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गुरुपूर्णिमा पर्व सोत्साह मनायें, श्रद्धा को जीवन्त बनायें

गुरुकृपा का पूरा लाभ उठायें, मनोकामना पूर्ति ही नहीं, चित्तवृत्तियों का शोधन भी करायेंपर्व का सार्थक उपयोगपर्व आते हैं, एक उत्साहवर्धक वातावरण बनाते हैं। उनका क्षणिक, सामयिक लाभ ही अधिकांश लोग उठा पाते हैं। उनके द्वारा बनाये गये वातावरण और जमाये गये उल्लास का दीर्घगामी या स्थाई लाभ कितने लोग उठा पाते हैं? प्रयास यह किया जाना चाहिए कि उस वातावरण और उल्लास का उपयोग अपने व्यक्तित्व के परिष्कार एवं विकास के लिए किया जा सके। ऐसा किया जा सके तो प्रत्येक पर्व हमें एक ऐसा अनुदान देकर जायेगा जो हमें दीर्घकालीन, स्थाई लाभ देने में समर्थ हो।गुरुपूर्णिमा पर्व मनाइये, उत्सव- उल्लास का माहौल बनाइये, गुरु की कृपा की महिमा के गीत गाइये, किन्तु उनका समुचित लाभ भी उठाइये, अपनी श्रद्धा को अधिक परिष्कृत और जीवन्त बनाइये।गुरुदेव ने स्पष्ट किया है कि श्रद्धा उत्कृष्टता के प्रति असीम प्रेम है। जिस व्यक्ति या वस्तु से गहरा प्रेम होता है, उसके निकट रहने, उसे अपनाने का मन होने लगता है। जिस उत्कृष्टता से प्रेम होगा, उसको भी अपनाने, जीवन में धारण करने का उत्साह जागेगा ही, लगन लगेगी ही।पर्व मनाने के दौरान एवं उसके बाद आत्मसमीक्षा करिए। गुरुपर्व मनाने के क्रम में उनके प्रभाव से अपनी मनोकामनाएँ पूरी होने, कठिनाइयाँ हल होने भर का विश्वास जागा या उनकी उत्कृष्टता को वरण करने के लिए कठिनाइयाँ स्वीकार करने की श्रद्धा भी विकसित हुई? यदि ऐसा होता है तो ही पर्व का सार्थक उपयोग हुआ, ऐसा माना जा सकता है।गुरु का स्वभाव और प्रभावगुरु का, संत का स्वभाव होता है कि वह सम्पर्क में आने वालों की सेवा- सहायता करें, उनके दु:ख- कठिनाइयों का निवारण करें। लेकिन उसका कार्य, उसका उद्देश्य हमेशा यही रहता है कि उसके शिष्य दु:खों से उबरने और कठिनाइयों को हल करने में स्वयं समर्थ बनें।विचार करें, किसी समर्थ पिता ने अपने बच्चों के लिए एक कुशल शिक्षक (ट्यूटर) नियुक्त कर दिया। स्कूल में बच्चों को घर पर पूरा करने के लिए कार्य (होमवर्क) दिया जाता है। बच्चे यदि यह चाहें कि उनका ट्यूटर उन्हें दिये जाने वाले होमवर्क को पूरा कर दिया करें और वह ऐसा करने भी लगे तो क्या होगा? समझदार लोग उन बच्चों को और उस शिक्षक को भी मूर्ख ही मानेंगे। बच्चे तो अविकसित ही रह जायेंगे। स्कूली परीक्षा या जीवन में सहज उभरने वाले प्रश्नों को वे हल न कर पायेंगे तथा कदम- कदम पर दु:ख और अपयश के भागीदार बनेंगे।गुरु स्तर के व्यक्ति एवं सच्चे शिक्षक ऐसी भूल कभी नहीं करते। बच्चों की समस्या हल करने में उन्हें प्रसन्नता भी होती है और उसमें वे सक्षम भी होते हैं। लेकिन उनकी असली प्रसन्नता तो तभी होती है जब उनके सहयोग से बच्चे स्वयं भी प्रश्नों का, जीवन की समस्याओं का हल निकालने योग्य बन जायें।पूज्य गुरुदेव एक बार प्रवचन के दौरान कहने लगे कि "कहा जाता है लोगों की नि:स्वार्थ सेवा की जाये। लेकिन हमसे तो ऐसा हुआ नहीं। लोगों की सेवा- सहायता करते समय यही भावना- कामना अन्दर बनी रही कि किसी बहाने से वे मेरे पास आयें तो उन्हें पकड़कर इंसान बना दूँ।" गुरु स्तर के व्यक्ति अपने उच्च उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हम सबको सेवा- सहायता के छोटे- छोटे आकर्षक- लालच भी देते हैं, किन्तु उनका उद्देश्य हमें ठगना नहीं, हमें उच्च स्तरीय सम्पदा से मालामाल बना देने का होता है।साधकगण इस तथ्य को समझें और तद्नुसार गुरु के उच्च स्तरीय सहयोग का लाभ उठाने की तैयारी करें। उनके स्वभाव को देखकर उनके निकट जायें और उनके प्रभाव का लाभ उठाने में, अपने व्यक्तित्व को श्रेष्ठतर बनाने में उनके सहयोगी बन जायें। तो ध्यान रखें :-उनके स्वभाव से कष्ट दूर भगायें और प्रभाव से जीवन सम्पदा कमायें। सच्चे शिष्य कहायें, धन्य हो जायें।प्रौढ़ता लायें, श्रेष्ठता अपनायेंबच्चे जब छोटे होते हैं तो स्कूल का, शिक्षा का महत्त्व नहीं समझते। उन्हें टॉफी, मिठाई, नये कपड़ों जैसे उनकी पसंद के आकर्षण दिखाकर मन लगाकर पढ़ने, नियम से स्कूल जाने के लिए प्रेरित किया जाता है। वही जब बड़े हो जाते हैं, समझ बढ़ जाती है तो उनका ढंग बदल जाता है। फिर वे समय पर कक्षा में पहुँचने के लिए बिना खाये भी भागने लगते हैं। मित्रों और मनोरंजन- आकर्षण छोड़कर भी पढ़ाई में पर्याप्त समय लगाते हैं।आध्यात्मिक शिक्षण के क्रम में भी ऐसी प्रौढ़ता साधकों में आनी चाहिए। गुरु के पास सुविधा- सहायता के आकर्षण में नहीं, उनके सान्निध्य के प्रभाव को लक्ष्य करके असुविधा- कठिनाइयाँ सहते हुए भी जाने का विवेकपूर्ण साहस जुटाना चाहिए।पूज्य गुरुदेव जहाँ स्वभाववश कठिनाइयाँ हल करने की सेवा- सहायता प्रसन्नतापूर्वक देते ही रहते थे, वहीं अपने अन्तरंग प्रभाव के लाभ उठाने के लिए भी प्रेरित करते रहते थे। एक प्रेरक प्रसंग इस संदर्भ में प्रस्तुत किया जा रहा है।शक्तिपीठों की प्राणप्रतिष्ठा के दौरे का प्रसंग है। व्यस्तता के बीच जगह- जगह भावनाशीलों का मन रखते चलने के कारण चित्रकूट पहुँचने में काफी विलंब हो गया था, फिर भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुगण एवं प्रबुद्धजन एकत्रित थे। पूज्य गुरुदेव ने इस प्रकार कठिनाइयाँ सहकर भी दूर- दूर से पहुँचने तथा देर तक रुके रहने की उनकी भावना की सराहना की। फिर अचानक स्वर बदल कर बोले :-"कोई तुम लोगों से पूछे कि इतनी परेशानियाँ उठाकर कहाँ गए थे? तो तुम्हारा उत्तर होगा च्आचार्य जी के पासज्। पुन: प्रश्न उठे कि कौन से आचार्य जी? तो तुम लोग यही कहोगे न कि उनने हमारे असाध्य रोग ठीक कर दिए, हमारे कष्ट टाल दिए, हमें आशीर्वाद देकर बच्चा दे दिया। यही न?" फिर एकाएक तमककर बोले "जैसे घटिया तुम, वैसे तुम्हारे आचार्य जी। तुमने मेरा रूप यही समझा कि मैं तुम सबकी अनगढ़ कामनाएँ पूरी करता रहूँ? गुरु कहलाकर तुम्हें बहलाता भर रहूँ? मुझे समझना है तो एक क्रान्तिकारी के रूप में समझो। परिचय देना है तो एक ऐसे ऋषि के रूप में दो जिसके पेट में क्रान्ति की ज्वालाएँ जलती रहती हैं और आँखों से क्रान्ति की चिनगारियाँ फूटती रहती हैं। जो मनुष्य में देवत्व जगाने और धरती पर स्वर्ग लाने के लिए भूमण्डल पर आया है। इससे कम में उसका कोई समाधान नहीं होता।"उनका ऐसा स्वरूप समझने और उनके उद्देश्य के लिए हर कीमत चुकाकर तैयार होने की प्रौढ़ता हमारे अन्दर आनी ही चाहिए।प्राप्त सौभाग्य का पूरा लाभ लेंगुरु नाम से कानफूँक कर दीक्षा देने वाले, लौकिक सम्पदा और लौकिक यश की भूख जगाकर अपने अनुयायी बनाने वाले कथित गुरु तो बहुत मिल जाते हैं, लेकिन जीवन का यथार्थ समझाकर, अपने अनुभव के आधार पर मंजिल तक पहुँचा देने का वायदा करने वाला गुरु बड़े सौभाग्य से विरलों को मिलता है। हमारे गुरुदेव ने मैं क्या हूँ? पुस्तिका में स्पष्ट घोषणा की है- "यह रास्ता मेरा देखा- समझा हुआ है, तुम्हें बीच में नहीं छोडूँगा।" अपनी जीवनी हमारी वसीयत- विरासत में वे लिखते हैं- "जो इसे ध्यान से समझकर पढ़ेगा, वह अध्यात्म के मार्ग में कहीं भटकेगा नहीं।"आदि शंकराचार्य ने गुरुवंदना में लिखा है- "मैं उस गुरु को नमन श्रद्धा से करता हूँ जो सदा गायत्रीरूप है, जिसके अमृत वचनों से संसार रूपी विष का नाश होता है।"नमोस्तु गुरवे तस्मै, गायत्री रूपिणे सदा।यस्य वाग्मृतं हन्ति विषं संसार संज्ञकम्।।हमें जीवनभर गायत्री साधना में निरत रहनेवाला, अपने प्रभाव से विश्वभर में गायत्री का प्रचार- प्रसार करने वाला और अंत में गायत्री जयंती के दिन काया छोड़कर सूक्ष्म एवं कारण सत्ता में प्रवेश कर जाने वाला गुरु प्राप्त हुआ है।संत कवि तुलसीदास ने गुरुवंदना में लिखा है- "मैं बोधमय नित्य- शंकररूपी गुरु को नमन करता हूँ।"वन्दे बोधमयं नित्यं, गुरुं शंकर रूपिणं।हमें कालचक्र को पलटकर, मनुष्यमात्र के लिए परम कल्याणकारी प्रज्ञायुग लाने के लिए महाकाल की भूमिका निभाने वाले गुरु प्राप्त हुए हैं।गुरुगीता में गुरु को परमानन्द और परम सुख देने वाले विशुद्ध ज्ञानमूर्ति कहा है।परमानन्दं, परम सुखदं, केवलं ज्ञानमूर्तिं।हमारे गुरुदेव वेदमूर्ति हैं, बार- बार यही कहते हैं कि मेरा सही स्वरूप मेरे विचारों में सन्निहित है। शरीर रहे- न रहे, उनका मंगलमय अस्तित्व श्रेष्ठ विचारों और उत्कृष्ट भावप्रवाहों के रूप में, सूक्ष्म एवं कारण स्तर पर निरंतर बना हुआ है। हमें अपने इस दुर्लभ सौभाग्य का सही मूल्यांकन करते हुए इस सौभाग्य का भरपूर उपयोग करने के लिए प्रतिबद्ध होना ही चाहिए।योग साधेंभगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद् भगवद्गीता में कहा है :-अनन्य चिंतन के द्वारा जो मेरी उपासना करता है, इस प्रकार जो मेरे साथ नित्य- निरन्तर जुड़ा है, उसके योग एवं क्षेम की जिम्मेदारी मैं स्वयं ही वहन करता हूँ :-अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते।तेषां नित्याभियुक्तानां, योगक्षेमं वहाम्यहम्।।प्रज्ञावतार पूज्य गुरुदेव के साथ भी इसी प्रकार अनन्य भाव से जुड़ने की आवश्यकता है। फिर आत्मकल्याण और लोककल्याण के लिए हमारे लिए संयोग जुटाने (योग) और सुयोगों को टिकाऊ- दीर्घकालीन बनाने (क्षेम) की जिम्मेदारी का निर्वाह वे करेंगे। उन्होंने परिवर्तन के महान क्षण पुस्तिका में स्पष्ट लिखा भी है कि भावनापूर्वक हमें याद करने वाले व्यक्ति हमें अपने निकट खड़ा और समर्थ सहयोग देता हुआ अनुभव करेंगे।आज इंटरनेट के माध्यम से तमाम पुस्तकों, पुस्तकालयों, शोधों की जानकारी अपने कम्प्यूटर पर प्राप्त की जा सकती है। यह कैसे संभव हुआ? उस ज्ञान के स्थूल पुस्तकाकार स्वरूप को सूक्ष्म संकेतों के रूप में विराट जगत में फैला दिया गया है। पूज्य गुरुदेव ने भी सूक्ष्मीकरण साधना के माध्यम से नवसृजन से सम्बन्धित तमाम सूत्रों- संकेतों, अनुशासनों को सूक्ष्म एवं कारण स्तर पर विराट प्रकृति में स्थापित कर दिया है। जैसे कम्प्यूटर पर वाञ्छित जानकारी पाने के लिए किसी सुनिश्चित सूत्र (कोड) को संप्रेशित करना पड़ता है, उसी प्रकार सूक्ष्म जगत से वाञ्छित सहयोग पाने के लिए अपने संकल्पों और उसके पीछे के उत्तम भावों को संप्रेषित करना पड़ता है। जब वे इष्ट अनुशासन के अनुरूप होते हैं तो वाञ्छित सहयोग उपलब्ध हो जाता है। अन्यथा केवल चाहने भर से बात बनती नहीं।तीनों स्तरों पर साधेंयुगऋषि ने कहा है, मैंने नवसृजन के लिए प्रत्यक्ष- स्थूल तंत्र तो खड़ा कर ही दिया है, उसे स्थायित्व और बल देते रहने के लिए सूक्ष्म (विचार) स्तर पर तथा कारण (भाव संवेदना) के स्तर पर भी व्यवस्था बना दी है। योग- सम्पर्क साधें और लाभ पायें।स्थूल स्तर पर उपासना, साधना, आराधना एवं उसके निमित्त समयदान तथा अंशदान की प्रत्यक्ष रीतिनीति अपनायें। उसे थोड़े से प्रारंभ करें और नियमित रूप से निभाने और बढ़ाते रहने का क्रम बनायें।स्थूल प्रक्रिया कर्मकाण्ड के रूप में अपना भी लें, लेकिन अगर उसके पीछे विचार लौकिक यश और लाभ भर कमाने के हों तो उनका प्रभाव भी सीमित होगा। उन कर्मों के पीछे निहित आदर्श विचारों को उनके साथ जोड़ना जरूरी है।सूक्ष्म स्तर पर :- श्रेष्ठ विचारों से ही प्रेरित श्रेष्ठकर्म पूरा लाभ पहुँचाते हैं। अन्यथा चुनाव जीतने के लिए आदर्शों का हवाला तो जाने कितने व्यक्ति देते हैं। सूक्ष्म स्तर पर ऋषिसत्ता से जुड़ने के लिए विचार और वाणी की साधना करनी होती है। बोलें तो उद्वेगरहित वाक्य बोलें। न स्वयं को उद्वेग हो और न सुनने वालों को। अपने वचनों को सत्य, प्रिय और हितकारी बनाने का प्रयास करें। गलत विचार हमें प्रभावित न कर पायें, श्रेष्ठ विचारों की सीना अपने साथ रहे। इसके लिए स्वाध्याय करने और उसकी चर्चा करते रहने का क्रम बनायें।कारण स्तर पर :- लोगों को न्याय मिले इसके लिए कढछ (इण्डियन पैनल कोड) बना हुआ है। किन्तु उस आधार पर न्याय कितनों को मिल पाता है? वकील उसके सूत्रों पर बौद्धिक बाजीगरी दिखाते रहते हैं और कुछ का कुछ सिद्ध करते रहते हैं। विचार सूत्रों के साथ न्याय देने की भाव संवेदना हो तो बात बने। इसी प्रकार पूज्य गुरुदेव की भाव संवेदना सबसे लिए सद्बुद्धि, सबके लिए उज्ज्वल भविष्य का निर्माण के अनुरूप भाव बनें, उस नाते जो जिस स्तर पर है उससे उसे थोड़ा उन्नत बनाने की अदम्य भावना जागे तो उनकी कारण सत्ता से सम्पर्क बनता रह सकता है।सूक्ष्म, स्थूल एवं कारण स्तर पर सम्पर्क- सुयोग साधें तो साधना में प्राण आ जाये, जीवन धन्य हो जाये। गुरुपर्व ऐसे ही संकल्प के साथ मनायें।

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अगले दिनों होगा सर्वमान्य ईश्वर एवं सर्वसमर्थित पूजा विधान

परिष्कृत होती मान्यताएँआ दिमकाल से लेकर अब तक मनुष्य ने प्रगति पथ की अनेकों सीढ़ियाँ पार की हैं। इसी के साथ-साथ धर्म का भी विकास होता चला आया है। दार्शनिक : आदिम काल में आग का गोला सूर्य, आकाश में चमकने वाले चाँद-तारे, बिजली की कड़क, जन्म-मरण जैसी हलचलों को लोगों  ने किन्हीं अदृश्य अतिमानवों की करतूत समझा होगा और उनके कोप से बचने के लिए एवं उन्हें सहायक बनाने के लिए पूजा उपक्रम का कुछ ढंग सोचा होगा। संभवत: यहीं से उपासनात्मक अध्याय का आरंभ हुआ है। एकाकी स्वेच्छाचार ने जब समूह में रहने की प्रवृत्ति अपनाई होगी तो आचारसंहिता की आवश्यकता पड़ी होगी अन्यथा सहयोग का अभिवर्धन और टकराव का समाधान ही संभव न होता। धर्म यहीं से चला है। भय के बाद लोभ की प्रवृत्ति पनपी। उसने अतिमानवों से, देवताओं से अभीष्ट लाभ पाने की आशा रखी होगी। मनुष्य की आकांक्षाएँ बढ़ीं और साधन सीमित रहे। ऐसी परिस्थितियों में किन्हीं अदृश्य अतिमानवों का, देवमानवों का पल्ला पकड़ना उसने उचित समझा होगा। संयोगवश जो भले-बुरे अवसर आते गये उन्हें दैवकृत माना जाता रहा। उनके कोप से बचना और प्रसन्न करके लाभान्वित होना तब एक दिव्य कौशल रहा होगा। उन्हीं दिनों मंत्र-तंत्र के देव-परिकर के रूप में विधान गढ़े गये।भय और लोभ की व्यक्तिवादी आकांक्षाओं से बढ़कर मनुष्य अधिकाधिक समाज पर निर्भर होते चलने की स्थिति में यह समझने के लिए बाध्य हुआ कि समूहगत हलचलें मनुष्य को अधिक प्रभावित करती हैं। अतएव व्यक्ति और समाज की नीति-मर्यादाओं को अधिक सबल, अधिक परिष्कृत बनाया जाय। इस मान्यता ने नीति के, उपकार के तत्त्वज्ञान को धर्म में सम्मिलित किया और इसके लिए आचारशास्त्र का विकास हुआ। यह और भी अधिक महत्त्वपूर्ण कदम था। इससे आगे ब्रह्मविद्या का युग है। एक ही आत्मा सब में समायी हुई है, सब में अपनी ही सत्ता जगमगा रही है, अपने भीतर सब है, सब में एक ही आत्मा का प्रतिबिम्ब है।  यह विश्व मानव की, विश्व परिवार की एकात्म, अद्वैत बुद्धि सचमुच धर्म की अद्भुत और अति उपयोगी देन है। सामाजिक : कोई देश अपने पड़ोसियों के कारण ही नहीं, दूर देशों की आन्तरिक परिस्थितियों के कारण भी प्रभावित होता है। व्यक्ति की प्रगति और अवगति अब उसके निजी पुरुषार्थ पर निर्भर नहीं, वरन सामाजिक परिस्थितियाँ उसे बनने, बदलने के लिए विवश करती हैं। व्यक्ति पूरी तरह समाज-यंत्र का पुर्जा मात्र बन गया है। इन परिस्थितियों में यदि व्यक्ति को समाजनिष्ठ बनने के लिए कहा जाय, उसे अपनी प्रगति, अवगति को समाज के उत्थान-पतन के रूप में जोड़ने के लिए कहा जाय तो यह सर्वथा उचित और सामयिक है। जो परिस्थितियाँ आज अनिवार्य हो गई हैं, कुछ समय पहले ही उनकी सम्भावना दूरदर्शियों ने भाँप ली थी और धर्म एवं अध्यात्म को अधिकाधिक समाजनिष्ठ बनाना आरम्भ कर दिया गया था। अहंकार को, स्वार्थ को, परिग्रह को, तृष्णा-वासना को त्यागने के लिए कहने का तात्पर्य व्यक्तिवाद की कड़ी पकड़ से अपनी चेतना को मुक्त करना ही हो सकता है। सेवा, परोपकार, जन-कल्याण, दान-पुण्य, त्याग-बलिदान के आदर्श मनुष्य को समाजनिष्ठ बनाने के लिए विनिर्मित हुए हैं। मनुष्य में संयम की, तप की, तितीक्षा की, पवित्रता की, मितव्ययिता की, शालीनता की, सज्जनता की, संतोष और शान्ति की वे धाराएँ सम्मिलित की गई हैं, जो उसके अपने लिए अपनी शक्तियों का न्यूनतम भाग खर्च करने की प्रेरणा देती हैं और तन-मन, धन का जो भाग इस नीति को अपनाने के कारण बचा रहता है उसे जनकल्याण में खर्च करने की ओर धकेलती हैं।    ईश्वर आस्था : ईश्वर का स्वरूप भी अब भयंकर, वरदाता, नीति-निर्देशक की क्रमिक भूमिका से आगे बढ़ते-बढ़ते इस स्थिति पर आ पहुँचा है कि हम विराट् ब्रह्म के, विश्व दर्शन के रूप में उसकी झाँकी कर सकें और श्रद्धा-विश्वास जैसे उत्कृष्ट चिन्तन को भवानी-शंकर की उपमा दे सकें। अग्निहोत्र की व्याख्या यदि जीवनयज्ञ के, सर्वमेध के साथ जोड़ी जाने लगी है, तो यह अत्यन्त ही सामयिक परिभाषा का प्रस्तुतीकरण है। क्रिया-काण्ड को यदि भाव परिष्कार का प्रतीक-संकेत कहा जाय तो वस्तुत: यह प्राचीन ईश्वर की परिष्कृत चेतना भी कहा जायेगा। अब प्रसाद खाकर या प्रशंसा सुनकर प्रसन्न होने वाले ईश्वर का रूप बदल रहा है। प्रतिमाओं का दर्शन करने, नदी, तालाबों में नहाने, मंत्र के जपोच्चार से, चित्र-विचित्र कर्मकाण्डों से अब ईश्वर के प्रसन्न होने की बात पर केवल बहुत पिछड़े लोग ही विश्वास करते हैं।आदिम ईश्वर सर्वतन्त्र स्वतन्त्र था, जिस पर प्रसन्न हो उसे लाभ देना और जिस पर अप्रसन्न हो उसे हानि पहुँचाना ही उसका काम था। मनुष्यों से वह भेंट, पूजा और स्तवन की आकांक्षा करता था। पुरोहित वर्ग उसका एजेंट था। उन्हें प्रसन्न करना ही प्रकारान्तर से ईश्वर को प्रसन्न करना था।अब का ईश्वर एक नियम है। उसने समस्त जड़-चेतन को संसम्बद्ध नियंत्रण में जकड़ा है, यहाँ तक कि अपने को भी कायदे-कानून के बंधनों में बाँध लिया  है। आधुनिक ईश्वर की झाँकी स्थूल शरीर में सत्कर्म के रूप में और मन में सद्भावों के रूप में की जाने लगी है। परिष्कृत व्यक्तियों की गणना दैवी अथवा अवतार के रूप में की जाने लगी है। यह शुभ चिह्न है। एकता-समता की ओरधर्म और ईश्वर जिस क्रम से विकास पथ पर चल रहे हैं, उसे देखते हुए अगले दिनों नास्तिक और आस्तिक का झगड़ा दूर हो जायेगा। धर्म और विज्ञान के बीच जो विवाद था, उसका हल निकल आयेगा। साम्प्रदायिक विद्वेष की भी गुंजायश न रहेगी। पिछले और पिछड़े सम्प्रदाय अपने-अपने ईश्वरों के अलग-अलग आदेशों को पृथक प्रथा- परम्पराओं के रूप में मानते थे और मतभेद रखने वालों को तलवार के घाट उतारते थे। अब वैसी गुंजाइश नहीं रहेगी। सद्भावना एवं सज्जनता की परिभाषाएँ यों अभी भी कई तरह की जाती हैं, पर उनमें इतना अधिक मतभेद नहीं है, जिनका समन्वय न किया जा सके। दुनिया अब एक धर्म, एक आचार, एक संस्कृति, एक राष्ट्र, एक भाषा के आधारों को अपनाकर एकता की ओर चल रही है। ऐसी दशा में एक सर्वमान्य ईश्वर और उसका एक सर्वसमर्थित पूजा-विधान भी होना ही चाहिए। अब इस दिशा में आशाजनक स्थिति उत्पन्न होने जा रही है। धर्म और कर्म का मर्म समझने वाले ब्रह्मपरायण व्यक्ति ईश्वर को निर्विवाद स्थिति तक पहुँचाकर ही रहेंगे।

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वर्षाकाल में वृक्षारोपण अभियान को तत्परतापूर्वक तीव्र गति दी जाय

मौसम की अनुकूलता एवं पर्वों की प्रेरणा की सुसंगति बिठाई जायचिंताजनक समस्या का उपचारपर्यावरण प्रदूषण चिंताजनक स्थिति तक पहुँच गया है। बढ़ती आबादी और बढ़ती औद्योगिक इकाइयों के कारण तमाम कोशिशें करने पर भी प्रदूषण पैदा करने वाले स्रोतों पर नियंत्रण हो नहीं पा रहा है। दिल्ली सहित भारत के अनेक शहरों में प्रदूषण का प्रतिशत जान लेवा स्थिति तक पहुँच गया है। वृक्ष निश्चित रूप से पर्यावरण प्रदूषण के स्तर में कमी ला सकते हैं, किन्तु उनकी संख्या भी भारत में बहुत घट गई है। एक सर्वेक्षण के अनुसार विभिन्न देशों में प्रति व्यक्ति वृक्षों की संख्या इस प्रकार है :-ग्रीन विजार्ड न्यूज़ लैटर के अनुसार आँकड़ेदेश प्रतिव्यक्ति वृक्ष देश प्रतिव्यक्ति वृक्षकनाडा ९९५९ रशिया ४४६१ब्राज़ील १४९४ यू.एस. ७१६चाइना १०२ भारत २८वास्तव में ये आँकड़े चौंकाने वाले और चिंताजनक हैं। जो भारतवासी वृक्ष- वनस्पतियों की पूजा करते हैं, वे उनके संबंध में इतने संवेदनहीन और गैर जिम्मेदार कैसे हो गए?समस्याओं पर चर्चा भर करते रहने से उनके समाधान नहीं निकलते। उसके लिए तो नैष्ठिक प्रयास पूरी तत्परता और तन्मयता के साथ करने पड़ते हैं। युग निर्माण योजना के अन्तर्गत, गायत्री परिवार संगठन ने इसी लिए पर्यावरण संरक्षण को अपने प्रमुख आन्दोलनों में शामिल किया है। इसके अंतर्गत स्वच्छता के प्रति जागरूकता लाने, ठोस अपशिष्टों के पुनर्चक्रण की व्यवस्था बनाने, यज्ञ करने- कराने आदि प्रयोगों के साथ 'हरीतिमा संवर्धन' कार्यक्रम को भी जीवन्त रूप दिया है। यों तो इसके लिए प्रयास वर्षभर चलते रहते हैं, किन्तु वर्षाकाल इसके लिए सबसे अनुकूल समय होता है। इस वर्ष भी हमें संकल्पपूर्वक सुनिश्चित लक्ष्य बनाकर इस अभियान को तेजस्वी रूप देना है। गायत्री जयंती से लेकर शारदीय नवरात्र तक वृक्षारोपण, हरीतिमा सवंर्धन के लिए प्रकृति की अनुकूलता का पूरा- पूरा लाभ उठाने के प्रयास करने चाहिए।जनभागीदारी बढ़ायेंकिसी भी आन्दोलन को विस्तार और मजबूती देने के लिए उसमें जन- जन की भावभरी भागीदारी अत्यंत आवश्यक है। अभी तक के सफल प्रयोगों के पीछे पहल करने वाले प्राणवान परिजनों के साथ ही जनभागीदारी निभाने वाले भावनाशीलों का भी महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। इसी सुसंगति के कारण परिजनों ने देश के विभिन्न भागों में अनेक कीर्तिमान स्थापित किए हैं। उनके विवरण समय- समय पर पाक्षिक में छपते भी रहते हैं। इस दिशा में प्रयास बराबर करते रहना है।जनसामान्य को हरीतिमा संवर्धन में भागीदार बनने की प्रेरणा देने के लिए वैज्ञानिक आँकड़ों के माध्यम से संकट की भयावहता का बोध कराना भी उपयोगी है। उसके साथ ही इस अभियान से जन- जन को जोड़ने के लिए उनमें भावनात्मक संवेदना जगाना और भी अधिक उपयोगी होता है। नीचे दिए गये पद के भावों को जनमानस में बिठाकर उन्हें भागीदार बनाने में अच्छा योगदान मिल सकता है।वृक्ष बने ब्रह्मा के साथी, रचते हैं भू पर जीवन।और विष्णु के संगी बनकर, करते हैं पालन- पोषण।।यही सदाशिव रूप लोकहित, विषपायी बन जाते हैं।इंद्रदेव की तरह मेघ से वर्षा भी करवाते हैं।।ऋषि दधीचि की तरह विश्वहित अस्थिदान कर देते हैं।इन्हें उगाओ- संरक्षण दो, ये अनुपम वर देते हैं।।हरीतिमा संवर्धन के कार्यक्रमों में इन भावों को बैनरों पर छापा भी जा सकता है और गाया भी जा सकता है।सटीक व्यवस्था बनायेंजनमानस में प्रेरणा भरने से अनेक भावनाशील उसमें भागीदारी के लिए उत्साहित होते हैं। उन्हें संकल्पित कराने के साथ- साथ संकल्प पूर्ति में आवश्यक सहयोग देने का व्यवस्थित तंत्र भी बनाया जाना चाहिए। जैसे :-उपयुक्त पौध :- क्षेत्र विशेष में सहजता से पनपने वाले उपयोगी वृक्षों की पौध उपलब्ध रहनी चाहिए। इस कार्य में कुशल व्यक्तियों से पौध तैयार कराकर, वन विभाग की पौधशालाओं से संगति बिठाकर उन्हें उपलब्ध कराया जा सकता है। सम्पन्न भावनाशील लोग अपनी तरफ से पौध उपलब्ध कराने के लिए आगे आ सकते हैं।उपयुक्त क्षेत्र :- वृक्षारोपण करने- कराने के लिए उपयुक्त भूमि पर भी दृष्टि रखनी चाहिए। जैसे :-ग्राम पंचायतों के अधिकार में खाली पड़ी भूमि।आश्रमों, स्कूल- कॉलेजों में उपलब्ध भूमि।सड़कों, रेलवे लाइनों, नदियों, जलस्रोतों के किनारे उपलब्ध खाली क्षेत्र।ऊबड़- खाबड़, बंजर भूमि, छोटी- छोटी पहाड़ियाँ।व्यक्तिगत भवनों, खेतों, आहातों आदि में उपयुक्त स्थान।जहाँ वृक्षारोपण न हो सकें वहाँ फूलवाले पौधे, तुलसी, आज्ञाघास, मेंहदी, मीठी नीम जैसे उपयोगी पौधे भी लगाये जा सकते हैं। यह भी पर्यावरण शोधन तथा आरोग्य संवर्धन के लिए उपयोगी हैं।उपयुक्त अवसर :- हरीतिमा संवर्धन के लिए लोगों को संकल्पित तो कभी भी कराया जा सकता है, किन्तु विशेष अवसरों पर कराये गए संकल्प अधिक प्रभावशाली सिद्ध होते हैं। जैसे पर्वों पर : वर्षाकाल में गुरुपूर्णिमा, श्रावणी (रक्षाबंधन), जन्माष्टमी, ऋषिपंचमी, पितृपक्ष जैसे महत्त्वपूर्ण पर्व आते हैं। गुरुपूर्णिमा पर गुरु की स्मृति में या गुरुनिर्देशों के नाते; श्रावणी और ऋषि पंचाी पर ऋषि परम्परा, ऋषिऋण चुकाने, भाई- बहिन के प्रेम की स्मृति में; पितृपक्ष में पितृऋण चुकाने, पितरों की स्मृति में वृक्षारोपण के प्रभावी प्रयोग किए- कराए जा सकते हैं। यज्ञों- संस्कारों के साथ तो यह क्रम जोड़ने के प्रयास किए ही जाते हैं।कहने का तात्पर्य यह है कि मौसम की अनुकूलता के साथ पर्वों की प्रेरणा का सुसंयोग बनाकर प्राणिमात्र के लिए हितकारी इस अभियान को व्यापक गति दने के विवेकपूर्ण प्रयोग बहुत ही प्रभावी सिद्ध हो सकते हैं।तरुपुत्र- तरुमित्र कार्यक्रम इस दिशा में बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ है। भविष्य में इसे और भी व्यापक और लोकप्रिय बनाया जा सकता है। इसके लिए निम्न गेय पद के अनुसार जनभावनायें उभारने और उन्हें साकार रूप देने में पर्याप्त सफलता मिल सकती है।पद :तरुपुत्रों का वरण करो, ये थोड़े में पल जाते हैं।निश्चित ही पुत्रों से ज्यादा, पुण्य- सुयश दे जाते हैं।।मित्र मानकर तुष्ट करो, ये स्वार्थ रहित करते उपकार।प्राणवायु, आहार आदि के,जीवन में भरते उपहार।।मातु- पितावत्, श्रद्धापूर्वक वृक्षों का सम्मान करें।ये विषपायी औगढ़दानी, जगती का कल्याण करें।।अपने देश के नर- नारी भावनावश विशेष पुरुषार्थ कर लेते हैं। शरीर से जर्जर व्यक्ति भी किसी के लिए मनौती मनाने के लिए सैकड़ों सीढ़ियाँ, कठिन चढ़ाईयाँ पार करके देवस्थलों तक पहुँच जाते हैं। स्वयं भूखे रहकर भी प्रसन्नतापूर्वक दान- पुण्य करते हैं। प्रकृति माता के पूजन के भाव से ब्रह्मा- विष्णु, इन्द्रादि के पूरक प्रतीक वृक्षों के रक्षण- संवर्धन के लिए वे अनुपम पुरुषार्थ कर सकते हैं। नैष्ठिक साधक जनमानस में ऐसे भाव जगाने में समर्थ हो सकते हैं।भारतभूमि को सस्यश्यामला (हरीतिमा से शोभित) कहा गया है। उसे पुन: उसी गरिमामय अवस्था में पहुँचाने के लिए संकल्पित, समन्वित, सहकारी पुरुषार्थ करना श्रेष्ठतम यश आौर पुण्य देने वाला कार्य है। आइये हम तुरंत इसमें जुट जाएँ। *

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संयम- साधना से मिलता है उपासना- अनुष्ठान का फल

अध्यात्म पथ के पथिकों को युगऋषि का मार्गदर्शनमनुष्य में उत्कृष्ट चिन्तन की पृष्ठभूमि बनाने का काम अध्यात्म करता है। आत्मा में विद्यमान परमात्मा को हम कैसे विकसित करें, इस विद्या का नाम अध्यात्म है, परन्तु आज का मनुष्य तो पूजा- पाठ, कर्मकाण्ड, अनुष्ठान तथा हनुमान जी को प्रसाद चढ़ा देने को ही अध्यात्म क्या, सब कुछ मान बैठा है। यह उसकी भूल है।वास्तव में अध्यात्म का मतलब है आदमी के चिंतन, चरित्र, आदर्श एवं व्यवहार को ऊँचा उठाना। जो इस तथ्य को जानता है, वही सच्चा अध्यात्मवादी है। ऋषियों ने इसके लिए चार साधनाएँ बतलायी हैं, जो मनुष्य को करनी चाहिए। वे हैं 'सादा जीवन उच्च विचार', आत्मवत सर्वभूतेषु', 'लोष्ठवत् परद्रव्येषु' एवं 'मातृवत् परदारेषु'। इन सूत्रों को अपनाकर ही हमारे अन्दर अध्यात्म का बल 'आत्मबल' आ सकता है।बेटे! आत्मबल एक सुन्दर तथा नफे का व्यापार है। गुरुनानक को उनके पिताजी ने २० रुपये दिये थे व्यापार के लिए। आत्मबल के धनी नानक ने ऐसा व्यापार किया कि आज वह करोड़ों के व्यापारी बन गए। बुद्ध ने बचपन में बूढ़े, बीमार एवं मरे आदमी को देखकर आत्मबल का व्यापार किया तो विश्व में अनेक जगहों पर उनके सोने के मंदिर बने हुए हैं। हम भी इसके व्यापारी हैं। हमारा आपसे निवेदन है कि आप भी भगवान की इस लिमिटेड कम्पनी में अपना शेयर खरीद लीजिए और भागीदार बन जाइये।आहार संयम से भावशुद्धिअध्यात्म एक भावना का नाम है, श्रद्धा का नाम है। आप जिस श्रद्धा एवं भक्ति के साथ गायत्री माता के फोटो को देखते हैं, आपको उसी प्रकार का लाभ मिलता है।यह एक तथ्य है कि भगवान को प्राप्त करने के लिए भावना पवित्र होनी चाहिए तथा भावना को पवित्र करने के लिए आहार को ठीक करना परम आवश्यक है। आपके आहार के अनुसार ही भावना होगी। आपने गलत ढंग से पैसा कमाया है और उस पैसे का अन्न ग्रहण किया है तो आपकी भावना भी दूषित होगी। आपका आहार तमोगुणी होगा तो भावना भी उसी प्रकार की होगी। अत: हर साधक को अपने भोजन के बारे में सही मात्रा, सही समय तथा संस्कार संबंधी दोष एवं अवांछनीयता का ध्यान रखना चाहिए।संस्कारवान बनने के लिए अपने आहार का नियंत्रण करना आवश्यक है, तभी हमारी उपासना में सामर्थ्य एवं बल की प्राप्ति होगी। हमने २४ साल तक जौ की रोटी और छाछ का आहार लिया है। अपने को परिष्कृत- परिमार्जित किया है। वास्तव में हमने चौबीस वर्ष जो आहार संयम किया था, उसके कारण आज भी हमारी पाचन शक्ति ठीक है। हम जो ग्रहण करते हैं उसे पेट ठीक ढंग से पचा लेता है। पिप्पलाद ऋषि ने अपना सारा जीवन केवल पीपल के फल से ही काटा था। इससे उन्हें बहुत फायदा हुआ था।आहार के द्वारा मनुष्य के विचार बनते हैं। शास्त्रों में कहा गया है- जैसा खाये अन्न, वैसा बने मन। आपमें से अधिकांश होटलों में खाते हैं। वहाँ आपको जूठन भी मिलता है। वहाँ काम करने वाले नौकर ठीक से बर्तनों की सफाई या मँजाई नहीं करते हैं। ड्रम में रखे थोड़े- से पानी में बार- बार धो- पोंछकर पुन: आपको परोसकर दे देते हैं। इस प्रकार के आहार द्वारा आपका अन्नमय कोश कैसे ठीक होगा? आपकी उपासना कैसे ठीक ढंग से संचालित होगी?आपने अगर अपनी जीभ को साध लिया, किसी की चुगली नहीं की, कभी अभक्ष्य पदार्थ नहीं खाया, किसी का दिल नहीं दु:खाया तो आपकी जीभ भगवान बन जायेगी। आप जिस किसी को भी कुछ कहेंगे वह उसके लिए वरदान सिद्ध हो जाएगा। हमने अपनी जीभ को, अपनी इंद्रियों को साधा है, तब ही यह चमत्कार आपको यहाँ दिखाई पड़ रहा है।ब्रह्मचर्य पालन- मानसिक संयमआपने ब्रह्मचर्य व्रत का पालन भी नहीं किया है। आपकी पत्नी कितनी खूबसूरत, सुकोमल आयी थी, आपने उसके साथ भी संयम नहीं बरता और बच्चे पर बच्चे पैदा करते चले गये। आपकी जो थोड़ी- सी शक्ति अर्जित होती थी, वह भी बार- बार निकल जाती रही। अगर आपको कुछ बनना है, उपासना- साधना करनी है तो आपको सीमित ब्रह्मचर्य का पालन कर संयमशील बनना चाहिए, तभी मन की चंचलता थमेगी और आपका मन उपासना में लगेगा।मित्रो, ब्रह्मचर्य के साथ- साथ मन:संयम भी बरतना आवश्यक है। संयम शारीरिक एवं मानसिक दोनों प्रकार का होता है। स्त्री- पुरुष के बीच में एक स्वाभाविक आकर्षण होता है। जब भी कोई जवान व्यक्ति एक- दूसरे को देखते हैं तो उन्हें लगाव महसूस होता है। दोनों अगर अपनी भावनाओं में परिवर्तन कर लें तो दोनों ही महानता की ओर अग्रसर हो सकते हैं। ऐसी अनेक घटनाएँ हैं जो इस प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक संयम का प्रतिपादन करती हैं।शिवाजी ने जब मुगलों पर विजय पायी थी, तो उनके सेनापति ने एक सन्दर युवती को लाकर उनके सामने खड़ा कर दिया था। शिवाजी में शारीरिक एवं मानसिक संयम विद्यमान था। उसे देखकर वे बोल उठे- काश हमारी माँ भी ऐसी सुन्दर होती तो हम भी सुन्दर होते। उन्होंने सेनापति को बुलाकर भला- बुरा कहा और उसे उसके निवास स्थान पर छोड़ आने का निर्देश दिया।स्वामी विवेकानन्द जब विदेश गये थे, तो एक लड़की ने भी उनकी परीक्षा ली थी, परन्तु वे डिगे नहीं, अपनी वासना को जला दिया और उस लड़की को शिष्या बना लिया। वही आगे चलकर सिस्टर निवेदिता के नाम से प्रख्यात हुई। यह सब अपनी भावनाओं में परिवर्तन की बात है।अध्यात्ममार्ग की साधनाएँआपको आत्मबल प्राप्त करने के लिए अध्यात्म के रास्ते पर चलना होगा और इसके लिए निम्नलिखित सिद्धांतों को अपनाना होगा। पहला- माला के विधान को समझना होगा- यानी कि व्यक्तित्व का परिष्कार करना होगा। दूसरा- एक नये किस्म की आरती एवं दीपक का थाल सजाना होगा, अर्थात् अपने को भगवान के प्रति समर्पित करना होगा। तीसरा- आहार पर नियंत्रण करना होगा। चौथा- शारीरिक एवं मानसिक संयम साधना और पाँचवाँ- स्वाध्यायशील बनना होगा। आप इस प्रकार कर सकेंगे तो मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि आपका जीवन महान बन जाएगा।