प्रणव (ॐ - ओंकार) मंत्र का विशिष्ट प्रयोग भी करें :

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    युगऋषि ने गायत्री विद्या के व्यापक विस्तार के लिए स्वजनों को प्रेरित करते हुए कहा था, ‘‘गायत्री मंत्र के उपयोग में बहुतों को संकोच हो सकता है, इसलिए मैंने नयी गायत्री बना दी है। वह है उज्ज्वल भविष्य हेतु प्रार्थना ‘‘हे परमात्मा! हम सबको उज्जवल भविष्य के मार्ग पर बलपूर्वक चला दें।’’
    ऋषि के कहने का गूढ़ तात्पर्य यह समझा जा सकता है कि उन्होंने सूक्ष्म जगत में ऐसी व्यवस्था बना दी है कि इस प्रकार की भावभरी प्रार्थना का प्रभाव भी गायत्री मंत्र के बराबर ही होगा। इस दिशा में व्यापक प्रयोग तो नहीं किए जा सके, किन्तु जो किए गए वे सार्थक सिद्ध हुए।
इसी संदर्भ में उन्होंने कुछ साधकों से यह भी कहा था कि समय आने पर ओंकार मंत्र का भी व्यापक प्रयोग कराया जायेगा। अब इसके लिए युगऋषि की प्रेरणा उतरी है। उनकी इस प्रकार की प्रेरणा एक साथ कई साधकों में उतरती है, ताकि किसी व्यक्ति के अहंकार के विकार उसमें शामिल न हो सकें।
    यह प्रेरणा पहले क्यों नहीं दी गयी, इसका समाधान यह है कि युगऋषि जब सूक्ष्म जगत में उपयुक्त व्यवस्था बना देते हैं, तभी वे किसी काम को अपनाने के लिए निर्देश देते हैं। उन्होंने गायत्री मंत्र की दीक्षा देने के पहले भी उसके लिए सूक्ष्म जगत में व्यवस्था बनाई थी। तभी गायत्री की संक्षिप्त साधना का प्रभाव इतना व्यापक हो सका। सूक्ष्मीकरण साधना के बाद उन्होंने अपने ध्यान निर्देशों में कुछ परिवर्तन किए। षट्चक्रों के साथ उन्होंने सहस्त्रार को भी सबके लिए ध्यान में शामिल कर दिया। स्पष्ट है कि समुचित पूर्व व्यवस्था बनाकर ही वे किसी नये साधना क्रम को लागू करते रहे हैं।
     अब जब वे स्वयं सूक्ष्म से कारण में प्रवेश कर गये हैं, उनकी चेतना परब्रह्म के समकक्ष हो गयी है तो उन्होंने ब्रह्म के बोधक प्रणव- ओंकार के विशिष्ट प्रयोग को सर्वसुलभ बनाने की प्रेरणा उभार दी।
पहले स्पष्ट किया जा चुका है कि ॐ से तीन व्याहृतियाँ तथा उनसे गायत्री के तीन चरणों का विकास हुआ। ओंकार मंत्र जप प्रयोग को त्रिपदा गायत्री की तरह प्रभावी बनाने के लिए उसे त्रिवाचक बनाया गया है, वह है- ‘ॐओंकाऽऽऽर।’
    यह संक्षिप्त गायत्री महामंत्र की तरह प्रयुक्त होगा। गायत्री मंत्र जपने में संकोच करने वाले भी इसे सहज ही जप सकेंगे। साकार, निराकार, सगुण, निर्गुण सभी प्रकार के साधक इसका प्रयोग कर सकेंगे।
इसका जप लयबद्ध ढंग से उपांशु या मानसिक रूप में भी किया जा सकता है। इससे मनोविकारों को शान्त करने, दिव्य भावों को जगाने में सहायता मिलेगी। जप के साथ मंत्र के गुंजार को अपने भीतर गुंजरित अनुभव करने से अन्तःप्रकृति का शोधन तथा उन्नयन होगा। विराट वातावरण में इसके गुंजार को संचरित होता अनुभव करने से विराट प्रकृति में उज्जवल भविष्य के अनुरूप हलचलें बढ़ेंगी। गायत्री मंत्र से दीक्षित तथा अदीक्षित सभी इसका सार्थक उपयोग कर सकेंगे।


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