Published on 2016-10-07

प्रसन्न रहना हो तो श्रेष्ठ साहित्य का करे नियमित स्वाध्याय  : 
हरिद्वार, ०७ अक्टूबर। 

अखिल विश्व गायत्री परिवार प्रमुख डॉ. प्रणव पण्ड्याजी ने कहा कि नवरात्रि साधकों के लिए आत्मिक ऊर्जा को उभारने का सुनहरा अवसर है। इन दिनों जप, तप के साथ श्रेष्ठ साहित्य का पठन- पाठन करने से साधकों का मनोबल ऊँचा होता है। वे शांतिकुंज के मुख्य सभागार में देश- विदेश से आश्विन नवरात्रि साधना करने आये साधकों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि अनुशासित होकर जप- तप करने से कई तरह की समस्याएँ स्वतः नष्ट हो जाती हैं। साधकों का जीवन श्रेष्ठतर दिशा की ओर अग्रसर होता है। उन्होंने कहा कि श्रद्धावान व स्वाध्यायी होना ही साधक ही पहचान है। स्वाध्याय के साथ तप भी आवश्यक है। तप अर्थात् इन्द्रिय संयम, विचार संयम, अर्थ संयम व  समय संयम, जो परमात्मा के चिंतन एवं उनमें विचरण के लिए आवश्यक है। 

देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ. प्रणव पण्ड्याजी ने कहा कि हमारे प्राचीन ऋषि- मुनियों के पास आज की तरह डिग्री तो नहीं थी, पर वे स्वाध्यायी व तपस्वी थे। परिणामतः उनका शिक्षण आज भी वेदों के रूप में विद्यमान है। वर्तमान युग में भी गायत्री परिवार के संस्थापक तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य जी की शिक्षा प्राइमरी की थी, पर वे दुनिया की समस्त समस्याओं के समाधानपरक ३२०० से अधिक पुस्तकों की रचना कीं, जो आज लाखों- करोड़ों नर- नारियों के जीवन को सकारात्मक दिशा दे रही हैं। 

इस अवसर पर शांतिकुंज के अंतेवासी कार्यकर्त्ता, देसंविवि परिवार, ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान परिवार के अलावा देश- विदेश से आये गायत्री साधक, विभिन्न प्रशिक्षण शिविर में प्रतिभागी उपस्थित थे। 

करेंगे चीन निर्मित वस्तुओं का बहिष्कार 

गायत्री परिवार प्रमुख डॉ. पण्ड्या ने कहा कि दशहरा एवं दीवाली का त्योहार आने वाला है। भारत की संप्रभुता को खण्डित करने में जुटे आतंकवादियों को पनाह देने वाले पड़ोसी देश के साथ सहयोगी की भूमिका निभा रहे चीन की नीतियों का विरोध करें। डॉ. पण्ड्याजी ने चीन से आयातीत वस्तुओं का बहिष्कार करने का मुखर आग्रह  किया। 

बालसंस्कार शालाएँ चलाने के लिए किया प्रेरित 

आज की युवापीढ़ी पाश्चात्य संस्कृति की ओर तेजी से बढ़ रही है, ऐसे में हर एक को भावी पीढ़ी को सुसंस्कारी बनाने एवं भारतीय संस्कृति के प्रति आकर्षित प्रेरित करने के लिए नियमित रूप से कुछ समय अवश्य निकालना चाहिए। इसी का एक प्रायोगिक स्वरूप हम बालसंस्कार शालाओं के रूप में भी चला सकते हैं।




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