img

संयम- साधना से मिलता है उपासना- अनुष्ठान का फल

अध्यात्म पथ के पथिकों को युगऋषि का मार्गदर्शनमनुष्य में उत्कृष्ट चिन्तन की पृष्ठभूमि बनाने का काम अध्यात्म करता है। आत्मा में विद्यमान परमात्मा को हम कैसे विकसित करें, इस विद्या का नाम अध्यात्म है, परन्तु आज का मनुष्य तो पूजा- पाठ, कर्मकाण्ड, अनुष्ठान तथा हनुमान जी को प्रसाद चढ़ा देने को ही अध्यात्म क्या, सब कुछ मान बैठा है। यह उसकी भूल है।वास्तव में अध्यात्म का मतलब है आदमी के चिंतन, चरित्र, आदर्श एवं व्यवहार को ऊँचा उठाना। जो इस तथ्य को जानता है, वही सच्चा अध्यात्मवादी है। ऋषियों ने इसके लिए चार साधनाएँ बतलायी हैं, जो मनुष्य को करनी चाहिए। वे हैं 'सादा जीवन उच्च विचार', आत्मवत सर्वभूतेषु', 'लोष्ठवत् परद्रव्येषु' एवं 'मातृवत् परदारेषु'। इन सूत्रों को अपनाकर ही हमारे अन्दर अध्यात्म का बल 'आत्मबल' आ सकता है।बेटे! आत्मबल एक सुन्दर तथा नफे का व्यापार है। गुरुनानक को उनके पिताजी ने २० रुपये दिये थे व्यापार के लिए। आत्मबल के धनी नानक ने ऐसा व्यापार किया कि आज वह करोड़ों के व्यापारी बन गए। बुद्ध ने बचपन में बूढ़े, बीमार एवं मरे आदमी को देखकर आत्मबल का व्यापार किया तो विश्व में अनेक जगहों पर उनके सोने के मंदिर बने हुए हैं। हम भी इसके व्यापारी हैं। हमारा आपसे निवेदन है कि आप भी भगवान की इस लिमिटेड कम्पनी में अपना शेयर खरीद लीजिए और भागीदार बन जाइये।आहार संयम से भावशुद्धिअध्यात्म एक भावना का नाम है, श्रद्धा का नाम है। आप जिस श्रद्धा एवं भक्ति के साथ गायत्री माता के फोटो को देखते हैं, आपको उसी प्रकार का लाभ मिलता है।यह एक तथ्य है कि भगवान को प्राप्त करने के लिए भावना पवित्र होनी चाहिए तथा भावना को पवित्र करने के लिए आहार को ठीक करना परम आवश्यक है। आपके आहार के अनुसार ही भावना होगी। आपने गलत ढंग से पैसा कमाया है और उस पैसे का अन्न ग्रहण किया है तो आपकी भावना भी दूषित होगी। आपका आहार तमोगुणी होगा तो भावना भी उसी प्रकार की होगी। अत: हर साधक को अपने भोजन के बारे में सही मात्रा, सही समय तथा संस्कार संबंधी दोष एवं अवांछनीयता का ध्यान रखना चाहिए।संस्कारवान बनने के लिए अपने आहार का नियंत्रण करना आवश्यक है, तभी हमारी उपासना में सामर्थ्य एवं बल की प्राप्ति होगी। हमने २४ साल तक जौ की रोटी और छाछ का आहार लिया है। अपने को परिष्कृत- परिमार्जित किया है। वास्तव में हमने चौबीस वर्ष जो आहार संयम किया था, उसके कारण आज भी हमारी पाचन शक्ति ठीक है। हम जो ग्रहण करते हैं उसे पेट ठीक ढंग से पचा लेता है। पिप्पलाद ऋषि ने अपना सारा जीवन केवल पीपल के फल से ही काटा था। इससे उन्हें बहुत फायदा हुआ था।आहार के द्वारा मनुष्य के विचार बनते हैं। शास्त्रों में कहा गया है- जैसा खाये अन्न, वैसा बने मन। आपमें से अधिकांश होटलों में खाते हैं। वहाँ आपको जूठन भी मिलता है। वहाँ काम करने वाले नौकर ठीक से बर्तनों की सफाई या मँजाई नहीं करते हैं। ड्रम में रखे थोड़े- से पानी में बार- बार धो- पोंछकर पुन: आपको परोसकर दे देते हैं। इस प्रकार के आहार द्वारा आपका अन्नमय कोश कैसे ठीक होगा? आपकी उपासना कैसे ठीक ढंग से संचालित होगी?आपने अगर अपनी जीभ को साध लिया, किसी की चुगली नहीं की, कभी अभक्ष्य पदार्थ नहीं खाया, किसी का दिल नहीं दु:खाया तो आपकी जीभ भगवान बन जायेगी। आप जिस किसी को भी कुछ कहेंगे वह उसके लिए वरदान सिद्ध हो जाएगा। हमने अपनी जीभ को, अपनी इंद्रियों को साधा है, तब ही यह चमत्कार आपको यहाँ दिखाई पड़ रहा है।ब्रह्मचर्य पालन- मानसिक संयमआपने ब्रह्मचर्य व्रत का पालन भी नहीं किया है। आपकी पत्नी कितनी खूबसूरत, सुकोमल आयी थी, आपने उसके साथ भी संयम नहीं बरता और बच्चे पर बच्चे पैदा करते चले गये। आपकी जो थोड़ी- सी शक्ति अर्जित होती थी, वह भी बार- बार निकल जाती रही। अगर आपको कुछ बनना है, उपासना- साधना करनी है तो आपको सीमित ब्रह्मचर्य का पालन कर संयमशील बनना चाहिए, तभी मन की चंचलता थमेगी और आपका मन उपासना में लगेगा।मित्रो, ब्रह्मचर्य के साथ- साथ मन:संयम भी बरतना आवश्यक है। संयम शारीरिक एवं मानसिक दोनों प्रकार का होता है। स्त्री- पुरुष के बीच में एक स्वाभाविक आकर्षण होता है। जब भी कोई जवान व्यक्ति एक- दूसरे को देखते हैं तो उन्हें लगाव महसूस होता है। दोनों अगर अपनी भावनाओं में परिवर्तन कर लें तो दोनों ही महानता की ओर अग्रसर हो सकते हैं। ऐसी अनेक घटनाएँ हैं जो इस प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक संयम का प्रतिपादन करती हैं।शिवाजी ने जब मुगलों पर विजय पायी थी, तो उनके सेनापति ने एक सन्दर युवती को लाकर उनके सामने खड़ा कर दिया था। शिवाजी में शारीरिक एवं मानसिक संयम विद्यमान था। उसे देखकर वे बोल उठे- काश हमारी माँ भी ऐसी सुन्दर होती तो हम भी सुन्दर होते। उन्होंने सेनापति को बुलाकर भला- बुरा कहा और उसे उसके निवास स्थान पर छोड़ आने का निर्देश दिया।स्वामी विवेकानन्द जब विदेश गये थे, तो एक लड़की ने भी उनकी परीक्षा ली थी, परन्तु वे डिगे नहीं, अपनी वासना को जला दिया और उस लड़की को शिष्या बना लिया। वही आगे चलकर सिस्टर निवेदिता के नाम से प्रख्यात हुई। यह सब अपनी भावनाओं में परिवर्तन की बात है।अध्यात्ममार्ग की साधनाएँआपको आत्मबल प्राप्त करने के लिए अध्यात्म के रास्ते पर चलना होगा और इसके लिए निम्नलिखित सिद्धांतों को अपनाना होगा। पहला- माला के विधान को समझना होगा- यानी कि व्यक्तित्व का परिष्कार करना होगा। दूसरा- एक नये किस्म की आरती एवं दीपक का थाल सजाना होगा, अर्थात् अपने को भगवान के प्रति समर्पित करना होगा। तीसरा- आहार पर नियंत्रण करना होगा। चौथा- शारीरिक एवं मानसिक संयम साधना और पाँचवाँ- स्वाध्यायशील बनना होगा। आप इस प्रकार कर सकेंगे तो मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि आपका जीवन महान बन जाएगा।

img

गायत्री विद्या और गायत्री मंत्र से जन- जन को जोड़ने की संभावनाएँ बहुत हैं

पूर्व संदर्भपाक्षिक के गत (१ जून) अंक में गायत्री को युगशक्ति के रूप में स्थापित करने के संदर्भ में विभिन्न सूत्र दिए गए थे। उत्साही साधकों ने उसे पसंद भी किया और तद्नुसार अपने प्रयास भी विभिन्न रूपों में प्रारम्भ कर दिए हैं। गायत्री साधना से जीवन परिष्कृत और तेजस्वी बनाने की अगली सीढ़ियों पर चढ़ने- चढ़ाने, आगे बढ़ने- बढ़ाने के औचित्य को स्वीकार किया है। इसी के साथ उन्होंने समाज के विभिन्न वर्गों के व्यक्तियों को गायत्री साधना से जोड़ने और प्रशिक्षण प्रक्रिया को प्रभावी बनाने के विषय को कुछ अधिक विस्तार से समझाने का आग्रह भी किया है। तद्नुसार इस आलेख में इस विषय को कुछ अधिक खोलने का प्रयास किया जा रहा है।यों तो गायत्री मंत्र के प्रति जन आकर्षण विश्व स्तर पर बढ़ रहा है, लेकिन उसके प्रति आस्था जगाकर, साधना विधि और उसके अनुशासन समझाकर नियमित साधक बनाने के लिए बहुत लगन और अनुभव की जरूरत होती है। बहुत बड़ी संख्या में समझदार लोग यह मानने लगे हैं कि भौतिक संसाधनों- सुविधाओं के बढ़ जाने से बात बनी नहीं है। मनुष्य में मानवीय गुणों का विकास करने के लिए, गुण- कर्म का परिष्कार करने के लिए आध्यात्मिक आधार को मज़बूत बनाना ज़रूरी है। उनके मन- मस्तिष्क में यह आस्था बिठाना ज़रूरी है कि गायत्री साधना से विसंगतियों में उलझे हुए प्राणों को परिष्कृत करके उच्च स्तरीय चेतना से जोड़ा जा सकता है। इसके लिए तो विश्वस्त सलाहकार, अनुभवी परामर्शदाता (मैन्टर) की भूमिका निभाने योग्य सक्षम साधकों की जरूरत होती है। आत्मशक्ति के संवर्धन से, ब्रह्मवर्चस का स्तर बढ़ने से व्यक्तित्वों में लोगों का विश्वास जीतने, आत्मीयतापूर्ण ढंग से अपने अनुभवों के आधार पर उन्हें दिशा- प्रोत्साहन देते रहने, उनका कौशल निखारते रहने की क्षमता बढ़ती है। सम्पर्क में आने वाले प्रत्येक नये- पुराने साधक को उसके स्तर के अनुरूप अगले चरण बढ़ाने के लिए प्रेरित- प्रशिक्षित, प्रोत्साहित करते रहने की क्षमता विकसित होती रहती है। इसी तथ्य को युगऋषि ने 'अपने अंग अवयवों से' नामक निर्देश पत्रक में यह कहकर स्पष्ट किया है कि "अगला कार्यक्रम ऊँचा है, परिजनों के व्यक्तित्वों की ऊँचाई इसी अनुसार बढ़ती रहे, यह जरूरी है।"संभावनाएँ बहुत हैंगायत्री मंत्र यों तो सार्वभौम सिद्ध हो चुका है, किन्तु विभिन्न धर्म- सम्प्रदायों, संगठनों, आस्थाओं से जुड़े व्यक्तियों के मन की झिझक दूर करके उन्हें गायत्री साधक बनाने के लिए उनकी आस्था के अनुरूप प्रेरित करना होगा। यह कार्य थोड़े अध्ययन से भली प्रकार किया जा सकता है। जैसे • सनातन धर्म : सनातन धर्म में तो गायत्री मंत्र को अनादि गुरुमंत्र का दर्जा दिया ही गया है। दकियानूसी सोच के व्यक्तियों द्वारा उसे प्रतिबन्धित रखने के प्रयास निरस्त हो चुके हैं। अपने इष्ट, अपने गुरु और अपने गुरुमंत्र के अनुसार ही साधना करने का आग्रह विभिन्न संगठनों से जुड़े लोगों में होता है। उन्हें निम्न सूत्रों के आधार पर समझाकर सहमत किया जा सकता है।प्राचीन साधना विधानों के अनुसार किसी भी मंत्र को जाग्रत् करने के लिए गायत्री मंत्र को साथ में करना चाहिए। अपने गुरुमंत्र, इष्टमंत्र या इष्ट नाम का जप करें, लेकिन उसके साथ गायत्री मंत्र भी जपें। गायत्री मंत्र के शिक्षणों के अनुसार जीवन- परिष्कार करते रहने से इष्ट लक्ष्य जल्दी प्राप्त होता है। गायत्री मंत्र में परमात्मा का कोई नाम या रूप नहीं बताया गया है। 'तत्' से अपने इष्ट देव का बोध करते हुए उनके आदर्शों का वरण करने, उनके तेज को अंत:करण में धारण करने और उन्हीं के द्वारा सत्प्रेरणा और शक्ति पाने का भाव रखते हुए गायत्री मंत्र जपा जा सकता है।• आर्य समाज में तो गायत्री मंत्र सबके लिए आवश्यक माना ही गया है। वे चित्र या मूर्ति की पूजा नहीं करना चाहते तो न करें। उनके यहाँ केवल ॐ युक्त गायत्री मंत्र का चित्र स्थापित कराया जा सकता है। लेकिन युग परिवर्तन के लिए, मनुष्य मात्र के लिए उज्ज्वल भविष्य की कामना से व्यक्तिगत एवं सामूहिक जप- तप के अनुष्ठानों का क्रम तो चलाया ही जा सकता है। जप- उपासना के साथ व्यक्तित्व परिष्कार के सूत्रों को जीवन साधना में संकल्पपूर्वक सम्मिलित कराया जा सकता है। महात्मा आनन्द स्वामी सहित आर्य समाज के अनेक मूर्धन्य विद्वानों, साधकों के उदाहरण से उन्हें प्रेरित किया जा सकता है।• वैष्णव सम्प्रदाय को मानने वाले व्यक्ति बहुत बड़ी संख्या में हैं। शांतिकुंज के प्रतिनिधियों ने वैष्णव सम्प्रदाय के मान्य धर्मगुरुओं से वार्ता की तो पता लगा कि उनके यहाँ 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र के साथ गायत्री मंत्र जपने का नियम है। उन्हें प्रेरणा देकर गायत्री साधक बनाया जा सकता है। 'यज्ञं वै विष्णु:' यज्ञ ही पोषण करने वाले विष्णु भगवान का क्रियात्मक स्वरूप है, यह समझाकर यज्ञीय जीवन क्रम अपनाने के लिए सहमत किया जा सकता है।• स्वामीनारायण सम्प्रदाय भी प्रकारान्तर से वैष्णव ही है। नारायण, भगवान विष्णु को ही स्वामी मानते हैं। उनकी शिक्षापत्री में भी गायत्री जप का महत्त्व बताया गया है। उन्हें धरती पर स्वर्ग के अवतरण की ईश्वरीय योजना में भागीदार बनने के लिए, गायत्री उपासना करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।• सत्सार्इं बाबा के अनुयायियों की संख्या भी बहुत बड़ी है। पट्टपूर्ति स्थिति आश्रम में बाबा की वाणी में गायत्री मंत्र का गान प्रसारित किया जाता है। बाबा के द्वारा समय- समय पर दिए गए उपदेशों में से गायत्री के समर्थन में कहे गए सूत्रों को संकलित करके एक पुस्तिका भी प्रकाशित की गई है। उसमें एक स्थान पर लिखा है कि "गायत्री अब इतनी महत्त्वपूर्ण हो गई है कि किसी को भी उसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।" उनके प्रति श्रद्धा रखने वालों को इस प्रकार के संदर्भ देकर नियमित गायत्री साधना के लिए प्रेरित करना कठिन नहीं है। अभी कुछ वर्ष पहले आॅस्ट्रेलिया के सिडनी शहर में हुए अश्वमेध यज्ञ के संयोजकों में मुख्य भूमिका बाबा के समर्थकों ने ही निभाई थी।तात्पर्य यह है कि यदि थोड़ा- सा ध्यान दिया जाय, थोड़े विवेक युक्त व्यावहारिक प्रयास किए जायें तो तमाम मत- मतांतरों के अनुयायी नर- नारियों को नैष्ठिक गायत्री साधक बनाया जा सकता है। जरूरत इस बात की है कि उनकी आस्था जगाकर उन्हें पहले सुगम साधनाएँ बतायी जायें। फिर क्रमश: उन्हें आगे बढ़ाते रहा जाय। हर योग्य शिक्षक ऐसा ही करता है। किसी भाषा के आधार पर लिपि में प्रयुक्त होने वाले थोड़े से अक्षर ही होते हैं। गणित के आधार मूल अंक ही होते हैं। उन्हें सीखने से सब सीखा जा सकता है, ऐसा उत्साह जगाकर कमश: विद्यार्थियों को भाषा एवं गणित में कुशल बनाया जाता है। सामाजिक क्षेत्र में 'मैन्टर' (विश्वस्त अनुभवी परामर्शदाता) ऐसी ही भूमिका निभाते हैं। गायत्री साधना का लाभ भी इसी प्रकार के विवेकपूर्ण, लगनयुक्त निरंतर प्रयासों से ही जन- जन तक पहुँचाया जा सकता है।प्रज्ञा परिजनों के लिए युगऋषि ने 'सत्पराशर्म देने की विधा को स्वभाव का अंग बना लेने की साधना भी बताई है। यदि साधक गण समय की आवश्यकता के अनुरूप युग साधना को विस्तार देने के लिए कमर कस लें तो युगशक्ति के समर्थ- प्रामाणिक माध्यम बनने का श्रेय- सौभाग्य प्राप्त कर सकते हैं।

img

भूजल संरक्षण- संचयन के कुछ जनसुलभ उपचार

पूर्व प्रसंगपाक्षिक के गत (१ जून) अंक में आज की एक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता के रूप में जल संरक्षण के लिए विविध प्रयास जन स्तर पर भी किए जाने की अपील की गयी। क्षेत्रों के कई कर्मठ परिजनों ने भूजल संरक्षण- संचयन के कुछ जनसुलभ उपायों पर प्रकाश डालने का आग्रह किया है। उसी के अनुसार इस आलेख में कुछ सफल व्यावहारिक प्रयोगों का उल्लेख किया जा रहा है।पहले उल्लेख किया जा चुका है कि भूमि पर उपलब्ध जल का अधिकांश भाग तो समुद्र में खारे पानी के रूप में विद्यमान है। उसे पीने योग्य बनाने के जनसुलभ शोध प्रयोग जब सफल होंगे, तब होंगे। अभी तो शेष उपयोगी जल को ही समझदारी से सँजोने और प्रयोग में लाने की जरूरत है। उस उपयोगी जल का ७७% जो अंश बर्फ के रूप में विद्यमान है, उसके लिए भी मनुष्य सीधे- सीधे कुछ नहीं कर सकता ।। पर्यावरण संतुलन से ही उसके संरक्षण में कुछ मदद हो सकती है। वह भी पिघलकर झरनों- नदियों आदि के माध्यम से उपलब्ध होता है।उपयोगी जल का २२% भाग भूजल के रूप में स्थित रहता है। मनुष्य के द्वारा भूजल का दोहन इस हद तक किया जा रहा है कि उसकी उपलब्धता दुरूह होती जा रही है। महर्षि कश्यप ने जल संरक्षण के लिए जो सूत्र सुझाये थे, उनमें से चार जनसामान्य द्वारा भी अपनाये जा सकते हैं।महर्षि कश्यप के सूत्र१. पानी के प्रवाहित स्रोतों को शुद्ध रखा जाय तथा उनके प्रवाह में कम से कम रुकावट आने दी जाय। यदि जन जागरूकता लायी जा सके तो जल स्रोतों को प्रदूषित होने से बहुत अंशों तक बचाया जा सकता है। गन्दे नाले या तो औद्योगिक इकाइयों द्वारा पनपते हैं अथवा मनुष्यों के निस्तार से। जो लोग पानी का लाभ उठा रहे हैं वे उसे शुद्ध रखने की जिम्मेदारी निभायें, तो उपचार कठिन नहीं है।२. जल प्रवाहों, स्रोतों के आसपास के इलाके में सघन वृक्षारोपण किया जाय। पेड़ों की जड़ों के सहारे पानी जमीन के अन्दर गहराई तक उतरता है। जल प्रवाह के साथ मिट्टी के कटान को भी वृक्षों- वनस्पतियों की जड़ें रोकती हैं। अस्तु तालाबों, नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों में खूब वृक्ष लगाये जायें। यह कार्य जन सहयोग से बखूबी किया जा सकता है।३. पानी के उपयोग में समझदारी और किफ़ायतसारी बरती जाय। जल प्रवाह, झरने, नदी, नल आदि से पानी किसी पात्र में लेकर उसका उपयोग मितव्ययिता से किया जाय। झरने, नदी, तालाब आदि के पानी से सीधे सफाई करने से उसमें प्रदूषण बढ़ता है। किसी पात्र से लेकर उससे सफाई करने से पानी कम भी खर्च होता है तथा भूमि में बहकर आंशिक रूप से शोधित होकर फिर जल स्रोतों तक पहुँचता है।नल खोलकर हाथ- मुँह धोने, कुल्ला आदि करने से अधिक पानी बेकार बह जाता है। किसी पात्र में लेकर वही कार्य करने से बहुत कम पानी से कार्य चल जाता है। मोटर आदि वाहनों की सफाई यदि पाइप से पानी डालकर की जाती है तो अधिक पानी व्यय होता है। बाल्टी में मग्गे के द्वारा पानी डालकर कपड़े या ब्रश से साफ किया जाय तो बहुत कम पानी से काम चल जाता है। यह आदतें थोड़े से अभ्यास से ठीक की जा सकती हैं और पर्याप्त पानी निरर्थक बहने से बचाया जा सकता है।४. जो कोई भी व्यक्ति पानी का उपयोग करते हैं, उन सभी को जल संरक्षण संचयन के लिए उचित प्रयास करने चाहिए। इस सूत्र के आधार पर हर घर में वर्षा के समय छत के पानी को एकत्रित करने के हौद (टैंक) बनाये जा सकते हैं। उसे सोकपिटों, रीचार्ज सिस्टमों के द्वारा भूजल के रूप में संग्रहीत किया जा सकता है। कुछ सफल सहज उपचार यहाँ दिये जा रहे हैं।सोक पिट : जिस मार्ग से पानी बहकर निकल जाता है, उस मार्ग में थोड़ी- थोड़ी दूरी पर यह बनाये जा सकते हैं। इन्हें स्थानीय आवश्यकता के अनुसार गोल या चौकोर बनाया जा सकता है। इनकी लम्बाई, चौड़ाई एवं गहराई लगभग तीन- तीन मीटर रखी जाती है। इनमें नीचे एक मीटर तक बड़े पत्थर (बोल्डर), उसके ऊपर एक मीटर तक गिट्टी- रोड़ी भर दी जाती है। सबसे ऊपर आधा मीटर रेत भर दी जाती है। इसके माध्यम से सतह पर बह जाने वाला पानी भूजल के रूप में धरती के अन्दर समा जाता है। कुओं को रीचार्ज करने के लिए भी इनका उपयोग किया जा सकता है।पर्कोलेशन टैंक : यह छोटे या कच्चे तालाबों, पोखरों की तरह होते हैं। जल बहाव की दिशा में कहीं- कहीं ऐसे स्थान मिलते हैं, जहाँ पानी के लिए अवरोध बना देने से पानी रुक जाता है और धीरे- धीरे धरती के अन्दर समाता रहता है। इसके लिए कई उपचार किए जा सकते हैं।जल अवरोध : बड़े- बड़े पत्थरों के अवरोध बना देने से पानी में रुकावट आती है। इन्हीं पत्थरों को यदि तार के जाल में भर दिया जाय तो यह अधिक टिकाऊ होते हैं। इसी प्रकार जूट या प्लास्टिक की बोरियों में मिट्टी भरकर बोरी बाँध भी बनाया जा सकता है। प्राकृतिक नालों पर यदि छोटे- छोटे पक्के बाँध बना दिए जायें तो और भी अच्छे परिणाम पाये जा सकते हैं।कन्टूर ट्रैन्च : पहाड़ियों पर, तीव्र ढलानों पर इस विधि का प्रयोग किया जा सकता है। पानी के बहाव की दिशा में लगभग ६० से.मी. चौड़ी और लगभग ४५ से.मी. गहरी खाइयाँ खोद दी जाती हैं। इन्हें लगातार- सम्बद्ध या क्रमबार- असम्बद्ध ढंग से खोदा जा सकता है।रीचार्ज भाफ्ट : अच्छे तालाबों में एक सीमा तक पानी भर जाने पर अतिरिक्त पानी को वेस्ट वियर (फालतू निकास) के द्वारा निकाल दिया जाता है। वर्षा का बहुत- सा पानी बहकर क्षेत्र के बाहर चला जाता है। इसे भी भूमिजल के रूप में भूगर्भ में डाला जा सकता है।इस प्रयोग में तालाब के बीच में एक गहरा बोर कर दिया जाता है। उसके अन्दर नीचे बड़े बोल्डर, फिर गिट्टी और फिर रेत भर देते हैं। बोरिंग के पाइप की ऊँचाई वेस्ट वियर की सतह से कुछ नीची रखी जाती है। वर्षा का अतिरिक्त जल वेस्ट वियर से निकलने की जगह इस संरचना के द्वारा धरती के अन्दर भूजल के रूप में फैल जाता है, जो भूजल का स्तर बढ़ा देता है।खेतों की नाली : खेतों के आसपास मेड़ों से लगी गहरी नालियाँ, छोटी खाइयाँ बना दी जाती हैं। इनके माध्यम से वर्षा का पानी पर्याप्त मात्रा में भूमि में समा जाता है।यह सभी उपचार ऐसे हैं, जिन्हें हर क्षेत्र में सहजता से व्यक्तिगत प्रयासों से, जन सहयोग से, ग्राम पंचायतों, नगर पालिकाओं, समझदार उद्योगपतियों, उदार सम्पन्नों के सहयोग से कहीं भी सफल बनाया जा सकता है। इससे खेत का पानी खेत में, गाँव का पानी गाँव में, क्षेत्र का पानी क्षेत्र में भूजल के रूप में संग्रहीत होकर धरती और वृक्ष- वनस्पतियों सहित विभिन्न जीवों के लिए वरदान बन सकता है।

img

गायत्री को युगशक्ति के स्तर पर स्थापित करने योग्य विवेक और कौशल जुटायें

समय की माँगयुगऋषि नवयुग अवतरण की दैवी योजना को भूमण्डल पर क्रियान्वित करने के संकल्प के साथ आये। उन्होंने महामाया, आदिशक्ति को इस पुण्य प्रयोजन के लिए वेदमाता एवं देवमाता के साथ ही विश्वमाता की भूमिका निभाने के लिए सहमत किया। उनकी सहमति प्राप्त होते ही स्थूल- सूक्ष्म प्रकृति उस दिशा में सक्रिय हो उठी। जनमन में उस दिशा में जिज्ञासाएँ जागने लगीं, प्रकृति के स्थूल एवं सूक्ष्म प्रवाहों से तद्नुकूल परिस्थितियाँ भी बनने लगीं। युगऋषि ने गायत्री महाविद्या का स्वरूप गायत्री महाविज्ञान में खोला तथा छोटी- छोटी पुस्तिकाओं के माध्यम से जन- जन तक उसे सहज सुलभ रूप में पहुँचाया। उक्त सभी दिव्य और मानवी सत्पुरुषार्थों के परिणाम स्वरूप हजारों वर्षों से प्रतिबंधित मानी जाने वाली गायत्री साधना विश्वव्यापी स्तर पर प्रचारित हो गयी।किसी कला या विद्या को प्रारम्भ कर देना आसान होता है। उसे प्रभावी स्तर तक ले जाने, विशिष्टता का दर्जा देने के लिए लम्बे समय तक अनवरत कठोर तप साधना करनी पड़ती है। कोई भी खेल सीमित साधनों से गलियों में भी खेलकर किसी हद तक मनोरंजन एवं स्वास्थ्य के लाभ उठाये जा सकते हैं। लेकिन उसी खेल में राष्ट्रीय- अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पहुँचने के लिए पर्याप्त संसाधन और अभ्यास की व्यवस्था जुटानी पड़ती है। संगीत गुनगुनाकर कोई भी व्यक्ति थोड़ी शान्ति का, उल्लास का बोध कर सकता है, किन्तु संगीत का प्रखर प्रभावी माहौल बनाने वालों को तो लम्बे समय तक कठोर साधना का क्रम बनाना ही पड़ता है।जनमानस के शोधन- उन्नयन के लिए तथा रूठी हुई प्रकृति के अनुकूलन के लिए गायत्री उपासना- साधना के प्राथमिक प्रयास भली प्रकार फलित हो उठे हैं। उससे जुड़ने वाले लगभग सभी साधक अपने अन्दर दिव्यता के उभार होने और दिव्य सहयोग मिलने का अनुभव कर रहे हैं। किन्तु अभी समय की विसंगतियों, व्यक्ति- परिवार और समाज के विकृत रूढ़िवादी दृष्टिकोणों को निरस्त करके उन्हें सद्विवेकयुक्त दृष्टिकोण अपनाकर उनके पुरुषार्थ को त्रिविध क्रान्तियों को गति देने में लगा देने के लिए बहुत कुछ किया जाना है। जो हो सका है उससे संतुष्ट तो हुआ जा सकता है, किन्तु जो किया जाना है उसे संकल्पपूर्वक पूरा करने के लिए बलिदानी वारों की तरह सर्वस्व झोंककर जूझ जाने से कम में समय की माँग पूरी नहीं हो सकती। इससे कम में ऋषिसत्ता के विशिष्ट अनुग्रह और आत्मसंतोष पाना संभव नहीं है।युगऋषि ने विराट प्रकृति के 'सूक्ष्म एवं कारण' स्तरों पर युगशक्ति के प्रवाह को सक्रिय कर दिया है। उसे स्थूल धरातल पर अवतरित करने के लिए युग साधकों को, युग सैनिकों को माध्यम बनाना है। युगऋषि ने इसी उद्देश्य के लिए युगसाधकों को जगाया और प्रज्ञा संस्थानों, प्रज्ञापीठों, शक्तिपीठों की स्थापना की है। गायत्री जयंती, गुरुपूर्णिमा जैसे पर्वों को समारोहपूर्वक मनाने की परम्परा भी इसीलिए चलाई है। इन पर्वों पर पुराने साधक अपने व्यक्तित्व परिष्कार और पात्रता विकास के लिए संकल्पित साधना करें तथा नये- नये संस्कारवान व्यक्तियों को खोज- खरादकर इस प्रक्रिया के साथ जोड़ें, यही उद्देश्य गुरुवर का रहा है।ढर्रे की बात नहीं, संकल्पित साधनागायत्री जयंती पर ढर्रे के कार्यक्रम पूरे करके अपने कर्त्तव्य की इतिश्री नहीं मान लेना है। गायत्री महाविद्या को युगशक्ति के स्तर पर स्थापित करने के लिए समयबद्ध योजना बनाकर संकल्पपूर्वक निर्धारित लक्ष्यों तक पहुँचने के लिए प्रखर साधना तंत्र स्थापित करना है। समय की परिस्थितियों को देखते हुए उसके लिए सूत्र इस प्रकार निर्धारित किए जा सकते हैं।पूर्व परिजनों में हंसवृत्ति विकसित होगायत्री का वाहन हंस कहा गया है। हंसवृत्ति जिनमें जिस स्तर तक विकसित होती है, वे उसी अनुसार युगशक्ति के संवाहक माध्यम बन पाते हैं। हंस के तीन विशेष गुण सर्वमान्य हैं।(क) शुभ्र बेदाग काया : बाह्य जीवन अनुशासनबद्ध रहे। उस पर शक, कुशंका, छल, अविश्वास रूपी दाग न लगने देने के जीवन्त प्रयास हों।(ख) नीर- क्षीर विवेक : विवेकी, प्रज्ञावान हों। तमाम विसंगतियों के बीच भी अपने कर्त्तव्यों, अकर्त्तव्यों का ठीक- ठीक विवेचन करके एकनिष्ठ होकर कर्त्तव्यरत रह सकें। इसे विचार क्रान्ति की क्षमता कह सकते हैं।(ग) मुक्ता चयन : हंस मोती चुगते हैं, अर्थात् अपने निर्वाह के लिए उच्च आदर्शयुक्त माध्यमों- संसाधनों का ही उपयोग करते हैं। गन्दे, हीन, अभक्ष्य का सेवन कभी नहीं करते। यह प्रवृत्ति नैतिक क्रान्ति सम्मत न्याययुक्त संसाधनों- माध्यमों का ही उपयोग करने की प्रतिबद्धता की परिचायक है। पहले से जुड़े हुए साधक प्रतिवर्ष अपने अन्दर हंस वृत्तियों को क्रमश: विकसित करते रहने की संकल्पित साधना करें।क्षेत्र विस्तार हो, साधकों की संख्या बढ़े :युगशक्ति के अवतरण का उद्देश्य युग निर्माण है, मनुष्य मात्र के लिए उज्ज्वल भविष्य का सृजन है। इसके लिए विश्व के हर क्षेत्र में, हर सम्प्रदाय में, हर वर्ग में युग साधकों की संख्या बढ़ाना जरूरी है। ऋषिसत्ता ने हर क्षेत्र में, हर वर्ग में श्रेष्ठ आत्माओं को भेजा है। उन तक युग संदेश पहुँचाना, उनके अन्दर इसके लिए सहमति और उमंग जगाना पुराने साधकों का कार्य है। इसके लिए हर प्राणवान परिजन और जीवन्त, संगठित इकाई को अपने- अपने समयबद्ध लक्ष्य निश्चित कर लेने चाहिए। अपनी रुचि और सामर्थ्य के अनुसार किस क्षेत्र एवं किस वर्ग में नये सृजन साधक बनाने हैं, यह निर्धारित करके योजनाबद्ध ढंग से जुट जाना चाहिए।गायत्री जयंती पर प्रात:कालीन कार्यक्रम पूर्व परिजनों के स्तर को बढ़ाने की दृष्टि से किये- कराये जाने चाहिए। सायंकालीन कार्यक्रमों में नये वर्ग के भावनाशीलों, विचारशीलों को युगसृजन अभियान से परिचित कराने और नये सृजन साधकों के रूप में विकसित करने की दृष्टि से किए जाने चाहिए। उसमें पूर्व पूजन, प्रवचन, सांस्कृतिक कार्यक्रम- संगीत आदि का विवेकयुक्त समावेश किया जा सकता है।गायत्री मंत्र यों तो सार्वभौम है। इसमें परमात्मा का कोई नाम नहीं है। उसे सर्वव्यापी, कल्याणकारी सत्ता के रूप में मानने का भर आग्रह है। उसी का वरण करने, उसी को धारण करने के संकल्प के साथ उसी से सन्मार्ग पर प्रेरित करने की प्रार्थना करना है। यदि किन्हीं को संकोच या एतराज हो तो वे अपनी भाषा में परमात्मा से सबके लिए सद्बुद्धि देने और उज्ज्वल भविष्य लाने की प्रार्थना कर सकते हैं। इस्लाम में इसी आशय की पूर्ति 'सूरह फातिहा' नामक आयात से होती है। पाक्षिक के १६ मई २०१८ अंक में उसके जप एवं लेखन करने योग्य अंश भी प्रस्तावित किए गये हैं। पुराने साधकों को अपने व्यक्तित्व इस स्तर पर विकसित करने चाहिए कि वे किसी क्षेत्र या सम्प्रदाय विशेष को उनके विश्वासों की रक्षा करते हुए युग साधना से जोड़ सकें।सृजन प्रशिक्षण केन्द्र सक्रिय- विकसित होंजब किसी जन आन्दोलन को विस्तार दिया जाता है तो उसके लिए समर्थ प्रेरणा- प्रशिक्षण केन्द्रों की अनिवार्य आवश्यकता पड़ती है। युगऋषि ने शक्तिपीठों, प्रज्ञापीठों, प्रज्ञा केन्द्रों की स्थापना इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए की थी। उन्हें युगऋषि के संकल्प के अनुरूप समर्थ सृजन, प्रशिक्षण केन्द्रों के रूप में विकसित करने- कराने की जिम्मेदारी भी प्राणवान परिजनों को सँभालनी है।हर क्षेत्र के नये- पुराने प्राणवान परिजन गायत्री जयंती के पूर्व ही विचार गोष्ठी करके ऊपर दर्शाये गए सूत्रों के अनुसार गायत्री जयंती पर्व को अधिक प्रभावी ढंग से मनाने की योजना बनायें और तद्नुसार प्रयास- पुरुषार्थ करें।