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तमसो मा ज्योतिर्गमय

प्रकाश ही जीवन है प्रकाश ही जीवन है और अन्धकार ही मरण। प्रकाश में वस्तुओं का स्पष्ट रूप दर्शाने की क्षमता तो होती ही है। इसके अतिरिक्त उसमें ऊर्जा भी सन्निहित रहती है। यही कारण है कि सूर्य के उदय होते ही सर्वत्र गतिशीलता का प्रादुर्भाव होता है। पक्षी अपने घोंसले से निकल कर फुदकने लगते हैं, चहकने लगते हैं। पशु बाड़ा छोड़कर भोजन की तलाश में निकलते हैं। सोने वाले नींद छोड़कर नित्यकर्म से निपटते और नये दिन के कार्य आरम्भ करते हैं। सभी का उपार्जन, उत्पादन, निर्माण, उत्थान का क्रम अपने- अपने ढंग से चल पड़ता है। संसार की हर जड़- चेतन इकाई जीवन के प्रति उत्सुक रहती और मरण के प्रति अनुत्सुक। इसलिए उसे प्रकाश का आश्रय लेना पड़ता है। प्र्रकाश के अभाव में कोई किसी की सहायता न कर सकेगा। यहाँ तक कि सद्ग्रन्थ भी अक्षर दीख न पड़ने के कारण अपना मार्गदर्शन कर सकने में समर्थ न हो सकेंगे। प्रकाश की जितनी कमी पड़ती जायेगी, उतनी ही प्रगति अवरुद्ध होती जायेगी। सद्ज्ञान प्राप्ति का सूत्र- मंत्र भौतिक जगत में जो स्थान प्रकाश का है, ऊर्जा का है, वही सम्मिश्रित प्रभाव अध्यात्म जगत में सद्ज्ञान का है। इसलिए श्रुति परिकर में स्थान- स्थान पर सद्ज्ञान रूपी दिव्य प्रकाश की उपलब्धि के लिए परब्रह्म से भावभरी प्रार्थनाएँ की गई हैं। ऋषि के शब्दों में सार्वभौम अन्तरात्मा ने प्रार्थना की है कि ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’, जिसका अर्थ है- हमें अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो। गायत्री महामंत्र में इसी सर्वोपरि विभूति, उपलब्धि को हस्तगत करने का तारतम्य है। इस दिव्य वरदान की प्राप्ति के लिए आत्मा ने अपनी प्रबल आकांक्षा की अभिव्यक्ति की है। इसे प्राप्त कर सकने का विधान, प्रयोग भी उसमें सन्निहित है। इसी कारण गायत्री को वेदमाता, देवमाता, विश्वमाता आदि नामों से अलंकृत किया गया है। उसी दिव्य ज्ञान को भूमा, प्रज्ञा, प्राण, संवेदना आदि नामों से पुकारा गया। उसे पाकर और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता। जिसके हाथ में यह चिन्तामणि पहुँचती है वह इसी जीवन में स्वर्ग, मोक्ष और सिद्धि का आनन्द प्राप्त करता है। अलंकारिक भाषा में उसे अमृत, कल्पवृक्ष और पारस नाम से निरूपित किया जाता है। शिक्षा के साथ भी शिक्षा और विद्या का अन्तर स्पष्ट है। शिक्षा की परिधि में भौतिक दुनियादारियों का समुच्चय आता है। उसके आधार पर चतुर, अनुभवी, क्रिया- कुशल बना जाता है और धनोपार्जन से लेकर यशस्वी, पदाधिकारी, सफल, सम्मानित बना जाता है। इन प्रत्यक्ष लाभों को देखते हुए सरकारी और गैर सरकारी शिक्षण संस्थाओं की धूम है। अगणित पुस्तकें इसी उद्देश्य के लिए लिखी जाती हैं। रेडियो, दूरदर्शन, फिल्म, अखबार, पत्रिकाएँ आदि भी इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए अपना विशालकाय ढाँचा खड़ा किये हुए हैं। पर्यटन, प्रदर्शन, विज्ञापन- प्रचार आदि माध्यमों से भी इसी प्रयोजन की पूर्ति होती है। विद्या इससे आगे की उच्चस्तरीय उपलब्धि है। यह आत्मिकी का क्षेत्र है, अप्रत्यक्ष है। इसे इंद्रियातीत कहा गया है। अन्तर्मुखी होने पर ही इसका स्वरूप समझा और लाभ उठाया जा सकता है। विद्या का शुभारंभ आत्मिक क्षेत्र के चिंन्तन (वस्तुस्थिति का अध्ययन- अवगाहन) और मनन (विकृतियों के परिशोधन और सत्प्रवृत्तियों के सम्वर्धन की विचारणा- योजना और संभावनाओं की अभिनव स्थापना) से होता है। पेड़ का तना, उस पर बार- बार आने वाले पल्लव, फूल- फलों का समुच्चय प्रत्यक्ष दीखते हैं, पर उन सबको जीवन तथा विकास देने वाली जड़ें जमीन के अन्दर रहती हैं, जो दिखाई नहीं देतीं, फिर भी विचारशील निश्चयपूर्वक जानते हैं कि जड़ें ही वृक्ष की प्रगति एवं स्थिरता का आधारभूत कारण हैं। यदि जड़ें सूख जायें, उन्हें दीमक चर जाय तो समझना चाहिए कि वृक्ष का जीवन समाप्त हुआ। वह सूखेगा और हवा के किसी बड़े झोंके में धराशायी हो जायेगा। आत्मिकी का महत्त्व भी समझें व्यक्ति को एक वृक्ष समझा जा सकता है। उसका बाह्य वैभव है भौतिकी और जड़ों वाला अदृश्य पक्ष आत्मिकी। साधारण बुद्धि आत्मिकी का अर्थ नहीं समझती, वह भौतिकी को ही सब कुछ मान बैठती है। इतने पर भी तथ्य यथास्थान रहते हैं। सद्गुणों के बिना मनुष्य अनगढ़ ही बना रहता है। उसके गुण, कर्म, स्वभाव में ऐसी प्रखरता उत्पन्न नहीं होती कि वह साधारण कार्यों को भी सांगोपांग ढंग से सम्पन्न कर सके। कोई बड़ी सफलता प्राप्त कर सकना तो उसके लिए किसी भी प्र्रकार शक्य नहीं हो पाता। जिनकी जड़ों को पोषण नहीं मिला, वे किसी प्रकार जिन्दगी के दिन तो पूरे करते हैं, पर फूलते- फलते वृक्ष जैसा प्रभाव, गौरव कभी भी प्राप्त नहीं कर सकते। पुण्य- परमार्थ की बात तो उनके चिन्तन तक में प्रवेश नहीं कर पाती और उस प्रयोजन को कार्यरूप में परिणत कर सकना तो बन ही कैसे पड़े? ज्ञान की गरिमा ‘आत्मज्ञान’ के रखने में जानी जाती है। जिसे जीवन के स्वरूप, उद्देश्य और सदुपयोग का बोध सांगोपांग नहीं हुआ, वह न तो आदर्शों के साथ जुड़ पाता है और न शालीनता, उत्कृष्टता की राह समझने तथा उस पर चलने की विधि- व्यवस्था से परिचित होता है। ऐसी दशा में व्यक्तित्व में उत्कृष्टता का, शालीनता का समावेश तो हो ही नहीं सकता। इस अभाव के कारण स्थिति अस्त- व्यस्त, अनगढ़, असंस्कृत जैसी ही बनी रहती है। जिस आधार पर उच्चस्तरीय प्रगति बन पड़ती है- स्नेह, सहयोग, सद्भाव मिल सकता है, वह सूत्र हाथ ही नहीं आता। ऐसी दशा में पिछड़ेपन की हेय स्थिति ही घेरे रहती है। उस दलदल में से उबरकर मानवीय गरिमा के अनुरूप कोई श्रेय- सुयोग हाथ ही नहीं लग पाता। आत्मिकी से अनजान रहने पर यही दु:खद परिणाम निरन्तर सामने खड़ा रहता है। भौतिकी के क्षेत्र में प्रकाश का अर्थ है- रोशनी, ऊर्जा। यही है वह मौलिक शक्ति, जिसके आधार पर संसार का समस्त जड़- चेतन गतिशील हो रहा है। आत्मिकी के क्षेत्र में यही ज्योति ऊर्जा महाप्रज्ञा के नाम से जानी जाती है। चूँकि यह सचेतन परब्रह्म से उद्भूत होती हैं, इसीलिए उसे जीवन ज्योति भी कहते हैं, जिसका भावार्थ है- चेतनात्मक दिव्य प्रेरणा। ऐसी ऊर्जा, जो मनुष्य के अन्तराल तक प्रवेश कर सकने का मार्ग बनाती है और उस क्षेत्र की रहस्यमय परतों को उभार कर उजागर करती है। इतना उजागर कि मनुष्य अपने में देवस्तर का अवतरण होते प्रत्यक्ष देख सके। यही है वह प्रकाश, जिसे प्राप्त करने पर मनुष्य अपने निर्धारित पथ को देख सकता है। उस पर बिना लड़खड़ाए चल सकता है और अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँच सकता है।

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विजयादशमी से प्रेरणा लें, युग निर्माण के लिए दिग्विजयी शक्ति जगाएँ

जाग्रत् आत्माओं के संगठन, प्रशिक्षण, नियोजन का समर्थ तंत्र बनाए पुनरावृत्ति विजयादशमी पर्व से संबंधित दो कथाएँ प्रसिद्ध हैं। एक है माता दुर्गा के द्वारा महिषासुर और उसके असुर अनुयायियों का विनाश और दूसरी है भगवान श्री राम द्वारा रावण पोषित आसुरी तंत्र का उच्छेदन। आतंकी आसुरी तंत्र को निरस्त करने के लिए दोनों में ही बिखरी हुई देवशक्तियों को संगठित किया गया। प्रत्यक्ष और परोक्ष दिव्य पुरुषार्थ के समन्वय से असंभव से दिखने वाले कार्य संभव हो सके। अनीति- अनाचार के आतंक को निरस्त करके स्नेह- सौजन्य युक्त स्वर्णिम व्यवस्था पुन: स्थापित करने की ईश्वरीय योजना साकार हुई। वर्तमान समय में युग परिवर्तन की ईश्वरीय योजना को प्रभावी बनाने के लिए भी इसी ऐतिहासिक प्रक्रिया की समयानुसार पुनरावृत्ति की जानी है। भयानक दुष्प्रवृत्तियों के कारण प्रकृति और मानवता के अस्तित्व पर ही प्रश्नवाचक चिह्न लगा दिए गए हैं। देवी योजना के अनुसार बिखरी हुई जागृत आत्माओं को एकत्रित- संगठित करके उन्हें सत्प्रवृत्ति संवर्धन के मोर्चे पर लगाया जाना है। इस अभियान को इतना सशक्त, व्यापक, समर्थ बनाना है कि सामाजिक व्यवस्था पर हावी हो रही दुष्प्रवृत्तियों को निरस्त किया जा सके और प्रज्ञायुग के अनुरूप सतयुगी वातावरण बनाया जा सके। ऐसे कार्य परमात्मसत्ता के परोक्ष और प्रत्यक्ष तंत्र के समन्वित पुरुषार्थ से ही सिद्ध होते हैं। किसी फैक्ट्री के सभी यंत्र पावर हाउस से प्रवाहित बिजली से ही चलते हैं। लेकिन यंत्र यदि प्रामाणिक स्तर के न हों तो पर्याप्त बिजली होने पर भी काम चलता नहीं। इसी प्रकार अवतारी सत्ता का समर्थ चेतन प्रवाह भी उपयुक्त प्रामाणिक व्यक्तित्व वाले व्यक्तियों के माध्यम से ही कार्य करता है। इसीलिए हनुमान उपयुक्त माध्यम बनते हैं तो राम अपनी प्रसन्नता एवं कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। लक्ष्मण मूर्छित हो जाते हैं तो राम दु:खी हो जाते हैं, हर कीमत चुकाकर उन्हें चैतन्य अवस्था में लाने को आतुर हो जाते हैं। अर्जुन अपने पुरुषार्थ से कतराने लगता है तो कृष्ण नाराजगी व्यक्त करते हैं, उसे पुरुषार्थ के लिए प्रेरित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। दोनों के समन्वित पुरुषार्थ से ही काम बनते हैं। इसीलिए गीताकार ने अंतिम श्लोक में यही भाव व्यक्त किए हैं कि ‘‘जहाँ योगेश्वर कृष्ण और पुरुषार्थी पार्थ का संयोग बनता है, वहीं श्री, विजय, विभूति आदि की सिद्धि होती है।’’ प्रज्ञापुराण (प्रथम खंड) में भगवान विष्णु नारद को यही निर्देश देते हैं- ‘‘मैं परोक्ष स्तर पर प्रेरणा एवं शक्ति का संचार करूँगा और तुम उस संचार को क्रियाशील रूप देने वाले प्रामाणिक माध्यमों को तैयार करो। इसके लिए जागृत आत्माओं को बड़ी संख्या में भेजा गया है। उन्हें उनके जीवनोद्देश्य का स्मरण कराओ। उनमें उत्साह उभरे तो उसे तत्काल किसी उपयुक्त, भले ही सुगम कार्य में लगा दो। इतनी व्यवस्था बन गई तो आगे के कार्य हमारी युगांतरीय चेतना संपन्न करा लेगी।’’ चूँकि कार्य विश्वव्यापी परिवर्तन का है, इसलिए सभी वर्गों और क्षेत्रों की प्रतिभाओं को इसमें लगाना ही पड़ेगा, तभी युगक्रांति की ऐसी आँधी चलेगी जो तमाम विसंगतियों को तहस- नहस कर दे। इसके लिए हर क्षेत्र में जागृत आत्माएँ भेजी गई हैं। उन सब तक प्रेरणा पहुँचाने तथा उत्साहित करके युग परिवर्तन के किसी न किसी कार्य में नियोजित करने का कार्य युग निर्माण के सृजन सैनिकों को करना है। लक्ष्य के अनुरूप तैयारी जिस स्तर का कार्य सामने हो, उसी स्तर की तैयारी उसे संपन्न करने के लिए की जाती है। बड़ी योजनाएँ लंबे समय तक चलती हैं। उनके मुख्य लक्ष्य को स्मरण में रखते हुए चरणबद्ध- समयबद्ध सामयिक लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं। हर चरण की सफलता अभियान की सामर्थ्य को बढ़ाती है। बढ़ी हुई सामर्थ्य को अगले चरण के अपेक्षाकृत बड़े लक्ष्यों की पूर्ति में लगाया जाता है। युग निर्माण का तंत्र इस दिशा में जागरूक है। उक्त प्रक्रिया के अंतर्गत वंदनीया माताजी के जन्मशती वर्ष (2026) तक देश के हर प्रांत के हर जिले, हर ब्लॉक और हर गाँव तक अभियान की दिव्य प्रेरणाएँ पहुँचाने और वहाँ युग निर्माण की जीवंत इकाइयाँ स्थापित करने का लक्ष्य घोषित किया जा चुका है। घोषणा के समय जन्मशती तक 9 वर्ष का समय उपलब्ध था। कहा गया था कि इसे तीन- तीन वर्ष के तीन चरणों में पूरा किया जाए। पहली त्रिवार्षिक अवधि 2019 में पूरी हो जाएगी। गृहे- गृहे गायत्री यज्ञ अभियान इसी योजना के अंतर्गत चलाया गया, जिसमें सफलता के नए कीर्तिमान बनो और परिजनों में नया मनोबल और उत्साह जागा। इसके लिए सभी अग्रदूत एवं सहयोगी परिजन साधुवाद के पात्र हैं। जो कार्य हुआ वह सराहनीय है, किंतु जो अभी शेष है, उसकी बड़ी चुनौतियाँ सामने आ गई हैं। बड़े भोजन भंडारे की घोषणा करके उसमें शामिल होने का उत्साह जन- जन में जगाना कठिन नहीं है। लेकिन आमंत्रितों को भोजन कराने, उन्हें संतुष्ट करने के लिए बहुत बड़ी व्यवस्था बनानी पड़ती है। इसी प्रकार नवसृजन अभियान में ईश्वर के साथ भागीदारी के लिए लोगों के मनों में उत्साह जगा देना कठिन नहीं है। लेकिन साझेदारी के लिए उनमें अविचल धैर्य, अदम्य साहस और कुशलता जगाना आसान नहीं है। इसके लिए बड़ी सूझबूझ और कुशलता के साथ निरंतर प्रयास करने पड़ेंगे। जैसे- • सामूहिक उल्लास के प्रवाह में कौतुकी प्रकृति के व्यक्ति भी बड़ी संख्या में जुड़ जाते हैं। वे अधिक समय टिकते नहीं। उनके बीच से प्राणवानों, जागृत आत्माओं को छांट लेना, उन्हें निरंतर संपर्क में रखकर प्रेरणा और प्रोत्साहन देते हुए सृजन साधना में लगाए रखना बहुत जरूरी होता है। आवश्यकता के अनुसार उनमें कुशलता बढ़ाने के लिए प्रयोगों और प्रशिक्षणों की भी व्यवस्था बनानी पड़ती है। तभी अगले चरण के बड़े लक्ष्यों को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त संख्या में पर्याप्त कुशल सृजन सैनिकों की उपलब्धि हो पाती है। सन् 2026 तक के लिए निर्धारित लक्ष्य तक पहुँचने के लिए हमें उपलब्ध सृजन सैनिकों के सुयोजन से नए क्षेत्रों में विस्तार और नए क्षेत्रों से उभरने वाले उत्साहियों को प्रेरणा- प्रशिक्षण देकर अगले चरणों की सिद्धि हेतु नियोजित करते रहने की शृंखला निरंतर गतिमान रखनी होगी। केन्द्र ने इसके लिए चरणबद्ध कार्य योजना बनाई है, जिसे क्षेत्रीय छोटी- बड़ी सभी इकाइयों द्वारा विवेक और उत्साहपूर्वक चलाया जाना है। क्रमिक चरण विस्तार: • संपर्क में आए पुराने और नए क्षेत्रों को चिह्नित करें। उनमें संगठन की मूलभूत इकाइयों, प्रज्ञा मंडलों (पुरुष मंडल, महिला मंडल, युवा मंडल या संयुक्त मंडलों) की प्रामाणिक समीक्षा करें। यदि वे निष्क्रिय हैं तो उन्हें सक्रिय किया जाए। उनके सदस्यों की संख्या 1 से 5, 5 से 25, 25 से 125 के क्रम से बढ़ाने की व्यवस्था बनाई जाए। चालीस- पचास से अधिक संख्या हो जाने पर उन्हें क्षेत्रों के हिसाब से दो स्वतंत्र मंडलों में बाँट दिया जाए। इस प्रकार विकसित होने वाले नए मंडलों में नए उत्साही और पुराने अनुभवी दोनों प्रकार के सदस्य शामिल रहेंगे। इससे उनको जीवंत बनाये रखने में सुविधा रहेगी। नये क्षेत्रों में बने मण्डलों को प्रेरित- प्रोत्साहित करते रहने की जिम्मेदारी निकटस्थ अनुभवी परिजनों को सौंपी जाय। उन्हें प्रेम और प्रेरणा देते रहकर उनका उत्साह बढ़ाते रहने से नये मण्डलों का समुचित विकास होता रहेगा। संगठन :: • युगऋषि ने स्पष्ट किया है कि यह मण्डल ही व्यक्ति निर्माण एवं संगठन की मूलभूत इकाइयों के रूप में विकसित होते रहने चाहिए। हर सदस्य ईश- उपासना, जीवन साधना और लोक आराधना की साधनाएँ नित्य करें। सप्ताह में एक बार सामूहिक साधना, स्वाध्याय करें, संयम एवं सेवा के सामूहिक प्रयोग करें। इससे परस्पर आत्मीयता और कुशलता बढ़ाते रहने का लाभ सहज ही मिलता है। • हर सदस्य को प्रतिदिन कम से कम एक घंटा समय लोकमंगल के कार्यों में लगाने के लिए प्रेरणा एवं सहयोग देने का क्रम भी बनाया जाय। परिस्थितियों के अनुसार सप्ताह में कम से कम सात घंटे और माह में तीस घंटे के समयदान की व्यवस्था भी बनाई जा सकती है। • हर समयदानी सदस्य से सृजन कार्यों के निमित्त उनकी रुचि और क्षमता भी पूछी जाय। किसी को साहित्य विस्तार, किसी को यज्ञ- संस्कार, किसी को प्रचार- प्रवचन, किसी को किन्हीं रचनात्मक कार्यों, सुधारात्मक आन्दोलनों में सहज रुचि होती है। प्रारम्भ में अपनी सहज रुचि के कार्यों में व्यक्ति प्रसन्नता से लग जाता है। बाद में आवश्यकता के अनुसार अन्य कार्यों में भी मन लगने लगता है। पहले क्षमता के अनुसार कार्य दिये जावें तो बाद में कार्य के अनुरूप क्षमता के विकास में भी रस आने लगता है। प्रशिक्षण :: • कार्य के अनुरूप क्षमता के विकास के लिए प्रशिक्षण की जरूरत पड़ती है। इसलिए पुराने अनुभवी व्यक्तियों को प्रशिक्षण देते रहने की जिम्मेदारी भी निभाने को तैयार रहना चाहिए। समयदानी साधकों की रुचि का लेखा- जोखा होने से उन्हें प्रारम्भ में उन्हीं कार्यों (कर्मकाण्ड, संगीत, साधना, प्रवचन, रचनात्मक कार्यों) में प्रशिक्षण देना सम्भव हो पाता है। किसी एक विषय में सक्रिय हो जाने से मनोबल बढ़ता है। इस अनुभव के बाद अन्य विषयों में भी उत्साह बढ़ता है। • प्रशिक्षण भी कई स्तर के हो सकते हैं। थोड़ा- थोड़ा समय देने वाले के लिए प्रतिदिन या सप्ताह में 3 दिन, एक- दो घंटे के प्रशिक्षण सहजता से चलाये जा सकते हैं। किसी छुट्टी के दिन 8 घंटे के प्रशिक्षण की व्यवस्था भी स्थानीय स्तर पर बनाई जा सकती है। हर प्रशिक्षण में विषयों में कुशलता बढ़ाने के साथ ही उन्हें संगठन की रीतिनीति के आवश्यक सूत्र भी सिखाते रहना चाहिए। इससे उनके लिए अनुशासित ढंग से आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होता है। • अधिक समय एक साथ दे सकने वाले समयदानियों से भी उनकी रुचि और क्षमता जान लेनी चाहिए। इससे उन्हें तत्काल काम सौंपना अथवा उनकी योग्यता विकास के क्रम को आगे बढ़ाते रहना सहज हो जाता है। उनके प्रशिक्षण भी विषयवार चलाते रहने से वे जल्दी तैयार होते हैं। सुविधा के अनुसार उनके लिए कई दिनों के आवासीय प्रशिक्षण भी चलाये जा सकते हैं। इसके लिए ब्लॉक, जिला या उपजोन स्तर के संगठनों से वाञ्छित सहयोग भी प्राप्त किए जा सकते हैं। ध्यान रहे कि प्रभावित व्यक्तियों को संगठित और प्रशिक्षित करने से ही सृजन सैनिकों की संख्या और गुणवत्ता को निरंतर बढ़ाते रहना संभव होगा। इसी विकास प्रक्रिया के आधार पर निर्धारित लक्ष्यों को निर्धारित अवधि में प्राप्त करते रहा जा सकता है। नियोजन :: प्रशिक्षण पाये हुए व्यक्तियों को तत्काल कोई ऐसी जिम्मेदारी सौंपी जाये, जिसमें उन्हें प्रशिक्षण से प्राप्त अपनी योग्यता को इस्तेमाल करना पड़े। यदि तत्काल अभ्यास न मिले तो प्राप्त प्रशिक्षण क्रमश: भूलने लगता है। प्रशिक्षण देने या पाने की उपयोगिता घट जाती है। इसके लिए समर्थ समयदानियों का तंत्र भी विकसित करना चाहिए। समर्थ समयदानी दो तरह के हो सकते हैं। एक वे जो किसी कार्य में नियमित समयदान करते आ रहे हैं तथा अपने अनुभव के आधार पर कुछ (दो- चार से आठ- दस तक) समयदानियों को नियोजित कर सकते हैं। देखा गया है कि भावनापूर्वक समयदान का संकल्प देने वाले अधिकांश साधक समयदान करना चाहते हैं। लेकिन कब क्या करें, यह निर्धारण नहीं कर पाते। कुछ विचार उभरे भी तो संकोच के कारण शुरू ही नहीं कर पाते। यदि उन्हें छोटे- छोटे कार्य सौंपे जायें, कुशल व्यक्तियों के साथ सहयोगी बनने का मौका मिले तो वे सक्रिय हो जाते हैं। अपने संकल्प की पूर्ति का संतोष और कार्य से प्राप्त अनुभव उन्हें निरंतर प्रगति की प्रेरणा देते हैं। दूसरे समर्थ समयदानी वे कहे जा सकते हैं जो स्वयं तो अधिक समय नहीं दे पाते लेकिन अपने प्रभाव और कौशल से समयदानियों के मार्ग में आने वाली समस्याओं के समाधान निकालते रह सकते हैं। उनके संरक्षण और मार्गदर्शन से समयदानियों का हौसला निरन्तर बढ़ता रहता है। इस प्रकार समयदानियों के संगठन, प्रशिक्षण और सुनियोजन की व्यवस्था बन जाये तो कुशल समयदानियों की संख्या और गुणवत्ता बढ़ाते रहने का अविरल क्रम चल पड़ना कठिन नहीं है। निर्धारित अवधि में निर्धारित लक्ष्य हासिल करने योग्य समर्थ्य सृजन सेना विकसित करते रहने में सफलता मिल सकती है। देव संस्कृति दिग्विजय के लिए ऋषिसत्ता द्वारा निर्धारित चरण शानदार ढंग से पूरे किए जा सकते हैं। लक्ष्यबद्ध चिन्तन प्रस्तुत कार्ययोजना के सूत्र सरसरी दृष्टि से देखने में भले ही सामान्य लगें, किन्तु युगऋषि द्वारा दिए गये लक्ष्यबद्ध चिन्तन से जुड़ते ही उनकी गहराई, अनूठी सृजन सामर्थ्य का बोध होने लगता है। इसे लौकिक यश देने वाला कार्य न मानकर प्रभु के उच्चस्तरीय अनुग्रहों का सत्पात्र बनाने वाली श्रेष्ठ साधना मानकर किया जाय। शक्ति प्रदर्शन वाले आयोजनों की अपेक्षा सृजनशक्ति संवर्धन की उक्त साधना को अधिक महत्त्व दिया जाय। स्पष्ट है कि सही दिशा में किए जाने वाले नैष्ठिक प्रयासों के साथ प्रभु अनुग्रह जुड़ते ही कठिन से कठिन लक्ष्य भी हस्तगत हो ही जाते हैं।

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गृहे- गृहे गायत्री यज्ञ - उपासना अभियान

इन दिनों देशभर में नौ वर्षीय मातृशक्ति श्रद्धांजली महापुरश्चरण के अन्तर्गत गृहे-गृहे गायत्री यज्ञों का अभियान तेज गति से चलाया जा रहा है। इसी श्रृंखला के अंतर्गत इस वर्ष परम पूज्य गुरुदेव की पुण्य तिथि 02 जून 2019 को विश्वव्यापी ‘ गृहे-गृहे गायत्री यज्ञ’ के आयोजन का निर्णय किया गया है जिसके अन्तर्गत दो लाख चालीस हजार घरों में एक दिन-एक समय यज्ञ सम्पन्न किये जाना हैं।लक्ष्य-      (1)  सम्पूर्ण विश्व मे एक साथ- एक समय 2,40,000 घरों में यज्ञ - उपासना(2)  2020 से 2026 तक एक करोड़ घरों में गायत्री यज्ञ -उपासना का विस्तारउद्देश्य-                  (1)  घर-घर गायत्री महाविद्या का तत्वदर्शन पहुँचाना, देव  स्थापना एवं नियमित उपासना के  माध्यम से देव      परिवार निर्माण।       (2)  अखण्ड ज्योति आदि मासिक पत्रिकाएँ /प्रज्ञा पाक्षिक के पाठकों / ग्राहकों में वृद्धि       (3)  धर्म घट-ज्ञान घट स्थापित करना       (४) घर-घर पारिवारिक ज्ञान मंदिरों (साहित्य) की स्थापना        (५) संस्कारों की प्रेरणा देना और संपन्न कराने की व्यवस्था करना       (6)  संगठन/ मण्डलों का गठन करना       (७)  स्थानीय संगठन/शक्तिपीठ एवं शांतिकुंज से नये लोगों को जोडऩा       (8)  अखण्ड ज्योति आदि पत्र पत्रिकाओं के वितरण हेतु ज्ञानदूत तैयार करना       (9)  समयदानियों के प्रशिक्षण एवं नये पुराने निष्क्रिय कार्यकर्ताओं को जनसंपर्क एवं समयदान हेतु तैयार करना तथा उनके प्रशिक्षण एवं नियोजन की व्यवस्था करना।       (10)  मिशन के आधारभूत कार्यक्रम -जनसंपर्क को शक्ति प्रदान करना        (११)   देव परिवार पत्रक भरवाना |   Read more @ www.awgp.org, diya.net.in 

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भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा का रजत जयंती वर्ष

नई पीढ़ी को संस्कृतिनिष्ठ-व्यसनमुक्त बनाने हेतु ठोस प्रयास होंसोद्देश्य प्रारंभ और प्रगतिभारतीय संस्कृति को दुनियाँ भर के श्रेष्ठ विचारकों ने अति पुरातन और महान माना है। ऋषियों की दृष्टि हमेशा से विश्व बंधुत्व की रही है। इसी लिए इस संस्कृति में वे सारे तत्त्व शामिल किए गए हैं, जो मनुष्य मात्र को सह अस्तित्व के साथ प्रगतिशीलता की प्रेरणा दें और क्रमश: आदर्श जीवन लक्ष्य तक पहुँचा सकें। वर्तमान समय में जब विज्ञान और तकनीकी प्रगति ने वैश्विक सम्पर्क और सहयोग के अनेक रास्ते खोल दिए हैं, तब सांस्कृतिक सौमनस्य की स्थापना भी बहुत आवश्यक हो गई है। वाञ्छित सांस्कृतिक सौमनस्य की स्थापना में भारतीय संस्कृति अति महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। राष्ट्रीय गौरव की अनुभूति और राष्ट्रीय वर्चस्व की स्थापना के लिए भी यह आवश्यक हो गया है कि नई पीढ़ी अपने सांस्कृतिक वैभव का महत्त्व समझे और जीवन को संस्कृतिनिष्ठ बनाये। इस तथ्य पर छात्रों और शिक्षातंत्र से जुड़े व्यक्तियों का ध्यान आकर्षित करने और उस दिशा में प्रेरक पहल करने के उद्देश्य से भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा का शुभारंभ किया गया था। यह प्रसन्नता और संतोष का विषय है कि लोगों ने इसका महत्त्व समझा और भरपूर सहयोग देकर इसे बुलन्दियों तक पहुँचाया। इसी वजह से इस परीक्षा ने तमाम नए कीर्तिमान भी स्थापित किए। इस नाते इसमें सहयोग देने, समय, साधन, प्रतिभा एवं श्रम आदि लगाने वाले सभी भावनाशील और विचारशील भाई-बहिन साधुवाद के पात्र हैं। अब अगले चरण बढ़ेंइस अभियान ने सफलतापूर्वक २५ वर्ष पूरे कर लिए हैं। बड़ी संख्या में विद्यालयों के व्यवस्था मण्डल व शिक्षकों, छात्रों और उनके अभिभावकों के साथ अच्छे सम्बन्ध बन गए हैं। अस्तु अब नई पीढ़ी को संस्कृतिनिष्ठ, संतुलित, प्रगतिशील जीवन शैली अपनाने की दिशा में प्रेरित करने के अगले चरण बढ़ा ही दिए जाने चाहिए। जिन विद्यालयों में यह परीक्षा आयोजित होने लगी है, उनमें छात्र-छात्राओं एवं अध्यापक-अध्यापिकाओं के सुसंयोग से संस्कृति मण्डलों की स्थापना के प्रयास तीव्रतर किए जायें। मण्डल सदस्यों को स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन एवं सभ्य समाज निर्माण के सूत्रों को समझाने और अपनाने-अभ्यास में लाने के लिए प्रेरित-प्रोत्साहित किया ही जाय। अन्य विद्यालयों में इसके लिए व्याख्यानमालाएँ-कार्यशालाएँ भी चलायी जायें। एक सुसंयोग यह भी बन पड़ा है कि केन्द्रीय और प्रान्तीय सरकारों ने सभी शिक्षण संस्थाओं में नैतिक शिक्षा की कक्षाएँ चलाने का नियम बना दिया है। इसके लिए शिक्षा विभाग को लोकसेवी, स्वैच्छिक संगठनों का सहयोग लेने की छूट भी दी है। इसका लाभ उठाते हुए प्राणवान परिजन प्रबुद्ध वक्ताओं और अनुभवी लोकसेवियों के सहयोग से इस दिशा में प्रभावशाली एवं ठोस प्रयास कर सकते हैं। नयी पीढ़ी को श्रेष्ठ राष्ट्र निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान देने की प्रेरणा दे सकते हैं। उन्हें जीवन साधना, सत्साहित्य का स्वाध्याय, संयमशीलता (इंद्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम और विचार संयम) का अभ्यास करने तथा इस प्रकार विकसित हुई ऊर्जा और कुशलता को राष्ट्रसेवा में, लोक आराधना में लगाने के लिए प्रशिक्षित-प्रोत्साहित कर सकते हैं। उक्त योजना के अन्तर्गत विद्यालयों में कक्षाएँ कोई भी ऐसे परिजन ले सकते हैं, जो थोड़ा-बहुत भी भाषण दे लेते हैं। मिशन से प्रकाशित नैतिक शिक्षा भाग-एक और दो के आधार पर भाषण के विषय तैयार किए जा सकते हैं। उनमें हर विषय के साथ उनके साथ जोड़े जा सकने वाले दृष्टांत और पूछे जा सकने वाले प्रश्न भी दिए गए हैं। उनके माध्यम से प्रसंगों को अधिक रोचक और प्रभावशाली बनाया जा सकता है। केन्द्र की पहलइस दिशा में शांतिकुंज ने युवा क्रान्ति वर्ष की तरह चार रथों को शिक्षण संस्थानों एवं प्रभावशाली संगठनों के माध्यम से नई पीढ़ी से सम्पर्क साधने, उन्हें संस्कृतिनिष्ठ-व्यसनमुक्त बनने की प्रेरणा-कार्ययोजना देने के लिए शृंखलाबद्ध कार्यक्रम देकर भेजा है। इन रथों को २८ सितम्बर को सजल श्रद्धा-प्रखर प्रज्ञा के समीप समारोहपूर्वक विदा किया गया। (समाचार इसी अंक में पृष्ठ ३ पर हैं।) रथों की इस यात्रा को च्व्यसनमुक्त भारत यात्राज् नाम दिया गया है। यह रथ छएऊ स्क्रीन एवं प्रोजेक्टर, जैनरेटर सहित विविध प्रचार सामग्री से लैस हैं। इनमें भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा, नशामुक्ति एवं शान्तिकुंज के परिचय सम्बन्धी फिल्म प्रदर्शन भी किए जा सकेंगे। इनके साथ आवश्यक साहित्य एवं संकल्प पत्रादि भी हैं। वे स्थानीय परिजनों के सहयोग से हर जगह उपयुक्त स्थलों को केन्द्र बनाकर कार्य करेंगे। जैसे :- • भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा से जुड़े विद्यालय-महाविद्यालय • गायत्री शक्तिपीठ-प्रज्ञापीठ • शहरों और कस्बों के प्रमुख स्थल • स्थानीय प्रभावपूर्ण संगठन आदि। सम्बद्ध प्रान्त : यह चार रथ २ अक्टृूबर-गाँधी जयंती से लेकर ३१ जनवरी तक क्षेत्रों में सक्रिय रहेंगे। प्रत्येक रथ इस अवधि में ७०-७५ जिलों में सम्पर्क यात्रा क्नरेगा वे क्रमश: (१) उत्तर प्रदेश, (२) हरियाणा, हिमाचल प्रदेश तथा दिल्ली (३) महाराष्ट्र, ओडिशा तथा (४) बिहार एवं झारखंड के जिलों में कार्य करेंगे। इस प्रकार यह रथ ३०० से अधिक जिलों में निर्धारित लगभग ६०० कार्यक्रम करेंगे। तीन प्रान्तों-मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ एवं राजस्थान में इसी बीच प्रान्तीय चुनाव होने हैं, इसलिए उन्हें अगले चरण के लिए छोड़ दिया गया है। गुजरात प्रान्त के परिजन इन्हीं दिनों वहाँ हुए अश्वमेधों के रजत जयंती कार्यक्रमों में व्यस्त रहेंगे, इसलिए उसे भी अगले चरण में शामिल किया जायेगा। पूर्व एवं पूर्वोत्तर के तथा दक्षिण के प्रान्तों में भाषा की समस्या होने से वहाँ भिन्न ढंग से इस अभियान को गति देने की योजना बन रही है। विश्वास है कि इस रथयात्रा से भी युवा क्रान्ति वर्ष की रथयात्रा की तरह ही शानदार परिणाम निकलेंगे। अन्य प्रयासकई प्रान्तों में उसी क्षेत्र के प्राणवान परिजनों ने अच्छे वक्ताओं की एक टीम बनायी है। वे प्रवचनों, पावर पॉइण्ट प्रेज़ेण्टेशनों, कार्यशालाओं आदि के माध्यम से विभिन्न शिक्षण संस्थानों और विभिन्न संगठनों के माध्यम से भी नई पीढ़ी को श्रेष्ठ राष्ट्र के श्रेष्ठ नागरिक बनने के लिए प्रेरित करने का क्रम चलाते रहेंगे। प्रभावित युवाओं-युवतियों को छोटे-छोटे प्रशिक्षण शिविरों के माध्यम से अग्रदूतों की भूमिका निभाने के लिए तैयार किया जायेगा। कन्या कौशल शिविरों और युवा जागरण शिविरों के माध्यम से तो इस दिशा में सार्थक प्रयास हो ही रहे हैं। अगले दिनों इन्हें और अधिक व्यापक और प्रभावी बनाने के प्रयास चल पड़े हैं।