Published on 2020-01-24
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कुछ अच्छा, कुछ टिकाऊ परिणाम लाने वाले, लोकहित साधने वाले कार्य करने की सदेच्छा बहुतों में उभरती है। वे तद्नुसार उन शुभ कार्यों का शुभारंभ कर भी देते हैं, लेकिन उनमें से बहुतेरे कार्य बीच में ही रुकते, अटकते- भटकते देखे जाते हैं। यह इसलिए नहीं होता कि इन्हें शुरू करने वालों की कामना- भावना बदल जाती है, बल्कि वे इसलिए अटक जाते हैं कि उन्हें सफल बनाने के लिए आवश्यक साधनात्मक तैयारी नहीं होती। जनमंगल के कार्य आसान नहीं होते। उन्हें लम्बे समय तक तमाम विसंगतियों, विरोधों, चुनौतियों को झेलते हुए पूरी तत्परता से करते रहना पड़ता है। उनमें बड़ी संख्या में प्रखर पुरुषार्थियों को शामिल करना पड़ता है। उनका चुनाव करने, उन्हें प्रशिक्षित और नियोजित करते रहने की जरूरत पड़ती है। समाज के भिन्न- भिन्न वर्गों और रुचियों, प्रवृत्तियों वाले उन व्यक्तियों में परस्पर तालमेल बिठाते हुए एक- दूसरे के पूरक बनकर काम करने पड़ते हैं। इसके अलावा बदलती परिस्थितियों और बढ़ती जरूरतों के अनुसार उनकी कुशलता और संख्या भी बढ़ानी पड़ती है। सफलता मिलने पर मिलने वाले यश और सम्मान को पचा पाना भी आसान नहीं होता। वे भी कार्यकर्त्ताओं को लक्ष्य भुलाकर यशकामना की अनगढ़ होड़ में ठेल दिया करते हैं। इस सब अनिवार्य शर्तों की पूर्ति करने के लिए कार्यकर्त्ताओं में उच्च स्तरीय साधनात्मक ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती ही रहती है। इसीलिए भारत के ऋषियों- मनीषियों ने ‘साधना से सिद्धि’ के सिद्धांत को बहुत अधिक महत्व दिया है। युगऋषि ने भी युग निर्माण की सशक्त पृष्ठभूमि बनाने के लिए लम्बे समय तक कठिन साधना- तपश्चर्या का क्रम अपनाए रखा। इस कार्य में लगने वाले, सहयोगी बनने वाले युगसैनिकों- युगशिल्पियों को भी अपने स्तर पर इसी रीति- नीति को अपनाए रखने की प्रेरणा दी। इसी आधार पर यह अभियान अपनी 50 वर्ष से भी अधिक की यात्रा शानदार ढंग से पूरी करते हुए आगे बढ़ रहा है। युगऋषि कहते रहे हैं कि उनके अभियान के अंतर्गत होने वाले कार्यों का स्वरूप समुद्र में तैरते हुए विशाल हिमखंड (ग्लेशियरों) जैसा होता है। उनका केवल 1/10 अंश पानी के ऊपर दिखाई देता है, 9/10 अंश पानी के अंदर छिपा रहता है। इसी प्रकार दुनिया को दिखाने वाले प्रत्यक्ष पुरुषार्थ की भूमिका 1/10 और उसके पीछे शक्ति देने वाले साधनात्मक पुरुषार्थ की भूमिका 9/10 होती है। इसीलिए इस मिशन में सक्रिय रूप से जुड़े प्रत्येक साधक- सैनिक को ईश्वर उपासना, जीवन साधना और लोक आराधना के नियम अनिवार्य रूप से अपनाने पड़ते हैं। उनको पूरा करते रहने के लिए अपने समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन का एक अंश नियमित रूप से लगाते रहना होता है। इसके अतिरिक्त भी समयसमय पर सामूहिक साधना के विशेष क्रम भी चलाए जाते रहे हैं। जैसे• सन् 1958 के सहस्त्र कुंडीय यज्ञ के संदर्भ में ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान। • चीन के आक्रमण और अष्टग्रही योग के प्रभाव को काटने के लिए विशेष सामूहिक क्रम। श्री लाल बहादुर शास्त्री के कार्यकाल में हुए भारत- पाक संघर्ष की सफलता के लिए ‘क्लीं’ बीज मंत्र सहित विशेष जप अनुष्ठान ।।
• श्रीमती इंदिरा गाँधी के कार्यकाल में बंगला देश आॅपरेशन के समय विशेष सामूहिक साधना। • आपातकाल में उपजी विसंगतियों के निवारण के लिए किए गए सामूहिक साधना प्रयोग।

• स्काई लैब के अनियंत्रित हो जाने पर प्रतिदिन रात्रि में 9:00 से 9:30 बजे तक चलाई गई यान सुरक्षा साधना। स्मरण रहे कि स्काई लैब वैज्ञानिकों के तमाम अनुमानों के विपरीत इसी साधना काल की अवधि में (रात्रि 9:00 से 9:30 के बीच)सुरक्षित ढंग से आॅस्ट्रेलिया के निकट समुद्र में गिर गई थी।

• युगसंधि काल की अवधि में (सन् 1988 से 2000 तक) युगसंधि महापुरश्चरण साधना। इसकी पहली पूणार्हुति सन 1995 में आँवलखेड़ा में तथा महापूर्णाहुति सन् 2000 में हरिद्वार में की गई। इसके बाद समय- समय पर आश्वमेधिक अभियान, समूह साधना वर्ष जैसे प्रयोग किए जाते रहे हैं। वंदनीया माताजी की जन्मशती (सन् 2017 से 2026) तक 9 वर्षीय मातृशक्ति श्रद्धांजलि नवसृजन महापुरश्चरण साधना का क्रम चल रहा है। इसके अंतर्गत तीन- तीन वर्ष के तीन- तीन कालखंड निर्धारित किए गए हैं। प्रथम खंड (सन् 17,18,19) पूरा हो रहा है। इस अवधि में गृहे- गृहे जप- यज्ञ जैसे उल्लेखनीय क्रम चलाए गए। एक ही दिन में 2,40,000 घरों में एक साथ यज्ञ करने जैसे कीर्तिमान भी बने। श्रावण मास में एक साथ देश- विदेश के हजारों साधकों ने चान्द्रायण- अर्ध चान्द्रायण तप साधना में भागीदारी निभाई। इस प्रकार के प्रयोग आगे भी करते रहना है। समय की आवश्यकता यह समय दैवी और आसुरी शक्तियों के बीच तेज होते संघर्ष का है।

युगऋषि के अनुसार आसुरी शक्तियाँ जीवन- मरण का संघर्ष कर रही हैं। दैवी शक्तियाँ वातावरण को शोधित कर आत्मीयतासृजनशीलता जैसी प्रवृत्तियों को बढ़ा रही हैं, तो आसुरी शक्तियाँ वर्गभेद, अपराध, आतंकवाद के सहारे अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए जी- तोड़ प्रयास कर रही हैं। आसुरी प्रवृत्तियों को निरस्त करने तथा दैवी शक्तियों को प्रभावशाली बनाने के लिए लौकिक प्रयास विभिन्न स्तरों पर किए जा रहे हैं। इनके प्रभाव से दोनों प्रकार की गतिविधियाँ भर प्रभावित हो पाती हैं। यह आवश्यक तो है, किंतु पर्याप्त नहीं है। गतिविधियाँ जिन आंतरिक प्रवृत्तियों के आधार पर चलती हैं, उन्हें सुधारने -संभालने के लिए तो साधनात्मक प्रयोग ही करने पड़ते हैं। वर्तमान समय में भी करने पड़ेंगे। जैसे पिछले कुछ वर्षों से श्रावण मास में सामूहिक चान्द्रायण तप साधना का क्रम चलाया गया है, उसी प्रकार इस वर्ष से सामूहिक रूप से 40 दिन में सवा लाख जप का अनुष्ठान करने की रूपरेखा तैयार की गई है। उसके कुछ बिंदु इस प्रकार हैं :उपयुक्त समय :- पूज्य गुरुदेव ने 24000 गायत्री मंत्र जप अनुष्ठान के लिए 9 दिन की अवधि निर्धारित की है। उसी प्रकार सवा लाख के जप अनुष्ठान के लिए 40 दिन का समय बतलाया है। यों आवश्यकता और परिस्थितियों के अनुसार व्यक्ति उक्त अनुष्ठान को कम या अधिक दिनों में भी संपन्न कर लेते हैं, किन्तु सहज क्रम में उन्हें निर्धारित अवधि में ही करना अधिक संगत माना जाता है। सवा लक्ष जप के इस सामूहिक अनुष्ठान प्रयोग के लिए भी 40 दिन की अवधि ही निश्चित की गई है। वसंत पंचमी (माघ शुक्ल पंचमी) से लेकर होली (फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा) तक पूरे 40 दिन का समय मिल जाता है। यह समय वसंत ऋतु के परिपक्व होने का समय भी होता है। प्रकृति का सहज प्रवाह इन दिनों वृक्ष- वनस्पतियों के जीवन रस को पुष्पित- फलित करने के लिए सक्रिय रहता है। ऐसे समय में साधकों की सदेच्छापूर्ण तपश्चर्या भी प्रकृति के सहयोग से अपेक्षाकृत सहजता से पुष्ट- प्रभावशाली बन सकती है। इसी अवधि में पुराने पत्ते झड़ते हैं, नई कोपलें फूटती हैं और प्रकृति में एक नई मनोरम सृजनशील उमंग उमड़ने लगती है। सामूहिक साधना प्रयोग के प्रभाव से जनमानस में भी अवाञ्छनीयता को निरस्त तथा सत्प्रवृत्तियों को विकसित करने की, उन्हें युगसृजन के लिए प्रयुक्त करने की ऐसी ही उमंग उठाई जा सकती हैं। इस वर्ष यह अनुष्ठान (वसंत पंचमी) दिनांक 30 जनवरी 2020 से (होली पूर्णिमा) दिनांक 10 मार्च 2020 तक चलाया जाना है। उद्देश्य :- इस सामूहिक अनुष्ठान को 9 वर्षीय मातृशक्ति श्रद्धांजलि नवसृजन महापुरश्चरण के अंतर्गत संपन्न किया जाएगा। अत: संकल्प में निम्नलिखित उद्देश्य को शामिल किया जाएगा। • युग परिवर्तन के चक्र को अधिक प्रभावी बनाना। • इस संक्रमण काल में युग शिल्पिओं को तप साधना द्वारा अधिक प्रामाणिक बनाना। • आसुरी- आतंकवादी शक्तियों को निरस्त करना। • नवसृजन की गतिविधियों को शक्ति एवं संरक्षण प्रदान करना। • सज्जनों की संगठन की प्रवृत्ति व क्षमता बढ़ाना। विविध क्रम :- प्रत्येक साधक को प्रतिदिन 33 माला गायत्री मंत्र जप उक्त संकल्पों की पूर्ति के भाव से करना चाहिए। जप के साथ अपने अभ्यास के अनुसार साकार या निराकार ध्यान किया जा सकता है। सूर्य मंडल से, इष्ट के प्रतीक से, हिमालय से दिव्य प्रकाश का प्रस्फुटन और विस्तार हो रहा है जो सारे विश्व में फैल कर उद्देश्यों की पूर्ति में समर्थ सहयोग करने में समर्थ है। तप- नियम सामान्य अनुष्ठान की तरह ही रहेंगे। जैसे ब्रह्मचर्य व्रत का पालन, हिंसा के उत्पादों का त्याग, अपने शरीर की सेवा स्वयं करना, एक समय आहार, नमक या शक्कर का त्याग करना। प्रतिदिन 2 घंटे मौन साधना करने जैसे नियम सहजता से निभाये जा सकते हैं। अर्थ संयम, इन्द्रिय संयम, समय संयम एवं विचार संयम का स्तर बढ़ाने का प्रयास करें। 40 दिन में कम से कम एक दिन मौन साधना करें।
भाव शुद्धि :- अनुष्ठान काल में भावनाएँ शुद्ध रखें। सभी के हित की कामना करें, सभी को स्नेह, सद्भाव देने का अभ्यास बढ़ाएँ। हम विशेष साधना कर रहे हैं, ऐसा अहंकार न पनपने दें। यही भाव रखें कि गुरुकृपा से हमें इस कार्य में भागीदार बनने का अवसर मिला है। हम अपना पवित्र कर्त्तव्य पूरी तत्परता से निभा रहे हैं। उपयुक्त व्यक्तियों से सलाह लेने और उन्हें सम्मान देने का अभ्यास बढ़ाएँ। स्वाध्याय :- पूज्य गुरुदेव के जीवन साधनापरक साहित्य का नियमित स्वाध्याय करें। हम सब पढ़ चुके हैं, हमें बहुत कुछ आता है, इस विचार को निरस्त करते हुए हमें गुरुवर के विचारों की गहराई में पहुँचना है, उनके विशेष अनुग्रह पाने की पात्रता अर्जित करनी है, इस भाव से श्रद्धापूर्वक स्वाध्याय करें। गायत्री महाविज्ञान, हमारी वसीयत और विरासत, महाकाल की युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया, लोकसेवियों के लिए दिशा बोध, प्रज्ञा पुराण प्रथम खंड आदि को स्वाध्याय के लिए चुना जा सकता है। आराधना :- सेवा- साधना विराट प्रभु की आराधना के भाव से करें। प्रतिदिन जनसंपर्क एवं देवालय सेवा जैसे नियम पालें। जिनसे संपर्क करें उन्हें स्नेहपूर्वक सत्प्रवृत्तियों में भागीदारी के लिए प्रोत्साहित करें। कम से कम 5 व्यक्तियों से नित्य सम्पर्क का क्रम बनाएँ। देवालय सेवा के लिए शक्तिपीठ, प्रज्ञापीठ, प्रज्ञा केन्द्रों की स्वच्छता, शोभा संवर्धन के लिए कार्य करें। वे दूर हों तो किसी देवालय में यह सेवा दें। इसके लिए एक घंटा या अधिक समय निकालने का प्रयास करें। अंशदान :- सभी साधक एक कप चाय का मूल्य "5/- प्रतिदिन बचाएं। उसे पूणार्हुति के निमित्त ही खर्च करें। विश्व स्तर पर भागीदारी प्रयास यह है कि भारत के साथ विदेशों में रह रहे नैष्ठिक साधकों की भागीदारी इस अनुष्ठान में हो। कम से कम 24000 साधक इसमें शामिल हों। जोन, उप जोन, जिला संगठन तथा मंडलों के सदस्य अभी से उसके लिए साधकों को पंजीकृत करें। उसके लिए शान्तिकुञ्ज से आॅनलाइन पंजीयन की व्यवस्था बना दी गई है।

सक्रिय जिले इस हेतु अपने जिले में कम से कम 240 तथा अन्य जिले अपनी सामर्थ्य के अनुसार 108, 51, 24 साधकों के पंजीयन के लिए प्रयत्न करें। सभी भागीदार प्रयास करें कि 40 दिन की अवधि में अपने घर या किसी सार्वजनिक स्थान पर प्रात: से सायं 6:00 बजे तक सामूहिक जप साधना कराएँ। इसमें पुरानों के साथ नए साधकों को भी भागीदार बनाने का प्रयास करें। जप का समापन छोटे- से दीपयज्ञ से हो। उसमें इन सामूहिक अनुष्ठान के उद्देश्य और उसकी उपयोगिता की जानकारी उपस्थित जनसमुदाय को दी जाए। इस प्रकार 40 दिन में 24000 ऐसे सामूहिक अखंड जप एवं दीपयज्ञ के कार्यक्रम भी संपन्न हो जाएंगे। पूर्णाहुति :- इस अनुष्ठान की पूणार्हुति एक साथ फाल्गुन पूर्णिमा के दिन प्रात: 9:00 से 11:00 के बीच की जानी है। साधकगण शक्तिपीठों, प्रज्ञापीठों या किन्हीं सार्वजनिक स्थानों पर इसकी व्यवस्था बना सकते हैं। कुण्डों की संख्या साधकों की संख्या के अनुसार निश्चित की जा सकती है। कम से कम 108 आहुतियों का हवन अवश्य किया जाए। प्रदर्शन के लिए निरर्थक अपव्यय न किया जाए, किंतु यज्ञ के लिए आवश्यक व्यवस्थाएँ प्रामाणिक ढंग से बनाई जाएँ। पूणार्हुति के बाद सामूहिक भोजन व्यवस्था भी अमृताशन जैसे सात्विक भोज्य पदार्थों से की जा सकती है। उसके साथ कुछ कन्याओं को भोजन कराने तथा ब्रह्मभोज साहित्य वितरित करने की व्यवस्था भी होनी चाहिए। अनुयाज के रूप में वृक्षारोपण, जल संरक्षण जैसे रचनात्मक कार्यों के लक्ष्य निर्धारित किए जा सकते हैं। विश्वास किया जाता है कि साधकों का यह 40 दिवसीय संयुक्त पुरुषार्थ नवसृजन के मार्ग के व्यवधानों को दूर करने और उसकी सहयोगी प्रवृत्तियों को बल देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकेगा।


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होली पर्व के क्रम में नवजागरण के कुछ प्रेरक प्रयोग करें

सहज क्रम होली एक ऐसा पर्व है, जिसमें वसन्त की पावन मस्ती मानो जन-जन के अन्दर भर जाती है। उसका ऐसा प्रवाह उमड़ता है जिसमें छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, अवर्ण-सवर्ण सभी भेद बह जाते हैं। मैत्री भाव का, समता का सुन्दर माहौल.....

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चालीस दिवसीय साधना अनुष्ठान की यह साधना साधकों को अपने घर पर रह कर ही संपन्न करनी है । इस के लिए शांतिकुंज  नहीं आना होगा । पंजीयन करने का उद्देश्य सभी साधकों की सूचना एकत्र करना एवं शांतिकुंज स्तर.....