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प्रेम का प्रदर्शन नहीं, प्रेम की साधना करें

आज की विडम्बनाइन दिनों सर्वत्र अराजकता और अशान्ति का बोलबाला है। घृणा और विद्वेष का वातावरण इस कदर बढ़ा है, जैसा पूर्व में शायद ही कभी रहा हो। लोग प्रत्यक्ष में स्नेह का दिखावा तो करते हैं, पर परोक्ष में न जाने कितनी बार एक- दूसरे की हत्या कर चुके होते हैं, बुरा- भला कहकर निन्दा करते हैं। यह प्रेम का प्रदर्शन मात्र है। इससे न तो अपना भला होने वाला है, न दूसरे का।प्रेम का वह उद्दाम उत्सव अब कहाँ रहा, जिसके कारण धरती को कभी 'स्वर्गादपि गरीयसी' की संज्ञा दी गई थी। उसका प्रवाह वर्तमान में सूखकर संकीर्ण बन गया है। आज हम अनुराग तो करते हैं, पर वह घर- परिवार तक सीमाबद्ध होकर रह गया है, अपने और अपनों तक सीमित हो गया है। यही विकृत प्रेम इन दिनों बढ़ते अपराध के रूप में सामने आ रहा है। हम अपनों से प्यार प्रदर्शित करने के लिए दूसरों की सहानुभूति का अपहरण कर रहे हैं। अपना और अपनों के लाभ के लिए परायों को कष्ट दे रहे हैं।प्रेम इतना संकुचित नहीं हो सकता, न पहले कभी था, न भविष्य में होने वाला है। जब यह बौना बनने का प्रयास करता है, तो इन्हीं दिनों जैसे विकराल दृश्य उपस्थित करता है।प्रेम कुछ माँगता नहीं, न ही उसमें कोई शर्त होती है। वह सदा नि:स्वार्थ होता है। अनुरागी में प्यार की शक्ति होनी चाहिए और उसे निभाने की सामर्थ्य भी। आज इन दोनों का अभाव है। हमारे पास न तो वह विशाल हृदय है, न सभी को आत्मसात करने वाला पवित्र अंत:करण। हम प्यार पाने की इच्छा तो रखते हैं, पर उसे चुकाने की, लुटाने की हिम्मत नहीं संजो पाते, यही आज की सबसे बड़ी कमी है।पाने का आनन्द लुटाने में हैस्नेह- प्रेम में अद्भुत शक्ति है। जब यह विशिष्टता मानवी अन्त:करण में प्रस्फुटित होती है, तो न सिर्फ व्यक्ति को असाधारण बनाती है, वरन् उस समाज और राष्ट्र को भी अद्वितीय बना देती है, जिसमें इसकी सरिता प्रवाहमान है।संसार में दिन ही दिन होता अथवा रात ही रात होती, तो उन्हें आज जैसा सम्मान और महत्त्व नहीं मिल पाता, वह नीरस और ऊबाऊ भी होते, किन्तु दोनों पक्षों के समन्वय से एक सरसता पैदा होती है, जो पशु- पक्षी को समान रूप से लुभाती है। जीवन में यदि काम ही काम होता तो वह कितना एकरस व थकाऊ होता, इसकी कल्पना की जा सकती है, पर आराम के उपलब्ध होने पर व्यक्ति पुन: नये उत्साह और उल्लास के साथ काम में जुट पड़ता है और देखते- देखते उसे समाप्त कर डालता है। यह दो पक्षों के मिलन का चमत्कार है। जीवन में प्यार की परिणति भी ऐसी ही हो सकती है।हम वात्सल्य की आकांक्षा भी रखें और उसे बाँटने का साहस भी। सुख इसी में है। पाने का आनन्द लुटाने में ही होता है। कृपणों के बारे में तो नहीं कहा जा सकता, पर जो सचमुच उदारचेता हैं, वे जितना कमाते हैं, उसी अनुपात में बाँटते भी हैं। गुरु- शिष्य परम्परा इसी सिद्धान्त पर आधारित है। किसानों की तरह पाने के लिए लुटाना आवश्यक होता है।स्वामी विवेकानन्द का कथनसन् १८९७ में लाहौर में 'वेदान्त' पर व्याख्यान करते हुए स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि हम सामाजिक विकास के लिए भले ही हजारों समितियाँ गढ़ लें, लाखों सम्मेलन कर लें, पर उसकी वास्तविक उन्नति तभी हो सकेगी, जब समाज के लोगों के प्रति हम सहानुभूति रख सकें, प्रेम प्रदर्शित कर सकें। जब तक हमारे भीतर बुद्ध का हृदय और कृष्ण की वाणी विकसित और व्यवहृत होते नहीं दिखाई पड़ेंगे, तब तक प्रगति की आशा, दुराशा मात्र होगी।यह सत्य है कि हम असल की नकल करना बहुत जल्दी सीख जाते हैं, किन्तु इस उपक्रम में अभी भी काफी कच्चे हैं। हमारा अनुकरण बाह्य स्तर तक ही सीमित है। जिस दिन हम अन्दर के भाव को अपनाना और पनपाना सीख जायेंगे, उसी क्षण हम, हमारा समाज व राष्ट्र उन्नत बन जायेंगे।यूरोप से सीखेंअभेदानन्द एक स्थान पर लिखते हैं कि यूरोप में सभा- सम्मेलन जितनी संख्या में प्रतिदिन होते हैं, उतने शायद विश्व के किसी हिस्से में नहीं। इसका अनुकरण कर सहज ही ऐसे सम्मेलन आयोजित किए जा सकते हैं, पर उनकी राजनीतिक गोष्ठियों में जो सौहार्द्र दिखाई पड़ता है, उसका परिचय दे पाना हमारे लिए अभी कठिन है। हमें अब इसी कठिनाई को दूर करने की कोशिश करनी चाहिए।भारतीय संस्कृति में 'आत्म- विस्तार' की प्रक्रिया इसी हेतु सुझायी गई है। हम इस साधना को जीवन में यदि उतार सकें तो कोई कारण नहीं कि वह मनोभूमि विकसित न हो सके, जिसमें प्यार पाने और लुटाने की दोहरी भूमिका सम्पन्न होती हो। अध्यात्म का प्रवेश द्वार यही है।

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श्रावणी पर्व पर द्विजत्व को शुद्ध- प्रबुद्ध बनाने हेतु साधना का स्तर बढ़ायें

जीवन में ब्राह्मणत्व को जाग्रत् करने, जीवन्त बनाने के लिए संकल्पित होंपर्व प्रेरणाश्रावणी पर्व द्विजत्व के वरण और पोषण का पर्व है। द्विजत्व अर्थात् इसी जीवन में नये उद्देश्यपूर्ण नये जन्म को सार्थक बनाने वाली विधा। पिता के सहयोग से माँ के गर्भ से जन्म पाने की प्रक्रिया तो पशु- पक्षियों में भी होती है। यह शरीर को जन्म देने का क्रम है। शरीर के अन्दर जो 'ईश्वर अंश जीव अविनाशी' स्थित रहता है, उसे इतना जाग्रत्, जीवन्त, विकसित किया जाय कि काया के सारे क्रिया- कलापों में उसी की झलक उभरने लगे, पशु प्रवृत्तियों से संचालित काया दिव्य प्रेरणाओं से संचालित होने लगे तो इस परिवर्तन को नये जीवन, नये जन्म की संज्ञा दी जाती है।नया जन्म :- जैसे माता- पिता के संतुलित सहयोग से काया जनती है, वैसे ही गुरुकृपा और शिष्य के समर्पण के संयोग से साधक द्विज बनता है। बीज प्रकृति के प्रति समर्पण दिखाता है, प्रकृति के प्रवाह में अपना अस्तित्व मिलाने, गलाने के लिए तैयार होता है, तो प्रकृति की कृपा अपना प्रभाव दिखाने लगती है। छोटे से बीज से एक नये वृक्ष का जन्म होता है, जो ढेरों फलों और बीजों को पैदा करने में समर्थ होता है।इसी प्रकार साधक- शिष्य जब अपनी सीमित क्षमताओं को समर्थ गुरु के निर्देशों- अनुशासन के प्रति समर्पित कर देता है तो एक जीवन्त साधक का जन्म होता है, जिसके पुरुषार्थ के सुफल परिवार एवं समाज को धन्य बनाने लगते हैं। साधक का जीवन सफल हो जाता है। ऐसे समर्पित साधक को द्विज की संज्ञा दी जाती है।द्विजत्व का वरण करना बहुत कठिन नहीं है, किन्तु उसे नियमित और प्रगतिशील बनाये रखना कठिन होता है। विकृत मन:स्थितियाँ और विपरीत परिस्थितियाँ अपना प्रभाव साधक जीवन पर जाने- अनजाने में डालती रहती हैं। उनसे बचाते हुए नियमितता और प्रगतिशीलता बनाये रखने के कौशल और संसाधन जुटाने पड़ते हैं। बीज के अंकुरण के साथ खर- पतवार भी पनपने लगते हैं, जो अंकुर के विकास में लगने वाली पोषक शक्ति का अपहरण कर लेते हैं, विकास को बाधित कर देते हैं। साधक के मन, विचार और आचरण में अनचाहे प्रवेश करने वाले विकार भी खरपतवार जैसी ही भूमिका निभाते हैं। उनका उन्मूलन करने और द्विजत्व के संकल्प को पोषण- संरक्षण देने वाले सद्भावों, सद्विचारों, सत्पुरुषार्थ को धारदार बनाने की जरूरत पड़ती है। शिखा और यज्ञोपवीत जैसे गरिमामय प्रतीक इसी प्रक्रिया को नियमित, प्रगतिशील बनाये रखने के लिए धारण किए जाते हैं।श्रावणी पर्व साधक के जीवन में उक्त दोनों अनिवार्य प्रक्रियाओं को प्रखर- जीवन्त बनाने का संदेश और शक्ति प्रवाह लेकर आता है। इस पर्व पर द्विजत्व की दिशा में बढ़ने के लिए किए गये संकल्पों, अपनाये गये अनुशासनों के निर्वाह में जो भूलें हुई हों, उनको चिह्नित करके, तद्नुसार प्रायश्चित्त करके, भविष्य में उच्चतर सोपानों पर कदम बढ़ाने के संकल्प करने चाहिए। प्रकृति द्वारा प्रदत्त ऋषि अनुकम्पा से प्राप्त इस सुअवसर का अच्छे से अच्छा उपयोग करना चाहिए। सुनिश्चित तैयारी करेंइस सुअवसर का लाभ उठाना है तो केवल पर्व के दिन ही कुछ कर लेने से बात नहीं बनती। कोई महत्त्वपूर्ण अवसर आने वाला है तो उसका लाभ उठाने के लिए काफी पहले से तैयारी की जाती है। कोई परीक्षा देनी हो, कोई साक्षात्कार (इण्टरव्यू) देना हो या कोई महत्त्वपूर्ण मैच खेलना हो तो बहुत पहले से अपनी वर्तमान स्थिति की समीक्षा करके, कमियों को दूर करने, कौशल को निखारने के प्रयास पूरी ईमानदारी और मेहनत से किए जाते हैं, तभी वाञ्छित परिणाम प्राप्त हो पाते हैं। श्रावणी पर्व का समुचित लाभ उठाने के लिए इसी प्रकार तैयारी करने की मानसिकता बनानी चाहिए।क्या करें? श्रावणी पर्व पर मूल रूप में दो प्रक्रियाएँ अपनाई जाती हैं। (१) पूर्व में अपनाये गए गुरु अनुशासनों- संकल्पों के निर्वाह में जो भूलें हुई हों, उनको ठीक करने के लिए प्रायश्चित्त विधान निर्धारित है। उनसे हुई क्षति को पूरा करना। (२) अगले चरण के लिए बेहतर लक्ष्य निर्धारित करना, उन्हें पूरी निष्ठा से निभाने का संकल्प करना और ऋषि, देवताओं से उन्हें पूरा करने के लिए उचित शक्ति अनुदान प्राप्त करना। इसके लिए देवपूजन तथा रक्षाबन्धन, वृक्षारोपण जैसे रचनात्मक कार्यक्रम अपनाये जाते हैं।(१) प्रायश्चित्त विधान :- इसके तीन चरण होते हैं। (क) प्रकटीकरण (ख) तपश्चर्या(ग) इष्टापूर्ति।(क) प्रकटीकरण : गहन आत्म समीक्षा करके दोषों को रेखांकित करना तथा उन्हें खुले हृदय से गुरुसत्ता के सामने प्रकट कर देना। उन्हें आगे न दोहराने का वचन देना। इसे ईसाइयों में 'कन्फैशन' तथा इस्लाम में 'तौबा करना' कहते हैं। जब तक हृदय से दोषों को स्वीकार न किया जाय, तब तक उनके शोधन के अपने प्रयास भी सफल नहीं हो पाते तथा गुरुसत्ता- देवशक्तियों के विशेष अनुग्रह भी नहीं मिलते। इसके लिए पूर्व तैयारी में आत्मसमीक्षा द्वारा आत्मशोधन के लक्ष्य निश्चित कर लेने चाहिए।(ख) तपश्चर्या :- जिन छिपी हुई हीन चित्तवृत्तियों एवं आदतों के कारण वह चूकें हुई हैं, उनको निकाल फेंकने के लिए, उनकी पूरक श्रेष्ठ वृत्तियों को जाग्रत् करने और तद्नुसार नये विवेकपूर्ण अभ्यास करने के कठोर प्रयास ही तपश्चर्या बन जाते हैं। अपनी शक्तिभर उन्हें करने के व्यावहारिक, सुनिश्चत और प्रयासों के अनुरूप ही तपश्चर्या का स्वरूप बनता है। इस हेतु अपने लिए आवश्यक संकल्पों के प्रारूप भी पहले से तैयार रखने चाहिए।(ग) इष्टापूर्ति : उन भूलों और दोषों के कारण अपने व्यक्तिगत जीवन को, परिवार और समाज को जो हानियाँ हुई हैं, उनकी आपूर्ति अपने विशेष प्रयासों से करने के संकल्पित प्रयासों को इष्टापूर्ति कहा जाता है।उक्त तीनों चरण जिस ईमानदारी से उठाये और गिनाये जाते हैं, उसी अनुपात में ऋषि- देवताओं के अनुग्रह भी साधक के साथ जुड़ जाते हैं। श्रावणी पर्व पर हेमाद्रि संकल्प सहित दश स्नान, शिखा वंदन, यज्ञोपवीत परिवर्तन, देव एवं ऋषि पूजन उक्त पूर्व तैयारी से निर्धारित, सुनिश्चित संकल्पों के साथ करने से ही वाञ्छित लाभ मिलते हैं। यंत्रवत् कर्मकाण्ड भर पूरे कर लेने से कोई विशेष लाभ नहीं होता। अस्तु पर्व के उक्त जीवन्त अनुशासनों को पूरा करते हुए श्रावणी पर्व मनाने की अंतरंग एवं बहिरंग व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।द्विजत्व से देवत्व- ब्राह्मणत्व की ओरद्विजत्व का संस्कार, अपने भावों, विचारों और कर्मों को पाश्विक संकीर्णता से ऊपर उठाकर आत्मा की महत्ता के अनुरूप विकसित करने के संकल्प के साथ कोई भी ले सकता है। देव संस्कृति की मान्यता है कि जन्म से तो सभी शूद्र (केवल श्रम की क्षमता सम्पन्न) होते हैं।संस्कार से वे द्विज बन जाते हैं। जन्म के आधार पर कथित क्षत्रिय यदि संकीर्णता में फँसा रहे तो उनका शौर्य राष्ट्र और दुर्बलों की रक्षा करने की जगह अहंकारपूर्ण उपद्रवों में लग जाता है। कथित वैश्य का कौशल पोषण, उत्पादन और वितरण का संतुलन बनाकर जन- जन को पोषण देने की जगह कुटिलतापूर्वक अपने संकीर्ण स्वार्थों की पूर्ति के लिए जनशोषण का माध्यम बन जाता है। कथित शूद्र की श्रमशीलता समाज को मजबूती देने की जगह चोरी- उपद्रव जैसे क्रमों में लगा सकती है। कथित ब्राह्मण अपने ज्ञान से जन- जन को दिशा देने की जगह निजी स्वार्थ के लिए उन्हें भ्रमित करने, अन्धविश्वास फैलाने में लग सकता है। इसीलिए देव संस्कृति ने सभी को द्विज बनकर पशुत्व से देवत्व की ओर बढ़ने की व्यवस्था बनाई है। युगऋषि ने इसी तथ्य को प्रज्ञा पुराण में इस प्रकार व्यक्त किया है :-वर्ण चार हैं। क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र समाज में क्रमश: सुरक्षा, समृद्धि और श्रम की महत्त्वपूर्ण भौतिक आवश्यकताएँ पूरी करते हैं। ब्राह्मण का उत्तरदायित्व अध्यात्मप्रधान होता है। वस्तुत: समाजोत्कर्ष में चारों का योगदान महत्त्वपूर्ण होता है। किसी को छोटा- बड़ा या ऊँच- नीच नहीं कहा जा सकता। समाज रूपी शरीर के सभी अंग- सभी वर्ण स्वस्थ होने चाहिए। देव संस्कृति में मान्यता है कि जन्म से सभी शूद्र होते हैं, संस्कारों के द्वारा द्विज बनते हैं। सामान्य रूप से सभी वर्ण अपने निर्धारित कर्त्तव्य सँभालते हैं। किन्तु समाज और परिस्थितियों के विवेकपूर्ण संतुलन के लिए कोई भी व्यक्ति किसी वर्ण विशेष की क्षमताएँ अपने अन्दर विकसित करके उन दायित्वों को सँभाल सकता है। चारों में से किसी एक वर्ग का पतन होने से समाज का संतुलन बिगड़ने लगता है। ब्राह्मण वर्ग को इस दिशा में सबसे अधिक सतर्क रहना होता है। उसका पतन होने से अन्य वर्गों का पतन भी होने लगता है। (प्रज्ञो. ४, ५६- ६४)सभी वर्गों के व्यक्तियों को अपने अंदर बीज रूप में विद्यमान देवत्व को जाग्रत्- विकसित करना चाहिए। सच्चे ब्राह्मण का मुख्य कर्त्तव्य यही रहा है कि वह सभी वर्णों- वर्गों के व्यक्तियों को मनुष्य में देवत्व के विकास का क्रम अपनाने के लिए प्रेरित- प्रशिक्षित करने का तंत्र बनाये रखे। यदि वह अपने कर्त्तव्य से गिर जाता है तो उपयुक्त प्रेरणा, प्रशिक्षण, सहयोग के अभाव में अन्य वर्ण भी पतनोन्मुख होने लगते हैं। समाज का संतुलन लड़खड़ाने लगता है। इसलिए ब्राह्मण कहलाने के लिए उसके आचरण भी ब्राह्मणत्वयुक्त होने चाहिए। प्रज्ञा पुराण में लिखा है :-मनुष्य किसी कुल विशेष में जन्म लेने मात्र से ही ब्राह्मण नहीं बनता, उसके लिए उसे आचारणनिष्ठ भी होना पड़ता है। ब्रह्मकर्मरत वानप्रस्थ एवं सन्यासी भी ब्राह्मण संज्ञा में आते हैं। (प्रज्ञो. ४, ६८- ६९)स्पष्ट है कि यदि कोई व्यक्ति खिलाड़ी की पोशाक पहन ले, खेल के नियम याद कर ले तो इतने मात्र से वह खिलाड़ी नहीं बन सकता। उसे अपने स्वास्थ्य और कौशल को खेल के नियमों के अनुसार गढ़ना होता है। इसी प्रकार कोई व्यक्ति सरगम और रागों को रट ले, उन्हें ठीक से गा न सके तो वह संगीतज्ञ की भूमिका पूरी नहीं कर सकता। इसी प्रकार ब्राह्मण, वानप्रस्थ या सन्यासी का वेश बना लेने, उसके नियमों को याद कर लेने से कोई सच्चे ब्राह्मण की भूमिका नहीं निभा सकता। इस संदर्भ में प्रज्ञा पुराण में निर्देश हैं कि :-ब्राह्मण की तुलना मस्तिष्क और मुख से की गई है। वह उदार हृदय चिंतन प्रदान करता है और उद्घोष- प्रवचन का उत्तरदायित्व भी स्वयं अनुशासित बनकर सँभालता है। ब्राह्मण का निज जीवन अपरिग्रही, एषणाओं से रहित, सौम्य, सात्विक, सद्गुणी, सेवा परायण और सदाचार युक्त होना चाहिए। (प्रज्ञोपनिषद् ४, ६५- ६७)मस्तिष्क शरीर के एक छोटे- से हिस्से- सिर में स्थित होता है। किन्तु शरीर की तमाम क्रियाओं- प्रतिक्रियाओं को वही संचालित करता है। मस्तिष्क गड़बड़ा जाने पर व्यक्ति की काया ठीक होते हुए भी निष्क्रिय (लकवाग्रस्त) हो जाती है, शरीर की हरकतें पागलों जैसी हो जाती हैं। भोजन मुख में ही प्रवेश करता दिखता है, लेकिन उससे सारे शरीर को पोषण तथा क्रियात्मक ऊर्जा मिलती है। कोई व्यक्ति समाज में मस्तिष्क एवं मुख जैसी भूमिका तभी निभा सकता है जब उसमें उक्त गुण प्रचुर मात्रा में हों।धन्य बनें- धन्य बनायेंद्विजत्व के साधक को अपने अन्दर ब्राह्मणोचित गुणों- प्रवृत्तियों के विकास के लिए संकल्पित प्रयास करने चाहिए। आजकल ऐसे सच्चे ब्राह्मणों की बहुत आवश्यकता है। प्रज्ञा पुराण ने इसे स्पष्ट करते हुए लिखा है :-उदरपूर्ति के लिए आवश्यक शिक्षा प्राप्त करने हेतु विद्यार्थी और अभिभावक स्वयं ही दौड़- धूप करते रहते हैं। उसके लिए जानकारी भर बढ़ाने वाले वेतनभोगी अध्यापक भी अन्यान्य श्रमिकों की तरह हर जगह मिल जाते हैं। अभाव उनका रहता है, जो अपने गुण- कर्म, स्वभाव का आदर्श प्रस्तुत करके जनसाधारण का विवेक जगा सकें, उदात्त आचरण एवं परमार्थ परायणता सिखा सकें। यह काम कर सकना हर किसी के वश का नहीं है। यह कार्य प्राय: ब्राह्मण ही कर पाते हैं। उन्हीं को पुरोहित के रूप में जनसाधारण का नेतृत्व करना पड़ता है। इस धर्म- धारणा के लिए मात्र शिक्षण- उद्बोधन ही पर्याप्त नहीं होता, वरन अभ्यास के लिए अनेकों रचनात्मक एवं सुधारात्मक आन्दोलन भी खड़े करने पड़ते हैं। उनमें अनेकों को जुटाकर ज्ञान को कर्म में परिणत करते हुए उन्हें मनुष्यों के स्वभाव- संस्कार के स्तर तक पहुँचाना पड़ता है। (प्रज्ञोपनिषद् ४, ७०- ७७)युगऋषि ने हर भावनाशील- प्रतिभाशाली को संस्कार से ब्राह्मण बनने के रास्ते खोल दिए हैं। जन- जन के बीच दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन, सत्प्रवृत्ति संवर्धन के समर्थ सूत्र भी समझाये हैं तथा उसके लिए सेवा- आराधना के रूप में रचनात्मक कार्यक्रमों के ताने- बाने भी बुन दिए हैं। प्राणवान साधक उसके लिए प्रखर साधना करें, युगधर्म निभायें, स्वयं भी धन्य बनें तथा अन्यों को भी धन्य बनायें।

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छोड़ो सुविधाओं की होड़, महाकाल से लो नाता जोड़

आज की विडंबनाआज के तथाकथित बुद्धिमान इन दिनों की समस्याओं और आवश्यकताओं को तो समझते हैं, पर उपाय खोजते समय यह मान बैठते हैं कि यह संसार मात्र पदार्थों से सजी पंसारी की दुकान भर है। इसकी कुछ चीजें इधर की उधर कर देने, अनुपयुक्त को हटा देने और उपयुक्त को उस स्थान पर जमा देने भर से काम चल जायेगा।इन दिनों समूचे प्रयास इसी दृष्टि से बन और चल रहे हैं। वायु प्रदूषण दूर करने के लिए कोई ऐसी नई गैस खोजने का प्रयत्न हो रहा है, जो हवा में भरते जा रहे विष को चूस लिया करे। खाद्यान्न की पूर्ति के लिए खादों के ऐसे भीमकाय कारखाने खुल रहे हैं जो एक के दस पौधे उगा दिया करे। पर मूल कारण की ओर ध्यान न जाने से अभाव, असंतोष एवं विग्रह किस प्रकार निरस्त होगा, इसे सोचने की न जाने क्यों किसी को फुरसत नहीं है।चोट की मरहम- पट्टी की जा सकती है, पर समस्त रक्त में फैले हुए 'रक्त कैंसर' को मरहम- पट्टी से कैसे ठीक किया जाए? एक दिन तो कोई किसी को मुफ्त में भी रोटी खिला सकता है, पर आये दिन की आवश्यकताएँ तो हर किसी को अपने बलबूते ही हल करनी पड़ेंगी। उसके लिए किसी भी दानवीर के सदावर्त भण्डार में सभी लोगों का गुजारा चलता रहे, यह संभव नहीं।महाक्रान्ति की वेलावस्तुत: मनुष्य का चिन्तन, चरित्र और व्यवहार बुरी तरह गड़बड़ा गया है। उसकी स्थिति तो विक्षिप्तों जैसी हो गई है, उसी से ऐसे ऊटपटांग काम होने लगे हैं, जिनके कारण अपने और दूसरों के लिए विपत्ति ही विपत्ति उत्पन्न हो गई है। पगलाये हुए व्यक्ति द्वारा की गई तोड़- फोड़ की मरम्मत तो होनी ही चाहिए, पर साथ ही उस उन्माद की रोकथाम भी होनी चाहिए, जिसने भविष्य में भी वैसी ही उद्दण्डता करते रहने की आदत अपनाई है।यहाँ यह तथ्य भी स्मरण रखने योग्य है कि सामान्यजन अपनी निजी समस्याओं को ही किसी प्रकार सँभालते, सुधारते रहते हैं, पर व्यापक विपत्ति से मिलजुलकर ही निपटना पड़ता है। बाढ़ आने, महामारी फैलने जैसे अवसरों पर सामूहिक योजनाएँ काम देती हैं। पुरातन भाषा में ऐसे ही महत्त्वपूर्ण परिवर्तनों को युग परिवर्तन अथवा अवतार अवतरणों जैसे नामों से पुकारा जाता रहा है। ऐसे तूफानी परिवर्तनों को महाक्रान्ति भी कहते हैं। क्रान्तियाँ प्रतिकूलताओं से निपटने के लिए संघर्ष रूप में उभरती हैं। पर महाक्रान्तियों को दूरगामी योजनाएँ बनानी पड़ती हैं। अनीति के विरुद्ध संघर्ष छेड़ने के साथ- साथ नवसृजन के निर्धारण करने एवं कदम उठाने पड़ते हैं। इस अपने समय में अदृश्य में पक रही खिचड़ी को महाक्रान्ति के रूप में जाना जाय और युग परिवर्तन कहा जाय, इक्कीसवीं सदी में उज्ज्वल भविष्य की संरचना जैसा कुछ नाम दिया जाय, तो भी कोई हर्ज नहीं।भविष्य उज्ज्वल हैअत्यधिक विशालकाय सुविस्तृत क्षेत्र को प्रभावित करने वाले ६०० करोड़ मनुष्यों के चिन्तन को अवांछनीयता से विरत करके वांछनीयता के साथ जोड़ देने वाले कार्य को कोई एक व्यक्ति न कर सकेगा; पर इस तथ्य पर अविश्वास नहीं करना चाहिए। ऐसे अवसर भूतकाल में भी अनेक बार आये हैं। जब मनुष्य निराश होने लगते हैं, तब उनमें नये सिरे से, नई हिम्मत भरने के लिए प्रभातकाल के अरुणोदय की तरह नये तूफानी प्रवाह उदय होते रहे हैं, जिनके लिए बड़ी उथल- पुथल भी असंभव नहीं होती।स्रष्टा की सत्ता और क्षमता पर जिन्हें विश्वास है, उन्हें इसी प्रकार सोचना चाहिए कि गंदगी कितनी ही कुरुचिपूर्ण क्यों न हो, वह तूफानी अंधड़ के दबाव और मूसलाधार वर्षा के प्रवाह के सामने टिक नहीं सकेगी। बिगाड़ रचने में मनुष्य ने अपनी क्षुद्रता का परिचय कितना ही क्यों न दिया हो, पर इस सुन्दर भूलोक के नन्दनवन का संस्थापक उसे इस प्रकार वीरान न होने देगा, जैसा कि कुचक्री उसको विस्मार कर देने के षड्यंत्र रच रहे हैं। अनाचारियों की करतूतें निश्चय ही रोमांचकारी होती हैं, पर विश्व को संरक्षण देने वाली ऐसी देव सत्ताएँ भी सर्वथा निष्क्रिय नहीं, जिनको सृष्टि का संतुलन बनाये रहने का काम सौपा गया है।युगावतार की पुकारईश्वर- विश्वासी जानते हैं कि भगवान का अनुग्रह जहाँ साथ है, वहाँ असमंजस जैसी कोई चीज शेष नहीं रह जाती। जब आवेश की ऋतु आती है तो जटायु जैसा जीर्ण- शीर्ण भी रावण जैसे महायोद्धा के साथ निर्भय होकर लड़ पड़ता है। गिलहरी श्रद्धामय श्रमदान देने लगती है और सर्वथा निर्धन शबरी अपने संचित बेरों को देने के लिए भाव- विभोर होती है। सुदामा को भी तो अपनी चावल की पोटली समर्पित करने में संकोच बाधक नहीं हुआ था। यह अदृश्य में लहराता दैवी- प्रवाह है, जो नवसृजन के देवता की झोली में समयदान, अंशदान ही नहीं, अधिक साहस जुटाकर हरिश्चन्द्र की तरह अपना राजपाट और निज का, स्त्री- बच्चों का, शरीर तक बेचने में आगा- पीछा नहीं सोचता। दैवी आवेश जिस पर भी आता है, उसे बढ़- चढ़ कर आदर्शों के लिए समर्पण कर गुजरे बिना चैन नहीं पड़ता।यही है महाकाल की वह अदृश्य अग्नि शिखा, जो चर्मचक्षुओं से तो नहीं देखी जा सकती है, पर हर जीवन्त व्यक्ति से समय की पुकार कुछ महत्त्वपूर्ण पुरुषार्थ कराये बिना छोड़ने वाली नहीं है। ऐसे लोगों का समुदाय जब मिल- जुलकर अवांछनीयताओं के विरुद्ध निर्णायक युद्ध छेड़ेगा और विश्वकर्मा की तरह नई दुनिया बनाकर खड़ी करेगा, तो अंधे भी देखेंगे कि कोई चमत्कार हुआ। पतन के गर्त में तेजी से गिरने वाला वातावरण किसी वेधशाला से छोड़े गए उपग्रह की तरह ऊँचा उठ कर अपनी नियत कक्षा में द्रुतगति से परिभ्रमण करने लगेगा।फिर क्या होगा? उत्तर एक ही है- विचार परिवर्तन, करुणा से ओतप्रोत भाव संवेदना, व्यक्तित्त्वों में संयम और कार्यक्रमों में आदर्शवादी पराक्रम। बस इतने भर नवगठन से अपनी दुनिया का काम चल जाएगा। उससे वे सभी समस्याएँ, जो इन दिनों सुरसा, सिंहका, ताड़का और सूर्पणखा जैसी विकरालता धारण किए हुए हैं, अपना अस्तित्व गँवाती चली जाएँगी।बदलाव! बदलाव!! बदलाव!!!लगता है, विश्व- चेतना ने अपनी रीति- नीति और दिशा- धारा में उज्ज्वल भविष्य की संरचना कर सकने वाले सभी तथ्यों का परिपूर्ण समावेश कर लिया है। उसी का उद्घोष दसों दिशाओं में गूँज रहा है। उसी की लालिमा का आभास अन्तरिक्ष के हर प्रकोष्ठ में परिलक्षित हो रहा है। न जाने किसका पांचजन्य बज रहा है और एक ही ध्वनि नि:सृत कर रहा है- बदलाव! बदलाव!! बदलाव!!! उच्च स्तरीय बदलाव, समग्र बदलाव। यही होगी अगले समय की प्रकृति और नियति। मुनष्यों में से जिनमें भी मनुष्यता जीवित होगी, वे यही सोचेंगे, यही करेंगे। उसकी परिवर्तन प्रक्रिया अपने आप से आरंभ होगी और परिवार- परिकर को प्रभावित करती हुई समूचे समाज को महाकाल के अभिनव निर्धारण से अवगत और अनुप्राणित करेगी।

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भक्ति की सार्थकता भाव संवेदनाओं के उन्नयन में है

बुद्धिवाद की सीमाएँबौद्धिक क्षमता को किन्हीं गणितीय सूत्रों से किसी सीमा तक आँका- नापा भी जा सकता है, लेकिन स्मरण शक्ति, रचना शक्ति, लेखन, संगठन, अनुसंधान- विश्लेषण जैसी क्षमताएँ माप की परिधि में नहीं आतीं। भौतिक विज्ञानी केवल पदार्थों की स्थिति का विवेचन- विश्लेषण करते हैं, लेकिन भावनात्मक उथल- पुथल की व्याख्या करने में अपने को असमर्थ पाते हैं, जो मानव जीवन को अत्यधिक प्रभावित करती है।चंद्रमा एक निर्जीव पिण्ड है, पर चकोर से लेकर कवियों तक पर जो भावनात्मक प्रतिक्रियाएँ होती हैं, वे क्या हैं, क्यों हैं? पुष्प की व्याख्या कोई वनस्पति विज्ञानी एक पादप- अवयव के रूप में ही कर सकता है, किन्तु उसकी समीपता से दृष्टि को जो सौन्दर्य बोध होता है, एक- दूसरे को उपहार प्रस्तुत करते समय जिन भाव संवेदनाओं का आदान- प्रदान होता है, उसकी विवेचना विज्ञानी के बस से बाहर की चीज है।तरुण नारियों में से एक के साथ पवित्र तथा दूसरी के साथ वासनात्मक दृष्टि क्यों उभरती है, इसका उत्तर शरीर विज्ञानी क्या दे सकते हैं? आदर्शों के लिए आत्मरक्षा और स्वार्थ को छोड़कर लोग त्याग- बलिदान के उदाहरण क्यों उपस्थित करते हैं, इसका उत्तर मनोविज्ञान वेत्ताओं के पास, प्राणी की मूल प्रवृत्तियों का विवेचन करने वालों के पास क्या हो सकता है?भाव- श्रद्धा की शक्तिमनुष्य वस्तुत: भावनात्मक स्तर पर खड़ा है। उसकी गरिमा को नापना- देखना हो तो गहराई में उतरकर देखना होगा कि किसका चिंतन और दृष्टिकोण क्या है? उसकी आस्था, निष्ठा और आकांक्षा किस केन्द्र बिन्दु पर टिकी है? मनुष्य की महानता उच्च दृष्टिकोण के आधार पर ही निर्भर है, फिर उसे भले ही अभावग्रस्त साधनों में जीवन- यापन क्यों न करना पड़े।व्यक्ति की श्रद्धा ही है, जिसका सम्बल पाकर वह अपने आदर्शों के लिए बड़े से बड़े कष्ट सहकर भी प्रसन्न ही रहा करता है। जिनकी आकांक्षा और आस्था का केन्द्र, जितना उच्च होगा, उसकी श्रद्धा उतनी ही प्रगाढ़, परिष्कृत समझनी चाहिए।भक्ति समर्पण चाहती हैईश्वर या धर्म के प्रति व्यक्ति की भक्ति और उसकी श्रद्धा का परिचय भी आकांक्षाओं से ही मिलता है। सच्ची और गहनतम श्रद्धा तो वह है जिसमें ईश्वर से कोई अपेक्षा नहीं की जाती, बल्कि ईश्वर की अपेक्षा के अनुसार ही स्वयं को ढाला जाता है।यदि आप सचमुच आस्तिक हैं, तो परमेश्वर को अपनी इच्छानुसार चलाने के लिए प्रयास न करें, बल्कि स्वयं ईश्वर की इच्छापूर्ति के निमित्त बनें। अब तक के उपलब्ध अनुदान कम नहीं हैं, उन पर संतोष करना चाहिए और यदि अधिक की अपेक्षा है तो बुद्धि और पुरुषार्थ के मूल्य पर उसके लिए प्रयत्न करना चाहिए।ईश्वर को अपना आज्ञानुवर्ती बनाने की अपेक्षा यह उचित है कि हम ईश्वर की इच्छानुसार चलें और अपनी वासना, तृष्णाओं का ताना- बाना समेट लें। मालिक की तरह ईश्वर पर हुकुम चलाना उचित नहीं। उपयुक्त यही है कि हम उसके आदेशों को समझें और तद्नुसार अपनी गतिविधियों का पुन: निर्माण, पुन: निर्धारण करें।आस्तिकता का अर्थ केवल ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास करना ही नहीं, वरन यह भी है कि उसके निर्देशों का पालन यथावत किया जाय। उपासना का अर्थ समृद्धि और सुविधा के लिए गिड़गिड़ाना नहीं, वरन् यह है कि हमारा शौर्य सजग हो, जिसमें अंधकार में भटकते लोगों का अनुसरण छोड़कर ईश्वर के पीछे एकाकी चल सकें।हम ईश्वर के लिए जिएँपरमात्मा तो हमें अपनी गोद में लेने के लिए, छाती से लगाने के लिए दोनों भुजाएँ पसार कर खड़ा है। एक भुजा है पीड़ितों, पतितों और पिछड़े हुओं का क्रन्दन। दूसरी भुजा है सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन की पुकार। यह निनाद दिशाओं के अन्तराल में गूँजता रहता है, बहरे कान उसे सुन नहीं पाते।इच्छाओं और कामनाओं की पूर्ति के लिए भगवान के सम्मुख गिड़गिड़ाना अशोभनीय है। जो मिला है उसी का सदुपयोग कहाँ कर सके जो और अधिक माँगने की हिम्मत करें। कर्मफल भोगने के लिए हमें साहसी और ईमानदार व्यक्ति की तरह रहना चाहिए। गलती करने में जो दुस्साहस कभी दिखाया था, आज उसका एक अंश प्रस्तुत कर्मफल को भोगने में भी दिखाना चाहिए।कर्मफल अकाट्य हैकर्मफल अनिवार्य है। उस विधान से कोई छूट नहीं सकता। स्वयं भगवान तक न छूट सके तो हम ही क्यों साहस खोकर दीनता प्रकट करें। जो सहना ही ठहरा, उसे हँसते हुए बहादुरी के साथ क्यों न सहें?पतन और पीड़ा से ग्रसित पिछड़े हुए मनुष्य भले ही अपने अकर्म या अज्ञान का फल भुगत रहे हों, पर हमारी दृष्टि में वे नियति द्वारा इसी उद्देश्य से लाये जाते हैं कि हम सेवा, सहानुभूति, भावुकता, सहयोग द्वारा उन्हें ऊँचा उठाने, सहारा देने का प्रयास करते हुए अपनी बहुमूल्य आत्मिक चेतना को उभार सकें। दया, करुणा, उदारता, सेवा जैसी दिव्य सम्पदाओं से अपने को सुसज्जित करें। इस प्रकार के प्रयासों में जो समय, श्रम, मनोयोग एवं धन खर्च होता है, उसकी तुलना में लाखों गुने मूल्य का आत्म- बल और आत्म- संतोष मिलता है। ऐसे प्रयत्नों में हुए खर्च और परिणाम में मिले लाभ को यदि ठीक तरह तौला जा सके तो प्रतीत होगा कि जो खोया गया, उससे लाखों गुना पा लिया।भक्ति का राजमार्गईश्वर को पाने के लिए हमें अपनी ओर से कुछ नहीं करना है। केवल उसकी पसारी हुई भुजाओं में प्रवेश करना है। उसके आमंत्रण को स्वीकार करना भर ईश्वर मिलन का प्रयोजन पूरा करने में पर्याप्त है।जिसने ईश्वर की भावनात्मक पुकार सुन ली, उसका जीवन धन्य हो गया। जिसने पतितों- पीड़ितों के क्रंदन और सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन आह्वान के रूप में फैली ईश्वर की भुजाओं का आमंत्रण स्वीकार कर लिया, वही भक्त है, उसी की भक्ति में शक्ति होती है।