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भारत देश गुरुकुल परम्परा के प्रति समर्पित रहा है। यहाँ के वशिष्ठ,संदीपन धौम्य आदि के गुरुकुलों से राम, कृष्ण, सुदामा जैसे शिष्य निकले, जिन्होंने अपना जन्म तो सार्थक किया ही, साथ ही विश्व वसुधा को सद्ज्ञान का आलोक प्रदान किया और इतिहास को भी धन्य बनाया। भारत कभी जगद्गुरु हुआ करता था। इस देश को जगद्गुरु बनाने वाला एक ही तत्त्व है और उसका नाम है- शिक्षक, गुरु, आचार्य। 
      भारत में सदैव शिक्षक का सर्वाधिक सम्मान किया जाता रहा है और उसे यह सम्मान यूँ ही प्राप्त नहीं होता था। उसका एक ही लक्ष्य होता था- राष्ट्र निर्माण के लिए नई पीढ़ी को तैयार करना। एतदर्थ शिष्य के व्यक्तित्व के निर्माण के लिए आचार्यगण महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते थे। वे अपने शिष्यों को मात्र भौतिक जानकारी नहीं देते थे, बल्कि संपूर्ण जीवन दर्शन का अध्ययन कराते थे। ऐसे ही एक दार्शनिक शिक्षक ने गुरु की गरिमा को तब शीर्षस्थ तक पहुँचाया, जब वे भारत जैसे महान् राष्ट्र के राष्ट्रपति बने। उनका ही जन्म दिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। इन दार्शनिक शिक्षक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म ५ सितम्बर १८८८ को तमिलनाडु के चित्तूर जिले के तिरुतनी गाँव के एक सामान्य परिवार में हुआ था। अपनी अथक लगन, सतत साधना एवं अनवरत अध्ययन से उन्होंने अपने समस्त शिक्षकों को अत्यंत प्रभावित किया। विनम्रता अनुशासन और आज्ञापालन की त्रिवेणी ने उन्हें समस्त शिक्षार्थियों का प्रिय बना दिया। उनकी दार्शनिक श्रमता एवं विलक्षण विद्वता का परिचय उनके ग्रंथ वेदान्त के नीतिशास्त्र एवं भारतीय दर्शन का क्रमबद्ध इतिहास से मिला। वे आन्ध्र तथा बनारस विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे। उन्होंने रूस में भारत के राजदूत के महत्त्वपूर्ण उत्तरदायित्व का भी निर्वहन किया। उनकी सर्वतोमुखी प्रतिभा के प्रति नमित होकर इस महान् राष्ट्र ने सन् १९५४ में अपना सर्वोच्च सम्मान भारतरत्न उन्हें प्रदान कर अपनी कृतज्ञता व्यक्त की। वे सन् १९५२ में भारत के उपराष्ट्रपति पद पर अभिषिक्त हुए और सन् १९६२ में उन्होंने राष्ट्रपति पद सँभाला। 
      यह है एक महान् शिक्षक की प्रगति कथा जिसने अपनी निष्ठा और लगन के परिणाम स्वरूप इतनी ऊँचाई पार की और शिक्षक के पद को गौरवान्वित किया। स्वयं अपने आचरण एवं कर्त्तव्य से सिद्ध करने के बाद उन्होंने उद्घोष किया- शिक्षक राष्ट्र के निर्माता है। जब तक शिक्षक अपने इस गौरव को समझता रहा, तब तक राष्ट्र को अनेकानेक प्रतिभाएँ गढ़ कर देता रहा और जब वह अपने लक्ष्य से भटक गया, अपने कर्त्तव्य पथ से च्युत हो गया, तो इसका परिणाम जो होना था, वह सामने ही है। 
जिस देश में ईश्वरचन्द्र विद्यासागर जैसे अध्यापक, जिनकी निष्ठा, कर्त्तव्य परायणता, सादगी और त्याग इतिहास की अविस्मरणीय निधि बने हुए हैं, स्वामी श्रद्धानन्द जैसे आदर्श शिक्षक, चाणक्य जैसे लोक शिक्षक होते रहे हैं, उस देश का शिक्षक- शिक्षक नहीं रहा, अब वह मास्टर हो गया है। 
      इस संदर्भ में पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का उल्लेखनीय कथन है- राष्ट्र के निर्माता शिक्षक होते हैं। आचार्य होते हैं, मास्टर नहीं। मास्टर होते हैं- वेतनभोगी कर्मचारी। 
उन्हें स्कूल में आने वाले बालक अपने बालकों की तरह दिखाई नहीं देते। उनकी दृष्टि अब पैसे पर जमी हुई है। अपने शिष्यों के प्रति कोई आत्मीयता, संवेदना रह नहीं गयी, जबकि पहले आत्मीयता की यह डोर शिक्षक और छात्र के बीच बहुत मजबूत होती थी। आज हमारे शिक्षकों का ध्यान विशेष रूप से उन्हीं बच्चों पर थोड़ा बहुत जाता है, जो उनसे ट्यूशन पढ़ते हैं। आजकल ट्यूशन के बड़े- बड़े व्यूरो चल पड़े हैं, जिनमें अधिकाधिक संख्या में स्कूलों और कॉलेजों के शिक्षक ही लिप्त होते हैं। 
      इसके विपरीत विद्यार्थियों की अपनी आत्मीयता एवं स्नेह की डोर से बाँधकर रखने वाले शिक्षकों का भी सर्वथा अभाव नहीं है। मध्यप्रदेश के एक कॉलेज के छात्रावास में यही घटना इसका ज्वलंत प्रमाण है- एक छात्र भयंकर बुखार से पीड़ित था, उस बालक ने उलटी कर दी। उसके कक्षा अध्यापक ने अपने दोनों हाथ उसके मुख के नीचे लगा दिए। इस पर साथ में जो दूसरे शिक्षक बंधु थे, उन्होंने कहा यह क्या कर रहे हो। चपरासी आ जायेगा, वह सफाई कर देगा। उन्होंने कहा इस समय इस बालक को चपरासी की नहीं, माँ की जरूरत है। इस समय मैं माँ का पार्ट अदा कर रहा हूँ। धन्य हैं ऐसे शिक्षक और धन्य है छात्रों के प्रति उनकी आत्मीयता। आज राष्ट्र को ऐसे ही शिक्षकों की जरूरत है। क्या हमारे गुमराह हुए शिक्षक बंधु शिक्षा का सही अर्थ समझ सकेंगे। 
      डॉ. राधाकृष्णन ने शिक्षा केन्द्रों के नाम अपने १५ दिसम्बर १९७८ के पत्र में लिखा है- शिक्षा का अर्थ सिर्फ विभिन्न शैक्षणिक विषयों का शिक्षण नहीं है, बल्कि यह विद्यार्थी में समग्र उत्तरदायित्व का विकास है। शिक्षक के रूप में कोई यह महसूस नहीं करता कि वह एक नई पीढ़ी को जन्म देने जा रहा है। क्या एक शिक्षक के रूप में इसकी सत्यता का अनुभव कर सकते हैं। यदि शिक्षक वर्ग अपनी संकीर्णता की शृंखला तोड़कर अपने अंदर की सोई आत्मीयता को पुनर्जाग्रत् कर लें, तो उसे फिर से राष्ट्र निर्माता का गौरव प्राप्त हो सकता है। यदि ऐसा हो सका, तो यही शिक्षक दिवस के पावन अवसर पर उन महान् शिक्षक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी। 


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