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गुरु के निर्देशों पर खरे सिद्ध होने की सच्ची साधना करें

[Shantikunj], Jun 23, 2017
गुरु के साँचे में ढलें, सच्चे समर्पण का अभ्यास करें, स्वयं भी साँचे बनें

पाक्षिक के गत (१६ जून) अंक में गुरुपूर्णिमा के संदर्भ में गुरुगीता के संदर्भ से गुरुसत्ता की महत्ता, गुरुतत्त्व के बोध और दिव्य अनुदानों को पाने, धारण करने की पात्रता बढ़ाने के सूत्रों पर प्रकाश डाला गया था। इस अंक में पूज्य गुरुदेव के निर्देशों के अनुसार जीवन साधना करते हुए युगधर्म के बेहतर निर्वाह और आत्मकल्याण के श्रेष्ठतर लक्ष्यों को पाने के संदर्भ में चर्चा की जा रही है। पूज्य गुरुदेव के उद्धरण 'महाकाल की चेतावनी' नामक पुस्तिका से लिए गये हैं। परिजनों से यही आशा- अपेक्षा है कि गुरुपूर्णिमा पर्व पर उभरने वाले दिव्य ऊर्जा प्रवाह का भरपूर लाभ उठाने में पूरी तत्परता बरतेंगे।

पूज्य गुरुदेव और हम
मनुष्य मात्र के अस्तित्व पर मँडरा रही विनाश की घटाओं को निरस्त करके, सभी के लिए उज्ज्वल भविष्य का सृजन करने वाली ईश्वरीय योजना 'युग निर्माण योजना' भूमण्डल पर प्रभावी ढंग से उतारने का महान दायित्व लेकर पूज्य गुरुदेव अवतरित हुए। इस प्रकार के प्रत्येक अवतार के साथ उनके साथ आत्मिक स्तर पर जुड़े हुए उनके साथी- सहचरों को भी योजनाबद्ध ढंग से भेजा जाता है। जो संस्कारवान आत्माएँ इस प्रकार की योजना के अन्तर्गत भूमण्डल पर आती हैं, उन्हें दुहरा श्रेय- सौभाग्य मिलता है।

१- वे अपने परम प्रिय के सान्निध्य का आनन्द उठाते हुए युगधर्म में प्रवृत्त होते हैं। यह सुख इतना बड़ा होता है जिसके लिए जीवनमुक्त आत्माएँ मोक्ष का सुख छोड़कर भी प्रसन्नता से जन्म लेने के लिए तैयार हो जाती हैं। इसके साथ ही ईश्वरीय प्रयोजन की पूर्ति में अपनी प्रतिभा लगाने के कारण उन्हें पावन पुण्य और यश की भी प्राप्ति होती है।

२- दिव्य अभियान में, दिव्यात्माओं के मार्गदर्शन में भाग लेने के कारण अन्तःकरण परिष्कार के उच्च स्तरीय लाभ सहज ही प्राप्त होने की अनोखी संभावना बन जाती है। यदि इस प्रसंग में जन्म लेने के उद्देश्य को निरन्तर ध्यान में रखा जा सके तो अनेक जन्मों तक प्रचण्ड तपस्या करने से प्राप्त होने वाले लाभ सहज क्रम में ही मिल जाते हैं।

युगऋषि के साथ जुड़ी हुई जाग्रत् आत्माओं को उक्त दोनों प्रकार के लाभ मिलने ही चाहिए। इस क्रम में जो कर्त्तव्य- उत्तरदायित्व मिलते हैं, उन्हें लौकिक कार्य न मानकर उत्कृष्ट स्तर की आत्मसाधना मानकर प्रत्येक साधक को चलना चाहिए।

मौलिक सिद्धांत समझें
युगऋषि ने स्पष्ट रूप से यह बात कही है कि अध्यात्म को वैज्ञानिक और व्यावहारिक स्तर पर स्थापित एवं प्रयुक्त करने से ही युग साधना को सफल बनाया जा सकता है। उत्कृष्ट खेल भावना विकसित करने के लिए कुछ खेलों को माध्यम बनाया जाता है। उसके लिए प्रतियोगिताएँ भी आयोजित की जाती हैं। यदि 'खेल भावना' को परिष्कृत करने का उद्देश्य भुला दिया जाय तो खेलों के तमाम आयोजनों का क्या महत्त्व रह जायेगा? इसी तरह जीवन परिष्कार की साधना के लिए कुछ जप- तप आदि का विधान भी बनाया जाता है। यदि उन कर्मकाण्डों के स्थूल विधि- विधानों के बीच आत्म- परिष्कार का प्रयोजन ध्यान से उतर जाय तो उन सब की क्या उपादेयता रह जायेगी? इसी तथ्य को स्पष्ट करते हुए गुरुवर लिखते हैं:-
यहाँ हम एक बात अवश्य कहेंगे कि आप आध्यात्मिकता के मौलिक सिद्धान्तों को समझिए। पूजा को पीछे हटाइए। आप यह मत सोचिए कि गुरुजी ने चौबीस- चौबीस लाख का जप किया था। नहीं, हम चौबीस लाख के जप करने वाले बहुतों का नाम बता सकते हैं जो आज बिल्कुल खाली एवं छूँछ हैं। केवल जप करने वाले कुछ नहीं कर सकते हैं, हम ब्राह्मण की शक्ति, संत की शक्ति जगाना चाहते हैं। अब तो मैं यहाँ तक कहता हूँ कि अब माला जप करें या न करें, एक माला जप करें या ८१ माला जप करें, परंतु मुख्य बात यह है कि आप अपने ब्राह्मणत्व को जगाइए।

पूज्य गुरुदेव ने यह तथ्य समय- समय पर बार- बार दुहराया है कि उनकी साधना की सफलता के पीछे अनुष्ठान के कर्मकाण्डों की अपेक्षा उनकी ब्राह्मण वृत्ति का योगदान कई गुना अधिक है। वे अपने शिष्यों- सहयोगियों से भी यही उम्मीद रखते हैं कि वे कर्मकाण्ड की अपेक्षा अपनी श्रेष्ठ वृत्तियों पर अधिक ध्यान दें। वे अक्सर कहा करते थे कि-
"मेरे चारों ओर जो वैभव बिखरा दिखाई देता है, इसका श्रेय हमारे अन्दर के ब्राह्मण को जाता है।"
सच है उनको दिये गये श्रद्धा- सहयोग का अधिकतम उपयोग लोकमंगल के कार्यों में ही किया जाता रहा। उनकी इस ब्राह्मणोचित प्रतिष्ठा के नाते ही इतना श्रद्धा- सहयोग उन्हें मिलता रहा कि गायत्री तपोभूमि, शान्तिकुंज से लेकर २४०० गायत्री शक्तिपीठों का निर्माण देखते- देखते हो गया। जिसके अन्दर उच्च आदर्शों के लिए सच्चे समर्पण का भाव होता है, उसे इस प्रकार के लाभ निश्चित ही मिलते हैं।

समर्पण की अवधारणा और कसौटी
समर्पण शब्द बोल देना बहुत आसान है, किन्तु उसका निर्वाह तो अपने 'मैं' को, अपनी इच्छाओं को, अपने लौकिक बड़प्पन और स्वाभिमान को विसर्जित करने से ही होता है। कामनाएँ अपनी, महत्त्वाकांक्षाएँ अपनी, और समर्पण गुरु को; यह कैसे होगा? इस संदर्भ में गुरुवर ने लिखा है:-
समर्पण का अर्थ है दो का अस्तित्व मिटाकर एक हो जाना। तुम भी अपना अस्तित्व मिटाकर हमारे साथ मिला दो व अपनी क्षुद्र महत्त्वाकांक्षाओं को हमारी अनंत आध्यात्मिक महत्त्वाकांक्षाओं में विलीन कर दो। जिसका अहं ज़िन्दा है, वह वेश्या है। जिसका अहं मिट गया, वह देवता है। देखना है कि हमारी भुजा, आँख, मस्तिष्क बनने के लिए तुम कितना अपने अहं को गला पाते हो। इसके लिए निरहंकारी बनो।
गुरु को समर्पण हो गया तो गुरुकार्य के लिए अपनी इच्छा, अपनी पसंद और अपनी प्रतिष्ठा आड़े नहीं आती। साधक गुरुकार्य की सफलता के लिए उन्हें सहज ही त्याग देता है। फिर गुरुकार्य के लिए संकल्पित व्यक्तियों को एकजुट होने में विशेष कठिनाई नहीं होती। समर्पण सही अर्थों में हुआ या नहीं, इसकी कसौटी वे संघबद्धता की सफलता को ही मानते हैं। लिखते हैं:-
हमारे अंतःकरण श्रद्धा एवं समर्पण के तत्वों से भरपूर हैं, इसकी कसौटी यही है कि हम अपनी संघबद्धता को और अधिक सशक्त करेंगे। आसुरी शक्तियों के मायावी जाल से बचेंगे। परस्पर दोषारोपण के स्थान पर पारस्परिक सहयोग, सौहार्द्र हमारी जीवन- नीति बनेगी। अहं की प्रतिष्ठा के स्थान पर अहं का विसर्जन, विलय हमारा जीवन- सिद्धान्त होगा। महत्वाकांक्षा का स्थान समर्पित भावनाएँ लेंगी। स्वार्थपरता, सेवा भावना में बदलेगी।

समर्थ बनें और बनायें
उस प्रकार समर्पण की कसौटी पर खरा सिद्ध होते ही लोकसेवी साधक के व्यक्तित्व का परिष्कार होने लगता है और वह अधिक महत्त्वपूर्ण- वज़नदार कार्यों का भार उठाने में सक्षम हो जाता है।

बड़े कामों के लिए बड़ी हस्तियाँ ही अभीष्ट होती हैं। इक्कीसवीं सदी के साथ एक से एक बढ़कर वज़नदार और महत्त्वपूर्ण कार्य जुड़े हैं। उन्हें सम्पन्न करने के लिए मनोबल के धनी और चरित्र बल में मूर्धन्य स्तर के व्यक्ति ही चाहिए। तलाश उन्हीं की हो रही है। प्रतिभा परिष्कार का अभियान उसी दृष्टि से चलाया जा रहा है। उस परिष्कार से तप कर निकले हुए व्यक्ति न केवल अपने अग्रगामी वरिष्ठजनों में गिने जाने योग्य बनेंगे, वरन दूसरों को ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने में भी अपनी विशिष्टता का परिचय दे सकेंगे।

जो स्वयं उत्कृष्ट बनने की साधना करते हैं, वे ही आगे चलकर उत्कृष्ट व्यक्तियों को गढ़ने में भी योगदान देने में समर्थ हो जाते हैं। गुरुदेव ने भी यही क्रम अपनाया और वह अपने परिजनों से भी यह अपेक्षा करते हैं :-
तुम्हीं को कुम्हार व तुम्ही को चाक बनाना है। हमने तो अनगढ़ सोना- चाँदी ढेरों लाकर रख दिया। तुम्ही को साँचा बनाकर सही सिक्के ढालना है। साँचा सही होगा तो सिक्के भी ठीक आकार के बनेंगे। आज दुनिया में पार्टियाँ तो बहुत हैं, पर किसी के पास कार्यकर्त्ता नहीं हैं। लेबर सबके पास हैं पर समर्पित कार्यकर्त्ता, जो साँचा बनता है, वह कई को बना देता है, अपने जैसा कहीं भी नहीं है। हमारी यह दिली ख्वाइश है कि हम अपने पीछे कार्यकर्त्ता छोड़कर जायें। तुम सबसे अपेक्षा है कि अपने गुरु की तरह एक श्रेष्ठ साँचा बनोगे।

पू. गुरुदेव यहाँ एक महत्त्वपूर्ण सत्य उद्घाटित कर रहे हैं। उन्होंने युग निर्माण परिवार में अपनी तप साधना से सोने- चाँदी जैसी उच्च आत्माओं को जोड़ दिया है। उन्हें पुर्जे- आभूषण जैसा रूप देने की जिम्मेदारी वे अपने नैष्ठिक परिजनों को सौंपना चाहते हैं। हमें यह शिकायत नहीं करनी चाहिए कि अमुक व्यक्ति उत्साही तो है, लेकिन अनगढ़ है, उसे काम कैसे सौंपें? सोचना यह चाहिए कि गुरुकृपा से सोने- चाँदी जैसे उत्साही व्यक्ति हमें मिल गये हैं। इस बेशकीमती धातु को वाञ्छित रूप देने की थोड़ी कुशलता तो हमें अर्जित करनी ही है।

आसुरी प्रवृत्तियों से बचें
गुरुवर ने एक ओर जहाँ सृजन सैनिकों की क्षमता- कुशलता बढ़ाने की बात कही है, वहीं आसुरी शक्तियों से अपनी सुरक्षा करने की विशेष सावधानी बरतने के लिए भी निर्देश दिए हैं। हम इस युग के देवासुर संग्राम के देव पक्ष के सैनिक बने हैं, इसलिए आसुरी शक्तियाँ हम पर सबसे पहले आघात करना चाहेंगी। युगऋषि स्पष्ट लिखते हैं :-
देव परिकर के सदस्यों के लिये यह आत्मावलोकन, आत्म- चिंतन एवं आत्म- मंथन का समय है। नवसृजन के ये जुझारू सैनिक, वे चाहे गायत्री तपोभूमि, शांतिकुंज एवं ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान के कार्यकत्ताओं के रूप में अग्रिम पंक्ति में खड़े हों अथवा फिर अपने- अपने क्षेत्रों में नवनिर्माण के लिए जूझ रहे कर्मठ सेनानी हों। अपने परिजनों को, गायत्री परिवार के सदस्यों को यह लड़ाई अग्रिम पक्ति में खड़े होकर लड़नी पड़ रही है। यह कारण है कि असुरता के कुचक्रों, कुटिल चालों, विनाशक आघातों का सबसे पहला निशाना वही बनते हैं।

गुरुदेव के कहने का तात्पर्य यह है कि आसुरी शक्तियाँ थोड़ा- सा मौका पाते ही हमारे अंदर की आसुरी प्रवृत्तियों को उत्तेजित करेंगी ही। 'सावधानी हटी, दुर्घटना घटी' यह कहावत हर सृजन सैनिक को याद रखनी चाहिए। हमारे रास्ते में आसुरी तत्वों को सेंधमारी के अनेक अवसर मिलते हैं।

प्रभुकार्य तत्परता से किया तो प्रभु अनुग्रह से सफलता तो मिलेगी ही। सफलता मिलते ही स्वयं की श्रेष्ठता का अहंकार पनपने लगता है। यदि सफलता का श्रेय संयोगवश किसी और को मिल गया तो अपने मन में हीनता और ईर्ष्या के विचार उठने लगते हैं। यह दो ही मनोवृत्तियाँ सृजन सैनिकों एवं अनेक संगठनों के लिए घातक होती हैं। गुरुवर ने इसे 'माया का जादू' कहा है। लिखते हैं :-
माया के जादू से हमारा अभिमान कभी तो कुछ साधन एवं सम्मान बटोर कर शीर्ष पर जा पहुँचता है और कभी आहत होकर कु्रद्ध नाग की तरह फुँकार उठता है। गुस्से में उबलते हुए हम कहने लगते हैं। "आखिर क्या मिला हमारी दीर्घकालीन सेवाओं के बदले में? क्या पाया हमने अपने भारी भरकम त्याग और बलिदान का पुरस्कार?" कहते हुए भूल जाते हैं कि "सच्चा त्यागी और बलिदानी पुरस्कार की माँग से बहुत ऊपर उठ जाता है। लेकिन अमुक को ढेर सारा सम्मान मिला और अनगिनत साधन- सुविधाएँ, मेरी योग्यता क्या किसी से कम है? क्या मेरा समर्पण उनसे थोड़ा भी कम है, सवालों को उठाते हुए क्या हम अपने ही समर्पणों का मजाक नहीं उड़ा देते?

प्रत्येक युग सैनिक को इन आसुरी आक्रमणों से स्वयं को भी बचाना है और अपने संगठन की सुरक्षा भी करनी है। उक्त प्रकार की अहंता या हीनता के भाव संगठन को विभाजित करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। हमारा संगठन लौकिक समूह मात्र नहीं है। पू. गुरुदेव ने 'अपने अंग अवयवों से' नामक पत्रक में लिखा है कि "आप सबकी समन्वित शक्ति का नाम ही वह व्यक्ति है जो यह पंक्तियाँ लिख रहा है।" इस नाते संगठन को क्षति पहुँचाना उनकी विराट काया को क्षति पहुँचाने जैसा क्रूर कृत्य ही कहा जा सकता है। उन्होंने यह बात स्पष्ट शब्दों में लिखी है :-
संगठन अपने प्रभु का विराट शरीर है, पारस्परिक सहयोग एवं सहकार ही उनकी इस विराट मूर्ति की आराधना है। तनिक आत्मावलोकरन करके देखें कि कहीं हम अपने कृत्यों से अपने प्रभु के शरीर पर आघात तो नहीं कर रहे हैं।

प्रेम के बंधन
हमारा संगठन अन्य संगठनों की तरह लौकिक नियमों से नहीं बँधा है। आत्मीयता- प्रेम के अलौकिक सूत्रों से गुरुसत्ता ने हमें बाँधा है। संगठन को व्यापक बनाने के लिए हमें भी दिव्य प्रेम की डोर को मजबूत बनाना होगा। युगऋषि कहते हैं :-
हम प्यार की रस्सी से बाँधे हुए हैं, आत्मीयता की रस्सी से बाँधे हुए हैं। ये रस्सियाँ आपको भी तैयार करनी चाहिए, ताकि आप नए आदमियों को बाँध करके अपने पास रख सकें और जो आदमी वर्तमान में हैं आपके पास, उनको मजबूती से जकड़े रह सकें। अन्यथा जो जुड़े हैं, वे भी नहीं रहेंगे। इनकी सफाई भी आपको करनी है। आत्मीयता अगर न होगी और आपका व्यक्तित्व न होगा तो आप के लिए इनकी सफाई करना भी मुश्किल हो जाएगा।

पूज्य गुरुदेव ने शक्तिपीठों की स्थापना इसलिए की थी कि वे सृजन सैनिकों के लिए प्रशिक्षण केन्द्र एवं नव जागरण केन्द्र बनें। यह सब तभी संभव होता है जब वहाँ के ट्रस्टीगण एवं कार्यकर्त्तागण परस्पर स्नेह के बंधनों में बँधकर जाग्रत्, जीवन्त मशाल का रूप ले लें। गुरुपर्व के अवसर पर सभी साधकों को यह प्रयास करने चाहिए कि गुरुवर की कसौटी पर खरे सिद्ध हों। इस प्रकार लोकमंगल और आत्मकल्याण के उभय लक्ष्यों को पाने का सौभाग्य पायें।






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