Published on 2016-06-06
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सम्माननीय, पूजनीय हैं वृक्ष 

वृक्ष समाज के विभिन्न वर्गों, धर्म- सम्प्रदायों, नास्तिकों, आस्तिकों; सभी के लिए सम्माननीय, पूजनीय हैं। 
• ये ब्रह्मारूप हैं, क्योंकि भूमण्डल पर जीवन विस्तार के आधार हैं। 
• ये विष्णुरूप हैं, क्योंकि जीवमात्र के पोषण का चक्र चलाते हैं। 
• ये शिवरूप हैं, क्योंकि विकास हेतु चल रहे मंथन से उभरे विष को पी जाते हैं। 
• ये इन्द्र हैं, क्योंकि वर्षा के आधार बनते हैं। 
• ये प्रचण्ड परमार्थी हैं, लगाने वाले को शुद्ध पर्यावरण- पोषण देते हैं। ये भूमि- मिट्टी को सुरक्षित, भूमण्डल को संरक्षित, वायु को शोधित रखने में कुशल और समर्थ हैं। पत्थर मारने वालों को भी फल देते हैं। काटने वालों को भी चारा और उपयोगी लकड़ी देते हैं। 
  
• ये पुण्यदायी पुत्र हैं। मनीषियों ने कुएँ बनवाने को पुण्यदायी कर्म कहा है। कुओं से अधिक बावड़ी, बावड़ियोंसे अधिक तालाब, तालाब से अधिक श्रेष्ठ संतान तथा श्रेष्ठ संतानों से भी अधिक पुण्यदायी वृक्षों को कहा है। यह उक्ति कोरी भावुकता नहीं, एक प्रामाणिक सत्य है। संतति के कर्मों के फल का अंश अभिभावकों को भी मिलता है। संतति सत्कर्म करे तो पुण्य और कुकर्म करे तो पाप का अंश अभिभवकों को मिलेगा। वृक्ष को संततिभाव से लगाने- विकसित करने वालों को सुनिश्चित रूप से पुण्य ही प्राप्त होता है। एक पुत्र को विकसित करने में जितना समय, श्रम, साधनों को लगाना पड़ता है, उतने में अनेक वृक्षों का आरोपण- संरक्षण करके प्रचुर पुण्य एवं यश कमाया जा सकता है। 
  
इसलिए किसी भी भाव से वृक्षों का आरोपण और संरक्षण हर व्यक्ति के लिए श्रेष्ठ लाभकारी, पुण्यदायी कर्म है। इसे पूरी श्रद्धा और तत्परता से किया जाना चाहिए। इसके लिए अनुकूल समय भी आ गया है, इसलिए गायत्री जयंती पर्व से ही सुनिश्चित लक्ष्य निर्धारित करके, योजना बनाकर कार्य प्रारम्भ कर देना चाहिए। गायत्री जयंती, गुरुपूर्णिमा, हरियाली तीज, श्रावणी आदि पर्वों को अपनी योजना में शामिल करते हुए शारदीय नवरात्रि तक लक्ष्य पूरे कर लेने चाहिए। 

योजना समग्र बनायें 
  
वृक्षारोपण अभियान की योजना एकांगी नहीं, समग्र होनी चाहिए। इसके अन्तर्गत लोगों को इसका महत्त्व समझाने, प्रेरित और संकल्पित कराने के साथ उसके लिए समुचित  व्यवस्थाएँ भी बनायी जानी चाहिए। जैसे पौध की उपलब्धि, स्थान एवं संसाधनों की व्यवस्था, अवसर विशेषों का चयन और उपयोग, रोपे गये पौधों को पोषण एवं संरक्षण प्रदान करना आदि। इन चरणों को ठीक से पूरा करने के लिए नीचे कुछ उपयोगी सूत्र दिए जा रहे हैं। क्षेत्रीय परिस्थितियों के अनुरूप उनका उपयोग करने- कराने के प्रयास  किए जाने चाहिए। 

पौध की प्राप्ति - पौध की प्राप्ति के लिए निम्न लिखित स्रोतों का उपयोग किया जा सकता है। 
• फलदार पौधे- उद्यान विभाग से। 
• अन्य पौधे- वन विभाग व नर्सरी से। 
• माली द्वारा कम लागत में बीज/कलमी पौधे तैयार किये जा सकते हैं। 
• शक्तिपीठों, मंदिरों में यदि जगह है तो वहाँ भी पौध तैयार की जा सकती है। 
• अपने घर की छोटी सी क्यारी में भी पौध तैयार कर सकते हैं। 
• नगर निगम/पालिका से संपर्क करें। 
  
• सार्वजनिक स्थान हेतु सरकारी नर्सरी से भी पौधे प्राप्त कर सकते हैं। 

भूमि एवं संसाधन :-
  • ग्रामीण क्षेत्र में भूमि पर वृक्षारोपण हेतु संबंधित पटवारी से उस स्थान का खसरा निकलवायें। तत्पश्चात् उस भूमि पर वृक्षारोपण हेतु ग्राम पंचायत में प्रस्ताव पास करवाकर वृक्षारोपण करें, जिसमें पंचायत का सहयोग भी लिया जाये। 
• रोड के दोनों ओर वृक्षारोपण हेतु पंचायत द्वारा तार फेन्सिंग करवाकर वृक्षारोपण करें, जिन्हें पालने की जिम्मेदारी आस- पास के दुकानदारों या रहवासियों को दी जा सकती है। 
• रेलवे के भूभाग पर वृक्षारोपण करने के लिए रेल विभाग से अनुमति व सहायता ली जा सकती है। 
• विद्यालयों मे ईको क्लब द्वारा प्रति वर्ष इस हेतु कुछ राशि माध्यमिक, हाईस्कूल व हायर सेकेन्ड्री शालाओं को प्राप्त होती है। प्राचार्य से चर्चा कर विद्यालयों में तरुमित्रयोजना द्वारा विद्यार्थियों को पर्यावरण आन्दोलन से जोड़कर पौधारोपण कर उनके संरक्षण का दायित्व विद्यार्थियों को दे देंं। 
• नगरीय क्षेत्रों में नगर पालिका, निगम या नगर पंचायत से ट्री- गार्ड की व्यवस्था बनवाई जा सकती है। 
• सस्ते बाँस खरीद कर बाँस की चिपली से भी सस्ते ट्री- गार्ड बनवाये जा सकते हैं। कंटीली तार का घेरा भी बना सकते हैं। 
• राष्ट्रीकृत बैंक/बीमा/पेट्रोलियम कम्पनी भी वृक्षारोपण हेतु ट्री गार्ड व साधन उपलब्ध करवाती है, उनसे भी इस कार्य हेतु सहयोग लिया जा सकता है। 

अवसर विशेष :- वृक्षारोपण के लिए निर्धारित क्षेत्र में वृक्षगंगा अभियान, धरती को हरी चूनर पहनाने के विशेष आयोजनों में भावनाशीलों एवं सम्पन्नों को तरुपुत्र, तरुमित्रआदि बनाकर अभियान को गतिशील बनाया जा सकता है। इसके अलावा निम्न अवसरों का भी समुचित उपयोग किया जा सकता है। 
  
• अपने जन्मदिन अथवा विवाह दिवस पर। 
• अपने पितरों की स्मृति में। 
• पर्व- त्यौहार, गायत्री जयंती, ज्येष्ठ पूर्णिमा, गुरुपूर्णिमा, हरियाली तीज आदि प्रसंग में। 
• नये भवन, परिसर के शुभारम्भ पर। 
• यज्ञों, कथाओं में, संस्कारों के आयोजन में प्रसाद रूप में पेड़े के साथ- साथ पेड़ भी बाँटें। 
• महाविद्यालयों /विद्यालयों में प्रवेश पर ज्ञान दीक्षा के अवसर पर। 
• अपने गुरु व इष्ट को श्रद्धाञ्जलि स्वरूप वृक्ष लगायें। 
• अपने नक्षत्र का वृक्ष लगायें। 
• घरों में वास्तु अनुसार वृक्ष लगायें, वास्तु वाटिका बनायें। 
• गाँव के देव स्थान को जाग्रत करें और त्रिवेणी (पीपल, बरगद, नीम), हरिशंकरी (पीपल, बरगद, पाकड़), पंचवटी (पीपल, बरगद, अशोक, बेल, जामुन) की स्थापना करें। 
• नदियों को वृक्षों की हरी चूनर चढ़ायें, तटों पर औषधीय, धार्मिक एवं पर्यावरण महत्त्व के पौधे लगायें ।। 
• पहाड़ियों, टेकरियों को गोद लेकर हरा- भरा बनायें। 

सिंचाई, सुरक्षा :- मात्र पौधा लगाने को ही इतिश्री न समझा जाये। इनमें खाद- पानी देने तथा वृक्ष के रूप में विकसित होने तक इनकी समुचित देख- रेख की जाये। देख- रेख, सुरक्षा एवं परिपोषण की व्यवस्था न बन सकी, तो श्रम का अधिकांश भाग सरकारी प्रयासों की भाँति निरर्थक चला जायेगा और अन्ततः असफलता ही हाथ लगेगी। प्रारंभ में गर्मी के दिनों में सिंचाई की एक- दो वर्ष आवश्यकता पड़ती है, फिर तो उनकी जड़ें गहरी चली जाती हैं और वे स्वावलम्बी हो जाते हैं। 

• वृक्ष जन- जन से लगवायें। पालन- पोषण की जिम्मेदारी युवा मंडल सँभाले। पास के मुहल्ले, कस्बे और गाँव के किशोरों, युवक- युवतियों तथा महिला- पुरुषों के पाँच- पाँच के समूह बनाकर उन्हें भी यह जिम्मेदारी दी जा सकती है। 
  
• जहाँ पालन- पोषण का प्रबंध न हो, वहाँ वर्षा ऋतु में पौध रोपण की व्यवस्था बनायें व ऐसे पौधों का चयन करें, जिन्हें बहुत अधिक देख- रेख की जरूरत न पड़ती हो। ऐसे स्थान के लिये किसी माली अथवा मजदूर को नियुक्त भी किया जा सकता है। उसके पारिश्रमिक की व्यवस्था किसी धनी व्यक्ति द्वारा अथवा गाँव, मोहल्ले व सोसायटी द्वारा सामूहिक रूप से चंदा कर बनाई जा सकती है। 

• जल वृक्ष को अधिक दिन तक लाभ पहुँचाये, इसके लिए जरूरी है कि थाँवला बनाकर सिंचाई की जाय। थाँवला सूखते ही इसके ऊपर की सतह में पतली गुड़ाई कर दी जाये और हो सके तो यहाँ घास- पत्ती आदि फैला दी जाये। इससे थाँवले के नीचे की मिट्टी का पानी उड़ना बन्द हो जाता है। 
• जल भावनाओं का सर्वश्रेष्ठ वाहक है। अतः व्रत रहकर, पवित्र होकर दिव्य आत्माओं व वृक्ष को जल पिलाने की भावना से जल देने का महत्त्व सामान्य जलदान से कई गुना  अधिक लाभदायक है। 

पौधों, वृक्षों की रक्षा के लिए अधिक पानी की जरूरत नहीं होती। केवल उनकी जड़ों के आसपास मिट्टी में नमी बनी रहे, इतना ही पर्याप्त है। इसके लिए ड्रिप पद्धति से सिंचाई करने से थोड़े पानी से भी उन्हें जीवित रखा जा सकता है। व्यवस्था के सूत्र इस प्रकार हैं। 
  
• जहाँ सामूहिक सघन वृक्षारोपण किया जाय, वहाँ भावनाशील साधकों के सहयोग से विधिवत् ड्रिप पाइप लाइन डालकर व्यवस्था बनाई जा सकती है। इसके अभाव में कुछ सस्ते व्यावहारिक प्रयोग इस प्रकार हैं। 
  
• पौधे- वृक्ष की जड़ के पास पैंदा कटी हुई पानी की बोतल उलटी गाढ़़ दी जाय अथवा प्लास्टिक, टिन, मिट्टी के पुराने बर्तनों के पैंदे में छोटा छेद करके उन्हें जड़ के पासगाढ़ दिया जाय, ऊपर मुँह खुला रखें। उसमें एक बार पानी भर देने से लगभग एक सप्ताह तक जड़ों में नमी बनी रहती है। 
  
बीज आरोपण अभियान :- दुर्गम स्थानों, वनों, टेकरियों पर, जहाँ पौधों के आरोपण की व्यवस्था न बन सके वहाँ बीजों के आरोपण का क्रम सहजता से अपनाया जा सकता है। इस हेतु उपयोगी सूत्र इस प्रकार हैं :- 

जिस क्षेत्र में जो वृक्ष सहजता से उपलब्ध हो सकते हैं, वहाँ के लिए उनके बीज पर्याप्त मात्रा में एकत्रित कर लिये जायें। जैसे नीम, इमली, जामुन, बड़, पीपल, बेर, अमरूद, सीताफल आदि। एक थैली में बीज, कम्पोस्ट खाद एवं एक खुरपी लेकर स्वयंसेवक निकलें। उपयुक्त स्थानों पर खुरपी से छोटा गड्ढा करके उसमें बीज एवं खाद डालकर सादा मिट्टी डाल दें। यह कार्य वर्षा ऋतु में एक- दो अच्छी बारिश हो जाने पर सहज ही किया जा सकता है। 


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