम मालिके यौमद्दीन को लें। दोनों में परमात्मा को सारे विश्व में समाया हुआ और श्रेष्ठ गुणवाला माना गया है। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि के तत्सम इय्याक़ नआबुदु व इय्याक नस्तईन को लिया जाय। दोनों में परमात्मा को वरण करने योग्य और धारण करने की भावना की गई है।धियो यो न: प्रचोदयात् के स्थान पर इहदिनस्सिरात्तलमुस्तक़ीम लें। दोनों में प्रभु के अनुरूप सीधे मार्ग पर सही दिशा में बढ़ने की प्रार्थना है। इस्लाम के अनुसार भी 'दौरे हक' सतयुग आना ही है। इसके लिए ईश्वर की साझेदारी करने की साधना वे भी करें और परमात्मा के अनुग्रहों- अनुदानों को पाने के सच्चे हकदार बनें।

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समूह चेतना जागे, स्वार्थ- संकीर्णता भागे

व्यक्ति और समाजहमारे जीवन के दो बिन्दु हैं- एक व्यक्तिगत, दूसरा समष्टिगत। एक हमारी जीवन यात्रा का प्रारम्भ स्थान है तो दूसरा गन्तव्य। व्यक्तिगत जीवन अपूर्ण है, वह समाजिक जीवन में आत्मसात होकर ही पूर्ण बनता है। व्यक्ति और कुटुम्ब मरते हैं, नष्ट होते रहते हैं, पैदा भी होते हैं, किन्तु समष्टि का जीवन अखण्ड है, अनन्त है, सदा- सदा चलता रहता है। व्यक्तिगत जीवन सामयिक बरसाती चिर- प्रवाहित सुरसरि की तरह है जो कभी रुकता ही नहीं।जीवन के विकास के अनुकूल साधन, परिस्थितियाँ, समाज ही जुटा सकता है। समाज से परे एकाकी रहकर तो व्यक्तिगत जीवन का भी विकास सम्भव नहीं है। विभिन्न शिक्षण संस्थायें, उनमें काम करने वाले व्यक्ति, जीवन- निर्वाह के साधन, ज्ञान विज्ञान, अविष्कार अन्वेषण के व्यापक कार्यक्रम क्या एक व्यक्ति से सम्भव है? एकाकी व्यक्ति तो सुख भी नहीं भोग सकता। जिसे हम सुख और आनन्द कहते हैं, वह भी तो समाज की ही एक स्थित है। सुख के स्वर्ग में भी यदि मनुष्य को एकाकी छोड़ दिया जाए तो वह उससे ऊब जाएगा और भयभीत हो उठेगा।हमारे कार्य व्यवहार सामाजिक जीवन को परिपुष्ट और विकसित करने के लिए हो। स्वामी रामतीर्थ ने कहा था- "तुम समाज के साथ ही ऊपर उठ सकते हो और समाज के साथ ही तुम्हें नीचे गिरना होगा। यह तो नितान्त असम्भव है कि कोई व्यक्ति अपूर्ण समाज में पूर्ण बन सके। क्या हाथ अपने को शरीर से पृथक्बलशाली बना सकते हैं? कदापि नहीं।"जिस समाज में व्यक्ति अपने- अपने लाभ, अपने सुख, अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं की प्रेरणा से जीते हैं, वह समाज विशृखंलित हो जाता है, चाहे उसमें कितने ही बड़े विद्वान योद्धा, राजनीतिज्ञ, शक्तिशाली व्यक्तित्व क्यों न हों?स्मरण रहे व्यक्ति और समाज की उन्नति साथ- साथ चलती है। यदि समाज कमजोर, विशृंखल, अव्यवस्थित होगा तो वह व्यक्ति के विकास में समर्थ न हो सकेगा। इतिहास इस बात का साक्षी है कि इसी कमजोरी के कारण; सामाजिक चेतना के अभाव में अपने ही लाभ और सुख को मान्यता देने के कारण ही हमें विदेशियों के आक्रमण तथा अत्याचार के दिन देखने पड़े। मुहम्मद गौरी, गजनवी, तैमूरलंग, नादिरशाह को हमारी सामाजिक विशृंखलता, व्यक्तिवाद के कारण ही अपने पैर जमाने में सफलता मिली।वर्तमान समय की विडंबनाएँआज राजनैतिक दृष्टि से हम स्वतंत्र हो गये हैं, लेकिन अभी तक हम अपनी नागरिक जिम्मेदारियों के प्रति सचेत नहीं हो पाये हैं। यही कारण है कि कन्ट्रोल के समय हमारे यहाँ काला बाजार जोरों पर चलता है। अनाज के भण्डार भरे रहने पर भी कृत्रिम महँगाई पैदा करके अत्यधिक मुनाफा कमाते हैं। और तो और सार्वजनिक निर्माण कार्यों में लगने वाले सामान यथा- सीमेन्ट, लोहा, कोलतार, लकड़ी आदि बहुत- सा सामान चोर बाजार में बेच दिया जाता है और हमी लोग सस्ता पाकर उसे खरीद लेते हैं, फिर भारी मुनाफे के साथ उसे बेचते हैं। कई महत्वपूर्ण वस्तुएँ, दवा, मशीनें आदि जो बड़ी कठिनाई से विदेशी मुद्रा खर्च करके प्राप्त की जाती है, हमारे यहाँ वे भी काले बाजार में पहुँच जाती हैं, ऐसी स्थिति में क्या हम एक स्वतन्त्र देश के उत्तरदायी नागरिक कहला सकते हैं?हमारे दायित्वनि:संदेह एक सच्चे नागरिक का यह कर्तव्य है कि अपने आराम के लिए वह समाज की शक्ति को दुर्बल न करें। वरन् उसे परिपुष्ट करने के लिए अपनी बहुत- सी आवश्यकताओं को स्वेच्छा से त्याग करने के लिए भी उद्धत रहे।जीवन- निर्वाह की सीमित जरूरतों के अतिरिक्त भोग- विलास, मौज- मजे, आराम- सुख की जिंदगी बिताने के नाम पर हमारे यहाँ कितना अपव्यय होता है, सम्पत्ति, पदार्थों का कितना नाश होता है? लेकिन हम यह नहीं जानते कि व्यर्थ ही नष्ट किये जाने वाले पदार्थों को, बड़े भारी अपव्यय को रोककर यदि उस बचत को हम राष्टः निर्माण की दिशा में लगाएँ तो कोई संदेह नहीं कि कुछ ही समय में हमारा देश संसार में समृद्ध देशों की पंक्ति में खड़ा हो सकने योग्य बन जायेगा।एक प्रेरक दृष्टांतसर टामास रो के डॉक्टर ने बादशाह शाहजहाँ की लड़की का इलाज किया और वह अच्छी हो गयी। इसके प्रति उपकार में शाहजहाँ ने मनचाहा इनाम माँगने के लिए कहा। सर टामस रो ने अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए कुछ न माँग कर इंग्लैण्ड से आने वाले माल पर से चुंगी हटाने की माँग की, जो स्वीकार कर ली गई। इससे उनके देश से आने वाला माल भारत में सस्ता बिकने लगा। उनका व्यापार बढ़ा और वे इस देश पर अपना राजनैतिक वर्चस्व जमा सकने योग्य सामर्थ्यवान हो गये। इंग्लैंड मालामाल और शक्तिवान हो गया। यह है व्यक्तिवाद को हटकर उसके स्थान पर समूहवाद की प्रतिष्ठापना करने का प्रतिफल।इसके विपरीत हमारे देशवासियों ने व्यक्तिवाद को जब से आगे रखा तब से प्रत्येक क्षेत्र में अध:पतित होते चले गये। मुट्ठी भर विदेशी आक्रमणकारी हमारी व्यक्तिगत मनोभूमि के कारण ही इस देश पर हजार वर्ष तक अपना खूनी पंजा गड़ाये रह सके। अध्यात्मवादी अपनी व्यक्तिगत मुक्ति, स्वर्ग कामना एवं ऋद्धि- सिद्धि में लग गये। धर्मवादी अपनी पूजा- प्रतिष्ठा कराने के लिए अपने- अपने नाम के नये- नये सम्प्रदाय खड़े करने लगे। देश समाज- जाति, प्रांत, भाषा और सम्प्रदाय जैसी संकीर्णताओं में बँट गया। हर व्यक्ति अपने छोटे दायरे के लाभ की बात सोचने लगा और बड़े दायरे की उपेक्षा की जाने लगी। इन संकीर्णताओं को यदि हम अब भी न छोड़ सके और समूहवादी विशाल दृष्टिकोण न अपना सके तो न व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्ध होगा और न समूहगत सुस्थिरता के दर्शन होंगे। आवश्यकता इस बात कि है कि हम व्यक्तिगत लाभ की उपेक्षा करके सामाजिक लाभ एवं उत्थान की बात सोचें। परस्पर सहयोग करना सीखें और सम्मिलित शक्ति से मिल- जुलकर आगे बढ़ने की सर्वानुभूत सच्चाई को अपनाएँ।

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समग्र क्रान्ति के उपयुक्त शक्ति संवर्धन की योजनाएँ बनायें- चलायें

संगठित इकाइयाँ व्यक्तित्व निर्माण की टकसालें- संघबद्धता की मिसालें बनेंगहन चिंतन करेंजाग्रत आत्माओं, सृजन सैनिकों, सृजन साधकों के लिए यह समय एक महत्त्वपूर्ण अवसर तथा कठिन परीक्षा लेकर आया है। जैसे महाभारत के समय भगवान श्रीकृष्ण ने महान भारत निर्माण के अपने अभियान में पाण्डवों को माध्यम बनाया था, उसी प्रकार युगावतार ने नवयुग निर्माण के अभियान में सक्रिय सहयोग देने, अग्रदूतों की भूमिका निभाने के लिए जाग्रत आत्माओं, संस्कारवान प्रतिभाओं को माध्यम बनाने की रीति- नीति अपनाई है। अवसर का लाभ उठाना है तो कठिन परीक्षा या उसे पार करने के लिए कठोर प्रशिक्षण को बिना किसी असमंजस के प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करना ही होगा।महाभारत के समय अर्जुन असमंजस में पड़ा तो भगवान कृष्ण ने उसे समझाया, अपना दिव्य- विराट रूप दिखाया और बतलाया कि कौरवों का विनाश सुनिश्चित है, तुम युगधर्म समझने और दिव्य चेतना के उपयुक्त माध्यम बन जाओ। कृष्ण मार्गदर्शन देते रहे, अर्जुन ने निष्ठापूर्वक पूरी शक्ति से पुरुषार्थ किया तो महाभारत विजय का यश और श्रीकृष्ण के नैष्ठिक सहयोगी, नारायण के साथ नर की भूमिका निभाने का अनुपम श्रेय- सौभाग्य प्राप्त कर सका।युगऋषि ने भी कहा है कि युग परिवर्तन तो होना ही है। जाग्रत आत्माओं को उसके लिए दिव्य चेतना के उपयुक्त माध्यम बनना है। अग्रदूतों की भूमिका निभानी है। • अडिग आस्था, • अटूट साहस तथा • अथक पुरुषार्थ का परिचय देना पड़ा। सृजन सैनिकों को भी दिव्य शक्ति धारा से जुड़ने, उसके उपयुक्त माध्यम बनने के लिए • अडिग- सुदृढ़ आस्था • अखण्ड- सफल जीवन साधना और • अनुशासित समर्थ संगठन के विकास की रीतिनीति अपनानी होगी।इसके लिए गहन चिन्तन- मनन की जरूरत है। युगऋषि ने मार्गदर्शन बहुत आगे तक के लिए दे रखा है। हर युग साधक को अपनी मन:स्थिति इसके अनुसार बनानी- विकसित करनी है। साथ ही अपनी वर्तमान स्थिति, अपने वर्तमान स्तर से एक चरण आगे बढ़ाने का समयबद्ध संकल्प करके मजबूती से कदम रखना है।• अर्जुन अपने बूते भीष्म का वध नहीं कर सकते थे, किन्तु जब उन्होंने उन्हें मार्ग से हटाने का दृढ़ निश्चय कर लिया तो भगवान श्रीकृष्ण ने उसके लिए मार्ग बना दिया। अर्जुन ने अभिमन्यु वध से क्रुद्ध होकर जयद्रथ को सूर्यास्त तक मार देने का संकल्प कर लिया। अर्जुन के संकल्प को पूरा कराने के लिए श्रीकृष्ण ने अपनी माया का सटीक- सामयिक उपयोग करके संकल्प को पूरा करा ही दिया। इसी प्रकार सृजन सैनिक जब संकल्पपूर्वक कदम बढ़ाते हैं, तो युग देवता उसके साथ अपनी चेतन शक्ति लगाकर सत्प्रयासों को सार्थक बना ही देते हैं। इसके अनेक प्रमाण हम सबके सामने हैं। अनगढ़- सीमित साधकों के प्रयासों से प्रतिबंधित गायत्री साधना का जन- जन तक पहुँच जाने, यज्ञीय परम्परा के पुनर्जागरण से लेकर सामान्य व्यक्तियों के आश्वमेधिक प्रयोगों तक चेतनसत्ता के अदृश्य, किन्तु सुनिश्चित एवं समर्थ सहयोग को ही अनुभव किया जाता रहा है।अगले चरण कठिन भले हों, किन्तु नैष्ठिकों के संकल्पयुक्त पुरुषार्थ के साथ जुड़ने वाली समर्थ सत्ता के प्रभाव से वे भी शानदार ढंग से पूरे किए जा सकेंगे। हमें दिव्य चेतना के उपयुक्त प्रामाणिक माध्यम बनने के लिए शक्ति संवर्धन के ऊपर निर्दिष्ट अनिवार्य सूत्रों के अनुसार अपने प्रयासों को और अधिक धारदार बनाना है।संगठित इकाइयाँ प्रखर होंइसके लिए जहाँ प्रत्येक साधक अपने व्यक्तित्व को अधिक सृजनशील, प्रखर और बेहतर तालमेल के लिए विकसित करे, वहीं सभी छोटी- बड़ी संगठित इकाइयों को भी नवसृजन के अगले मोर्चे सँभालने के लिए अधिक पुष्ट और कुशल बनाना होगा। उन्हें आस्था संवर्धन, जीवन साधना और संगठन को समर्थ बनाने के लिए प्रचार, प्रेरणा एवं प्रशिक्षण के प्रामाणिक केन्द्रों की भूमिका निभानी होगी। प्रज्ञा मण्डलों (पुरुष, महिला, युवा), प्रज्ञा केन्द्रों, प्रज्ञापीठों एवं शक्तिपीठों को इस स्तर पर विकसित और सक्रिय किया जाना है।प्रचार- विस्तार :- इसके लिए इस एक वर्ष में नये एक लाख गाँवों तक युगसंदेश पहुँचाने, नये व्यक्तियों को प्रेरित करके सुगम कार्यक्रमों से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। बड़े नगरों के नये मोहल्लों को भी एक गाँव मानकर चला जा सकता है। इसी प्रकार समाज के विभिन्न वर्गों तक भी नवसृजन का संदेश पहुँचाने और उनकी मानसिकता के अनुरूप सुगम कार्यक्रमों से जोड़ने के लक्ष्य बनाये जा सकते हैं।संपर्क यात्राएँ :- इसके लिए समयदानियों को सम्पर्क यात्राएँ करने के लिए प्रेरित, प्रशिक्षित एवं नियुक्त किया जाना जरूरी है। युगऋषि ने लिखा है-युगनिर्माण का एक सूत्रीय कार्यक्रम यह है कि प्राणवान व्यक्ति जनसंपर्क करें। इस प्रकार दीपक से दीपक जलाने की तरह, आस्था से आस्था, विवेक से विवेक, पुरुषार्थ से पुरुषार्थ और कौशल से कौशल जगाने की दिव्य प्रक्रिया को प्रभावशाली एवं प्रचण्ड बनाया जा सकता है।साइकिल यात्राएँ :- एक लाख गाँवों तक नवसृजन का संदेश देने और जन- जन को उसमें भागीदार बनाने के लिए साइकिल यात्राओं की व्यवस्था बनाई जाय। चार साइकिलें, हो सके तो पीले रंग से रंगाकर प्रशिक्षित समयदानियों को ग्राम प्रव्रज्या के लिए भेजा जाय। इस संदर्भ में साइकिलें तैयार करने, साउण्ड सिस्टम एवं आवश्यक साजोसामान संबंधी मार्गदर्शन शांतिकुंज युवा प्रकोष्ठ अथवा संगठन कार्यालय से प्राप्त किया जा सकता है।अन्य क्रम :- साइकिलें न होने पर निर्धारित गाँव, नगर के मोहल्लों तक किसी भी साधन से सम्पर्क टोलियों को पहुँचाने, वापिस लाने की व्यवस्था बनायी जा सकती है। वहाँ वे निर्धारित क्रम से रैली, धर्मफेरी, सद्वाक्य लेखन, संगोष्ठियाँ आदि के माध्यम से जनजागरण का कार्य कर सकते हैं। इस क्रम में भाइयों की तरह बहनों की टोलियाँ भी नियुक्त की जा सकती हैं।झोला पुस्तकालय :- घर- घर संपर्क करके बिना मूल्य जीवन उपयोगी साहित्य पढ़ाने- वापिस लेने के लिए सभी समयदानियों को तैयार किया जाय। पूज्य गुरुदेव ने झोला पुस्तकालयों को अमृत कलश कहा है। इस माध्यम से कम जानकार व्यक्ति भी सभी को ज्ञानामृत का पान कराने का पुण्य कार्य कर सकते हैं। प्रौढ़ पुरुषों, महिलाओं को इसमें विशेष रूप से लगाया जा सकता है।पर्व- त्यौहार :- संस्कारों की तरह पर्वों के माध्यम से सामाजिक श्रेष्ठ आदर्शों के प्रति जन- जन को आकर्षित किया जा सकता है। पूज्य गुरुदेव ने वर्ष में १२ चुने हुए पर्वो पर सामूहिक प्रेरक आयोजन करने का विधान धर्मतंत्र से लोकशिक्षण के अन्तर्गत दिया है। क्षेत्र विशेष में प्रचलित किन्हीं लोकप्रिय पर्वों की प्रक्रिया निर्धारित करने के लिए शांतिकुंज से मार्गदर्शन, सहयोग प्राप्त किया जा सकता है।स्लाइड शो :- पहले स्लाइड प्रोजेक्टरों के माध्यम से जन- जन में विचार क्रांति, नैतिक क्रान्ति तथा सामाजिक क्रान्ति की प्रेरणा देने के लिए व्यवस्था बनाई गई थी, जो बहुत प्रभावकारी सिद्ध हुई थी। अब नई तकनीकों के अनुसार सामान्य रूप से उपलब्ध साधनों- लैपटॉप, स्मार्ट फोन आदि के माध्यम से या सस्ते प्रोजेक्टरों के माध्यम से इस प्रक्रिया को पुन: नये रूप में जीवन्त बनाने के प्रयास केन्द्रीय एवं क्षेत्रीय स्तर पर किए जा रहे हैं।उक्त माध्यमों से सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों को क्रमश: साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवा के सुगम कार्यक्रमों से जोड़ने के लिए प्रयास करने चाहिए। उत्साह उभरने पर उन्हें समयदान एवं अंशदान के लिए भी प्रेरित किया जा सकता है। इन सब कार्यक्रमों को वे ठीक से चला सकें, इसके लिए छोटे- छोटे प्रशिक्षणों का क्रम चलाया जाना चाहिए।प्रशिक्षण व्यवस्था सुलभ बनेविविध कार्यक्रमों के माध्यम से सम्पर्क बनने और जानकारी मिलने पर बड़ी संख्या में नर- नारी कुछ करने के लिए उत्साहित और संकल्पित तो होते हैं, किन्तु आत्मीयता और प्रशिक्षण न मिल पाने से वे पुन: निष्क्रिय होने लगते हैं। इसलिए प्रत्येक सक्रिय मण्डल, प्रज्ञा केन्द्रों, प्रज्ञापीठों, शक्तिपीठों को अपने- अपने स्तर पर प्रशिक्षण की व्यवस्था बनानी चाहिए। प्रशिक्षण देने वाले व्यक्तियों में क्रमश: लोकनेतृत्व के गुण विकसित होने लगते हैं, जो संगठन को व्यापक और सशक्त बनाने के साथ उसे सही दिशा देते रहने में भी सफल हो पाते हैं। इस संदर्भ में युगऋषि ने 'युग निर्माण योजना भाग- दो' में लिखा है :-युग निर्माण अभियान के उमड़ते हुए प्रवाह को सँभालना और उसे दिशा देना अपने आप में एक बड़ा काम है। लोक- नेतृत्व एक जटिल कला है। उसमें निर्जीव मशीनों से नहीं, वरन सजीव मनुष्यों से पाला पड़ता है और विरोधी को भी सहयोगी बनाने का, मूर्छित को गतिवान हनुमान बनाने का कार्य पूरा करना होता है। साधनों की जहाँ कोई व्यवस्था नहीं, वहाँ उन्हें उपलब्ध करके कुछ से कुछ कर दिखाने का चमत्कार करना होता है। लोक नेतृत्व कर सकने वाले सुयोग्य और सुलझे हुए व्यक्ति हमें आज ही तैयार करने चाहिए ताकि कल की आवश्यकताओं को ठीक तरह पूरा किया जा सके।यह कार्य बहुत पहले ही आरम्भ होना चाहिए था। मगर अब तो उस आवश्यकता की पूर्ति अनिवार्य हो गई है। संगठन की आवश्यकता और गतिविधियों की तीव्रता आँधी और तूफान की तरह बढ़ रही है। प्रवाह और उफान तो कोई दिव्य शक्ति ला रही है, उसकी चिन्ता नहीं करनी है। चिन्ता इतनी भर करनी है कि विश्व इतिहास के इस सबसे महत्त्वपूर्ण अभियान को सँभालना, व्यवस्थित और नियंत्रित करना जिस प्रकार संभव हो, उसका प्रबन्ध करना चाहिए। अभियान की आज सबसे बड़ी आवश्यकता है सुयोग्य और प्रशिक्षित अनुभवी और कुशल लोकनेताओं की जो इस अभियान के महामत्त गजराज को सही दिशा में चलाने की भूमिका कुशलतापूर्वक निभा सकें। अन्यथा वह शक्ति अव्यवस्थित और अनियंत्रित होकर अवाँछनीय दिशा में फूट सकती है।प्रारंभ में जुड़ने वाले व्यक्ति प्रशिक्षण के लिए दूर जाने या अधिक समय लगाने के लिए तैयार नहीं हो पाते, इसलिए उन्हें मण्डल स्तरों पर कम समय के प्रशिक्षण देने की व्यवस्था बनायी जानी चाहिए। एक बार सक्रियता में रस आने पर वे अधिक समय वाले दूरस्थ प्रशिक्षणों में भी शामिल होने लगते हैं।आस्था संवर्धन :- हर आस्तिक व्यक्ति को समस्त विश्व के लिए उज्ज्वल भविष्य लाने वाली युगशक्ति के साथ सक्रिय साझेदारी के लिए प्रेरित, प्रशिक्षित करना चाहिए।उपासना क्रम में गायत्री मंत्र जप, मंत्रलेखन अथवा गायत्री चालीसा पाठ के साथ जीवन परिष्कार की साधना के सूत्रों से जुड़ने का मार्गदर्शन देना चाहिए। जो गायत्री मंत्र जप न करना चाहें वे सबके लिए उज्ज्वल भविष्य की भावना के साथ किसी भी इष्ट मंत्र या इष्ट नाम का जप- लेखन कर सकते हैं। इस प्रयोजन के लिए 'परिवर्तन के महान क्षण', 'सबके लिए सुलभ उपासना- साधना' एवं 'जीवन देवता की साधना आराधना' आदि पुस्तकों को माध्यम बनाया जा सकता है।जीवन साधना :- उज्ज्वल भविष्य के लिए श्रेष्ठ चरित्र निर्माण की आवश्यकता समझते हुए उन्हें स्वाध्याय, संयम एवं सेवा कार्यों में तत्परतापूर्वक लग पड़ने की रीतिनीति समझाई और सिखाई जानी चाहिए। इसके क्रम में आत्मसमीक्षा, आत्मशोधन, आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास की साधनाएँ सिखाई जानी चाहिए। इन्द्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम तथा विचार संयम की सामर्थ्य अर्जित करने के लिए प्रेरित करते रहना चाहिए। अगले क्रम में युग निर्माण सत्संकल्प के सूत्रों के अनुसार आत्मप्रगति के चरण बढ़ाये जा सकते हैं। इसके लिए 'जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्र' जैसी पुस्तकों को और प्रज्ञा पुराण के द्वितीय खंड को माध्यम बनाया जा सकता है।संघबद्धता :- प्रत्येक नैष्ठिक साधक को किसी न किसी संगठित इकाई- मण्डल से जोड़ा जाना चाहिए। युगऋषि ने इस संदर्भ में लिखा है -यह विचारधारा ही अत्यंत उच्च कोटि की है, फिर उसको संघशक्ति का पोषण मिल जाय तो उसके प्रयासों का आँधी- तूफानों की तरह उठ खड़ा होना स्वाभाविक है। थोड़े से डाकू बहुत बड़े समुदाय पर संघशक्ति के बल से विजय पा जाते हैं, उसी प्रकार संघशक्ति से सम्पन्न देवत्व हजार गुना अधिक प्रभावी होगा।इसके लिए 'संगठन की रीतिनीति' एवं 'युग निर्माण योजना का दर्शन, स्वरूप एवं कार्यक्रम' जैसी पुस्तकों को माध्यम बनाया जा सकता है। संगठन तंत्र इतना समर्थ एवं प्रामाणिक बने कि हर क्षेत्र में सम्पर्क एवं प्रशिक्षण करने के साथ आवश्यकता के अनुसार विभिन्न आन्दोलनों को प्रभावी ढंग से चलाया जा सके। सभी आन्दोलनों को गति देने के लिए उनके विशिष्ट प्रशिक्षणों का तंत्र भी क्षेत्रीय और केन्द्रीय सहयोग से विकसित किया जाना चाहिए।शक्ति संवर्धन वर्ष में दिव्य सत्ता शक्ति अनुदान देने की उदार व्यवस्था बना ही चुकी है। व्यक्तियों, समयदानियों की संख्या और गुणवत्ता बढ़ने से ही दिव्य शक्ति प्रवाह को प्रत्यक्ष जगत में उतरने का आधार मिलेगा। इसके लिए प्रचार, प्रेरणा, प्रशिक्षण के साथ उनके संगठन और सुनियोजन के सुनिश्चित समयबद्ध संकल्प करने, उन्हें पूरा करने के लिए प्राण- प्रण से लग जाने से ही हम इष्ट प्रयोजन पूरा कर सकेंगे। 'हम यह कर सकते हैं और जरूर करेंगे' युगऋषि के इस वाक्य को आधार बनाकर जुट पड़ें, यही उचित है।

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आवश्यकता अंधविश्वास, आडम्बर, मूढ़मान्यताओं से मुक्ति पाने की भी है

आशंका का भूत, अंधविश्वास की देवी भूत- प्रेत क्या है, उनके अस्तित्व का प्रामाणिक आधार क्या है तथा उनकी वास्तविकता क्या है? यह अलग विषय है, पर सर्वसामान्य में भूत- प्रेतों के किस्से इस तरह प्रचलित हैं कि लगता है वे चिड़िया से भी सस्ते और सरलतापूर्वक प्राप्त हो जाने वाले हों जो हर किसी को हर कहीं चाहे जब मिल जाएँ। अंधेरे स्थान, गाँव का कोई पुराना पेड़, बरगद या पीपल की शाखाएँ अथवा उपेक्षित- सा कोई एकान्त में पड़ने वाला कुआँ प्राय: भूत- प्रेतों से सम्बद्ध हो जाते हैं। लोग उनके प्रति इस प्रकार विचित्र धारणाएँ बना लेते हैं कि उनके पास से निकलने में भी डर लगता है। इन बातों में तथ्य जरा भी नहीं होता, लेकिन आश्चर्य है कि भूत- प्रेतों के किस्से गली- गली और मुहल्ले- मुहल्ले सुनने को मिल जाते हैं। भूत- प्रेतों की ही भाँति देवरा बैठक के रूप में भी गाँव से लेकर शहरों, कस्बों तक में अन्ध- विश्वासियों की भीड़ जुड़ती है। देवरा बैठक ऐसे स्थानों को कहा जाता है जहाँ पीपल वाली शीतला और भैरों पीर जैसी सत्ताओं की कल्पना कर लोग उनके पास अपनी समस्याओं का हल करने तथा कष्ट- कठिनाइयों को दूर करने, रोग- बीमरियों से मुक्ति पाने के लिए पहुँचते हैं। उस स्थान पर किसी मूर्ति की प्रतिष्ठा कर ली जाती है, फिर वहाँ का पण्डा या पुजारी नहा- धोकर पूजा की चौकी पर चुपचाप बैठ जाता है। सब लोग शान्तिपूर्वक देवता के आने की प्रतीक्षा करते हैं और जब पण्डा या पुजारी सिर हिलाकर उठल- कूद मचा कर झूमने लगता है तो समझा जाता है कि देवता का आगमन हो गया है। फिर क्रम से वहाँ आये लोग देवता के सामने अपनी समस्याएँ रखने लगते हैं। कहीं- कहीं तथाकथित देवता खुद फरियादी को पुकार कर पूछते हैं। ऐसे नाटकों में देवता बड़े अजीब- अजीब कारण और विचित्र समाधान सुझाते हैं। कोई कहता है- "अमुक दिन तेरे घर पर मैं फकीर के या साधु के वेश में आया था तो तूने मेरा तिरस्कार कर दिया था।" कोई कहता है हवा लग गयी है। इन कारणों से उत्पन्न हुई समस्याओं का समाधान एक पूजा करवाना या पाँच ब्राह्मणों को जिमाना अथवा सन्त बैठक में हाजिर होना सुझाया जाता है। विचारशील लोग इन सुझाये गए समाधानों के पीछे विद्यमान कारणों को आप ही समझ लेते हैं, जैसे पूजा करवाने के साथ- साथ भक्त भेंट- चढ़ावा भी लाता है और साधु पुरुष को भोजन कराने की बात है तो उसी देवता के पण्डे से अच्छा साधु और कहाँ मिलेगा। बैठक में हाजिरी देने के लिए भी प्रत्येक भक्त कुछ दान- दक्षिणा तो लेकर पहुँचते ही हैं। देवी- देवता आने का ढोंग कर जनसामान्य की धर्म श्रद्धा का शोषण करने वाले लोग बड़े होशियार होते हैं तथा भक्तों की नब्ज़ को पहचानते हैं। उसी के अनुसार भक्तों की सामर्थ्य देखकर वे समस्याओं का हल समझाते हैं। आत्मघाती अंधश्रद्धा अन्ध- विश्वासियों की भी बड़ी विचित्र स्थिति रहती है। वे अपने देवी- देवों पर इतनी श्रद्धा रखते हैं कि साधारण- सा बुखार भी दो चार दिन के इलाज से दूर नहीं हो तो उसे अमुक देवता का प्रकोप समझकर उनके स्थानों पर ले जाते हैं। गाँवों में चेचक की देवी शीतला, मोतीझरा के देवता मोतीसर आदि कितने ही ऐसे चौधरी, देवी- देवता विराजमान होते हैं, जैसे वे अलग- अलग बीमारियों के डॉक्टर हैं। बीमारी तो जैसे- तैसे दूर हो जाती है या नहीं भी होती, बहुत से यम देवता की शरण भी चले जाते हैं, पर अन्धविश्वासी लोग उन्हें दूर करने के लिए अपने देवों के पास ही जायेंगे और कोई डॉक्टरी उपचार नहीं लेंगे। ऐसे देवी- देवताओं की सप्ताह में एक बार या पखवाड़े की एक तिथि नियत होती है, जिस दिन उनकी सवारी आती है। कहीं- कहीं तो भेंट- पूजा का सामान जुटाकर जब उन्हें बुलाया जाता है, तभी वे आ जाते हैं। झाड़- फूँक का जंजाल देवी- देवताओं के पण्डों की तरह जो किसी अदृश्य शक्ति का ढोंग तो नहीं करते, पर अपनी कलाबाजियाँ झाड़- फूँक कर सिद्ध करते ऐसे ओझे- सयाने भी गाँव में दो- चार तो मिल ही जाते हैं। वात दोष के कारण होने वाली पेट की बीमारियों से लेकर पीलिया और मोतीझरा झाड़ने वालों तथा बिच्छू और साँप का जहर उतारने वाले जान लेवाओं का अपना व्यवसाय भी गाँवों में बड़ी खूबी से चलता रहता है। जाहिर है कि रोग- बीमारियों का कारण प्रकृति के अनुसार जीवन न जीने के कारण आये दोष होते हैं अथवा मौसम और मानवी प्रकृति की विषमता है, परन्तु आश्चर्य है कि तथाकथित ओझा उनकी जिम्मेदारी देव- शक्तियों पर ही डाल देते हैं और उन्हें समझा- बुझाकर मनाने की दलाली खाते हैं। समझ में नहीं आता कि संसार में देव- शक्तियों का अस्तित्व अगर है भी तो क्या इसलिए कि वे लोगों को बीमार करते रहें और अपने ऐजेण्टों की सिफारिश पर लोगों को उनसे मुक्त कर दें। यदि देव- शक्तियों का यही काम है तो उनमें और राक्षसों में क्या फर्क हुआ? ओझा, सयानों को चरित्र की दृष्टि से परखा जाए तो वे सामान्य लोगों की अपेक्षा हीन स्तर के ही होते हैं और उनके पास प्राय: ऐसे गँवार- मूढ़ स्त्रियाँ तथा पुरुष ही जाया करते हैं जो उनके लिए बोतल, चिलम या हुक्के का प्रबन्ध कर अपना काम करवाते हैं। कई अवसरों पर तो ओझा, सयानों पर ज्यादा विश्वास करने से घाटा भी उठाना पड़ता है। आये दिन समाचार पत्रों में ऐसी घटनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं, जिनसे व्यक्त होता है कि झाड़- फूँक करने वालों पर जरूरत से ज्यादा विश्वास करने वाला चरित्र और धन दोनों ही दृष्टि से ठगा जाता है। कई बार तो जान तक से हाथ धोना पड़ता है। वैज्ञानिक दृष्टि से सोचें विष उतारने वालों सें प्राण खोने का खतरा ज्यादा रहता है। वैज्ञानिक रूप से यह सिद्ध हो चुका है कि काटने वाले साँपों में ९७ प्रतिशत साँप विषहीन होते हैं। उनका विष ही नहीं चढ़ता, केवल मनोवैज्ञानिक भय के कारण ही लोगों की मृत्यु होती है। झाड़- फूँक करने वाले ऐसे लोग मनोवैज्ञानिक विष जरूर ठीक कर देते हैं, पर जब कभी सचमुच ही विषैले साँप ने काटा हो तो ओझा क्या देवता भी उसे बचाने में समर्थ नहीं होते और जीवन- ज्योति बुझ जाने पर च्च्समय अधिक हो गया।ज्ज् अथवा च्च्नाग देवता बहुत ज्यादा कुपित हैं।ज्ज् कहकर अपनी बात जाने से बचा लेते हैं। काश, ओझा, सयाने के चक्कर में न आ कर डॉक्टरी सहायता ली जाती। यहाँ तो कुछेक ही अन्ध- विश्वासों का जिक्र किया गया, पर उनकी संख्या इतनी अधिक है कि यदि सबका विवरण एकत्रित किया जाए तो एक बड़ी पुस्तक तैयार हो सकती है, फिर भी यह निश्चिततापूर्वक नहीं कहा जा सकता कि उस पुस्तक में सभी विवरण आ सकेंगे, केवल भारत के ही। कहाँ तो हमारा देश किसी काल में जगद्गुरु रह चुका है और इस सत्य तक पहुँच चुका है कि रोग, शोक, विपत्तियाँ, कठिनाइयाँ अपनी ही गलतियों के कारण आती हैं, ईश्वर भी उनमें कोई मदद नहीं करता, वरन् सच्चे आस्तिकजन तो उनमें ही ईश्वर की कृपा मानते हैं कि इस प्रकार हमारे पाप हलके हो रहे हैं और कहाँ यह निकृष्टतम स्थिति कि साधारण से बुखार को भी दैवी प्रकोप मानते हैं। यह तो स्पष्ट है कि इस विश्वास को व्यवसाय का रूप देने वाला वर्ग बड़ा होशियार और चालाक है पर विचारशील व्यक्तियों का भी तो यह कर्त्तव्य हो जाता है कि वे फैलाये जाने वाले अन्धविश्वासों को निरस्त करें।