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सहृदयता-करुणा, एक दिव्य विभूति

महानता की पहचानसहृदयता मनुष्य का प्रधान लक्षण है और महानता की पहली निशानी। सहृदय व्यक्ति सब में एक ही परमात्मा का निवास होने का सिद्धांत तर्कों और तथ्यों के आधार पर प्रतिपादित करते हों अथवा नहीं, परन्तु अपने आचारण और व्यवहार द्वारा अवश्य सिद्ध करते हैं कि उन्होंने मनुष्य मात्र में बसने वाले परमात्मा को न केवल पहचाना, बल्कि उसे अपनाया और इस सिद्धान्त को अपने जीवन क्रम में उतारा भी था। उदारता व सहृदयता सम्पन्न व्यक्तियों का प्रसंग आता है तो महाकवि पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला का नाम उसमें चमक कर उभरता है।  वे हिन्दी साहित्य के इतिहास प्रवर्तक कवि थे, किन्तु उन्हें उनकी सहृदयता, उदारता और करुणा के कारण देवता के रूप में उल्लेखित किया जाता है। उन्होंने अपनी सारी सम्पदा और समूचे साधन दीन-दुखियों में बाँट दी थी तथा स्वयं अकिंचन होकर रहते थे। यही नहीं, जब भी कभी उन्हें किसी और से कुछ मिलता तो वे उसे भी अपने पास रखने की अपेक्षा दूसरे जरूरतमन्द व्यक्तियों को बाँट देते थे। एक बार जेठ की तपती दुपहरी में वे घर में विश्राम कर रहे थे। किसी काम से बाहर निकले तो देखा एक क्षीणकाय वृद्ध, जिसके शरीर में अस्थियाँ मात्र ही थीं, सिर पर लकड़ियों का भारी गठ्ठर उठाये चला जा रहा था। उसका शरीर तो जवाब दे ही रहा था, ऊपर से सूरज की गर्म किरणें और नीचे जलती हुई धरती; वातावरण ही ऐसा था कि उसमें चलना तो क्या, खड़े रह पाना भी कठिन था। तिस पर भी वह फटे, पुराने कपड़े तथा नंगे पैर था।  निराला की दृष्टि उस वृद्ध पर पड़ी तो वे अपना काम भूल गए और तुरन्त वृद्ध के पास जा पहुँचे। उन्होंने वृद्ध को कुछ कहा तथा उसके सिर पर रखा लकड़ियों का गठ्ठर उतारकर उसे अपने घर के भीतर ले आये। कुछ दिनों पहले ही कुछ मित्रों ने उनके लिए जूते और वस्त्र आदि खरीदे थे। निराला ने सारा सामान लाकर उस वृद्ध व्यक्ति के सामने रख दिया और आग्रहपूर्वक कहा, "इन्हें पहन लो।"वृद्ध व्यक्ति यह देखकर सकपका गया। कोई जान-पहचान नहीं, अपरिचित हूँ, फिर भी यह सब क्यों किया जा रहा है? बड़ी मुश्किल से साहस जुटाकर बोला, "बिना कुछ जान-पहचान के यह सब ...!"वह वृद्ध अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि निराला जी बीच में ही उसकी बात काटते हुए बोले, च्च्अच्छी तरह जानता हूँ बाबा तुम्हें। तुम मेरे करोड़ों भाइयों में से एक हो।ज्ज् इतना कहकर वे स्वयं अपने हाथ से उस वृद्ध को जूते पहनाने लगे। अहितकारी का भी भला होसहृदयता अथवा करुणा अहित चिन्तन करने वालों को भी अपना बना देती है। सौमनस्यता उत्पन्न करने के लिए किए गये हजारों-हजार प्रयास वह परिणाम उत्पन्न नहीं कर पाते जो करुणा उत्पन्न करती है। सब में अपने ही समान आत्मा देखने और प्राणिमात्र का दु:खदर्द समझने वाले व्यक्ति अपने लाभ के लिए भी किसी प्राणी को कष्ट नहीं पहुँचा सकते। घटना सन् १९४० की है। उन दिनों महात्मा गाँधी के आश्रम सेवाग्राम में परचुरे शास्त्री नामक विद्वान भी रहते थे, जो कुष्ट रोग से पीड़ित थे। बापू स्वयं उनकी मालिश किया करते, घावों को धोते और दवाई लगाते। एक दिन आश्रम के ही एक कार्यकर्त्ता पं. सुन्दरलाल ने बापू को शास्त्री जी की मालिश करते देखा, कहा, "बापू! कोढ़ की तो एक अचूक औषधि है। कोई जीवित काला नाग पकड़कर मँगवायें और कोरी मिट्टी की हाँड़ी में बन्द कर उसे उपलों की आग पर इतना तपायें कि नाग जलकर भस्म हो जाए। उस भस्म को यदि शहद के साथ रोगी को खिलाया जाय तो कुष्ठ कुछ ही दिनों में दूर हो सकता है।"महात्मा गाँधी इस उपाय के सम्बन्ध में कुछ कहें, इसके पहले ही शास्त्री जी ने कहा, "बेचारे निर्दोष साँप ने क्या बिगाड़ा है? जो उसको जला कर अपना रोग ठीक किया जाय। इससे तो मेरा स्वयं का मरना ही ठीक है, क्योंकि हो सकता है पूर्व जन्म के किसी पाप के कारण मुझे यह रोग लगा हो।"सबको मिलता है यह सुयोगधन, बुद्धि, प्रतिभा, योग्यता से सम्पन्न होते हुए भी जिस व्यक्ति में सहृदयता-करुणा नहीं है, वह पिछड़ा, एकांगी, अपूर्ण ही माना जाएगा। समृद्धि एवं बौद्धिक प्रखरता मनुष्य के लिए साधन मात्र जुटा सकते हैं, किन्तु वे आधार नहीं दे पाते जिनसे परस्पर एक-दूसरे के प्रति, समस्त समाज के प्रति आत्मीयता उमड़ती हो, पीड़ा-पतन को देखकर सेवा-सहयोग के लिए हृदय मचलता हो। ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने एक भूखे, किन्तु मातृभक्त बालक की एक रुपया देकर सहायता की। इसी एक रुपये के सहारे आगे चलकर वह प्रतिष्ठित दुकानदार बन गया था और ईश्वरचंद्र विद्यासागर जी को अपना भगवान मानने लगा था।  ऐसे सुयोग हर मनुष्य के जीवन में कभी न कभी आते हैं, किन्तु लोग संकीर्णता-निष्ठुरतावश उनसे कन्नी काटते नज़र आते हैं। लेकिन हृदय सम्पन्नों की करुणा उन्हें बड़े से बड़ा जोखिम उठाने को भी बाध्य करती है। निर्धन, किन्तु दिल से अमीरनई दिल्ली की घटना है जब पंजाबी सूबे को लेकर साम्प्रदायिकता का विष फूट पड़ा था। हिंसा का नंगा नाच चल रहा था, सैकड़ों व्यक्ति मारे गए। उसी समय एक अशिक्षित रिक्शा चालक, एक महिला तथा शिशु को लिए मुख्य सड़क से निकल रहा था। दंगा शुरू होते ही महिला सारा सामान छोड़कर चाँदनी चौक की एक गली में दौड़ गई। सामान तो छोड़, बच्चे पर भी उसका ध्यान नहीं रहा।  चारों ओर पत्थर फिक रहे थे, गोलियाँ भी चल रही थीं। रिक्शावाला चाहता तो वह भी भाग कर अपनी सुरक्षा करता, किन्तु वह भागा नहीं, एक वर्षीय मासूम बच्चे की सुरक्षा के लिए उसे गोद में लेकर अपने सिर को उसकी ढाल बना ली। पत्थर पड़ते रहे, रिक्शेवाला लहुलुहान हो गया, बेहोश हो गया। जब होश आया तो अपने को पुलिस से घिरा पाया। सामने ही सजल नेत्रों से वह महिला देख रही थी। रुँधे गले से वह बोली, "भैया! तुमने मेरे बच्चे को आज नया जीवन दिया है। मैं जीवनपर्यन्त तुम्हारी ऋणी रहूँगी।" कुछ पैसे निकाल कर महिला ने रिक्शा चालक को देने चाहे, किन्तु रिक्शा चालक ने इन्कार कर दिया, कहा, "मनुष्य होने के नाते यह तो मेरा कर्त्तव्य था।"आन्तरिक करुणा ही मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है। स्वामी विवेकानन्द ने अपने एक भाषण में इस प्रकार प्रस्तुत किया था, "बुद्धिमान होना अच्छी बात है। बुद्धिमान और भाव सम्पन्न होना और भी अच्छी बात है। किन्तु यदि दोनों में चयन की बात आये जो बुद्धिमान होने की तुलना में भाव सम्पन्न बनना अधिक पसन्द करूँगा। हृदय की संवेदनशीलता के अभाव में बुद्धि निरंकुश और कठोर बन जाती है। महामानव, महापुरुष अंत:संवेदनाओं को उभारने और उसे सत्प्रयोजनों में, पीड़ा-पतन निवारण में नियोजित करने के लिए ही अधिक लगे रहे हैं। यही वह आधार है, जिसके सम्बल से मानवता गौरवान्वित होती है और समाज में सुख-शांति से भरीपूरी परिस्थितियाँ विनिर्मित होती हैं।

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ऋषियों के प्रभाव से ही भारत महान बना, मनुष्यता धन्य हुई

ऋषि परम्परा से जुड़े होने का गौरव अनुभव करें, उसके जीवन्त अंग बनेंऋषि पंचमीऋषि पंचमी का पर्व प्रतिवर्ष भाद्रपद (भादों) माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाने का प्रचलन भारत में है। इस वर्ष यह पर्व १४ सितम्बर को पड़ रहा है। भारत की महानता के पीछे ऋषितंत्र की ही विशेष भूमिका रही है। पूरे भारत में हर वर्ग का गोत्र ऋषियों के नाम पर ही होता है। वंश या साधना- शोध प्रक्रिया के क्रम में जो वर्ग जिस ऋषि के निर्देशों- अनुशासनों का अनुपालन करता था, उसका गोत्र उसी ऋषि के नाम से ही बोला जाता रहा है। अर्थात् हर भारत वासी किसी न किसी रूप में ऋषि परम्परा के साथ गहराई से जुड़ा रहा है। ऋषि परम्परा से जुड़े होने के नाते हर नर- नारी का पवित्र कर्त्तव्य बनता है कि वह अपने जीवन क्रम को ऋषि- अनुशासन के अनुरूप चलाता- विकसित करता रहे। इसी आत्म समीक्षा और आत्म शोधन- संवर्धन की प्रक्रिया को जीवन्त बनाये रखने के लिए ऋषि पंचमी का पर्व प्रतिष्ठित किया गया है।आजकल तो इस पर्व का महत्त्व सामाजिक दृष्टि से बहुत कम रह गया है। कहीं- कहीं आस्थावान गृहणियाँ इस दिन चिह्न पूजा के रूप में उपवास एवं पर्व पूजन का कुछ क्रम चला लेती हैं। लेकिन व्रत रखने वाली देवियों सहित समाज के लोग इस पर्व के महत्त्वपूर्ण उद्देश्यों को न समझते हैं और न अपनाते हैं। कथित ब्राह्मण और साधु वर्ग के व्यक्ति, जिनसे ऋषि अनुशासन निभाने और अन्य व्यक्तियों को भी उस दिश में प्रेरित करते रहने की आशा की जाती है, अधिकांश रूप में वे भी इस ओर उदासीन ही रहते हैं।ऋषिगण जीवन जीने की कला जीवन- विज्ञान के सर्वोच्च विशेषज्ञ रहे हैं। आज व्यक्तिगत, पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन में जो कष्टकारी- पतनोन्मुख विसंगतियाँ पनप रही हैं, उनमें से लगभग सभी ऋषियों द्वारा स्थापित जीवन- अनुशासन के उल्लंघन से उभरी हैं। उनका समाधान भी पुन: जनजीवन में ऋषि अनुशासनों की स्थापना से ही निकल सकता है। इसलिए ऋषि पंचमी पर्व के माध्यम से ऋषि गरिमा को समझने- समझाने, उनके जीवन सूत्रों को अपनाने, अभ्यास में लाने के प्रयास- प्रयोग किए जाने उचित भी हैं और आवश्यक भी। विशेष रूप से 'प्रज्ञा अभियान', युग निर्माण योजना से जुड़े परिजनों को तो इस दिशा में विशेष भूमिका निभानी चाहिए, क्योंकि युगऋषि ने मनुष्य मात्र के लिए उज्ज्वल भविष्य लाने, मनुष्य में देवत्व के जागरण और धरती पर स्वर्ग के अवतरण के लिए ऋषि परम्परा के पुनर्जीवन की अनिवार्य आवश्यकता बताई है। यह तथ्य जन- जन तक पहुँचाने के लिए ऋषि पंचमी को भी एक उपयुक्त माध्यम बनाया जा सकता है।गौरवमय परम्परामनुष्यता के इतिहास पर दृष्टि डालें, तो मनुष्य जीवन को गरिमामय बनाने में ऋषितंत्र की सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका दिखाई देती है। कुछ तथ्यों पर ध्यान दें :-• सृष्टि के प्रारंभ में स्वायंभू (परमात्मा के संकल्प से प्रकट हुए) मनु और शतरूपा ऋषिस्तर के ही थे। अवतारों में वामन, परशुराम, भगवान राम, कृष्ण आदि को काया रूप में लाने का आधार ऋषि स्तर के व्यक्तियों ने ही बनाया। वे ही परमात्म चेतना और मनुष्यों के बीच दिव्य सम्पर्क सूत्र बने रहे।• अवतारी पुरुषों को निखारने- उभारने की अद्भुत प्रक्रिया अपने- अपने समय के ऋषिकल्प व्यक्तियों ने ही चलायी।• ज्ञान- विज्ञान, कला- संस्कृति के विकास के लिए शोध- तप, प्रयोग, प्रसार, प्रशिक्षण की व्यवस्थित प्रक्रियाएँ उन्हीं ने चलायीं। ज्ञान के प्रथम और सर्वोच्च माने जाने वाले संस्करण, वेदों, उपनिषदों, ब्राह्मण एवं आरण्यक सूत्रों की रचना, संकलन- सम्पादन की जिम्मेदारी भी ऋषितंत्र ने निभायी।• योग- विज्ञान, व्याकरण, ज्योतिर्विज्ञान, संगीत, चिकित्सा विज्ञान आदि की विभिन्न धाराएँ भी ऋषि परम्परा की प्रतिभाओं ने ही अवतरित, विकसित एवं प्रसारित कीं। पदार्थ विज्ञान, मनोविज्ञान और चेतना विज्ञान (अध्यात्म) को विकसित और परस्पर पूरक बनाने वाले भी वही रहे।• विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में प्रकृति की भिन्नताओं के बीच विकसित विविध सांस्कृतिक धाराओं से जुड़े, विभिन्न धर्म- आस्था वाले व्यक्तियों के बीच 'वसुधैव कुटुम्बकम', 'आत्मवत् सर्वभूतेषु' की दिव्य अनुभूति के आधार पर अनेकता में एकता का बोध उन्हीं ने किया और कराया।• धर्म विज्ञान के मूल आध्यात्मिक सूत्रों के साथ क्षेत्र और समय विशेष की आवश्यकताओं की संगति बिठाते हुए ईश्वरीय संदेशों को जन- जन तक पहुँचाने वाले, उनके अनुपालन हेतु मार्गदर्शन और शक्ति अनुदान देने वाले, विभिन्न धर्म- सम्प्रदायों के प्रणेता सभी ऋषि परम्परा के ही महापुरुष थे।इन सूत्रों पर प्रकाश डालने का मूल प्रयोजन यही है कि जन- जन का ध्यान ऋषि परम्परा के गरिमामय स्वरूप और उनके सम्बन्ध, अनुशासनों की आवश्यकता की ओर लाया जाय तो मनुष्य के चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में आये भटकाव एवं उस कारण उपजी अनेक कठिनाइयों का उपचार किया जा सकता है। मनुष्य मात्र के लिए उज्ज्वल भविष्य का पुष्ट आधार तैयार किया जा सकता है।सत्य यह नहीं है कि समय के साथ उभरे विज्ञान युग के शोध प्रयोगों ने मनुष्य के लिए जो सुविधाएँ प्रदान कर दी हैं, शक्तियाँ प्रदान कर दी हैं, उनके कारण मनुष्य के जीवन में भटकाव आ गया है। सत्य यह है कि भौतिक शक्तियों- सुविधाओं के सदुपयोग की दिशा- प्रेरणा देने में समर्थ ऋषि सूत्रों को भुला देने के कारण मनुष्य समाज भटक कर विकास के भ्रम में विनाश के सरंजाम जुटाने लगा है।युगऋषि के समाधानयुगऋषि (वेदमूर्ति, तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा) ने इस दिशा में बहुत विवेकसम्मत और व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत किए हैं। जैसे :-लौकिक शक्तियाँ अपने आप में अच्छी या बुरी नहीं होतीं। उनका सदुपयोग या दुरुपयोग ही उन्हें अच्छा या बुरा बनाता है। जितनी समर्थ शक्ति हो, उसे नियंत्रित करके सही दिशा में, सही प्रयोजनों में लगा देने के लिए उसी स्तर की आत्मशक्ति की आवश्यकता होती है। उसके अभाव में ही लौकिक शक्तियाँ अनियंत्रित होकर अर्थ का अनर्थ करने लगती हैं। उदाहरण देखें :-सैन्य शक्ति : इसे बढ़ाने का मूल प्रयोजन जन- जन को सुरक्षा प्रदान करना है। इस शक्ति का खूब विकास हुआ है। शरीर की शक्ति से प्रारम्भ होकर अस्त्र- शस्त्रों, तीर- तलवारों, बन्दूकों- तोपों से होते हुए परमाणु बम तक इसका विकास हो गया है। लेकिन कोई भी स्वयं को सुरक्षित अनुभव नहीं कर रहा है। इसकी दिशा बहक जाने से यह गुण्डागर्दी, उग्रवाद, आतंकवाद को बढ़ावा दे रही है।अर्थशक्ति : इसकी आवश्यकता जन- जन को पोषण- आरोग्य, दीर्घ जीवन प्रदान करने के लिए है। अनुशासनहीन होकर यही शोषण, व्यसन, रोग आदि को बढ़ावा दे रही है। लोग अज्ञानग्रस्त होकर इस साधन को ही साध्य मानने लगे हैं। इसे पाने के नशे में लोग मनुष्यता को भूलकर पशु और पिशाच स्तर तक गिर जाते हैं।बुद्धिशक्ति : इसकी आवश्यकता मनुष्य को विभिन्न विषयों में कुशल और विवेकशील बनाने के लिए है। लेकिन यह भटक कर छल, प्रपंच, पाखंड और घोटाले बढ़ाने में लग रही है। समाज को पीड़ित- प्रताड़ित करने वाली दुष्प्रवृत्तियों को बुद्धि से कमजोर व्यक्ति अंजाम नहीं दे सकता। दुर्बुद्धि से दुरुपयोग और दुरुपयोग से दुर्गति की उक्ति सर्वमान्य है। ऋषि प्रणीत सूत्रों के अनुसरण से उक्त तीनों शक्तियों को सद्बुद्धि से सदुपयोग और सदुपयोग से सद्गति के कल्याणकारी मार्ग पर लाया जा सकता है।लोग अपनी ऋषि परम्परा, उससे प्राप्त शानदार विरासत को भूल गये हैं। वे अपने आप को इस समय की विकृत परम्पराओं का ही अंग मानने लगे हैं। चेतन होते हुए भी जड़- निर्जीव पदार्थों की तरह जमाने की धारा में बहते जाना ही अपनी नियति मान बैठे हैं। हम समाज को उत्कर्ष की दिशा और शक्ति देने वाले ऋषियों की गौरवमयी परम्परा के अंग हैं, यह भाव जागते ही परिदृश्य बदलने लगेगा। बेजान तिनकों, पत्तों, लकड़ी के टुकड़ों की तरह धारा में बहने वाले व्यक्ति चेतना सम्पन्न जल जीवों की तरह धाराओं को चीरते हुए अपने- अपने गरिमामय लक्ष्यों की ओर बढ़ने लगेंगे।समझें- समझायें, बढ़ें- बढ़ायेंयुगऋषि से गहन आस्था के साथ जुड़े हुए उनके शिष्य, अनुयायी अंग- अवयव कहलाने वाले प्रजा परिजनों, प्रज्ञापुत्र- पुत्रियों को ऋषि सूत्रों को समझने- समझाने, उस दिशा में बढ़ने- बढ़ाने के लिए स्वयं को तैयार और सक्रिय करना ही चाहिए। इसी आधार पर वे युग परिवर्तन के ईश्वरीय अभियान में अग्रदूतों की सफल भूमिका निभा सकते हैं। युगधर्म का कुशल निर्वाह करते हुए उच्चस्तरीय श्रेय- सुयश और सद्गति के अधिकारी बन सकते हैं।ध्यान रहे इसके लिए ऋषि सूत्रों को रट लेना और लोगों से दुहरवा लेना भर काफ़ी नहीं है। गीता पढ़ी और रटी तो बहुतों ने है, किन्तु स्थितप्रज्ञ बनने की दिशा में, अपनी संकीर्णता को विसर्जित करके प्रभु की विराटता की अनुभूति करने में कितने सफल हुए?पतंजलि के योग सूत्र पढ़ना, याद करना तो किसी के लिए संभव है, किन्तु क्या इतने मात्र से वे योग सिद्ध साधक बन सकते हैं?वेदान्त के सूत्र बहुतों को याद हैं, किन्तु इतने भर से क्या वे सारे विश्व के साथ एकात्मता का बोध कर सकते हैं?युगऋषि ने कहा है कि यह सब पहले चरण के रूप में ठीक हो सकते हैं, किन्तु अगले चरणों की सिद्धि के लिए साधकों को अपने प्राणों को, व्यक्तित्व को उसके अनुरूप परिष्कृत- विकसित करना पड़ता है। उन्होंने लिखा है:-अध्यापक बहुत होते हैं, पर जो अपनी प्राण चेतना से, संपर्क में आने वालों का प्राण उपचार कर सकें, ऐसे ऋषिकल्प देवमानव कम ही होते हैं। जो होते हैं वे ज्ञान के साथ- साथ सदा उत्कृष्टता का अमृत पिलाते हैं, दृष्टिकोण बदलते हैं और जीवन की दिशाधारा में उच्च स्तरीय महान परिवर्तन करते हैं। (प्रज्ञोपनिषद् ६/२/८०- ८३)इस प्रकार वाँछित दिशा में श्रेष्ठ परिवर्तन करने के लिए केवल आत्मकल्याण की साधना ही पर्याप्त नहीं होती, उनके साथ लोकमंगल की साधना का भी संतुलित क्रम चलाना पड़ता है। ऋषियों की प्रणाली पर प्रकाश डलते हुए वे लिखते हैं:-इसके लिए व्यक्तित्व को गौरवशाली बनाने के उपरान्त वे (ऋषितंत्र के व्यक्ति) इस संचित विभूति के आधार पर अपने उदार पुरुषार्थ का उपयोग जन- जन का आन्तरिक परिष्कार करने में लगाते हैं। यही सनातन ऋषि धर्म है। इसी प्रयोजन के लिए वे समयासनुसार अनेक योजनाएँ बनाते और कार्यक्रम चलाते रहते हैं। (प्रज्ञो. ६/२/ ८४- ८६)प्रज्ञा परिजन इसी परम्परा का अनुसरण करते हुए युगऋषि के दिए हुए जीवन साधना सूत्रों से व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाते हुए जनमानस के परिष्कार को अपनी साधना की कसौटी मानकर लग पड़ें तो काम बनने लगे। इससे अपनी क्षमता बढ़ने या सफलता मिलने का अहंकार नहीं पनपेगा और आत्म संतोष, लोकसम्मान तथा दैवी अनुग्रह की बढ़तोत्तरी का लाभ भी प्राप्त कर सकेंगे।जिनमें मानसिक परिष्कार के प्रति उत्साह दिखाई दे, उन्हें तत्काल किसी सुगम- सुनियोजित कार्यक्रम में लगा दिया जाय। पू. गुरुदेव ने युग सैनिकों के लिए आत्मकल्याण और लोकमंगल की साधनाओं के साथ ऋषिधर्म- युगधर्म निभाने के लिए समुचित योजनाओं और कार्यक्रमों के प्रारूप भी बना दिए हैं। उनके दिए हुए मार्गदर्शन पर निष्ठापूर्वक चलने वालों के साथ उनकी शक्तिधाराएँ भी जुड़ जाती हैं, इस तथ्य की अनुभूति भी हममें से लगभग सभी को है। उनके निर्धारित क्रम का अनुपालन करते हुए हम भी नवयुग, प्रज्ञायुग के लिए अनुकुल प्राणवान वातावरण बना सकते हैं। उन्होंने लिखा है:-पुरातन काल का सतयुग और कुछ नहीं, केवल मुनि- मनीषियों द्वारा उत्पन्न किए और बिखेरे गए सद्ज्ञान का ही प्रतिफल था। (प्रज्ञोपनिषद ६/२/८९)प्राचीन काल में सतयुग के लिए ऋषियों ने उस समय के अनुरूप व्यवस्था बनायी होगी। वर्तमान काल में युग परिवर्तन में सक्षम सद्ज्ञान को उत्पन्न- विकसित करने का कठिन कार्य युगऋषि ने स्वयं कर दिया है। युग सैनिकों के हिस्से में उन्हें उर्वर भूमि पर बिखेरने की भूमिका आयी है। इतना होने पर उन बीजों को विकसित, पल्लवित, पुष्पित, फलित करने का कार्य महाकाल की युगान्तरीय चेतना कर देगी।अस्तु ऋषि पंचमी पर सभी परिजनों को चाहिए कि वे अपने जीवन की गहन समीक्षा करें और ऋषि अनुशासन के अनुरूप अपने चिंतन, चरित्र और व्यवहार को श्रेष्ठतर स्तर पर ले जाने की ठानें। अपने प्रभावक्षेत्र के व्यक्तियों को भी इस हेतु प्रेरित करें। इस दिशा में परस्पर एक- दूसरे को सहयोग देते रहने का क्रम बनाएँ। ऐसा करके हम सब ऋषि चरणों में सार्थक श्रद्धांजलि अर्पित कर सकेंगे।

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पूजा ही पर्याप्त नहीं, जीवन को साधनामय बनाइये

जागरूक रहें, प्रवाह में न बहेंमानव जीवन ईश्वर की एक अनमोल अमानत है। इसे आदर्श एवं उत्कृष्ट बनाना ही अपनी बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता का परिचय देना है। भगवान ने हमारी पात्रता की कसौटी के रूप में यह मनुष्य शरीर दिया है और यह परखा है कि हम इसका उत्तरदायित्व संभालने की स्थिति में हैं या नहीं? यदि इस कसौटी पर खरे उतरे तो ऋषित्व एवं देवत्व जैसे उच्च उत्तरदायित्व प्रदान कर अंतत: अपना ही अंग बना लेता है, पर यदि मनुष्यत्व जैसी परीक्षा में सफल न हो सके तो जिस स्तर के हम हैं, उसी निम्न योनि में पड़े रहने के लिए वापिस भेज देता है।अस्तु, प्रयत्न यह होना चाहिए कि मानव के महान् उत्तरदायित्व को वहन करने के लिए हम पग- पग पर सतर्कता बरतें। निम्न योनियों के संचित कुसंस्कारों को हटायें और मानवोचित गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत करें।यह प्रयत्न तभी सफल हो सकता है जब हर घड़ी अपने आपके ऊपर चौकसी रखी जाय। अपने सम्बन्ध में असावधान रहने से उसी ढर्रे पर अपनी गाड़ी भी लुढ़कने लगती है जिसमें आसपास घिरे हुए निकम्मे लोगों का जीवन फूहड़पन के साथ बर्बाद होता चला जा रहा है। आवश्यकता ऐसी विवेकशीलता की है जो अपने सम्बन्ध में सतर्कता बरतने और दूसरे गन्दे लोगों का अनुकरण न करके अपना मार्ग स्वत: निर्धारत करने का साहस प्रदान कर सके।साहसी कदम बढ़ायेंऐसा साहस ही अध्यात्म है जो आदर्श जीवन जीने की गतिविधियों का निर्माण करे, उसी रास्ते पर उत्साहपूर्वक घसीट ले चले। जिन लोगों के बीच हमारा रहना है उनमें से अधिकांश बड़े स्वार्थी, संकीर्ण, ओछे, गंदे लोग हैं, इनकी कोशिश अपने ही ढर्रे पर साथियों को भी घसीट ले चलने की होती है। वे उत्कृष्ट जीवन जीने वालों का मजाक बनाते हैं। निन्दा और विरोध करते हैं और तरह- तरह की अड़चनें खड़ी करते हैं।जो इनसे डर गया, वह गन्दा जीवन जीने के लिए विवश होगा, पर जिसने साहस करके अपना पथ स्वयं निर्धारित करने का संकल्प कर लिया और पड़ौसियों की उपेक्षा करके उत्कृष्टता की गतिविधियाँ अपनाने के लिए दृढतापूर्वक चल पड़ा, वही जीवनोद्देश्य की प्राप्ति में सफल होता है। अध्यात्म साहसी शूरवीरों का, आदर्शवादी और उत्कृष्ट लोगों का मार्ग है।जो जीवन शोधन का पुरुषार्थ कर सकने का साहस नहीं कर सकते, उन्हें आत्मिक प्रगति, ईश्वर की प्रसन्नता और उन दिव्य विभूतियों की आशा नहीं करनी चाहिए, जिन्हें पाकर मनुष्य जीवन धन्य और सार्थक बनता है। कीमती वस्तुएँ उचित मूल्य देकर ही खरीदी जा सकती हैं। आध्यात्मिक विभूतियाँ और दैवी सम्पदाएँ जीवन- शोधन से कम मूल्य पर आज तक न कोई खरीद सका है और न भविष्य में कोई खरीद सकेगा।देवी- देवताओं को मंत्र- तंत्र से सिद्ध कर उनसे तरह- तरह की मनोकामनाएँ सहज ही प्राप्त कर लेने के सपने देखने वाले, थोड़ी- सी टण्ट- घण्ट के बदले स्वर्ग- मुक्ति लूट ले जाने वाले धूर्त अपना मन सस्ते सपने देखने में बहलाते रहते हैं, पर रहना उन्हें खाली हाथ ही पड़ता है। सस्ते मूल्य पर आत्मिक सफलताएँ मिलने के प्रलोभन विडम्बना भर हैं। उनसे हर विवेकशील को अपना पिण्ड शीघ्र ही छुड़ा लेना चाहिए और साहसपूर्वक जीवन- शोधन के उस राजमार्ग पर चल पड़ना चाहिए, जिस पर चले बिना कल्याण का लक्ष्य प्राप्त कर सकना किसी के लिए भी संभव नहीं हो सकता।आत्मशोधन की प्रक्रियायह कार्य एक निर्धारित समय पर थोड़ी पूजा- उपासना जैसी प्रक्रिया अपनाकर सम्पन्न नहीं किया जा सकता। इसके लिए हर घड़ी अपने ऊपर आत्म- निरीक्षण की दृष्टि रखनी होती है। साधना के प्रथम चरण द्वारा अपने शरीर और मन पर, कार्य और विचारों पर बारीकी से नजर रखकर यह देखना होता है कि मनुष्यता को गिराने वाले पशु स्तर के कुसंस्कार अपने में कितने समाये हुए हैं? गुण, कर्म, स्वभाव में किन पशु- प्रवृत्तियों का समावेश है? उन्हें धीरे- धीरे, एक- एक करके छोड़ने का संकल्प करना चाहिए। अपने कुसंस्कारों से लड़ना चाहिए। उनकी हानियों पर विचार करना चाहिए और एक- एक करके अपने दोष- दुर्गुणों को छोड़ते चलना चाहिए।आहार- विहार सम्बन्धी कितनी ही कुटेव अपने अन्दर हो सकती हैं। नशे, व्यसन, व्यभिचार, आलस्य, कटु भाषण, क्रोध, आवेश, असंयम, मलीनता, लापरवाही, आशंका, चिन्ता, भय, कायरता, निराशा, उच्छ्रंखलता जैसे छोटे- मोटे स्वभावजन्य दोष ऐसे होते हैं, जो देखने में मामूली से लगते हैं, पर प्रगति के पथ पर भारी अवरोध उत्पन्न करते हैं।चोरी, हत्या, धोखा, बेईमानी, बलात्कार जैसे बड़े पाप तो कोई बिरले ही करते हैं, उनके लिए कानून- दंड व्यवस्था भी है, पर छोटे दुर्गुणों की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। असल में पतन की जड़ यही होते हैं और आगे चलकर उन्हीं की वृद्धि होती चलने से व्यक्ति क्रूर- कुकर्मी, नर- पिशाच बन जाता है। इसलिए इन विष- वृक्षों के छोटे- मोटे पौधे भी अपने जीवन क्षेत्र में उग रहे हों तो उन्हें एक- एक करके फेंकते चलने के लिए कटिबद्ध हो जाना चाहिए।अपने दैनिक क्रिया- कलाप और उनके साथ जुड़े हुए विचारों एवं उद्देश्यों को परखते रहना चाहिए कि वे निकृष्ट स्तर के, नर- पशुओं के स्तर पर तो नहीं चल रहे हैं? यदि इनमें दोष पाये जायें तो तुरन्त उसके स्थान पर सुधरी हुई रूपरेखा उपस्थित करनी चाहिए और दोष के स्थान पर गुण को, अनुपयुक्त के स्थान पर उपयुक्त को प्रतिष्ठित करना चाहिए। जो ग़लत किया जा रहा है, उसके स्थान पर सही क्या हो सकता है, यह निर्णय करने के लिए पक्षपातरहित विवेक की आवश्यकता है।पक्षपात नहीं, न्याय निष्ठाआमतौर से हर मनुष्य अपने साथ रियायत और पक्षपात करता है। यह भूल सुधारनी चाहिए। जैसे ग़लत विचार या ग़लत काम हम करते हैं, यदि वैसे ही कोई दूसरा करे और पूछने आये कि मुझे इन्हें कैसे छोड़ना चाहिए? और इनके स्थान पर क्या रीति- नीति अपनानी चाहिए? तो इसके उत्तर में हम निश्चित ही बहुत कुछ उपदेश और परामर्श दे सकते हैं। वही उपदेश और परामर्श अपने को भी देना चाहिए।अपने भीतर एक नया न्यायाधीश, उपदेशक, गुरु, भगवान विकसित कर लेना चाहिए। वही अपना सुधार और मार्गदर्शन कर सकता है। उसी के परामर्श पर चलना चाहिए। इसी प्रकार एक- एक करके अपने दोष- दुर्गुणों का अन्त होगा। आत्म- शोधन को एक महान साधना मानकर उसमें निरन्तर संलग्न रहने से ही हम निर्मल, निर्दोष, निष्पाप और निष्पक्ष, सद्विवेकी महामानव बन सकेंगे। आध्यात्मिक प्रगति के लिए यही राजमार्ग है।

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प्रेम का प्रदर्शन नहीं, प्रेम की साधना करें

आज की विडम्बनाइन दिनों सर्वत्र अराजकता और अशान्ति का बोलबाला है। घृणा और विद्वेष का वातावरण इस कदर बढ़ा है, जैसा पूर्व में शायद ही कभी रहा हो। लोग प्रत्यक्ष में स्नेह का दिखावा तो करते हैं, पर परोक्ष में न जाने कितनी बार एक- दूसरे की हत्या कर चुके होते हैं, बुरा- भला कहकर निन्दा करते हैं। यह प्रेम का प्रदर्शन मात्र है। इससे न तो अपना भला होने वाला है, न दूसरे का।प्रेम का वह उद्दाम उत्सव अब कहाँ रहा, जिसके कारण धरती को कभी 'स्वर्गादपि गरीयसी' की संज्ञा दी गई थी। उसका प्रवाह वर्तमान में सूखकर संकीर्ण बन गया है। आज हम अनुराग तो करते हैं, पर वह घर- परिवार तक सीमाबद्ध होकर रह गया है, अपने और अपनों तक सीमित हो गया है। यही विकृत प्रेम इन दिनों बढ़ते अपराध के रूप में सामने आ रहा है। हम अपनों से प्यार प्रदर्शित करने के लिए दूसरों की सहानुभूति का अपहरण कर रहे हैं। अपना और अपनों के लाभ के लिए परायों को कष्ट दे रहे हैं।प्रेम इतना संकुचित नहीं हो सकता, न पहले कभी था, न भविष्य में होने वाला है। जब यह बौना बनने का प्रयास करता है, तो इन्हीं दिनों जैसे विकराल दृश्य उपस्थित करता है।प्रेम कुछ माँगता नहीं, न ही उसमें कोई शर्त होती है। वह सदा नि:स्वार्थ होता है। अनुरागी में प्यार की शक्ति होनी चाहिए और उसे निभाने की सामर्थ्य भी। आज इन दोनों का अभाव है। हमारे पास न तो वह विशाल हृदय है, न सभी को आत्मसात करने वाला पवित्र अंत:करण। हम प्यार पाने की इच्छा तो रखते हैं, पर उसे चुकाने की, लुटाने की हिम्मत नहीं संजो पाते, यही आज की सबसे बड़ी कमी है।पाने का आनन्द लुटाने में हैस्नेह- प्रेम में अद्भुत शक्ति है। जब यह विशिष्टता मानवी अन्त:करण में प्रस्फुटित होती है, तो न सिर्फ व्यक्ति को असाधारण बनाती है, वरन् उस समाज और राष्ट्र को भी अद्वितीय बना देती है, जिसमें इसकी सरिता प्रवाहमान है।संसार में दिन ही दिन होता अथवा रात ही रात होती, तो उन्हें आज जैसा सम्मान और महत्त्व नहीं मिल पाता, वह नीरस और ऊबाऊ भी होते, किन्तु दोनों पक्षों के समन्वय से एक सरसता पैदा होती है, जो पशु- पक्षी को समान रूप से लुभाती है। जीवन में यदि काम ही काम होता तो वह कितना एकरस व थकाऊ होता, इसकी कल्पना की जा सकती है, पर आराम के उपलब्ध होने पर व्यक्ति पुन: नये उत्साह और उल्लास के साथ काम में जुट पड़ता है और देखते- देखते उसे समाप्त कर डालता है। यह दो पक्षों के मिलन का चमत्कार है। जीवन में प्यार की परिणति भी ऐसी ही हो सकती है।हम वात्सल्य की आकांक्षा भी रखें और उसे बाँटने का साहस भी। सुख इसी में है। पाने का आनन्द लुटाने में ही होता है। कृपणों के बारे में तो नहीं कहा जा सकता, पर जो सचमुच उदारचेता हैं, वे जितना कमाते हैं, उसी अनुपात में बाँटते भी हैं। गुरु- शिष्य परम्परा इसी सिद्धान्त पर आधारित है। किसानों की तरह पाने के लिए लुटाना आवश्यक होता है।स्वामी विवेकानन्द का कथनसन् १८९७ में लाहौर में 'वेदान्त' पर व्याख्यान करते हुए स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि हम सामाजिक विकास के लिए भले ही हजारों समितियाँ गढ़ लें, लाखों सम्मेलन कर लें, पर उसकी वास्तविक उन्नति तभी हो सकेगी, जब समाज के लोगों के प्रति हम सहानुभूति रख सकें, प्रेम प्रदर्शित कर सकें। जब तक हमारे भीतर बुद्ध का हृदय और कृष्ण की वाणी विकसित और व्यवहृत होते नहीं दिखाई पड़ेंगे, तब तक प्रगति की आशा, दुराशा मात्र होगी।यह सत्य है कि हम असल की नकल करना बहुत जल्दी सीख जाते हैं, किन्तु इस उपक्रम में अभी भी काफी कच्चे हैं। हमारा अनुकरण बाह्य स्तर तक ही सीमित है। जिस दिन हम अन्दर के भाव को अपनाना और पनपाना सीख जायेंगे, उसी क्षण हम, हमारा समाज व राष्ट्र उन्नत बन जायेंगे।यूरोप से सीखेंअभेदानन्द एक स्थान पर लिखते हैं कि यूरोप में सभा- सम्मेलन जितनी संख्या में प्रतिदिन होते हैं, उतने शायद विश्व के किसी हिस्से में नहीं। इसका अनुकरण कर सहज ही ऐसे सम्मेलन आयोजित किए जा सकते हैं, पर उनकी राजनीतिक गोष्ठियों में जो सौहार्द्र दिखाई पड़ता है, उसका परिचय दे पाना हमारे लिए अभी कठिन है। हमें अब इसी कठिनाई को दूर करने की कोशिश करनी चाहिए।भारतीय संस्कृति में 'आत्म- विस्तार' की प्रक्रिया इसी हेतु सुझायी गई है। हम इस साधना को जीवन में यदि उतार सकें तो कोई कारण नहीं कि वह मनोभूमि विकसित न हो सके, जिसमें प्यार पाने और लुटाने की दोहरी भूमिका सम्पन्न होती हो। अध्यात्म का प्रवेश द्वार यही है।