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संसार में समझदार और वृद्ध पुरुषों की कमी नहीं है। उनके अनुभव और ज्ञान से नई पीढ़ी का भारी मार्गदर्शन होता है। इसीलिए दनकी महत्ता को सदा से अक्षुण्ण रखा जाता है। गुरुजनों की सेवा, शिक्षा और आज्ञा का समुचित ध्यान रखना कर्तव्य माना गया है। वैसा ही हमें करना भी चाहिए। उनके शारीरिक सुख और सुविधाओं का तो पूरा- पूरा ध्यान रखा ही जाना चाहिए और यदि उनका कोई सुझाव या आदेश व्यावहारिक न हो, तो कम से कम अपमान के शब्दों में प्रत्युत्तर तो नहीं ही देना चाहिए। ऐसे प्रसंगों पर चुप हो जाने से तात्कालिक कटुता उत्पन्न होने से रोकी जा सकती है। 
औचित्य और आज्ञा के धर्मसंकट में जो उचित है, जो धर्म है, जो कर्तव्य है, उसे ही प्रधानता दी जानी चाहिए। वृद्ध पुरुष बड़े हैं, पर धर्म- कर्तव्य उससे भी बड़ा है। बड़ों का आदेश पालन किया जाना चाहिए, पर विवेक की पुकार उससे भी पहले सुनी जानी चाहिए। व्योमोह यदि वृद्धों के कलेवर में प्रवेश करके बोले, तो उसे सुनने से पर्व औचित्य का ध्यान आवश्यक है, चाहे वह किसी के मुख से भी उच्चारित हुआ हो। 
आयुवृद्ध से ज्ञानवृद्ध बड़ा होता है। आयु का महत्त्व निश्चय ही बहुत है, पर विवेक से बढ़कर उसकी महत्तस स्वीकार नहीं की जा सकती। बड़ों की सभी बातें हम मानें, उनको सब प्रकार सुखी- सन्तुष्ट बनाने का प्रयत्न करें, पर जब वे अनैतिक, असंगत, अविवेकपूर्ण आदेश देने लगें, तो उनकी पूर्ति के लिए तत्परता दिखाना आवश्यक नहीं। वृद्धावस्था की प्रतिष्ठा ज्ञान, विवेक, धर्म और दूरदर्शिता के कारण ही होती है। यदि यह तत्व उनमें न रहें, तो वृद्ध पुरुषों और गुरुजन न रहकर बूढ़े आदमी मात्र रह जाते हैं। हमें वृद्ध पुरुषों और गुरुजनों परिपूर्ण अनुगमन करना चाहिए, पर यह जरूरी नहीं कि सफेद बालों के कारण विवेकहीन बूढ़े आदमी भी हमारे मार्गदर्शक बनें ही। 
यहाँ यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेनी चाहिए कि बड़ों की बात उचित न होने पर न मानना और बात है और बड़ों के प्रति उपेक्षा, अवज्ञा एवं असम्मान का स्वभाव बना लेना और बात है। बड़ों के मार्गदर्शन का लाभ न मिल सकता हो, तो भी उन्हें उचित सम्मान एवं सुविधाएँ देने में चूक नहीं करना चाहिए। बड़ों का मार्गदर्शन ही नहीं, उनका सद्भाव एवं आशीर्वाद भी बहुत महत्त्व रखता है। 
भारतीय संस्कृति में ‘आशीर्वाद’ प्राप्त कर लेना परम सौभाग्य और विजय का सूचक माना गया है। यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि अपने से बड़े- बुजुर्ग माता- पिता एवं गुरुजनों से आशीर्वाद मिलने से मनुष्य का मनोबल बढ़ता है और उससे एक प्रकार की शक्ति अनुभव की जाती है। इसलिए प्रत्येक मंगल कार्य, उत्सव, पर्व और किसी भी शुभ कार्य के आरम्भ में अपने से बड़ों का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह बड़ों के प्रति सम्मान करने और आत्मबल सम्पन्न होने का लक्षण है। जो ऐसा नहीं करता, उसे नीच प्रकृति का उच्छृंखल व्यक्ति माना जाता है। बाल्मीकि रामायण में बताया गया है— 
मातरं पितरं विप्रमाचार्यं चावमन्य ते। 
स पश्यति फलं तस्य प्रेतराज वशं गतः॥ 
अर्थात् जो तामा- पिता, ब्राह्मण और गुरुदेव का सम्मान नहीं करता, वह यमराज के वश में पड़कर पाप का फल भोगता है। 
किसी के प्रति सम्मान प्रकट करने या प्रणाम करने से मनुष्य छोटा नहीं हो जाता, वरन् इससे श्रेष्ठत्व की प्रतिष्ठा ही होती है और उस उच्च भावना का लाभ भी हमले बिना रहता नहीं। शुद्ध अन्तःकरण से किया हुआ नमन आन्तरिक शक्तियों को जगाता है, इसलिए श्रेष्ठ पुरुषों ने सदैव ही इस मर्यादा का पालन किया है। भगवान् राम और आचार्य रावण में पारस्परिक प्रतिद्वन्द्विता थी। राम- रावण की कुटिलता को जानते थे, किन्तु पाण्डित्य और श्रेष्ठता के प्रति उनके हृदय में श्रद्धा भावना थी। उसके वशीभूत होकर ही उन्होंने विपरीत परिस्थिति में भी इस नैतिक मर्यादा का पालन किया था। रामायण में लिखा है— 
अस कहि रथ रघुनाथ चलावा। 
विप्र चरण पंकज सिर नावा॥ 
‘इस प्रकार रणोद्यत राम ने अपना रथ आगे बढ़ाया और रावण के सम्मुख पहुँचकर उसके चरण- कमलों में अपना शीश झुकाया।’ 
सैद्धान्तिक मतभेद के बावजूद भी व्यावहारिक जीवन में बड़ों को सम्मान देने का उच्च आदर्श भारतीय संस्कृति की अपनी निजी विशेषता है। वह आत्मा ही बलवान हो ता है जो प्रभुसत्ता के समक्ष अपने आपको बिल्कुल लघु मानता है। तुलसी दास जी के शब्दों में ‘सियाराम मय सब जग जानी, करहुँ प्रणाम जोरि जुग पानी’ की भावना रखने वाला ही सच्चा कर्मयोगी होता है। 
अनावश्यक अभिमान मनुष्य को पतित बनाता है, इसका उदय न हो, इसलिए बड़ों के समक्ष हमेशा विनम्र होकर रहने की शिक्षा हमें दी गई है। महाभारत में अनेक ऐसे प्रसंग आते हैं जब विपक्षी पितामह भीष्म और द्रोणाचार्य के अर्जुन आदि पाण्डव चरण स्पर्श करते और उनका शुभाशीष प्राप्त करते हैं। शिष्य की निष्ठा से द्रवीभूत गुरु उनकी जय कामना करते हैं और वैसा होता भी है। यदि यह मान लें तो भी यह बात निर्विवाद सिद्ध होती है कि जो शक्ति अभिमान के वशीभूत न हो, वह श्रेष्ठ तो होगी ही और उस श्रेष्ठता से लाभान्वित होने का लाभ उन्हें अनायास मिला ही। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, हरिद्वार) 


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