Published on 2020-01-28
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उसे उभारने और सुनियोजित करने के लिए की जाय प्रचण्ड जीवन साधना मन्थन- चिन्तन पाक्षिक (दिनांक 1 जनवरी 2020) के अंक में वासन्ती प्रवाह के परिपाक की 40 दिन की अवधि में सवा लाख गायत्री जप सहित सामूहिक साधना अनुष्ठान की अपील को परिजनों ने बड़े उत्साह के साथ स्वीकार किया है। सभी क्षेत्रों से व्यक्तिगत एवं सामूहिक पंजीयन का क्रम चल रहा है। आशा की जाती है कि साधकों की संख्या निर्धारित लक्ष्य से कुछ अधिक ही हो जायेगी। परिजन अपनी मन:स्थिति तथा परिस्थितियों के बीच सन्तुलन बनाने के लिए जिज्ञासाएँ भी व्यक्त कर रहे हैं, जिनके उत्तर यथाशीघ्र उन तक पहुँचाये भी जा रहे हैं। जैसे :प्रश्न :- जो व्यक्ति अधिक कार्यव्यस्त हैं, वे क्या मिलजुल कर जप साधना पूरी कर सकते हैं? उत्तर :- हाँ, ऐसा किया जा सकता है। परिवार के सदस्य या मित्रगण, नर- नारी मिलकर जप पूरा कर सकते हैं। लेकिन उन सबको मिलाकर अनुष्ठान की एक इकाई ही माना जाएगा। साथ ही जप के साथ ‘तप’ के नियम उन सभी को विवेकपूर्वक अपनाने होंगे।

प्रश्न :- अनष्ुठान के दौरान आवश्यक यात्रा या कोई और अड़चन आन पर क्या किया जाय? महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान क्या करना चाहिए? उत्तर :- कोई व्यवधान आने पर नियमित जप न हो पाने पर भी मानसिक जप करने का क्रम बनाये रखें। उस मानसिक जप से अन्त:करण की वृत्तियों का बिखराव नहीं होगा, उनके शोधन का क्रम अवचेतन मन में चलता रहेगा। नियमित जप जो छूटा है, उसकी पूर्ति उस व्यवधान के पहले या बाद में जप संख्या बढ़ाकर कर लेनी चाहिए।
प्रश्न :- यदि पूर्णाहुति के समय तक जप पूरा न हो सके तो क्या करें?
उत्तर :- ऐसी स्थिति में दो विकल्प बनते हैं। एक यह कि अपनी पूर्णाहुति कुछ दिन आगे बढ़ा दी जाय। पूर्णाहुति तक तप के नियम निभाते रहें। दूसरा यह कि गुरुसत्ता के भण्डार से शेष जप उधार लेकर पूर्णाहुति सबके साथ ही कर ली जाय। पूर्णाहुति के समय ही यह संकल्प ले लिया जाय कि उधार लिये गये जप को निर्धारित अवधि में वापस कर दिया जाएगा। प्रायश्चित्त स्वरूप 10% जप अधिक किया जाय। जैसे 100 माला जप उधार लिया है तो निर्धारित अवधि में 110 माला जप पूरा करके गुरु कोष में जमा करने का संकल्प करें।

ध्यान रहे :- अनुष्ठान में जप साधना भी जरूरी है, लेकिन उसके साथ तप साधना होना और भी अधिक जरूरी है। यन्त्रवत जप पूरा कर देने से कोई विशेष लाभ नहीं मिलता। उसके साथ आत्मपरिष्कर और आत्मनिर्माण, आत्मविकास की समुचित तप साधनाएँ भी प्रभावी ढंग से चलाई जानी चाहिए। पू. गुरुदेव ने अपनी जीवनी ‘हमारी वसीयत और विरासत’ में स्पष्ट लिखा है कि उनके अनुष्ठान की सफलता में प्रत्यक्ष जप के साथ अदृष्य रूप से चलने वाली प्रखर जीवन साधना का विशेष महत्त्व रहा है। आत्मोन्नयन की जीवन साधना का समावेश न किया जाय तो कर्मकाण्ड का महत्त्व निष्प्राण कलेवर जैसा ही रह जाता है। यदि कोई चित्र बनाने के लिए कागज, तूलिका, रंग आदि तो बहुत अच्छे हों, किन्तु बनाने वाले का न तो हाथ सधा हो और न श्रेष्ठ कल्पना शक्ति हो तो चित्रों में प्रभाव कैसे आएगा? इसीलिए जप साधना के साथ अनुष्ठान के उद्देश्य के अनुरूप अपनी शक्ति और कुशलता विकसित करने वाली जीवन साधना भी अनिवार्य रूप से की जानी चाहिए। विवेकपूर्वक कदम बढ़ें इस सामूहिक अनुष्ठान के जो उद्देश्य निर्धारित हैं, उन्हें केवल कर्मकाण्ड वाले संकल्प में दुहरा देने से बात नहीं बनेगी। उन्हें आन्तरिक संकल्प, अर्थात् उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपनी पूरी सामर्थ्य झोंक देने के जज़्बे का रूप देना जरूरी होता है। इस दृष्टि से निर्धारित (1 जनवरी के अंक में घोषित) उद्देश्यों पर एक समीक्षात्मक दृष्टि डालते हैं

:युग परिवर्तन चक्र को अधिक प्रभावी बनाना :- इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए युग परिवर्तन के मार्ग में बाधक प्रवृत्तियों एवं परम्पराओं को दूर करना और उसमें सहयोगी सत्प्रवृत्तियों, सत्परम्पराओं की स्थापना करना बहुत जरूरी है। केवल सदेच्छा करने भर से बात सधती नहीं है। उन्हें सुनिश्चित संकल्प का रूप देना जरूरी होता है। अर्थात् इतने समय में, इतने क्षेत्र में इतना प्रभाव तो पैदा करना ही है। प्रारम्भ अपने प्रभाव क्षेत्र से करें। अपने अन्दर जिन- जिन हीन प्रवृत्तियों को दूर करना जरूरी है, उनमें से एक- दो को पूर्ण रूप से हटाने या आंशिक रूप से कम करने के संकल्प को चरितार्थ करने की तप साधना तो की ही जा सकती है। अपने अन्दर जिन शुभ प्रवृत्तियों और आदतों को विकसित करना है, उनमें से कुछ को तप साधना का अंग बनाया जा सकता है। जब अपने प्रभाव क्षेत्र में ही सफलता नहीं मिलेगी तो व्यापक क्षेत्र में सफलता की आशा कैसे की जा सकती है? लेकिन यदि हजारों व्यक्ति अपने प्रभाव क्षेत्र में परिवर्तन चक्र तीव्रतर कर सकते हैं तो उसका व्यापक प्रभाव जरूर दिखने लगेगा। उससे खरबूजे को देखकर खरबूजे का रंग बदलने वाली कहावत चरितार्थ होने लगेगी। इसलिए इस सामूहिक अनुष्ठान के भागीदार प्रत्येक साधक को युग परिवर्तन चक्र को तीव्रतर करने की तप साधना अवश्य करनी चाहिए।

युगशिल्पियों को अधिक प्रामाणिक बनाना :- समाज में सभी समझदार व्यक्ति वाञ्छित परिवर्तन चाहते हैं, उसमें स्वयं भी शामिल होना चाहते हैं। लेकिन किसी का अन्धानुकरण करके ठगे जाना पसन्द नहीं करते। सही परिवर्तन की वकालत करने वाले उपदेश विभिन्न रूपों में खूब मिलते हैं। लेकिन जब उनके आचरण को उनके उपदेशों- सुझावों की कसौटी पर कसा जाता है तो निराशा ही हाथ लगती है। स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न मन में उभरता है कि यदि ये सिद्धान्त इतने लाभकारी हैं तो ये स्वयं उनका लाभ क्यों नहीं उठाते? पूज्य गुरुदेव इस सन्दर्भ में एक उदाहरण दिया करते थे। कहते थे कि मान लो किसी ने शुद्ध देशी घी की दुकान खोल दी। विज्ञापनों में देशी घी के खूब फायदे गिनाये गये। लोग उनसे प्रभावित होकर घी खरीदने भी लगे। लेकिन जब उनकी स्वयं की रसोई का जायजा लिया गया तो पता चला कि वहाँ उनकी दुकान का घी इस्तेमाल नहीं होता। वे अपने लिए कहीं और से घी लाते हैं। तब विज्ञापन के हजार वायदों के ऊपर यह तथ्य भारी पड़ जाएगा कि वे स्वयं उसे क्यों नहीं वापरते? कोई न कोई हेराफेरी जरूर है। युगशिल्पियों के सामने भी यही चुनौती खड़ी है। वे लोकमंगल के लिए जिस जीवन शैली को जरूरी मानते हैं, वह उनके जीवन में भी होनी चाहिए। दूध का जला छाछ भी फूँकना चाहता है। लोग स्वयं उनके जीवन में सादा जीवन, उच्च विचार, श्रेष्ठ आचार के प्रमाण जाँचना चाहेंगे। इस दृष्टि से हमारे अपने और अपने प्रभाव क्षेत्र के व्यक्तियों की प्रामाणिकता इस अनुष्ठान काल में बढ़े तो ‘हम बदलेंगे, युग बदलेगा’ का नारा जीवन्त होने लगेगा।

आसुरी आतंकवादी शक्तियों को निरस्त करना :- आसुरी शक्तियाँ विवेकपूर्ण परामर्श या अनुनय- विनय से प्रभावित नहीं होतीं। मच्छर, खटमल आदि उपदेश देने से लोगों का रक्त चूसना नहीं छोड़ते। उनके लिए तो विवेकपूर्वक साहसिक प्रतिरोध ही करने पड़ते हैं। उसके लिए युग सैनिकों को अपने अन्दर पर्याप्त साहस, कौशल और बल जगाना होगा। इसके लिए अपने ही अन्दर छिपे आन्तरिक शत्रुओं अहंता, संकीर्णता, लोलुपता, उन्मत्तता जैसी आतंकवादी प्रवृत्तियों को पहचानने, स्वीकार करने, परास्त करने योग्य सद्विवेक एवं सत्साहस को विकसित करना पड़ेगा। फिर अपने परिवार और छोटी सामाजिक इकाईयों में घुस पड़ी अविवेकपूर्ण घातक कुरीतियों से लोहा लेने की क्षमता अर्जित करनी होगी। यह क्रम बन जाने पर हर क्षेत्र में अनीति निवारक साहसिक टोलियाँ उभर आयेंगी। उनके संयुक्त प्रभाव से आतंकवादी शक्तियाँ हतोत्साहित होने लगेंगी। इसमें कोई शक नहीं कि सामूहिक अनुष्ठान से सूक्ष्म जगत में इस प्रकार की असुरता निरोधक शक्तियाँ जागेंगी। लेकिन इन्हें प्रत्यक्ष जगत में अवतरित होने के लिए माध्यम बनने वाले जीवन्त साधक भी तो चाहिए। इसलिए जप साधना में इस प्रकार के भाव उभारने के साथ- साथ तप साधना से सद्शक्तियों के माध्यम- वाहन बनने योग्य आधार गढ़ने पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। नवसृजन की गतिविधियों को शक्ति एवं संरक्षण प्रदान करना इसके अन्तर्गत भी आसुरी प्रवृत्तियों को निरस्त करने जैसी तैयारी करनी होगी। राम एवं कृष्ण के अवतारों की तरह ही प्रज्ञावतार को भी दुष्टता के विनाश के साथ ही साधुता को शक्ति एवं संरक्षण प्रदान करने की रीति- नीति दोहरानी है। इसके लिए अपने विवेक, साहस, कौशल एवं बल को इतना समर्थ बनाना होगा कि हर शुभ कार्य को समर्थ संरक्षण, प्रोत्साहन दिया जा सके। व्यक्तिवाद एवं वर्गभेद के अहं से उपर उठकर आसपास के क्षेत्र में सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन के अनेक प्रकल्प खड़े किये जा सकें। सज्जनों के संगठन की प्रवृत्ति एवं क्षमता बढ़ाना उक्त सभी सूत्रों को व्यापक सफलता प्रदान करने के लिए सद्भाव, सद्विचार सम्पन्नों को सत्पुरूषार्थ करने के लिए संगठित करने की अनिवार्य आवश्यकता है। कलियुग में संघशक्ति को सबसे प्रभावपूर्ण माना गया है। देखा जाय तो समाज में दुष्टों की अपेक्षा भले मानस अधिक संख्या में हैं। किन्तु संगठित होने की प्रवृत्ति न होने के कारण वे दीन- हीन स्थिति में रहते तथा थोड़े से संगठित दुष्टों से परास्त होते देखे जाते हैं। भले मानसों में संगठित होने की प्रवृत्ति जागे और वे यह क्षमता विकसित कर लें तो दुष्टता के प्रयोग करने की किसी की हिम्मत ही नहीं पड़े। यदि कोई दु:साहस करे तो वे अपने को समर्थ प्रतिरोधियों से घिरा अनुभव करके उस मार्ग से विरत हो जायें। इस प्रकार अपने निर्धारित उद्देश्यों को पूरा करने के लिए भावभरी जप साधना के साथ ही विवेकपूर्ण, साहसिक तप साधना का क्रम अपनाया जाये तो यह सामूहिक अनुष्ठान युग परिवर्तन चक्र को प्रभावी बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर सिद्ध हो सकता है। साधना समग्र- समर्थ बने इस सामूहिक अनुष्ठान को समग्रता के साथ किया जाए तो उसमें सामर्थ्य निसंदेह बढ़ जायेगी। इसीलिए युगऋषि ने जप- तप साधना के साथ ही स्वाध्याय, संयम, सेवा, आराधना के सूत्र भी जोड़े हैं। सबका सम्मिलित रूप ही अनुष्ठानों को समग्रता और समर्थता प्रदान करता है। इसलिए अपने अनुष्ठान में भाव शुद्धि, स्वाध्याय, चारों संयमों के साथ सेवा- आराधना के सूत्र भी जोड़े गये हैं।
ध्यान रहे :- उक्त सभी सूत्रों के सैद्धांतिक स्वरूप एक जैसे होने पर भी उनके व्यावहारिक स्वरूपों में भिन्नता रहेगी। इसके लिए हर साधकसाधिका को आत्म- समीक्षा, आत्म- शोधन, आत्मनिर्माण एवं आत्म- विकास के क्रम स्व- विवेक के साथ निर्धारित करने होंगे और उन पर पूरे मन से अमल करना होगा। प्रत्येक साधक- साधिका गुरुसत्ता एवं परमात्मसत्ता से सच्चे मन से निवेदन करे कि हे प्रभु! हम आपके हैं, हम आपके निर्देशों पर चलते हुए, आपके सच्चे अनुयायी, अंग- अवयव बनना चाहते हैं। आप हमें अपना आशीर्वाद दें कि हमें- • आत्म समीक्षा सही ढंग से करने योग्य सद्विवेक मिले। • आत्मशोधन भली प्रकार करने योग्य सत्साहस प्राप्त हो। • आत्मनिर्माण प्रामाणिक ढंग से करने योग्य सद्कौशल, सत्पुरुषार्थ हममें जागे। • आत्मविकास, आपके विराट रूप के साथ एकात्मता अनुभव करने योग्य आत्मबोध की हमारी क्षमता बढ़े। हे प्रभो! इस वसन्त काल में इस दिव्य साधना और आपके स्नेहपूर्ण अनुग्रह के नाते हमारे अन्दर ऐसी वासंती ऊर्जा प्रवाहित हो कि- हमारी संकीर्णता रूपी ठिठुरन छूटे और रूढ़िवादी मान्यताएँ पुराने पत्तों की तरह झड़ जायें। अन्दर से ऐसी सृजनशील उमंग उभरे कि सत्संकल्प और सत्पुुरुषार्थ की मनोहारी कोपलें फूट पड़ें। अन्दर का उल्लास सुरम्य पुष्पों की तरह प्रकट हो और उनकी ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया’ रूपी सद्भावना की सुगंधि वातावरण में भर जाये। यह वासंती पुरुषार्थ फलित होकर नये पुष्ट संकल्प रूपी बीजों के रूप में पक कर बिखरें और धरा पर स्वर्गीय वातावरण का निर्माण हो। इस प्रकार साधना को समग्र और समर्थ रूप देने के प्रयास निर्धारित उद्देश्यों की सिद्धि के सबल आधार तो बनेंगे ही, साथ ही साधकों की साधना का कद, स्तर बढ़ जाएगा। पूज्य गुरुदेव ने ‘अपने अंगअवयवों से’ नामक पत्रक के अन्त में यही भावना व्यक्ति की है कि हमारे कार्य का स्तर तो बढ़ता ही रहा है, उन्हें कुशलता से सम्पन्न करने के लिए युग साधकों का कद- स्तर भी बढ़ना चाहिए, ऐसी आशाअपेक्षा के साथ योजना आगे बढ़ाई जा रही है। यदि हम सब अपनी साधना का स्तर उनकी आज्ञा के अनुरूप बढ़ा लें तो आत्मकल्याण और गुरु- अनुग्रह पाने के दोनों ही उद्देश्य बेहतर ढंग से सधेंगे।


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