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जाग्रत विश्वात्मा बदल देगी दुनिया

चेतें, भ्रम- भटकावों से उबरें, सन्मार्ग की ओर कदम बढ़ायें, श्रेय- सौभाग्य पायेंएकता और समता नये युग का, नये विश्व का नया लक्ष्य है। यों इन दिनों सर्वत्र विषमता का बोलबाला है। गरीबों- अमीरों की, शिक्षित- अशिक्षितों की, समर्थ- असमर्थों की, नर और नारियों की, दुर्बल और सशक्तों की, शोषक- शोषितों की विरादरियाँ स्पष्ट रूप से बढ़ी देखी जा सकती हैं और उनके बीच पाया जाने वाला अंतर इतना बड़ा प्रतीत होता है कि एक को खाई और दूसरे को टीले की उपमा दी जा सके। यह खाइयाँ किस प्रकार पटेंगी? और हर क्षेत्र में फैली हुई विषमताएँ किस प्रकार मिटेंगी, यह समझना साधारण बुद्धि के लिए कठिन हो जाता है।असमंजस इस बात का है कि मनुष्य की संकल्प शक्ति, उत्कण्ठा और तत्परता अभीष्ट परिवर्तन का पक्ष यत्किंचित ही लेती है। समर्थ प्रयत्न भी योजनाबद्ध रूप से बड़े परिमाण में नहीं हो पा रहे हैं। छुट- पुट आवाजें उठतीं और छोटे स्तर की क्रिया- प्रक्रिया ही बन पड़ती दीख पड़ती हैं। मोटा अनुमान यही लगता है कि छुटपुट प्रयत्नों का प्रतिफल यत्किंचित ही होना चाहिए और उसे सुगठित होने में बड़ा समय लगना चाहिए।सार्थक मापदण्ड में इस प्रकार का असमंजस स्वाभाविक है, क्योंकि लोक- व्यवहार में छोटे प्रयासों की थोड़ी प्रतिक्रिया ही होती देखी गई है। किन्तु यदि युग निर्माण जैसे विराट प्रयोजन को पूरा करने के लिए ६०० करोड़ (विश्व के समस्त) मनुष्यों का चिन्तन, चरित्र और व्यवहार बदलना है, उनके स्वभाव एवं अभ्यास को बदलना है तो उसके लिए कोई अति समर्थ प्रयास सामने आना चाहिए। आतंक के दबाव में हुए परिवर्तनों का प्रतिफल देखा जा चुका है। उनसे नये प्रकार के आतंक फूटे हैं और परिणाम नफे के स्थान पर घाटे का ही रहा है।तब इस प्रकार असाधारण परिवर्तन कैसे संभव होगा? इसके लिए इस तथ्य और सत्य को ध्यान में रखना होगा कि इस वसुधा का निर्माता एवं नियन्ता कोई दूसरा है। मनुष्य की क्षमता बड़ी है, पर ऐसा नहीं कि इसी के सहारे सारी विश्व व्यवस्था चलती रही है या चलेगी।बड़े प्रयास मनुष्यों के प्रयत्नों से ही सम्पन्न हुए हैं यह भी ठीक हैं, पर यह मान बैठना भी ठीक नहीं कि जिस सम्बन्ध में उसने उपेक्षा दिखाई है, वह बन ही नहीं पाता। दास- दासियों का क्रय- विक्रय लम्बी अवधि से चला आ रहा था। यह भी आशा नहीं थी कि वे उत्पीड़ित व्यक्ति मिल- जुलकर समर्थों से टक्कर लेने और उन्हें परास्त करने में सफल होकर ही रहेंगे। उनकी किसी ने बड़ी वकालत भी नहीं की। उनके पक्ष में कोई युद्ध भी नहीं लड़ा गया। इतने पर भी इतिहासकारों ने आश्चर्यचकित होकर देखा कि जाग्रत विश्वात्मा के दबाव से वे निविड़- बन्धन अपने आप ही छूटते गये और बिना युद्ध का सरंजाम जुटाये क्रान्तिकारी योजनाएँ बनीं, दुनिया में से दास प्रथा उठ गई। उसका समर्थन अपनी मौत मर गया। यद्यपि अमीरों को इससे कम हानि नहीं हुई, फिर भी वे मन मारकर बैठे रहने के सिवाय और कुछ कर नहीं सके। दैवेच्छा अपने ढंग से अपने समय पर पूरी होकर रही।राजतंत्र की परम्परा युग- युगान्तरों से चली आई है। राजा को भगवान मानने की बात न जाने क्यों सीखी और सिखाई जाती रही है? उस समुदाय के पास शक्ति, क्षेत्र, सैनिक और साधनों की कमी नहीं थी। फिर भी न जाने क्या हुआ कि राजमुकुट धरती पर लोटते और धूल- धूसरित होते चले गये। उन्हें अपने वैभव की रक्षा करने का समय भी नहीं मिला और राज्य में राजा के रूप में सोये हुए सत्ताधारी भोर होते ही अपना समस्त वर्चस्व गँवा कर साधारण नागरिकों जैसे होकर रह गये।जागीरदारों, साहूकारों, सामन्तों का भी एक वर्ग था, जो अपने आप को प्रजाजनों की खुशहाली का स्वामी मानता था। जिस तरह चाहे उसी तरह निचोड़ता रहता था, पर देखते- देखते वे परिस्थितियाँ न जाने किस हवा में विलीन हो गर्इं? अब कर्ज की सुविधा बैकों के माध्यम से सरलतापूर्वक ली जा सकती है।और भी कई क्रान्तियाँ अपने- अपने ढंग से हुई हैं जो यह बताती हैं कि मनुष्य का पुरुषार्थ नगण्य और दैवी इच्छा के माध्यम से बन पड़ा संयोग अत्यधिक महत्वपूर्ण है। पर्दा प्रथा अब कहीं किन्हीं कोतरों में ही अपने नाममात्र के अस्तित्व की झलक- झाँक देती है, अन्यथा संसार में से उसका प्रचलन एक प्रकार से उठ गया ही समझा जा सकता है। जाति- पाँति, ऊँच- नीच की मान्यता किन्हीं गिरे हुए खंडहरों में ही जब कभी छिपी दीख जाती है, पर उसका संवैधानिक और लोक- व्यवहार में प्रचलन समाप्त हुआ ही समझा जाना चाहिए। सती प्रथा कभी गौरवान्वित रही है, पर अब तो उस पर कानूनी प्रतिबंध है और इसके लिए उकसाने तथा महिमामंडित करने पर कोई भी जेल की हवा खा सकता है।अँगे्रजी साम्राज्य, जिसके क्षेत्र में कभी सूर्य अस्त नहीं होता था, ऐसी परिस्थितियों से घिरा कि हर कहीं से अपने बोरिया बिस्तर समेटकर अपने छोटे- से दायरे में सीमित रहने के लिए ही विवश हो गया। नेपोलियन, सिकन्दर, चंगेजखाँ जैसे आतताइयों की करतूतें अपनी परम्परा देर तक नहीं निभा सकीं। आक्रान्ताओं की अपनी फूट ने ही उन गिरोहों का अस्तित्व समाप्त कर दिया, जो कभी अजेय समझे जाते थे। चन्द्रमा पर मनुष्य चहलकदमी करेगा, इसकी कल्पना कभी किसी ने नहीं की थी? अब तो अन्तरिक्ष में बस्तियाँ बसाने की योजना कार्यान्वित होने जा रही है।पुराण गाथाओं का अधिकांश कलेवर दैवी शक्तियों के चमत्कारी वर्णनों से ही भरा पड़ा है। अवतारों, सन्त, सिद्धों में से अधिकांश ऐसे हैं जिनके द्वारा स्वयं ऐसे कार्य सम्पन्न किये तथा दूसरों से कराये गये हैं, जो मनुष्य की साधारण शक्ति के सहारे बन पड़ेंगे, ऐसा संभव प्रतीत नहीं होता था। ।। फिर भी वे हुए। इसे देखते हुए इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि उन्हें किसी अदृश्य शक्ति का अवलम्बन मिला और उसके सहारे उन्होंने प्रतिकूलताओं को अनुकूलताओं में बदलने में विजय पाई।दार्शनिक, वैज्ञानिकों को प्राय: ऐसी ही अन्त:स्फुरणा होती रही है, जिसके मार्गदर्शन में उनका अन्तस् उस दिशा में चल पड़ा जो उनके लिए ही नहीं, अन्य असंख्यों के लिए भी श्रेयस्कर सिद्ध हुआ। वस्तुत: दैवी अनुकम्पा का दार्शनिक रूप यही है।अदृश्य ईश्वर का दर्शन कर सकना किसी प्रकार भी संभव नहीं। इन्द्रियों की सहायता से तो जड़ पदार्थ ही देखे जाते हैं। ईश्वर की भी यदि कोई छवि कल्पित की जाय, तो भी वह किसी प्राणी या पदार्थ से मिलती- जुलती होने के कारण भौतिक ही कही जायेगी,जबकि सृष्टा की सत्ता अदृश्य एवं निराकार है। भक्तों की कल्पना उनकी इच्छानुसार भी ध्यान स्थिति में साकार रूप धारण कर सकती है, पर तत्वदर्शी उसे विराट् ब्रह्म के रूप में देखते और विश्व- वसुधा में विद्यमान सत्प्रवृत्तियों के समर्थन में अपनी सेवा अर्पित करते हैं। यही वास्तविक पूजा- अर्चना है। उसका उपयोग एवं स्वरूप यही है कि उच्चस्तरीय आदर्शों का अवलम्बन लेने के लिए भावना और क्षमता को पूरी तरह से नियोजित कर सकने जैसी अदम्य उमंगें मन में उठें। इक्कीसवीं सदी में ऐसे ही अवलम्बन के धनी अनेक प्रतिभाशाली उत्पन्न होंगे और वे नव- सृजन की दिव्य योजना को पूरा करने में कार्यरत दिखाई  पड़ेंगे।

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उत्कृष्टता का आधार है- आदर्श

इक्कीसवीं सदी सतयुगी वातावरण का शिलान्यास होने की प्रभात बेला है। इन दिनों नवजीवन के नवनिर्माण का एक ही आधारभूत कारण होगा- लोकमानस का परिष्कार। जन- जन को समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी का पाठ पढ़ना होगा। चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में आदर्शों का समावेश करना होगा। मानवी गरिमा को अक्षुण्य रख सकने वाली रीति- नीति को अपनाना होगा।सामान्य बुद्धि ही यह सोचती है कि साधन सुविधाओं के आधार पर मनुष्य को उन्नति करने का अवसर मिलता है। यह कथन किसी हद तक तभी तक सार्थक होता है, जब साधनों के साथ उच्चस्तरीय सूझबूझ भी हो। अन्यथा दुष्ट, दुर्जन जितने ही अधिक साधन सम्पन्न होते हैं, उतनी ही अधिक दुष्प्रवृत्तियाँ अपनाने और अपने सम्पर्क क्षेत्र के लिए संकट खड़ा करते है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण इन दिनों की परिस्थितियों को देखकर समझा जा सकता है।पूर्वजों की तुलना में हम सुविधा में कहीं अधिक सम्पन्न हैं, शिक्षित भी हैं और समर्थ -संभ्रान्त भी। इस पर भी हमारी गतिविधियाँ इस स्तर की नहीं बन पातीं, जिन्हें सन्तोषजनक, सुख- चैन से युक्त या भविष्य को उज्ज्वल बनाती दीख पड़ें। इसके विपरीत उन असंख्य महामानवों का इतिहास साक्षी है जो साधारण परिस्थितियों में जन्मे और अपने गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता से निजी चरित्र और सम्पर्क क्षेत्र का सम्मान प्राप्त करते- करते उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँचे।सतयुगी आदर्शसतयुग के दिनों भावनाशील प्रतिभाओं ने अपने निजी संकीर्ण स्वार्थों को तिलाञ्जलि दी थी और महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति का एक ही केन्द्र पर नियोजन किया था कि जन- जन को पुरुषार्थीं, कर्मयोगी, समाजनिष्ठ और उदारचेष्टा बनाने के लिए जो कुछ किया जा सकता था, वह सब कुछ उन्होंने कर दिखाया था। इस हेतु सर्वप्रथम उनने अपनी जीवनचर्या को ऐसे ढाँचे में ढाला था जो सर्वसाधारण को अनुप्राणित कर सके, अनुसरण की श्रद्धा उत्पन्न कर सके। उसके साथ ही वे लोकसेवा की साधना को सर्वोपरि ईश्वर- भक्ति मानकर उसके निमित्त सर्वतोभावेन जुट गये। धर्मतन्त्र का उन्होंने आश्रय लिया, क्योंकि अन्त:करण की गहराई तक प्रवेश कर सकने की क्षमता उसी में है। आकांक्षा, आस्था, भावना, विचारणा की उत्कृष्टता के साथ जोड़ने की क्रिया अन्त:करण के क्षेत्र में सम्पन्न होती है। जले हुए दीपक ही बुझोंं को जलाने में समर्थ होते हैं। सुयोग्य ही अयोग्य को सुयोग्य बना सकते हैं। ऋषियुग का प्रचलन इसी प्रकार हुआ। सतयुग इसी प्रकार उगा और फल- फूल कर विशाल कल्पवृक्ष के रूप में परिणित हुआ। इस भूतकालीन प्रचलन को वर्तमान में अपनाया जाना चाहिए और इसी आधार पर उज्ज्वल भविष्य का स्वप्न सँजोया जाना चाहिए। विगत को आगत के रूप में इसी प्रकार अवतरित किया जा सकता है।ब्राह्मण परम्परा का नवजीवनइस हेतु ब्राह्मण और साधु परम्परा को पुनजीर्वित करना होगा। पुरोहितों और परिव्राजकों का नया वर्ग खड़ा करना होगा। वंश और वेश के आधार पर तो ये दोनों ही इतने अधिक हैं कि उनकी गतिविधियाँ देखकर एक बार तो गहरी निराशा होती है। उनका स्वरूप अपने उत्तरदायित्व के साथ संगति नहीं खाता। ऐसी दशा में पुराने खंडहरों के साथ बड़ी आशा सँजोने की अपेक्षा नये झोंपड़े खड़े करने होंगे। जाति, वंश की प्रक्रिया किसी को ऊँचा, नीचा नहीं बनाती। प्रश्न भावना और क्रिया का है। जो अपना क्रिया- कलाप जनमानस के परिष्कार में नियोजित कर सकें, जो ब्राह्मणों की तरह गृहस्थ अथवा विरक्त रहकर परिव्राजक की भूमिका निभा सकें, उन्हें कहीं से ढूँढना, उभारना और पुरातन विधि- व्यवस्था के अनुरूप कर्त्तव्य पथ पर आरूढ़ करना होगा।अनुकरणीय परम्पराएँधर्म के नाम पर ईसाई मिशनों ने कुछ कहने लायक काम किया है। सेवा को आगे रखकर अपना सम्प्रदाय बढ़ाने की यों उनकी बेतुकी नीति है, फिर भी पादरियों का चरित्र देखते बनता है। गिरजे खपरैलों के बने होते हैं। पादरी घर- घर जनसम्पर्क के लिए जाते हैं और जो कहना है, भावनापूर्वक कहते हैं। फलस्वरूप दो हजार वर्ष में दुनियाँ की आधी जनसंख्या उनके धर्म में दीक्षित हो गई।प्राचीनकाल में ऋषि भी यही करते थे। ढाई- हजार वर्ष पूर्व बुद्ध धर्म इसी रीति- नीति को अपनाकर विश्वव्यापी बना था। स्याम (अनाम) में यह प्रथा थी कि हर व्यक्ति को एक वर्ष तक परिव्राजक बनकर बुद्ध विहार में रहना पड़ता था। साधना, स्वाध्याय, संयम की व्यक्तिगत आचार संहिता का पालन करते हुए अधिकांश समय लोकसेवा के निमित्त नियोजित रखना पड़ता था। यह प्रचलन जिन्होंने भी, जब भी अपनाया है, तभी उतने अंश में जनसहयोग मिला है और अभीष्ट प्रगति का पथ प्रशस्त हुआ है।आवश्यकता इस बात की है कि वर्तमान विकृतियों से जूझने और सत्प्रवृत्तियों का नये सिरे से अभिवर्धन करने के लिए धर्मसेवी समुदाय का नये सिरे से उत्पादन किया जाय। देश में श्रद्धा, भक्ति का मूल तत्त्व अभी भी कम नहीं हुआ है। यदि घटा होता तो धर्मजीवियों का इतना बड़ा समुदाय गुलछर्रे किस प्रकार उड़ाता? इतने विशालकाय देवालय किस प्रकार खड़े होते? धार्मिक कर्मकाण्डों में, तीर्थ यात्राओं में लगने वाली इतनी बड़ी राशि कहाँ से आती? जड़ जीवित है, पत्ते और टहनियाँ भर सूखी हैं। यदि जड़ को नई भावना और नई योजना के साथ सींचा जा सके तो इस पतझड़ जैसे ठूँठ बने उपवन में फिर से नया बसन्त आ सकता है।लोकसेवा की उमंग जागेऐसे भावनाशील लोग ढँॅूढने पर कहीं न कहीं अवश्य मिल जायेंगे जो जीवन्त धर्मधारणा की सेवा- साधना के लिए जीवन समर्पित करें और उसी कार्य पद्धति को अपनाएँ जो सतयुग के देवमानवों ने अपनाई। ऐसे असंख्य व्यक्ति भी निकल पड़ेंगे जो उनके निर्वाह का भार कितने ही दरिद्र होने पर भी सहन करते रहें। इस नवनिर्मित देव समुदाय का एक ही कार्य होना चाहिए जनसाधारण के चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को उच्चस्तरीय बनाना, हर किसी में लोकसेवा की आदर्शवादी प्रतिस्पर्धा करने के लिए महत्वाकांक्षा जगाना।आवश्यकता ऐसे गोताखोरों की है जो गहरी डुबकी लगाकर मणिमुक्ताओं को खोज सकें। इन्हें एक सूत्र में पिरोकर शोभायमान हार की तरह देव संस्कृति का सुशोभित मुकुट बना सकें। साथ ही अन्य क्षेत्रों की प्रतिभाओं से भी अपने ढंग से अपने- अपने स्तर का लोकोपयोगी कार्य करा सकें। प्रतिभावान वरिष्ठ जन अपनी विशेषता का उपयोग इन दिनों प्राय: धन संचय में, अहंकार जताने वाला ठाट- वाट जुटाने में करते रहते हैं। यदि उनकी दिशा बदले तो ऐसे आधार खड़े हो सकते हैं जो युग का कायाकल्प कर सकें। साहित्यकार ऐसा साहित्य सृजें, कलाकार ऐसा संगीत अभिनय प्रस्तुत करें। लेखनी और वाणी का इन्हीं प्रयोजनों के लिए उपयोग हो सम्पदा उस व्यवसाय या अनुदान में लगे जिससे हरिश्चन्द्र और भामाशाह की कथाएँ नया संस्कार बनकर उभरें।आदर्श एकांकी भी बहुत कुछ कर सकता है। छोटी स्थिति वाला भी बड़ी भूमिका निभा सकता है। किन्तु सर्वसमर्थ होते हुए भी व्यक्ति पतनोन्मुख रहा हो तो दुर्दान्त असुरों की तरह सर्वत्र संकट ही खड़ा करेगा। आवश्यकता आर्दशवादिता के अभिवर्धन की है। इसी को धर्मधारणा, आस्तिकता या मानवी गरिमा के नाम से भी पुकारा जा सकता है।

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इच्छामृत्यु का अधिकार

विशेष परिस्थितियों में 'इच्छामृत्यु' का अधिकार सम्बद्ध व्यक्ति को देने सम्बन्धी वैचारिक उथल- पुथल लम्बे समय से चल रही थी। दिनांक ९ मार्च २०१८ को 'कॉमन कॉज़' नामक एक गैर सरकारी संगठन की याचिका के संदर्भ से सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने विशेष शर्तों के साथ इसे मान्यता दे दी है। उक्त संविधान पीठ में मुख्य न्यायाधीश सहित पाँच न्यायाधीश थे। उन्होने सर्वसम्मति से इस संदर्भ में निम्नानुसार फैसला दिया है।कोर्ट ने माना है कि संविधान के अनुच्छेद २१ के अन्तर्गत सम्मान के साथ जीने के अधिकार में सम्मान के साथ मरने का अधिकार भी शामिल है। इस फैसले में निष्प्रयास इच्छा मृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) को सशर्त मान्यता दी गयी है। उसका स्वरूप इस प्रकार है।दो प्रकार : इच्छा मृत्यु या दया मृत्यु को यूथेनेशिया कहा जाता है। इसके दो प्रकार हैं १. पैसिव और २. एक्टिव।पैसिव के अन्तर्गत सम्बद्ध व्यक्ति इच्छा और मेडिकल विशेषज्ञों की सहमति के आधार पर जीवन रक्षक दवाएँ न देने और उपकरण ना लगाने या हटाने का निर्णय लिया जा सकता है। व्यक्ति को शान्ति से स्वाभाविक मौत पाने का मौका दिया जाता है।एक्टिव के अन्तर्गत उसे मरने में सहायक दवाएँ या इन्जेक्शन देने की भी छूट रहती है।दो श्रेणियाँ : इनकी दो श्रेणियाँ होती हैं- स्वैच्छिक और गैर स्वैच्छक। स्वैच्छक के अन्तर्गत सम्बन्धित व्यक्ति की स्वीकृति या उसकी जीवन सम्बन्धी वसीयत (लिविंग विल) के आधार पर कार्यवाही की जाती है। गैर स्वैच्छिक के अन्तर्गत यदि व्यक्ति की जीवन सम्बन्धी वसीयत नहीं है और वह स्वयं स्वीकृति देने की स्थिति में नहीं है, तो उसके सम्बन्धियों और मेडिकल विशेषज्ञों की सहमति से कार्यवाही की जा सकती है।न्यायालय ने अपने फैसले में 'स्वैच्छिक निष्प्रयास दया मृत्यु' को मान्यता दी है। कोई व्यक्ति इसके लिए अपनी जीवन सम्बन्धी वसीयत भी कर सकता है। उसका नियम इस प्रकार है।कोई व्यक्ति इस वसीयत में पहले से यह घोषित कर सकता है कि मरणासन्न स्थिति आने पर उसे जीवन रक्षक प्रणाली पर न रखा जाय, शान्ति से स्वाभाविक मौत मरने दिया जाय।इस वसीयत पर वसीयतकर्त्ता और दो प्रत्यक्ष गवाहों के हस्ताक्षर होने चाहिए। वसीयतकर्त्ता के क्षेत्र के प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के हस्ताक्षर के साथ वह वसीयत पंजीकृत (रजिस्टर्ड) होगी। उसे मैडिकल बोर्ड की सहमति से ही लागू किया जायगा। मेडिकल बोर्ड सहमति न दे तो वसीयतकर्त्ता या उसके परिजन हाईकोर्ट का आश्रय ले सकते हैं।इस नियम के बन जाने से अंगदान और देहदान करनेवाले व्यक्ति भी इसका लाभ ले सकते है।

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नवजागरण-नवसृजन की दिव्य योजना १७वीं सदी में भी प्रकट हुई थी

महामति प्राणनाथ के माध्यम से उतरी तारतमवाणी में है उसका उल्लेखएक शृंखला-एक तारतम्यईश्वरीय योजना के अन्तर्गत अचानक कुछ चमत्कारी घटनाएँ भले ही देखी जाती हों, किन्तु वास्तव में दिव्य योजना एक शृंखलाबद्ध क्रम में होती हैं। अलग-अलग दिखने वाली घटनाओं में भी एक तारतम्य होता है। दृष्टा स्तर के व्यक्ति उसका संकेत समय-समय पर करते रहते हैं।रामचरित मानस में इस प्रकार की सम्बद्धता का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। असुरता के उन्मूलन के लिए च्राम जन्मज् की व्यवस्था बनीं। उसी के साथ तमाम देवशक्तियों को यह निर्देश दिए गए कि वे विभिन्न शरीर धारण कर मृत्युलोक में पहुँचें। समय पर उन्हें जाग्रत् करके निर्धारित योजनानुसार विभिन्न भूमिकाओं में लगा दिया जाएगा। वही हुआ भी। वर्तमान नवसृजन की दिव्य योजना भी वैसी ही शृंखलाबद्ध क्रम से लागू की जा रही है। इसके संकेत १६वीं सदी से ही मिलने लगे थे।संत सूरदास (१४८६-१५८४), फ्रांस के भविष्यवक्ता नेस्ट्रडेमस (१५०३-१५६६) के द्वारा एक श्रेष्ठ युग के आने की संभावनाओं का विवरण समय-समय पर मिलता रहा है। उसी शृंखला में महामति प्राणनाथ या प्राणनाथ महाप्रभु के नाम से प्रसिद्ध सिद्ध महात्मा द्वारा नवजागरण-नवसृजन की ईश्वरीय योजना का प्राकट्य बहुत स्पष्ट शब्दों में काफी विस्तार के साथ किया गया था।उनके द्वारा घोषित सूत्रों का अध्ययन करने से पता लगता है कि उनमें और वर्तमान समय में च्युगऋषिज् द्वारा घोषित युग निर्माण योजना के सूत्रों में अद्भुत समानता है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि क्षर जगत (स्थूल, नश्वर जगत) में घटने वाली विशेष घटनाओं की सम्बद्धता परोक्ष जगत (अक्षर एवं अक्षरातीत) से होती है। संभवत: इसी सम्बद्धता को प्रकाश में लाने के कारण उनके द्वारा प्रकट पद्यबद्ध सूत्रों को च्तारतम वाणीज् कहा जाता है।उनका जीवन वृत्तइतिहासविदों के अनुसार प्राणनाथ महाप्रभु च्प्रणामीज् सम्प्रदाय के प्रणेता और बुन्देलखण्ड के प्रतापी राजा च्छत्रसालज् के आध्यात्मिक गुरु थे। छत्रसाल ने छत्रपति शिवाजी से प्रेरणा एवं मार्गदर्शन प्राप्त करके बुन्देलखण्ड को यवन शासकों से मुक्ति दिलाई थी। कविवर च्भूषणज् ने अपने काव्य में केवल दो ही राजाओं-छत्रपति शिवाजी और छत्रसाल की ही सराहना की है। उन्हीं के शब्दों में-और राव सब एक मन में न लाऊँ  अब,साहू को सराहों कि सराहों छत्रसाल को।जिस प्रकार शिवाजी महाराज को समर्थ गुरु रामदास का संरक्षण-मार्गदर्शन मिला, उसी प्रकार छत्रसाल को प्राणनाथ महाप्रभु से वह सब प्राप्त हुआ। उन्होंने एक दिन सवेरे छत्रसाल को आशीर्वाद देकर कहा था कि आज सूर्यास्त तक तुम जितने क्षेत्र का दौरा कर लोगे, उतनी भूमि च्रत्नगर्भाज् हो जाएगी। छत्रसाल ने उसी क्षण अपना घोड़ा दौड़ाया तथा सूर्यास्त से पहले लौटकर उन्हें प्रणाम किया। पन्ना (अब मध्य प्रदेश का एक जिला) के उस भूभाग में आज भी हीरे निकलते हैं।पूर्ववृत्त :- उनका जन्म गुजरात प्रान्त में ईस्वी सन १६१८ में हुआ और १६९४ में उन्होंने देह त्यागी। उनका नाम हेमराज ठाकुर था और वे जामनगर राज्य के दीवान पद पर थे। ईर्ष्यालुओं के षड़यंत्र के कारण उन्हें उनके भाइयों के साथ जेल में डाल दिया गया। वे परम सात्विक एवं ईश्वरनिष्ठ व्यक्ति थे। जैसे श्री अरविंद को जेल में दिव्य बोध हुआ था, उसी तरह उन्हें समय-समय पर दिव्य आवेश आने लगे और तारतमवाणी प्रकट होने लगी। उन्हें मुक्त कर दिया गया। वे भ्रमणशील रहे। तारतम वाणी के अनुसार अन्धकार युग (कलियुग) की समाप्ति की ईश्वरी योजना लोगों को समझाते रहे। उनके अनुयायी च्प्रणामीज् कहलाए। बाद में वे छत्रसाल के साथ पन्ना क्षेत्र में रहे।तारतमवाणी की दिशाधारा• परब्रह्म की सृष्टि को तीन श्रेणियों में विभक्त माना गया है। गीता में लोकत्रयं (तीन लोकों) के अनुसार यह अवधारणा है। गीता में पृथ्वी, अन्तरिक्ष औ द्युलोक को तारतमवाणी में क्षर, अक्षर और अक्षरातीत कहा है।• सृष्टि में जीवात्माओं को भी तीन स्तर का माना गया है।१. जीव सृष्टि : इनकी गति क्षर लोक तक ही है।२. ईश्वर सृष्टि : इनकी गति अक्षर लोक तक है।३. ब्रह्म सृष्टि : इनकी गति अक्षरातीत धाम तक है। • द्वापर युग के बाद कलियुग को अज्ञान जनित रात्रि काल माना गया है। दिव्य आत्माओं को उस काल में सुप्त अवस्था में रखे जाने की बात कही गई है। समय पर दिव्य योजना के अनुसार उन्हें जाग्रत किया जाएगा।• उस जागरण के  काल को च्जागनीज् की लीला कहा गया है। दिव्य आत्माओं में पुन: सुरता जागेगी (देवत्व का उदय होगा)। पहले ब्रह्म सृष्टि की परात्माएँ (मोमिन, उच्च कोटि की आत्माएँ) अपने अन्दर के संस्कारों के दिव्य प्रकाश (नूर) का अनुभव करेंगी। वे ईश्वर कोटि की आत्माओं को जाग्रत करेंगी और उनके संयुक्त प्रभाव से पूरी जीव सृष्टि में दिव्य प्रकाश फैल जाएगा। श्रेष्ठ युग का फिर से अवतरण होगा।• यह सब परमात्मा की इच्छानुसार उन्हीं की कृपा से होगा। तारतम वाणी में परमात्म सत्ता को च्हकज् (सत्य) या श्रीराजजी (विश्व नियंता) कहा गया है। उन्हीं की योजनानुसार नवजागरण-नवसृजन का क्रम चलेगा।• महामति प्राणनाथ जी के समय तक जागनी (नवजागरण) के दो चरण पूरे हुए माने गए हैं। तीसरे चरण में जागनी का क्रम पूरा होने और नवयुग के नवप्रभात के उदय की बात कही गई है।• दिव्य योजना के अनुसार रात्रि को कुछ लम्बा करके तीसरे चरण को थोड़ा आगे बढ़ाया गया है। तारतम वाणी के अध्येता-समीक्षक इसे २०वीं सदी के उत्तरार्ध में मानते हैं। तद्नुसार युग निर्माण अभियान को जागनी का, नवजागरण का तीसरा एवं अंतिम चरण मानना युक्ति संगत लगता है।समीक्षात्मक चर्चा• स्वामी विवेकानन्द ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि ठाकुर (श्रीरामकृष्ण परमहंस) के आने से नवसृजन का क्रम चल पड़ा है।• योगी श्री अरविंद जी ने कहा कि नवजागरण के लिए मनुष्य का मानस पर्याप्त नहीं, अतिमानस (सुपर कोंशस) का अवतरण होना है। वह प्रक्रिया उन्होंने सन् १९२६ से प्रारंभ मानी। इसी वर्ष युगऋषि की अखण्ड ज्योति प्रज्वलित करके गायत्री के २४ महापुरश्चरण करने की साधना आरंभ हुई। वहीं से तारतम वाणी में दिए गए संकेतों के अनुसार नवजागरण के विविध प्रयोग चल पड़े।त्रिवेणी संगम : नवसृजन अभियान को उन्होंने त्रिवेणी संगम की उपमा दी। योजना और शक्ति ईश्वर की, मार्गदर्शन एवं संरक्षण ऋषियों का, पुरुषार्थ एवं सहकार जाग्रत आत्माओं का। तारतम वाणी ने इन्हीं चरणों को च्हक का हुक्मज् मोमिनों द्वारा पहल और सज्जनों द्वारा विस्तार कहा गया है।देवत्व का उदय : युग निर्माण अभियान में श्रेष्ठ आत्माओं के अन्दर सुप्त देवत्व को जगाने की बात तारतम वाणी में परात्माओं में सुरता के जागरण के संकेत का ही प्रायोगिक संस्करण है। मनुष्य में देवत्व के विकास के साथ ही दिव्य योजनानुसार धरती पर स्वर्ग का अवतरण सुनिश्चित होगा।आत्मशक्ति से युगशक्ति : तारतम वाणी में कहा गया है कि श्रेष्ठ आत्माएँ अपने दिव्य स्वरूप का बोध करेंगी, उसी से उत्पन्न प्रकाश नया सवेरा लाएगा। युगऋषि ने इसी को आत्मशक्ति से युगशक्ति के उदय की प्रक्रिया कहा है।निष्ठा, प्रज्ञा, श्रद्धा : तारतम वाणी में कहा गया है कि सत्कर्म क्षर जगत का वातावरण सुधारेगा, इल्म लुंदन (सद्ज्ञान, सद्विवेक, प्रज्ञा) आत्माओं को अक्षर जगत से जोड़ेगा और इश्क (दिव्य प्रेम, श्रद्धा) के माध्यम से वे अक्षरातीत लोक स्थित परमात्मा से जुड़ेगी।सहूर (स्वाध्याय, मनन, चिंतन) : आत्मोन्नति के लिए तारतम वाणी (दिव्य ज्ञान) की महत्त्वपूर्ण भूमिका होने की बात कही गई है। इसका सहूर (अध्ययन, मनन, चिन्तन) करते रहने पर बल दिया गया है। युग निर्माण अभियान में सत्साहित्य का, युग साहित्य का नियमित स्वाध्याय उसी प्रक्रिया का द्योतक है।अवतरित ज्ञान : तारतम वाणी महामति के माध्यम से दिव्य ज्ञान के अवतरण से प्रकट हुई। प्राणनाथ जी ने कहा कि परम धाम में सम्पन्न खिलवत (बैठक) में हुई 'बत' (बहस-परिचर्चा) का सारांश ही उनके माध्यम से प्रकट हुआ है। युगऋषि कहते रहे हैं कि मैं लेखक नहीं हूँ, मैं तो यहाँ की समस्याएँ लेकर उच्च लोकों में जाता हूँ, वहाँ परिचर्चा में जो समाधान निकलते हैं, उन्हें ही चिट्ठी के रूप में जाग्रत् आत्माओं तक पहुँचाता रहता हूँ। दिव्य ज्ञान का दिव्य स्रोत वही है।इष्ट सविता : तारतम वाणी में एकमात्र इष्ट 'हक' को स्थापित करने की बात कही गई है। हक को 'मूल प्रकाश' कहा गया है। 'सविता' उसी का शास्त्रीय नाम है। वही सबका उत्पादक एकमात्र इष्ट कहा जा सकता है।दिव्य प्रार्थना : वाणी में कहा गया है कि 'हक' से जुड़ने की दिव्य बुद्धि, प्रज्ञा केवल अपने प्रयासों से नहीं जागती, उसके लिए च्हकज् की कृपा भी जरूरी है। इसीलिए युगऋषि ने सर्वव्यापी प्रभु से 'धियो यो न: प्रचोदयात्।' (वह प्रभु हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर प्रेरित करे) यह प्रार्थना करवाई है। इस अभियान को विश्वव्यापी बनाकर सभी जाग्रत् आत्माओं को इससे लाभान्वित करने का क्रम बनाया। महत्त्वपूर्ण समय : तारतम वाणी के समीक्षक यह मानते हैं कि जागनी का समय २०वीं सदी का उत्तरार्ध होगा। युगऋषि ने सन् १९८० से २००० तक के समय को युगसंधि काल कहा। उसी बीच उन्होंने सूक्ष्मीकरण साधना की, ताकि दिव्य सूक्ष्म तंत्र को प्रत्यक्ष जगत में सक्रिय किया जा सके। जागनी के तीसरे चरण का समय आने तक तारतम वाणी को प्रकाश में लाने की प्रेरणा प्रणामी सम्प्रदाय में नहीं उभरी। २०वीं सदी में ही उसके अनुवाद, प्रकाश और विस्तार की प्रक्रिया चालू हई।कयामत विनाश नहीं, नवजागरण : कुरान में १४वीं सदी (हिजरी) के बाद कयामत की बात कही गई है। लोग कयामत को प्रलय से जोड़ते हैं। तारतम वाणी ने कहा कि कयामत का आशय प्रलय नहीं, नव जागरण है। कहा गया है कि कयामत के समय तमाम रूहें जाग जायेंगी। एक नया सवेरा होगा। युगऋषि ने स्पष्ट किया कि मनुष्य की भूलों के कारण भले ही विश्व के विनाश की संभावनाएँ दिख रही हों, किन्तु नियंता को यह मंजूर नहीं। नव जागरण के प्रभाव से श्रेष्ठ आत्माएँ जाग्रत और सक्रिय होंगी। फिर से श्रेष्ठ युग आएगा। जागरण का क्रम : तारतम वाणी में जागरण के क्रम में पहले ब्रह्म सृष्टि स्तर की सुरताओं के जागरण, फिर ईश्वरीय सृष्टि स्तर की आत्माओं के जागरण के प्रभाव से सम्पूर्ण जीव सृष्टि में नूर फैलने की बात कही गई है। युगऋषि ने उन्हें क्रमश: जीवन मुक्त आत्माएँ और जाग्रत आत्माएँ कहा है। वे अग्रदूत की भूमिका निभाएँगी तथा उनके प्रभाव से नवजागरण की प्रचण्ड लहर उभरेगी। जैसे चक्रवात के प्रभाव से निर्जीव पत्ते और धूलिकण भी आकाश चूमने लगते हैं, वैसे ही नवजागरण के तूफानी प्रवाह के साथ जन सामान्य भी उच्च आदर्शों का अनुगमन करने लगेंगे। तारतम वाणी में उक्त उच्च आत्माओं की संख्या क्रमश: १२००० और २४००० कही गई है। युगऋषि ने ईश्वरीय आदेश से समय की आवश्यकता के अनुसार बड़ी संख्या में उनको लाए जाने की योजना पर प्रकाश डाला है।परिवर्तन की तीव्र गति : सभी परात्माओं की सामूहिक जागनी होने पर विश्व का वातावरण तीव्र गति से सुधरेगा, की बात तारतम वाणी में कही गई है। युगऋषि ने कहा च्हम विश्व की तमाम विभूतियों को जगाने की साधना कर रहे हैं। सन् २००० के बाद जगह-जगह से क्रान्तियाँ फूट-फूट कर निकलेंगी। वह क्रम स्पष्ट दिखाई देने लगा है। उन्होंने सन् १९५८ के सहस्र कुण्डीय यज्ञ के समय कहा था एक दिन सारे विश्व में गायत्री मंत्र गूँजेगा। सन् २००० आते-आते वह स्थिति दिखने लगी है।एक विश्व व्यवस्था बनाने की उनकी घोषणा विश्व पटल पर दिखने लगी है। विश्व युद्ध न होने देने की ईश्वरीय इच्छा प्रकट करते हुए उन्होंने ८० के दशक में कहा था, तनी हुई बंदूकें नीचे होंगी, 'तू पीछे हट-तू पीछे हट' की तकरीर रुकेगी, परस्पर वार्ता से तमाम मसले हल होंगे। महाशक्तियों को भी मर्यादा में रहने के लिए बाध्य किया जाएगा। उक्त कथन पिछले वर्षों में चरितार्थ होते दिखे हैं। रूस में आयरन कर्टेन (फौलादी पर्दे) की जगह ग्लास नोस्त (पारदर्शिता) और पैरस्त्रोयका (सहगमन) के नारे उभरे। अमेरिका के स्टार वॉर कार्यक्रम को लाचारी में रोक देना पड़ा। स्पष्ट है कि जागनी का तीसरा चरण सक्रिय हो चुका है। हर व्यक्ति को ईश्वरीय योजना में भागीदारी के लिए अपने समय-साधनों का एक अंश लगाकर अनुपम सौभाग्य से जुड़ना ही चाहिए।