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माँ सरस्वती से सद्ज्ञान, शिव से सच्चरित्रता लेकर सफल होलिकोत्सव मनायें

वसन्तोत्सव ४० दिन का होता है। माघ शुक्ल पंचमी, वसन्त पंचमी से उसका शुभारंभ होता है और फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा ‘होलिकोत्सव’ पर उसका समापन किया जाता है। इन दोनों पर्वों के बीच में महाशिवरात्रि पर्व पड़ता है। ऋषियों- मनीषियों ने इसे ‘सत्यं, शिवं, सुन्दरम् के साक्षात्कार का ४० दिवसीय अनुष्ठान जैसा स्वरूप देने का प्रयास किया है। इसका मर्म समझकर साधना की जाय तो जीवन में सत्यं, शिवं, सुन्दरम् के संतुलित समन्वय का आभास करना और उसका समुचित लाभ उठाना सभी साधकों के लिए संभव है।

वसंत ऋतु समृद्धि और सौन्दर्य के सृजन का एक अद्भुत प्रवाह लेकर आती है। समृद्धि नयी फसलों के रूप में और सुन्दरता मनोरम दृश्यों के रूप में उभरती है। जीवन की पूर्णता के लिए दोनों ही जरूरी हैं। इन्हें पाना सौभाग्य माना जाता है। किन्तु इसका एक दूसरा पक्ष भी है। समृद्धि परोपकार और पोषण के लिए होती है, किन्तु उसे पाने वालों को स्वार्थी, अहंकारी, उन्मत्त भी होते देखा गया है। सौन्दर्य प्रभु की दिव्यता का बोध कराने के लिए है, किन्तु लोग उसके कारण मोह, काम, क्रोध में भी फँसने लगते हैं।
अविवेकजन्य अशिव, अश्लीलता को जलायें, समता-ममतामय यज्ञीय जीवन बनायें
सत्यं, शिवं, सुन्दरम्

ऋषियों- मनीषियों ने इस तथ्य को समझा और एेसी योजना बनाई कि समृद्धि और सौन्दर्य का प्रभाव अहितकारी, अशिव न होकर हितकारी- कल्याणकारी ही हो। समृद्धि और सौन्दर्य उभारने वाले वासन्ती प्रवाह को तीन साधनापरक चरणों में सँजोया गया। सुन्दरम् को सत्यं और शिवं से जोड़कर उसे शुभ रूप देने का साधनात्मक अनुशासन बनाया गया।

पहला- वसंत पंचमी : ज्ञान की देवी सरस्वती से सद्ज्ञान लेकर सत्- असत् का विवेक जगाया जाय। हंस की तरह असत् को छोड़कर सत् के वरण की साधना की जाय।

दूसरा- शिवरात्रि पर शिवत्व की साधना की जाय, ताकि बढ़ती समृद्धि और सुन्दरता के अशिव उपयोग की कामना ही न उभर सके। दोनों के लोकहितकारी उपयोग की दिव्य क्षमता विकसित हो जाये।

तीसरा होली पर्व : फसलों के रूप में आयी समृद्धि का उपयोग यज्ञीय भाव से किया जाय। अन्तःकरण में ममता, स्नेह तथा व्यवहार में समता- सहकार से जीवन को सुन्दर बनाया जाय। प्रकृति के इस स्वाभाविक प्रभाव से सत्यं, शिवम्, सुन्दरम् के अनुशासन में ढलकर उसके श्रेष्ठतम परिणाम प्राप्त किये जायें।

आशय स्पष्ट है
यदि उभरने वाली समृद्धि और सुन्दरता को सत्य और शिव के सम्पुट में न रखा जाय तो उसका विकृत उपयोग होने लगता है।
• यदि प्राप्त सम्पत्ति और सामर्थ्य को यजन (यज्ञीय पोषण कर्म) में न लगाया जाय तो वह व्यसन (अनगढ़- हानिकारक) कर्मों में लग ही जाती है।
• सौन्दर्य बोध को यदि योगोन्मुख न बनाया जाय तो वह भोगोन्मुख बन ही जाता है।
• इसीलिए वसन्त साधना को सत्यं- शिवं की साधना को अनुप्राणित करते हुए सुन्दरम की साधना को सार्थक- कल्याणकारी बनाने का विधि- विधान बनाया गया। इस तथ्य को समझने और अपनाने में शिथिलता बरतने के कारण होली पर्व का रूप विकृत होता चला जा रहा है।

जैसा कि पहले उल्लेख किया जा चुका है, होली पर्व वसंत से उपजी समृद्धि के उल्लास को समता- आत्मीयता के विस्तार की दिशा में लगाने का पर्व है; लेकिन उसका स्वरूप विकृत हो रहा है। यज्ञीय परम्परा भुला दी गयी, तो चोरी करके होली रचने का स्वांग चल पड़ा। उल्लास को आत्मीयता- समता की दिशा न दे पाने के कारण वह हुल्लड़ और अश्लीलता की ओर मुड़ गया।
उसे ठीक करना है। यह तभी सम्भव होगा जब सद्ज्ञान की साधना से जीवन के सत्य को समझने वाले साधक आगे आयें। वे जन- जन को शिवत्व- कल्याणकारी मार्ग अपनाने की प्रेरणा दें। सृजन सैनिकों को, युगशिल्पियों को कुछ इसी तरह की भूमिका निभानी है।

होली पर्व को ४० दिवसीय वसन्त साधना की पूर्णाहुति का रूप दिया जा सकता है। वसन्त पंचमी पर सद्ज्ञान की साधना की गयी। इसे विचार क्रान्ति का विस्तार भी कह सकते हैं। शिवरात्रि पर चरित्र में शिवत्व के समावेश की साधना अपनायी जाय। इसे नैतिक क्रान्ति का विस्तार कह सकते हैं। तब होली पर सामाजिक सद्प्रवृत्तियों के संचार का उद्देश्य पूरा किया जा सकता है। इसे सामाजिक क्रान्ति का एक सार्थक चरण कह सकते हैं। युग निर्माण अभियान संकल्पपूर्वक इस दिशा में काम कर रहा है, इसलिए इस पर्व शृंखला के प्रभाव का सदुपयोग हमें पूरी तत्परता के साथ करना चाहिए।

अभी की बात
वसंत पंचमी का पर्व अपने परिवार ने बहुत उत्साह से मनाया। सद्ज्ञान की, सद्विवेक की साधना के लिए जन- जन को प्रेरित किया गया। जैसा शानदार शुभारंभ किया गया है, वैसा ही प्रभावशाली समापन करने की रूपरेखा बनायी जानी चाहिए। शिवरात्रि पर्व पर शिवत्व की साधना के संकल्प कराते हुए होली पर्व के लिए रूपरेखा बनायी और प्रयास किये जाने चाहिए।
होली पर्व को सामूहिक यज्ञीय पर्व के रूप में मनाने के प्रयास तो चल ही रहे हैं, इसके साथ इसे अश्लीलता निवारण दिवस का रूप भी दिए जाने का निर्णय किया गया है। इसे सफल बनाना है तो इसके लिए काफी समय पहले से प्रयास करने होंगे। यज्ञ की सफलता के लिए जैसे प्रयाज किया जाता है, वैसे ही होली पर्व के काफी पहले से ही वातावरण बनाना होगा।
होली को यज्ञीय समारोह और स्नेह मिलन का रूप देने के प्रयास पहले की तरह ही किये जायें, साथ ही अश्लीलता निवारण के लिए भी प्रभावी प्रयोग करने की व्यवस्था बनायी जानी चाहिए।

अश्लील आचरण के मूल में अश्लील विचार होते हैं। यह अश्लील साहित्य पढ़ने, अश्लील चित्रों, चलचित्रों को देखने तथा उस तरह की चर्चाओं में रुचि लेने से पनपते हैं। अश्लील आचरण रोकने के लिए अश्लीलता के इन स्रोतों को बन्द करने के प्रयास करने जरूरी हैं।

अश्लीलता का जो नग्न नृत्य अपने समाज में देख रहे हैं, उसके पीछे उक्त अनगढ़ स्रोत ही होते हैं। इसने लाखों व्यक्तियों के जीवन को कुमार्ग में लगाया है। यह एक ऐसा विष है जिसका सीधा प्रभाव मस्तिष्क पर पड़ता है और उसे अपने काबू में करके अपनी इच्छानुसार मोड़ लेता है। इसने मनुष्य को केवल शरीर- पूजा तक सीमित कर दिया है। यह इसी के लिए मरना और जीना सिखाता है। शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा को निर्बल करने वाला यह विषवृक्ष एटम बम से अधिक नाश करने वाला है।

पूर्व तैयारी के सूत्र
• इस सम्बन्ध में कुछ पत्रक छपवाये जायें। उसमें अश्लीलता के घातक परिणाम समझाये जायें तथा होली को अश्लीलता निवारण दिवस के रूप में मनाने, उसमें सहयोग करने की अपील की जाय।
• शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थियों- शिक्षकों को इसमें भागीदारी के लिए प्रेरित किया जाए। धार्मिक- सामाजिक संगठनों को भी इसके लिए सहमत किया जाय।
• विद्यालयों, महाविद्यालयों, सामाजिक संस्थाओं, युवा संगठनों में सार्वजनिक स्थानों पर भाषण, चित्रकला, निबंध, काव्य, जैसी अभिव्यक्तिपरक प्रतियोगिताएँ अधिक से अधिक मात्रा में आयोजित की जायें। इन समस्याओं के समाधान के सुझाव माँगे जायें।

इन प्रतियोगिताओं से श्रोता- दर्शक तो प्रभावित होंगे ही, सबसे ज्यादा प्रभावित वे विद्यार्थी या युवा होंगे जो प्रतियोगिता में भाग लेंगे। उन्हें विषय की तैयारी के क्रम में उस पर गहराई से चिंतन करने का अवसर मिलेगा। यदि वे स्वयं व्यसन- अश्लीलता से प्रभावित हैं तो उन्हें आत्ममंथन का अवसर मिलेगा, आत्मबल बढ़ेगा। जो अभी इनसे बचे हुए हैं, उन्हें समय रहते सावधान हो जाने की प्रेरणा मिलेगी।

अभी पर्याप्त समय है, इसलिए बड़ी संख्या में ऐसी प्रतियोगिताएँ आयोजित की जा सकती हैं। यह युवा क्रांति वर्ष का एक महत्त्वपूर्ण अभियान सिद्ध हो सकता है।
इस प्रकार विचार मंथन परक कार्यक्रमों के माध्यम से अश्लीलता निवारण के पक्ष में जो वातावरण बने उसको स्थिरता देने के लिए नयी पीढ़ी से जवानी संकल्प बुलवाने और लिखित संकल्प पत्र भरवाने का क्रम भी अपनाया जा सकता है।

संकल्पों के प्रस्तावित सूत्र
• मैं मानता हूँ कि आजकल के अश्लील चित्र समाज में दूषित भावनाओं को जाग्रत् करते हैं, सन्मार्ग से हटाकर कुमार्ग की ओर ले जाते हैं, इसीलिए मैं स्वयं उनको नहीं देखूँगा और अपने सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों को भी उनसे दूर रहने की प्रेरणा दूँगा।
• केवल कल्पना पर आधारित, काम विचारों की वृद्धि करने वाला साहित्य नहीं पढूँगा। जिन पत्रिकाओं में ऐसी विचार सामग्री आती है, उनका अध्ययन स्वयं बन्द करके दूसरों को भी वैसी ही प्रेरणा दूँगा।
• जिन फिल्मी गीतों में गंदे विचार होते हैं, उनको मैं न गाऊँगा और न सुनूँगा।
मैं अपने घर में कोई अश्लील चित्र न टाँगूँगा। अपने मुहल्ले में जिन घरों में टँगे होंगे, उनको उतरवाकर महापुरुषों के चित्र व अन्य प्रेरणादायक वाक्य टँगवाऊँगा।
• अश्लील चित्रों के प्रति घृणा उत्पन्न करने के लिए, उनके प्रति असम्मान के भाव प्रकट करने के लिए होली के अवसर पर जुलूस निकाल कर सामूहिक रूप से चित्रों की होली जलवाने का प्रयत्न करूँगा।
• जिन से संकल्प बुलवाये जायें या संकल्प पत्र भरवाये जायें, उन्हें होली पर्व के समारोह में भाग लेने के लिए भी प्रेरित किया जाय।

पर्व प्रकरण
जिस दिन होली जलायी जाती है, उस दिन स्थानीय सुविधा के अनुसार दोपहर बाद या शाम को एक रैली निकाली जाय। उसमें अश्लीलता की राक्षसी का चित्र रखा जाय, जो बालक- बालिकाओं को निचोड़ रही है। अश्लीलता विरोधी बैनर, वाक्य रखे जायें।

अश्लीलता का नाश हो, अनैतिकता का नाश हो।
गंदे चित्र लगाओ मत, नारी को लजाओं मत।
जैसे नारे लगाये जायें।

घर- घर सम्पर्क करके गन्दे चित्रों और साहित्य को निकाल लाया जाय। उन्हें रात्रि में होलिका दहन के साथ घोषणापूर्वक जलाया जाय। अगले दिन सवेरे होली के समारोह में शामिल होने का आमंत्रण सभी को दिया जाय।

अनुशासित उल्लास
होलिका दहन के अगले दिन सवेरे से ही होली के उल्लास की अभिव्यक्ति का क्रम चल पड़ता है। इसके लिए ऐसे प्रयास किये जायें, जिनसे हर्षोल्लास तो प्रकट हो, किन्तु कहीं भी अश्लीलता, भद्रता, कटुता को स्थान न मिले। रंग गुलाल की छूट रहे, किन्तु कालौच, कीचड़ जैसी अप्रिय वस्तुओं का उपयोग न किया जाय।

• होली गाने वाली टोलियाँ लोक- परंपरागत, प्रेरक गीत गायें, अश्लील प्रकरणों का परहेज करें।
• शाम को हास्य कवि सम्मेलन या हास्य कविता सम्मेलन जैसे आयोजन तथा प्रेरक सांस्कृतिक कार्यक्रमों की व्यवस्था भी बनायी जा सकती है। इनमें भी अश्लीलता विरोधी कार्यक्रम जोड़े जा सकते हैं।
प्रबुद्ध परिजनों, युवा मण्डलों, दिया की इकाइयों के परस्पर सहयोग से होली पर्व के साथ जुड़ी विसंगतियों को दूर करके उसे एक शुद्ध सामाजिक समतापरक उल्लासभरे समारोह का स्वरूप दिया जाना कठिन नहीं है। ध्यान रहे अधिकांश व्यक्ति होली के विकृतरूप से ऊब चुके हैं, उसे श्रेष्ठ रूप देना चाहते हैं। एक सदाशयतापूर्ण सुनियोजित पहल के साथ वे सहज ही जुड़ सकते हैं। उनके सहयोग- समर्थन से इस पुण्य प्रक्रिया को व्यापक सफलता सहज ही मिल सकती है।
 






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